किसी व्यक्ति की दोनों आँखों से बनने वाले प्रतिबिम्ब के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है ?
- (a)दोनों आँखें वस्तुत: एक ही प्रतिबिम्ब को देखती हैं ।
- (b)एक आँख वस्तु के आधे भाग को देखती है ।
- (c)दोनों आँखें उनके द्वारा देखे जाने वाले दोनों प्रतिबिम्बों को संयुक्त करती हैं ।
- (d)प्रत्येक आँख किंचित् भिन्न प्रतिबिम्ब को देखती है ।
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) प्रत्येक आँख किंचित् भिन्न प्रतिबिम्ब को देखती है । कारण भूमिति जितना सरल है । हमारी दोनों आँखें चेहरे पर एक ही स्थान पर नहीं, कुछ दूरी पर लगी हैं । इसलिए किसी वस्तु को देखते समय दोनों आँखों की दृष्टि-रेखाएँ उस वस्तु तक थोड़े भिन्न कोणों से पहुँचती हैं, और परिणामस्वरूप दोनों के रेटिना पर बनने वाले प्रतिबिम्ब बिलकुल एक जैसे नहीं होते । यह अंतर छोटा होता है, पर होता अवश्य है, और उसे द्विनेत्री असमानता कहा जाता है । इसे परखने के लिए किसी उपकरण की आवश्यकता नहीं : अपनी उँगली आँखों के सामने रखिए और बारी-बारी से एक आँख बंद कीजिए — उँगली पीछे की पृष्ठभूमि के सापेक्ष खिसकती हुई दिखाई देगी । वही खिसकाव दोनों प्रतिबिम्बों का अंतर है, और वस्तु जितनी पास होगी अंतर उतना बड़ा होगा । अब इसका उपयोग देखिए । मस्तिष्क इन दो थोड़े भिन्न प्रतिबिम्बों को मिलाकर एक ही दृश्य बनाता है, और उसी अंतर से वह दूरी का अनुमान लगाता है — इसी को त्रिविम दृष्टि कहते हैं । यदि दोनों आँखें ठीक एक ही प्रतिबिम्ब देखतीं तो यह सूचना मिलती ही नहीं और गहराई का बोध कमज़ोर पड़ जाता । इस तरह ‘थोड़ा भिन्न देखना’ कोई कमी नहीं, बल्कि वही व्यवस्था है जिससे हम दूरी आँक पाते हैं । इसीलिए उत्तर विकल्प (d) है । विकल्पों को छाँटते समय एक कसौटी बहुत काम आती है : पूछिए कि कथन में क्रिया का कर्ता कौन है । दो विकल्प आँखों को वह काम सौंपते हैं जो मस्तिष्क करता है, अर्थात् दोनों दृश्यों को मिलाना या एक ही दृश्य देखना । एक विकल्प आँख के दृष्टि-क्षेत्र के बारे में ऐसी बात कहता है जिसे एक आँख बंद करके तुरंत ग़लत सिद्ध किया जा सकता है । केवल एक कथन ऐसा बचता है जो आँख के अपने स्तर पर सही तथ्य बताता है, और वही उत्तर है ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)दोनों आँखें वस्तुत: एक ही प्रतिबिम्ब को देखती हैं । — यह कथन ठीक उलटी बात कहता है । यदि दोनों आँखें वस्तुतः एक ही प्रतिबिम्ब देखतीं, तो दोनों से मिलने वाली सूचना में कोई अंतर ही न होता और दो आँखें रखने का कोई लाभ न रहता । वास्तव में दोनों आँखों की स्थिति भिन्न होने के कारण उनके रेटिना पर बने प्रतिबिम्ब भी भिन्न होते हैं, और यही सूक्ष्म भिन्नता गहराई के बोध का आधार है । इस विकल्प का आकर्षण यह है कि रोज़मर्रा के अनुभव में हमें दो नहीं, एक ही दृश्य दिखाई देता है — इसलिए लगता है कि दोनों आँखें एक ही चीज़ देख रही हैं । पर वह एकत्व आँखों में नहीं, मस्तिष्क में बनता है, और वह दो भिन्न प्रतिबिम्बों को मिलाकर बनता है ।
- (b)एक आँख वस्तु के आधे भाग को देखती है । — यह कथन भी ग़लत है । सामान्य दृष्टि में एक आँख वस्तु का आधा भाग नहीं देखती ; वह पूरी वस्तु देखती है, बस अपने कोण से । दोनों आँखों के दृष्टि-क्षेत्र आपस में बड़े भाग में एक-दूसरे पर चढ़े रहते हैं, और इसी अतिव्यापन के भीतर आने वाली वस्तुओं के लिए त्रिविम दृष्टि काम करती है । इसे स्वयं जाँचा जा सकता है : एक आँख बंद करके देखिए, वस्तु आधी नहीं दिखेगी, केवल गहराई का बोध कमज़ोर होगा और आसपास का दृष्टि-क्षेत्र उस ओर से कुछ घट जाएगा । जिन प्राणियों की आँखें सिर के दोनों ओर लगी होती हैं उनका अतिव्यापन कम होता है, इसलिए उनका दृष्टि-क्षेत्र चौड़ा होता है पर गहराई का बोध कमज़ोर ।
- (c)दोनों आँखें उनके द्वारा देखे जाने वाले दोनों प्रतिबिम्बों को संयुक्त करती हैं । — यह विकल्प सबसे नज़दीक आकर चूकता है, और उसकी चूक कर्ता में है । संयोजन का काम आँखें नहीं करतीं । प्रत्येक आँख का काम इतना ही है कि वह अपने लेंस से प्रकाश को मोड़कर अपने रेटिना पर एक प्रतिबिम्ब बनाए और उसे तंत्रिका-संकेत में बदलकर आगे भेज दे । दोनों संकेतों को मिलाकर एक दृश्य बनाने और उनके अंतर से दूरी आँकने का काम मस्तिष्क के दृष्टि-क्षेत्र में होता है । इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान दीजिए कि प्रश्न आँखों द्वारा प्रतिबिम्ब बनने के संबंध में पूछ रहा है, और उस स्तर पर सही तथ्य यही है कि दोनों प्रतिबिम्ब थोड़े भिन्न होते हैं । संयोजन उसके बाद की, और दूसरे अंग की, क्रिया है ।
अवधारणा
आँख एक प्रकाशीय तंत्र है । प्रकाश पहले पारदर्शी कॉर्निया से होकर भीतर आता है, फिर पुतली से गुज़रता है, जिसका आकार आइरिस घटाती-बढ़ाती है, और फिर लेंस से मुड़कर रेटिना पर पड़ता है । रेटिना पर बनने वाला प्रतिबिम्ब वास्तविक, उलटा और वस्तु से छोटा होता है ; उसे सीधा करके अनुभव कराने का काम मस्तिष्क करता है । लेंस की वक्रता बदलकर पास और दूर की वस्तुओं पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता समंजन कहलाती है । अब दो आँखों वाली व्यवस्था देखिए । दोनों आँखें कुछ दूरी पर होने के कारण एक ही वस्तु को थोड़े भिन्न कोणों से देखती हैं, इसलिए दोनों रेटिना पर बने प्रतिबिम्बों में सूक्ष्म अंतर रहता है । मस्तिष्क इन दोनों को मिलाकर एक दृश्य बनाता है और उसी अंतर से गहराई का अनुमान लगाता है — यही त्रिविम दृष्टि है । दूरी आँकने के अन्य संकेत भी होते हैं, जैसे वस्तु का सापेक्ष आकार, एक वस्तु का दूसरे को ढाँप लेना, और गति के साथ पृष्ठभूमि का खिसकना ; इन्हें एक आँख से भी पकड़ा जा सकता है । पर द्विनेत्री असमानता वह संकेत है जो केवल दो आँखों से मिलता है और पास की वस्तुओं के लिए सबसे सटीक होता है ।
भौतिकी वाले इस खंड में प्रकाश और दृष्टि पर प्रश्न नियमित रूप से आते हैं, और उनमें रचना प्रायः चार कथनों की होती है जिनमें से तीन सामान्य भ्रांतियाँ हों और एक सही तथ्य । यहाँ भी यही है : एक कथन कहता है कि दोनों आँखें एक ही प्रतिबिम्ब देखती हैं, एक कहता है कि हर आँख आधा भाग देखती है, और एक कर्ता बदलकर संयोजन का काम आँखों को सौंप देता है । तीनों रोज़मर्रा के अनुभव से उपजी धारणाएँ हैं, और इसीलिए उन्हें विकल्पों में रखा गया है । उत्तर तक पहुँचने का सबसे सुरक्षित रास्ता यह पूछना है कि कौन-सा कथन प्रयोग से जाँचा जा सकता है — और उँगली वाला प्रयोग तत्काल दिखा देता है कि दोनों आँखों का दृश्य भिन्न है । यह भी ध्यान दीजिए कि हिन्दी स्तंभ में विकल्प (a) में ‘वस्तुत:’ विसर्ग के स्थान पर कोलन के साथ छपा है और विकल्प (d) में ‘किंचित्’ हलंत के साथ ; दोनों को पुस्तिका के अनुसार वैसा ही रखा गया है ।
मुख्य तथ्य
- दोनों आँखें चेहरे पर कुछ दूरी पर होती हैं, इसलिए वे एक ही वस्तु को थोड़े भिन्न कोणों से देखती हैं और उनके रेटिना पर बने प्रतिबिम्ब सूक्ष्म रूप से भिन्न होते हैं ।
- इस अंतर को द्विनेत्री असमानता कहते हैं, और वस्तु जितनी पास होती है यह अंतर उतना ही बड़ा होता है ।
- मस्तिष्क दोनों प्रतिबिम्बों को मिलाकर एक दृश्य बनाता है और उनके अंतर से दूरी आँकता है ; इसी क्षमता को त्रिविम दृष्टि कहा जाता है ।
- रेटिना पर बनने वाला प्रतिबिम्ब वास्तविक, उलटा तथा वस्तु से छोटा होता है ; उसे सीधा करके अनुभव कराने का काम मस्तिष्क करता है ।
- लेंस की वक्रता बदलकर पास तथा दूर की वस्तुओं पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता समंजन कहलाती है, और यह काम पक्ष्माभी पेशियाँ करती हैं ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- अनुभव को तथ्य मान लेना । हमें एक ही दृश्य दिखाई देता है, इससे यह नहीं निकलता कि दोनों आँखों के प्रतिबिम्ब एक जैसे हैं ; एकत्व मस्तिष्क बनाता है ।
- संयोजन का काम आँखों को सौंप देना । दोनों प्रतिबिम्बों को मिलाने और दूरी आँकने का काम मस्तिष्क के दृष्टि-क्षेत्र में होता है ।
- एक आँख से देखने पर आधी वस्तु दिखने की कल्पना करना । एक आँख पूरी वस्तु देखती है ; केवल गहराई का बोध कमज़ोर होता है ।
दृष्टि पर प्रश्न चार साँचों में आते हैं । पहला साँचा संरचना का है — आँख के भाग और उनका क्रम, जैसे बाहर से भीतर की ओर परतें । दूसरा साँचा प्रतिबिम्ब का है : रेटिना पर बनने वाला प्रतिबिम्ब कैसा होता है, और लेंस उसे कैसे बनाता है । तीसरा साँचा दोषों का है — निकट दृष्टि, दूर दृष्टि तथा जरा दृष्टि, उनके कारण और उन्हें सुधारने वाले लेंस । चौथा साँचा वही है जो यहाँ आया है, अर्थात् दो आँखों से देखने की व्यवस्था और गहराई के बोध का आधार । चारों की तैयारी के लिए आँख का एक चित्र बनाइए और उस पर भागों के नाम तथा उनका काम लिखिए, फिर उसके नीचे तीन दृष्टि दोष और उनके उपचार की एक छोटी तालिका जोड़िए । द्विनेत्री दृष्टि के लिए इतना याद रखना पर्याप्त है कि अंतर आँखों में बनता है और संयोजन मस्तिष्क में ।
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- (a) Sclera → Choroid → Retina
- (b) Cornea → Choroid → Retina
- (c) Cornea → Sclera → Choroid
- (d) Sclera → Cornea → Choroid
उत्तर(a) Sclera → Choroid → Retina
उसी अंग की संरचना पर बना प्रश्न — नेत्रगोलक की तीन परतों को बाहर से भीतर के क्रम में रखना, जो इस कार्ड की प्रकाशीय व्याख्या का शारीरिक आधार देता है ।
अभ्यास
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मानव नेत्र के रेटिना पर बनने वाला प्रतिबिम्ब निम्नलिखित में से किस प्रकार का होता है ? (प्रकृति, दिशा तथा आकार तीनों देखिए)
- (a)आभासी, सीधा तथा वस्तु से बड़ा
- (b)वास्तविक, उलटा तथा वस्तु से छोटा
- (c)वास्तविक, सीधा तथा वस्तु से बड़ा
- (d)आभासी, उलटा तथा वस्तु से छोटा
उत्तर(b) वास्तविक, उलटा तथा वस्तु से छोटा — प्रतिबिम्ब उलटा ही बनता है, और उसे सीधा करके अनुभव कराने का काम मस्तिष्क करता है ।
- practice — not a real PYQ
दोनों आँखों से देखने पर गहराई का बोध मुख्य रूप से निम्नलिखित में से किस कारण होता है ?
- (a)दोनों रेटिना पर बने प्रतिबिम्बों के बीच के सूक्ष्म अंतर के कारण
- (b)पुतली के आकार के घटने-बढ़ने के कारण
- (c)रेटिना पर अंधबिंदु की उपस्थिति के कारण
- (d)नेत्र-लेंस के रंग के कारण
उत्तर(a) दोनों रेटिना पर बने प्रतिबिम्बों के बीच के सूक्ष्म अंतर के कारण — इसी अंतर को द्विनेत्री असमानता कहते हैं और मस्तिष्क उसी से दूरी आँकता है ।