राष्ट्रीय हरित अधिकरण [National Green Tribunal (NGT)] से संबंधित निम्नलिखित तथ्यों में से कौन-सा सही नहीं है ?
- (a)एन.जी.टी. का गठन वर्ष 2010 में किया गया था ।
- (b)इसका उद्देश्य पर्यावरणीय संरक्षा और वनों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों का प्रभावी एवं शीघ्र निपटान सुनिश्चित करना है ।
- (c)यह सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन निर्धारित प्रक्रिया से आबद्ध है ।
- (d)यह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों से निर्देशित है ।
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) यह सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन निर्धारित प्रक्रिया से आबद्ध है । यहाँ ‘नहीं’ मोटे तिरछे अक्षरों में छपा है, अर्थात् उत्तर वह कथन है जो ग़लत है । राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 19 इस विषय पर बिलकुल स्पष्ट है : अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 में दी गई प्रक्रिया से आबद्ध नहीं होगा, बल्कि नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों से निर्देशित होगा, और अपनी प्रक्रिया स्वयं विनियमित करने की शक्ति रखेगा । अर्थात् विकल्प (c) ठीक उसी बात को उलट कर कह रहा है जो अधिनियम कहता है, और इसीलिए वही उत्तर है । यह छूट कोई औपचारिकता नहीं है, उसके पीछे एक स्पष्ट उद्देश्य है । सिविल प्रक्रिया संहिता की विस्तृत प्रक्रिया दीवानी न्यायालयों के लिए बनी है और उसमें वाद-पत्र, लिखित कथन, विचारणीय प्रश्न तथा अपील के अनेक चरण होते हैं, जिनमें वर्षों लग सकते हैं । पर्यावरण से जुड़े विवादों में विलंब का अर्थ प्रायः यह होता है कि जब निर्णय आए तब तक क्षति अपरिवर्तनीय हो चुकी हो । इसीलिए विधायिका ने अधिकरण को इस प्रक्रिया से मुक्त रखा और उसके स्थान पर नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत रखे — अर्थात् दोनों पक्षों को सुनवाई का उचित अवसर मिले और निर्णय करने वाला पक्षपाती न हो । ध्यान रखिए कि यह मुक्ति प्रक्रिया से है, शक्तियों से नहीं : अधिनियम अधिकरण को साक्षियों को बुलाने, शपथ पर परीक्षण करने तथा अभिलेख मँगाने जैसे विषयों में दीवानी न्यायालय की-सी शक्तियाँ देता है । एक अंतिम जाँच, जो ऐसे कथन-आधारित प्रश्नों में बार-बार काम आती है : विकल्पों को आपस में मिलाकर पढ़िए और देखिए कि कहीं दो कथन एक-दूसरे को काट तो नहीं रहे । यहाँ एक कथन कहता है कि अधिकरण का उद्देश्य शीघ्र निपटान है और दूसरा कहता है कि वह दीवानी प्रक्रिया की पूरी संहिता से बँधा है । ये दोनों एक साथ नहीं चल सकते, और विधायिका ने भी दोनों में से पहले को चुना है ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)एन.जी.टी. का गठन वर्ष 2010 में किया गया था । — यह कथन सही है, इसलिए ‘नहीं’ वाले प्रश्न का उत्तर नहीं बन सकता । राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना वर्ष 2010 में हुई, राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अंतर्गत । इस अधिनियम की पृष्ठभूमि में भारत की वे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ हैं जो मानव पर्यावरण संबंधी स्टॉकहोम सम्मेलन तथा पर्यावरण और विकास संबंधी रियो सम्मेलन से निकलीं ; संविधान का अनुच्छेद 253 संसद को ऐसी अंतरराष्ट्रीय संधियों को लागू करने के लिए विधि बनाने की शक्ति देता है । इस अधिकरण के साथ भारत उन गिने-चुने देशों में सम्मिलित हो गया जिनके पास पर्यावरण के लिए अलग विशेषीकृत अधिकरण है । वर्ष याद रखना यहाँ उपयोगी है, क्योंकि परीक्षक कई बार 2010 के स्थान पर कोई निकट का वर्ष रखकर वही प्रश्न पूछ लेता है ।
- (b)इसका उद्देश्य पर्यावरणीय संरक्षा और वनों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों का प्रभावी एवं शीघ्र निपटान सुनिश्चित करना है । — यह कथन भी सही है और वस्तुतः अधिनियम के उद्देश्य को लगभग उसी भाषा में दोहराता है । अधिनियम का घोषित प्रयोजन पर्यावरणीय संरक्षा तथा वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़े मामलों का प्रभावी और शीघ्र निपटान है, साथ ही पर्यावरण से संबंधित किसी विधिक अधिकार का प्रवर्तन तथा व्यक्तियों और संपत्ति को हुई क्षति के लिए राहत और प्रतिकर देना । ‘शीघ्र निपटान’ वाला यह शब्द ही इस प्रश्न की कुंजी भी है, क्योंकि शीघ्रता का लक्ष्य ही वह कारण है जिससे अधिकरण को सिविल प्रक्रिया संहिता की विस्तृत प्रक्रिया से मुक्त रखा गया । दोनों कथनों को साथ पढ़िए और यह विरोधाभास स्वयं दिखने लगेगा कि शीघ्रता का लक्ष्य और संहिता की बाध्यता एक साथ नहीं चल सकते ।
- (d)यह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों से निर्देशित है । — यह कथन भी सही है, और वह उसी धारा से आता है जिससे सही उत्तर वाला कथन उलटा है । अधिनियम कहता है कि अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता से आबद्ध नहीं होगा, बल्कि नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों से निर्देशित होगा । नैसर्गिक न्याय के दो शास्त्रीय सिद्धांत हैं — कोई भी अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता, और किसी को भी बिना सुने दंडित नहीं किया जा सकता । भारत में अधिकरणों और अर्ध-न्यायिक प्राधिकारियों के लिए यह मानक व्यवस्था है : उन्हें विस्तृत प्रक्रिया-संहिता से मुक्त रखा जाता है, पर नैसर्गिक न्याय की न्यूनतम कसौटी से बाँध दिया जाता है, ताकि लचीलापन मनमानी में न बदल जाए । इसलिए यह विकल्प सही कथन है और उत्तर नहीं ।
अवधारणा
अधिकरण साधारण न्यायालयों से अलग निकाय होते हैं, जो किसी विशेष क्षेत्र के विवादों को शीघ्रता और विशेषज्ञता के साथ निपटाने के लिए बनाए जाते हैं । उनकी दो पहचान लगभग सार्वभौमिक हैं : वे सिविल प्रक्रिया संहिता की विस्तृत प्रक्रिया से आबद्ध नहीं होते, और वे नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों से निर्देशित होते हैं । राष्ट्रीय हरित अधिकरण इसी ढाँचे का उदाहरण है । उसकी स्थापना वर्ष 2010 में हुई और उसे पर्यावरण से जुड़े उन विवादों पर अधिकारिता दी गई जो अधिनियम की अनुसूची में सूचीबद्ध विधियों से उठते हैं । उसकी संरचना में न्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य दोनों होते हैं — यही मिश्रण उसे विशेषीकृत निकाय बनाता है, क्योंकि पर्यावरणीय विवादों में विधि के साथ-साथ वैज्ञानिक तथ्यों का मूल्यांकन भी करना पड़ता है । उसकी प्रमुख पीठ नई दिल्ली में है और क्षेत्रीय पीठें भोपाल, पुणे, कोलकाता तथा चेन्नई में । अधिनियम यह भी अपेक्षा करता है कि आवेदन या अपील का निपटारा यथासंभव छह मास के भीतर हो जाए, और अधिकरण के आदेश के विरुद्ध अपील उच्चतम न्यायालय के समक्ष होती है । अधिकरण जिन सिद्धांतों को लागू करता है उनमें सतत विकास, एहतियात का सिद्धांत तथा प्रदूषक-भुगतान का सिद्धांत सम्मिलित हैं ।
राजव्यवस्था और पर्यावरण का यह खंड EPFO के प्रश्नपत्र में नियमित रूप से आता है, और उसमें अधिकरणों पर प्रश्न प्रायः इसी ढाँचे में बनते हैं — चार कथन, जिनमें तीन पाठ्यपुस्तक-मानक हों और एक में कोई प्रावधान उलट दिया गया हो । यहाँ उलटा गया प्रावधान वही है जो अधिकरण की पूरी पहचान बनाता है, इसलिए जिसने धारा पढ़ी है उसके लिए यह प्रश्न बहुत सरल है और जिसने केवल सामान्य जानकारी पढ़ी है उसके लिए कठिन । एक और उपयोगी दृष्टि यह है कि विकल्प (b) और विकल्प (c) एक-दूसरे से मेल नहीं खाते : यदि उद्देश्य ‘शीघ्र निपटान’ है तो विस्तृत दीवानी प्रक्रिया से बँधना उस उद्देश्य को ही काट देता है । ऐसे आंतरिक विरोधाभास कथन-आधारित प्रश्नों में अक्सर उत्तर तक पहुँचा देते हैं । हिन्दी स्तंभ में अधिकरण का अंग्रेज़ी नाम रोमन लिपि में वर्ग कोष्ठक के भीतर छपा है और उसके भीतर गोल कोष्ठक में संक्षेपाक्षर, तथा हर विकल्प के अंत में स्थान छोड़कर पूर्ण विराम ।
मुख्य तथ्य
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 19 कहती है कि अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 से आबद्ध नहीं होगा, बल्कि नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों से निर्देशित होगा ।
- वही धारा अधिकरण को अपनी प्रक्रिया स्वयं विनियमित करने की शक्ति देती है, यद्यपि साक्षियों को बुलाने तथा अभिलेख मँगाने जैसे विषयों में उसे दीवानी न्यायालय की-सी शक्तियाँ प्राप्त हैं ।
- अधिकरण का गठन वर्ष 2010 में हुआ और उसका प्रयोजन पर्यावरणीय संरक्षा तथा वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़े मामलों का प्रभावी एवं शीघ्र निपटान है ।
- अधिकरण में न्यायिक सदस्य तथा विशेषज्ञ सदस्य दोनों होते हैं ; उसकी प्रमुख पीठ नई दिल्ली में है और क्षेत्रीय पीठें भोपाल, पुणे, कोलकाता तथा चेन्नई में हैं ।
- अधिनियम आवेदन या अपील के यथासंभव छह मास में निपटारे की अपेक्षा करता है, और अधिकरण के आदेश के विरुद्ध अपील उच्चतम न्यायालय के समक्ष होती है ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- ‘नहीं’ पढ़े बिना उत्तर चुन लेना । यहाँ तीन कथन सही हैं और उत्तर वही है जो अधिनियम के प्रावधान को उलट कर कहता है ।
- प्रक्रिया से मुक्ति को शक्तियों से मुक्ति समझ लेना । अधिकरण संहिता की प्रक्रिया से आबद्ध नहीं है, पर साक्षी बुलाने जैसी शक्तियाँ उसे प्राप्त हैं ।
- स्थापना का वर्ष गड्डमड्ड करना । अधिनियम और अधिकरण दोनों वर्ष 2010 के हैं ; परीक्षक कई बार इसके स्थान पर कोई निकटवर्ती वर्ष रख देता है ।
अधिकरणों और पर्यावरण विधि पर प्रश्न चार साँचों में आते हैं । पहला साँचा यही है — चार कथन देकर पूछना कि कौन-सा सही नहीं है, जहाँ ग़लत कथन प्रायः किसी प्रावधान को उलट कर बनाया जाता है । दूसरा साँचा संरचना का है : अधिकरण में कौन-से सदस्य होते हैं, अध्यक्ष की योग्यता क्या है, और पीठें कहाँ हैं । तीसरा साँचा अधिकारिता का है — किन विधियों से उठने वाले विवाद अधिकरण के समक्ष जा सकते हैं और अपील किसके पास होती है । चौथा साँचा सिद्धांतों का है, जिसमें सतत विकास, एहतियात तथा प्रदूषक-भुगतान जैसे सिद्धांत पूछे जाते हैं । चारों की तैयारी के लिए अधिनियम की चार-पाँच धाराएँ संख्या सहित याद रखना बहुत लाभदायक है, क्योंकि विधिक प्रश्नों में जो कार्ड धारा बता देता है वह तीन व्याख्यात्मक उत्तरों से अधिक काम आता है ।
संबंधित PYQ
EPFO_EOAO_2020_Q77खोलें व हल करें →Which of the following statements is/are correct ? 1. India is a signatory to the Ramsar Convention. 2. The Ramsar Convention is about wetland conservation. 3. At present there are 76 Ramsar Sites in India. Select the correct answer using the code given below :
- (a) 2 and 3 only
- (b) 1, 2 and 3
- (c) 1 only
- (d) 1 and 2 only
उत्तर(d) 1 and 2 only
इसी प्रश्नपत्र का दूसरा पर्यावरण-प्रश्न, जो आर्द्रभूमि संरक्षण की अंतरराष्ट्रीय संधि पर टिका है — वही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ जिनके संदर्भ में हरित अधिकरण का अधिनियम बना ।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
राष्ट्रीय हरित अधिकरण के किसी आदेश या निर्णय के विरुद्ध अपील निम्नलिखित में से किसके समक्ष की जाती है ?
- (a)संबंधित राज्य का उच्च न्यायालय
- (b)उच्चतम न्यायालय
- (c)केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
- (d)पर्यावरण, वन तथा जलवायु परिवर्तन मंत्रालय
उत्तर(b) उच्चतम न्यायालय — अधिकरण के आदेश के विरुद्ध अपील सीधे उच्चतम न्यायालय के समक्ष होती है ; प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा मंत्रालय अपीलीय प्राधिकारी नहीं हैं ।
- practice — not a real PYQ
राष्ट्रीय हरित अधिकरण की प्रमुख पीठ निम्नलिखित में से किस नगर में स्थित है ? (शेष तीनों में क्षेत्रीय पीठें हैं)
- (a)नई दिल्ली
- (b)भोपाल
- (c)पुणे
- (d)चेन्नई
उत्तर(a) नई दिल्ली — शेष तीनों नगरों में अधिकरण की क्षेत्रीय पीठें हैं, प्रमुख पीठ नहीं ; कोलकाता में भी एक क्षेत्रीय पीठ है ।