निम्नलिखित में से कौन-सा प्राक्कलन समिति का अधिदेश है ?
- (a)यह इस संबंध में प्रतिवेदन देती है कि प्राक्कलनों में अंतर्निहित नीति के अनुरूप क्या-क्या मितव्ययिता, संगठन में सुधार, कार्यकुशलता या प्रशासनिक सुधार किए जा सकते हैं ।
- (b)यह सरकार के विनियोजन एवं वित्त लेखाओं का संवीक्षण करती है ।
- (c)यह नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्टों की जाँच करती है और यह देखती है कि क्या सार्वजनिक उपक्रम दक्षतापूर्वक संचालित हो रहे हैं ।
- (d)यह सामान्य लोकहित के मामलों से संबंधित विधेयकों की जाँच करती है ।
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) यह इस संबंध में प्रतिवेदन देती है कि प्राक्कलनों में अंतर्निहित नीति के अनुरूप क्या-क्या मितव्ययिता, संगठन में सुधार, कार्यकुशलता या प्रशासनिक सुधार किए जा सकते हैं । यह कथन प्राक्कलन समिति के अधिदेश को लगभग उसी भाषा में दोहराता है जिसमें वह लोक सभा की प्रक्रिया-नियमावली में दर्ज है । समिति का काम यह देखना है कि सरकार ने जो अनुमानित व्यय संसद के सामने रखा है, उसी नीति के भीतर रहते हुए वह व्यय कहाँ घटाया जा सकता है, संगठन कहाँ सुधारा जा सकता है और प्रशासन कहाँ अधिक कुशल बनाया जा सकता है । इसी कारण उसे प्रायः ‘निरंतर चलने वाली मितव्ययिता समिति’ कहा जाता है । एक बात यहाँ बहुत महत्त्वपूर्ण है : समिति नीति पर प्रश्न नहीं उठाती । उसका काम नीति के भीतर रहकर उसके क्रियान्वयन की मितव्ययिता जाँचना है, नीति स्वयं बदलने का सुझाव देना नहीं । दूसरी महत्त्वपूर्ण बात समय की है । प्राक्कलन समिति व्यय होने से पहले की जाँच करती है, अर्थात् वह अनुमानों को देखती है ; इसके विपरीत लोक लेखा समिति व्यय हो जाने के बाद के लेखों को देखती है । इसी कारण कहा जाता है कि प्राक्कलन समिति आगे की ओर देखती है और लोक लेखा समिति पीछे की ओर । संरचना भी अलग है : प्राक्कलन समिति में तीस सदस्य होते हैं और वे सब लोक सभा से ही लिए जाते हैं, राज्य सभा का कोई प्रतिनिधित्व इसमें नहीं होता । कोई मंत्री इसका सदस्य नहीं हो सकता । इसीलिए उत्तर विकल्प (a) है । विकल्पों को छाँटने का सबसे तेज़ रास्ता यह है कि हर कथन में क्रिया-पद देखिए और पूछिए कि वह किस समय-बिंदु की बात कर रहा है । ‘प्राक्कलनों में अंतर्निहित नीति के अनुरूप’ पढ़ते ही स्पष्ट हो जाता है कि बात अनुमानों की है, अर्थात् व्यय से पहले की । ‘लेखाओं का संवीक्षण’ और ‘लेखा-परीक्षा प्रतिवेदनों की जाँच’ दोनों व्यय के बाद की क्रियाएँ हैं, और ‘विधेयकों की जाँच’ वित्तीय प्रक्रिया के बाहर की । एक ही कसौटी से तीन विकल्प हट जाते हैं ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)यह सरकार के विनियोजन एवं वित्त लेखाओं का संवीक्षण करती है । — सरकार के विनियोजन तथा वित्त लेखाओं का संवीक्षण लोक लेखा समिति का काम है, प्राक्कलन समिति का नहीं । लोक लेखा समिति व्यय हो जाने के बाद यह देखती है कि जो धन संसद ने स्वीकृत किया था वह उसी प्रयोजन पर और उसी सीमा में ख़र्च हुआ या नहीं । उसमें बाईस सदस्य होते हैं — पंद्रह लोक सभा से और सात राज्य सभा से — और उसका सभापति अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया जाता है ; परंपरा यह बन चुकी है कि यह पद विपक्ष के किसी सदस्य को दिया जाता है । यहीं दोनों समितियों का सबसे साफ़ भेद बनता है : प्राक्कलन समिति अनुमानों को देखती है और लोक लेखा समिति लेखों को । कालक्रम याद रखिए — पहले अनुमान, फिर व्यय, फिर लेखा-परीक्षा ।
- (c)यह नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्टों की जाँच करती है और यह देखती है कि क्या सार्वजनिक उपक्रम दक्षतापूर्वक संचालित हो रहे हैं । — यह कथन लोक उपक्रम समिति के अधिदेश का वर्णन करता है । वही समिति सार्वजनिक उपक्रमों के प्रतिवेदन तथा लेखे देखती है, उन पर आए नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक के प्रतिवेदनों की जाँच करती है, और यह भी परखती है कि वे उपक्रम सुदृढ़ व्यावसायिक सिद्धांतों तथा विवेकपूर्ण वाणिज्यिक व्यवहार के अनुसार चलाए जा रहे हैं या नहीं । इसमें भी बाईस सदस्य होते हैं — पंद्रह लोक सभा से और सात राज्य सभा से । ध्यान दीजिए कि इस कथन में दो अलग-अलग काम एक साथ जोड़ दिए गए हैं, और यही उसे आकर्षक बनाता है : नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्टें सामान्यतः लोक लेखा समिति से जुड़ी मानी जाती हैं, जबकि उपक्रमों की कार्यकुशलता लोक उपक्रम समिति से । किसी भी स्थिति में यह प्राक्कलन समिति का काम नहीं है ।
- (d)यह सामान्य लोकहित के मामलों से संबंधित विधेयकों की जाँच करती है । — सामान्य लोकहित के मामलों से संबंधित विधेयकों की जाँच करना प्राक्कलन समिति का काम नहीं है । विधेयकों की विस्तृत जाँच के लिए संसद अलग व्यवस्था रखती है — किसी विशेष विधेयक के लिए प्रवर समिति या संयुक्त समिति गठित की जा सकती है, और वर्ष 1993 से विभाग-संबंधित स्थायी समितियों की व्यवस्था भी है, जो अपने-अपने मंत्रालयों से जुड़े विधेयकों तथा अनुदान माँगों पर विचार करती हैं । प्राक्कलन समिति का दायरा विधेयक नहीं, व्यय के अनुमान हैं । यह विकल्प उस अभ्यर्थी के लिए है जो वित्तीय समितियों और विधायी समितियों के बीच का अंतर नहीं करता । संसदीय समितियों को दो बड़े वर्गों में बाँटकर याद रखिए — वित्तीय समितियाँ और अन्य स्थायी तथा तदर्थ समितियाँ ।
अवधारणा
संसद सरकार के व्यय पर नियंत्रण अकेले सदन में बहस से नहीं रख सकती, क्योंकि बजट का आकार बहुत बड़ा होता है और समय सीमित । इसीलिए तीन वित्तीय समितियों की व्यवस्था बनी है, जो सदन की ओर से विस्तृत जाँच करती हैं । पहली है लोक लेखा समिति, जो व्यय हो जाने के बाद विनियोजन तथा वित्त लेखे और नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक के प्रतिवेदन देखती है । दूसरी है प्राक्कलन समिति, जो व्यय के अनुमानों को देखकर मितव्ययिता तथा प्रशासनिक सुधार के सुझाव देती है । तीसरी है लोक उपक्रम समिति, जो सार्वजनिक उपक्रमों के कामकाज की जाँच करती है । संख्या का भेद याद रखने योग्य है : प्राक्कलन समिति में तीस सदस्य होते हैं और वे सब लोक सभा से आते हैं, जबकि शेष दोनों समितियों में बाईस-बाईस सदस्य होते हैं जिनमें राज्य सभा के सात सदस्य सम्मिलित रहते हैं । तीनों में मंत्री सदस्य नहीं हो सकते, सदस्यों का चुनाव प्रतिवर्ष आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत पद्धति से होता है, और सभापति की नियुक्ति अध्यक्ष करते हैं । प्राक्कलन समिति की सीमा भी स्पष्ट है — वह नीति के भीतर रहकर सुझाव देती है, नीति पर प्रश्न नहीं उठाती ।
संसदीय समितियों पर बनने वाले प्रश्न प्रायः एक ही चाल पर टिके होते हैं : चारों विकल्पों में चार अलग-अलग समितियों के काम रख दिए जाते हैं और पूछा जाता है कि इनमें से कौन-सा काम किस समिति का है । इसलिए यहाँ कठिनाई किसी एक समिति को जानने की नहीं, तीनों को अलग-अलग पहचानने की है । सबसे उपयोगी कसौटी समय की है — प्राक्कलन समिति व्यय से पहले, लोक लेखा समिति व्यय के बाद, और लोक उपक्रम समिति एक विशेष प्रकार की संस्थाओं पर । दूसरी उपयोगी कसौटी सदन की है : यदि किसी प्रश्न में राज्य सभा के प्रतिनिधित्व की बात आए तो वह प्राक्कलन समिति नहीं हो सकती । इस प्रश्नपत्र के हिन्दी स्तंभ में चारों विकल्प पूरे वाक्य हैं और हर वाक्य के अंत में स्थान छोड़कर पूर्ण विराम लगाया गया है ; विकल्प लंबे हैं, इसलिए उन्हें पढ़ते समय क्रिया-पद पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि वही बताता है कि समिति ‘प्रतिवेदन देती है’, ‘संवीक्षण करती है’ या ‘जाँच करती है’ ।
मुख्य तथ्य
- प्राक्कलन समिति का अधिदेश यह प्रतिवेदन देना है कि प्राक्कलनों में अंतर्निहित नीति के अनुरूप क्या मितव्ययिता, संगठन में सुधार, कार्यकुशलता या प्रशासनिक सुधार किए जा सकते हैं ।
- इस समिति में तीस सदस्य होते हैं और वे सब लोक सभा से ही चुने जाते हैं ; राज्य सभा का इसमें कोई प्रतिनिधित्व नहीं होता और कोई मंत्री इसका सदस्य नहीं हो सकता ।
- लोक लेखा समिति व्यय हो जाने के बाद विनियोजन तथा वित्त लेखों और नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक के प्रतिवेदनों की जाँच करती है ; उसमें बाईस सदस्य होते हैं — पंद्रह लोक सभा से और सात राज्य सभा से ।
- लोक उपक्रम समिति सार्वजनिक उपक्रमों के लेखे तथा प्रतिवेदन देखती है और यह परखती है कि वे सुदृढ़ व्यावसायिक सिद्धांतों के अनुसार चलाए जा रहे हैं या नहीं ; उसमें भी बाईस सदस्य होते हैं ।
- प्राक्कलन समिति नीति के भीतर रहकर सुझाव देती है, नीति पर प्रश्न नहीं उठाती — इसी सीमा के कारण उसे ‘निरंतर चलने वाली मितव्ययिता समिति’ कहा जाता है ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- प्राक्कलन समिति और लोक लेखा समिति को मिला देना । पहली व्यय से पहले अनुमानों को देखती है, दूसरी व्यय के बाद लेखों को ।
- नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट को हर वित्तीय समिति से जोड़ लेना । वह मुख्यतः लोक लेखा समिति के पास जाती है, और उपक्रमों से जुड़ी रिपोर्टें लोक उपक्रम समिति के पास ।
- समिति को विधेयकों की जाँच का काम सौंप देना । विधेयकों के लिए प्रवर, संयुक्त तथा विभाग-संबंधित स्थायी समितियाँ हैं, वित्तीय समितियाँ नहीं ।
संसदीय समितियों पर प्रश्न चार रूपों में लौटते हैं । पहला रूप अधिदेश का है, जैसा यहाँ है — कौन-सा काम किस समिति का है, जहाँ चारों विकल्प चार अलग समितियों से लिए जाते हैं । दूसरा रूप संख्या और संरचना का है : किस समिति में कितने सदस्य होते हैं, किस सदन से आते हैं, और सभापति कौन नियुक्त करता है । तीसरा रूप कथन-आधारित होता है, जिसमें दो कथन देकर पूछा जाता है कि वे सही हैं या नहीं और क्या दूसरा पहले की सही व्याख्या है । चौथा रूप परंपराओं का है, जैसे लोक लेखा समिति का सभापति विपक्ष से लिए जाने की परंपरा । चारों की तैयारी के लिए एक ही तालिका पर्याप्त है, जिसमें तीनों वित्तीय समितियों के नाम, सदस्य-संख्या, सदन, अधिदेश और एक विशेष बात लिखी हो । संख्या का भेद — तीस बनाम बाईस — अकेला ही अनेक प्रश्नों में उत्तर तक पहुँचा देता है ।
संबंधित PYQ
EPFO_APFC_2016_Q120Statement (I) : Speaker of the Lok Sabha appoints the Chairman of the Public Accounts Committee. Statement (II) : Members of Parliament, eminent persons from industry and trade are the members of the Public Accounts Committee.
- (a) Both Statement (I) and Statement (II) are individually true and Statement (II) is the correct explanation of Statement (I)
- (b) Both Statement (I) and Statement (II) are individually true but Statement (II) is not the correct explanation of Statement (I)
- (c) Statement (I) is true but Statement (II) is false
- (d) Statement (I) is false but Statement (II) is true
उत्तर(c) Statement (I) is true but Statement (II) is false
उसी समिति-परिवार का दूसरा प्रश्न, जो लोक लेखा समिति के सभापति की नियुक्ति और सदस्यों की संरचना पर दो कथन रखकर उनकी परख करता है ।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
प्राक्कलन समिति के सदस्यों की कुल संख्या कितनी होती है तथा वे किस सदन या सदनों से लिए जाते हैं ?
- (a)बाईस — पंद्रह लोक सभा से और सात राज्य सभा से
- (b)तीस — सभी लोक सभा से
- (c)पंद्रह — सभी लोक सभा से
- (d)तीस — दोनों सदनों से मिलाकर
उत्तर(b) तीस — सभी लोक सभा से ; बाईस सदस्यों वाली संरचना, जिसमें राज्य सभा के सात सदस्य होते हैं, लोक लेखा समिति तथा लोक उपक्रम समिति की है ।
- practice — not a real PYQ
नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की लेखा-परीक्षा रिपोर्टों की जाँच मुख्य रूप से निम्नलिखित में से कौन-सी संसदीय समिति करती है ?
- (a)प्राक्कलन समिति
- (b)लोक लेखा समिति
- (c)याचिका समिति
- (d)नियम समिति
उत्तर(b) लोक लेखा समिति — वही विनियोजन तथा वित्त लेखों के साथ इन प्रतिवेदनों की जाँच करती है ; सार्वजनिक उपक्रमों से जुड़े प्रतिवेदन लोक उपक्रम समिति के पास जाते हैं ।