पीरपुर रिपोर्ट (1938) किसने प्रस्तुत की थी ?
- (a)मुस्लिम लीग
- (b)यूनियनिस्ट पार्टी
- (c)अहरार पार्टी
- (d)भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) मुस्लिम लीग । पीरपुर रिपोर्ट अखिल भारतीय मुस्लिम लीग द्वारा नियुक्त एक समिति का प्रतिवेदन था, और वह वर्ष 1938 में प्रस्तुत हुई । समिति के अध्यक्ष पीरपुर के राजा सैयद मुहम्मद मेहदी थे, और उन्हीं के नाम से यह रिपोर्ट जानी जाती है । उसकी पृष्ठभूमि समझे बिना यह प्रश्न केवल एक नाम याद रखने का अभ्यास रह जाता है, इसलिए पृष्ठभूमि देखिए । भारत शासन अधिनियम, 1935 के अंतर्गत वर्ष 1937 में प्रांतीय विधानमंडलों के चुनाव हुए, जिनमें भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस को बड़ी सफलता मिली और उसने अधिकांश प्रांतों में मंत्रिमंडल बनाए । मुस्लिम लीग का प्रदर्शन उन चुनावों में कमज़ोर रहा, और उसके बाद उसने यह अभियान चलाया कि काँग्रेस के शासन वाले प्रांतों में मुसलमानों के साथ भेदभाव तथा अन्याय हो रहा है । इसी अभियान के भाग के रूप में उसने कुछ जाँच समितियाँ बनाईं, जिनमें से पहली और सबसे अधिक चर्चित पीरपुर समिति थी । रिपोर्ट में काँग्रेस मंत्रिमंडलों पर अनेक आरोप लगाए गए और उन्हें मुसलमानों के लिए असुरक्षित बताया गया । काँग्रेस ने इन आरोपों को अस्वीकार किया और उन्हें राजनीतिक प्रचार बताया । इसलिए इस रिपोर्ट को प्रस्तुत करने वाला दल मुस्लिम लीग था, और उत्तर विकल्प (a) है । इस प्रश्न में तर्क से भी उत्तर तक पहुँचा जा सकता है, और परीक्षा में यही रास्ता सबसे तेज़ होता है । पहले पूछिए कि रिपोर्ट किसके विरुद्ध है — वह काँग्रेस के प्रांतीय मंत्रिमंडलों के विरुद्ध है । इसलिए काँग्रेस स्वयं उसकी कर्ता नहीं हो सकती । फिर पूछिए कि उसका दायरा क्या है — वह एक प्रांत का नहीं, कई प्रांतों का आरोप-पत्र है, इसलिए किसी प्रांतीय दल की रचना भी नहीं हो सकती । और अंत में पूछिए कि उस समय काँग्रेस के विरुद्ध अखिल भारतीय स्तर पर अपनी राजनीतिक ज़मीन कौन बना रहा था । तीनों प्रश्नों के उत्तर एक ही दिशा में जाते हैं ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)यूनियनिस्ट पार्टी — यूनियनिस्ट पार्टी का इस रिपोर्ट से कोई संबंध नहीं है । वह पंजाब की एक प्रांतीय पार्टी थी, जिसका आधार मुख्यतः बड़े और मध्यम भूस्वामी थे और जिसकी विशेषता यह थी कि वह सांप्रदायिक रेखा पर नहीं, कृषक हितों की रेखा पर बनी थी — उसमें मुसलमान, हिंदू और सिख तीनों समुदायों के भूस्वामी सम्मिलित थे । वर्ष 1937 के चुनावों के बाद पंजाब में इसी दल की सरकार बनी । यह विकल्प इसलिए रखा गया है कि उस दौर की प्रांतीय राजनीति के नाम बहुत हैं और उन्हें आपस में मिला देना आसान है । पर पीरपुर समिति अखिल भारतीय स्तर के दल ने बनाई थी, किसी प्रांतीय दल ने नहीं, और उसका उद्देश्य काँग्रेस मंत्रिमंडलों पर आरोप लगाना था ।
- (c)अहरार पार्टी — अहरार पार्टी, अर्थात् मजलिस-ए-अहरार-ए-इस्लाम, वर्ष 1929 के आसपास बनी थी और उसकी राजनीतिक दिशा मुस्लिम लीग से भिन्न, कई मुद्दों पर उसके विरोध में थी । वह लीग की द्विराष्ट्र-संबंधी राजनीति की आलोचक रही और उस दौर की राष्ट्रीय राजनीति में प्रायः काँग्रेस के निकट दिखाई देती है । इसलिए काँग्रेस मंत्रिमंडलों के विरुद्ध आरोप-पत्र तैयार करना उसकी राजनीतिक दिशा के ही विपरीत होता । यह विकल्प उस अभ्यर्थी के लिए है जो केवल यह देखता है कि नाम किस समुदाय से जुड़ा प्रतीत होता है और उसी आधार पर उत्तर चुन लेता है । उस दौर की राजनीति को समुदाय से नहीं, दलों की घोषित दिशा से पहचानिए ।
- (d)भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस — भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस इस रिपोर्ट की लेखिका हो ही नहीं सकती, क्योंकि रिपोर्ट के आरोप स्वयं काँग्रेस के मंत्रिमंडलों पर थे । कोई दल अपने ही शासन के विरुद्ध आरोप-पत्र तैयार करके प्रस्तुत नहीं करता, इसलिए यह विकल्प तर्क से ही हट जाता है । काँग्रेस ने इन आरोपों को अस्वीकार किया था । यहाँ यह याद रखना उपयोगी है कि वर्ष 1937 के चुनावों के बाद बने काँग्रेस मंत्रिमंडल लगभग दो वर्ष चले और द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ने पर, भारत को भारतीय प्रतिनिधियों से पूछे बिना युद्धरत घोषित कर दिए जाने के विरोध में, उन्होंने वर्ष 1939 में त्यागपत्र दे दिया । इस प्रकार यह विकल्प न केवल तर्क से, बल्कि उस दौर के घटनाक्रम से भी बाहर है ।
अवधारणा
वर्ष 1937 से 1940 तक का कालखंड भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के तेज़ होने का काल है, और पीरपुर रिपोर्ट उसी प्रक्रिया का एक दस्तावेज़ है । भारत शासन अधिनियम, 1935 ने प्रांतों में उत्तरदायी शासन का ढाँचा दिया, यद्यपि राज्यपाल के पास विशेष अधिकार बने रहे । उसी के अंतर्गत हुए वर्ष 1937 के चुनावों में काँग्रेस ने अधिकांश प्रांतों में सरकारें बनाईं, जबकि मुस्लिम लीग मुसलमानों के लिए आरक्षित स्थानों में भी बहुत सीमित सफलता पा सकी । इसके बाद लीग ने अपनी राजनीति दो दिशाओं में मोड़ी — एक ओर संगठन का विस्तार, और दूसरी ओर यह प्रचार कि काँग्रेस का शासन मुसलमानों के लिए असुरक्षित है । इसी प्रचार के लिए जाँच समितियाँ बनाई गईं और उनके प्रतिवेदन प्रकाशित हुए, जिनमें पीरपुर रिपोर्ट सबसे अधिक चर्चित रही । काँग्रेस ने इन आरोपों को अस्वीकार किया । वर्ष 1939 में युद्ध के प्रश्न पर काँग्रेस मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र के बाद लीग ने उसे ‘मुक्ति दिवस’ के रूप में मनाया, और अगले ही वर्ष, 1940 में, लाहौर अधिवेशन में उसने अलग राज्य का प्रस्ताव पारित किया । इस क्रम को एक साथ देखने पर ही रिपोर्ट का राजनीतिक अर्थ समझ में आता है ।
इस प्रकार के प्रश्न में नाम अकेला याद रखना पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि उस दौर में एक से अधिक ऐसे प्रतिवेदन आए और चारों विकल्प उसी दशक की राजनीति से लिए गए हैं । सहायता इस बात से मिलती है कि रिपोर्ट का उद्देश्य देखा जाए : यदि किसी दस्तावेज़ का उद्देश्य काँग्रेस मंत्रिमंडलों पर आरोप लगाना है, तो उसका लेखक वही दल होगा जो उस समय काँग्रेस के विरोध में अपनी राजनीतिक ज़मीन बना रहा था । यही तर्क तीन विकल्पों को एक साथ हटा देता है — काँग्रेस स्वयं अपने विरुद्ध आरोप नहीं लगाएगी, यूनियनिस्ट पार्टी प्रांतीय दल थी, और अहरार की दिशा लीग से भिन्न थी । हिन्दी स्तंभ में रिपोर्ट का नाम देवनागरी में लिप्यंतरित है और वर्ष तुरंत बाद कोष्ठक में छपा है, बिना कोष्ठक से पहले स्थान छोड़े — यह इस पुस्तिका की छपाई की अपनी शैली है ।
मुख्य तथ्य
- पीरपुर रिपोर्ट अखिल भारतीय मुस्लिम लीग द्वारा नियुक्त समिति का प्रतिवेदन थी और वर्ष 1938 में प्रस्तुत हुई ; समिति के अध्यक्ष पीरपुर के राजा सैयद मुहम्मद मेहदी थे ।
- उसकी पृष्ठभूमि वर्ष 1937 के प्रांतीय चुनाव थे, जिनमें काँग्रेस ने अधिकांश प्रांतों में सरकारें बनाईं और मुस्लिम लीग का प्रदर्शन कमज़ोर रहा ।
- रिपोर्ट में काँग्रेस के शासन वाले प्रांतों में मुसलमानों के साथ भेदभाव के आरोप लगाए गए, जिन्हें काँग्रेस ने अस्वीकार किया ।
- यूनियनिस्ट पार्टी पंजाब की प्रांतीय पार्टी थी, जिसका आधार भूस्वामी वर्ग था और जिसमें तीनों प्रमुख समुदायों के सदस्य सम्मिलित थे ; वर्ष 1937 के बाद पंजाब में उसी की सरकार बनी ।
- काँग्रेस मंत्रिमंडलों ने वर्ष 1939 में, भारत को भारतीय प्रतिनिधियों से पूछे बिना युद्धरत घोषित किए जाने के विरोध में, त्यागपत्र दे दिया ; मुस्लिम लीग ने उसे ‘मुक्ति दिवस’ के रूप में मनाया ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- समुदाय के आधार पर दल पहचान लेना । अहरार पार्टी की राजनीतिक दिशा मुस्लिम लीग से भिन्न थी, इसलिए नाम की ध्वनि से उत्तर तय नहीं होता ।
- प्रांतीय दल और अखिल भारतीय दल को एक मान लेना । यूनियनिस्ट पार्टी पंजाब तक सीमित थी, जबकि यह समिति अखिल भारतीय स्तर के दल ने बनाई थी ।
- उस दौर के अन्य प्रतिवेदनों से इसे मिला देना । लीग ने एक से अधिक जाँच समितियाँ बनाईं, इसलिए रिपोर्ट का नाम, वर्ष और विषय तीनों साथ याद रखिए ।
वर्ष 1937 से 1940 तक के कालखंड पर आयोग तीन प्रकार के प्रश्न बनाते हैं । पहला प्रकार दस्तावेज़ और उसके कर्ता को जोड़ता है, जैसा यहाँ है — कौन-सी रिपोर्ट किसने प्रस्तुत की, या कौन-सा प्रस्ताव किस अधिवेशन में पारित हुआ । दूसरा प्रकार कालक्रम का होता है : चुनाव, मंत्रिमंडलों का गठन, उनका त्यागपत्र, मुक्ति दिवस और लाहौर प्रस्ताव — इन्हें सही क्रम में रखना । तीसरा प्रकार प्रावधानों का होता है, जो भारत शासन अधिनियम, 1935 पर केंद्रित रहता है और प्रांतीय स्वायत्तता तथा राज्यपाल के विशेष अधिकारों के बीच का संतुलन पूछता है । तीनों की तैयारी के लिए इस छोटे कालखंड की एक सघन समय-रेखा बना लीजिए, जिसमें वर्ष के साथ घटना और उसका कर्ता दोनों लिखे हों । यह कालखंड परीक्षा में इसीलिए बार-बार आता है कि विभाजन तक पहुँचने वाली राजनीतिक शृंखला की अधिकांश कड़ियाँ इन्हीं तीन-चार वर्षों में बनती हैं ।
संबंधित PYQ
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
वर्ष 1937 के प्रांतीय चुनावों के बाद बने काँग्रेस मंत्रिमंडलों ने वर्ष 1939 में किस कारण त्यागपत्र दे दिया था ?
- (a)क्रिप्स मिशन की विफलता के कारण
- (b)भारतीय प्रतिनिधियों से पूछे बिना भारत को द्वितीय विश्वयुद्ध में युद्धरत घोषित कर दिए जाने के विरोध में
- (c)भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित हो जाने के कारण
- (d)साइमन कमीशन के बहिष्कार के कारण
उत्तर(b) भारतीय प्रतिनिधियों से पूछे बिना भारत को द्वितीय विश्वयुद्ध में युद्धरत घोषित कर दिए जाने के विरोध में — क्रिप्स मिशन तथा भारत छोड़ो आंदोलन दोनों इसके बाद के हैं और साइमन कमीशन इससे बहुत पहले का ।
- practice — not a real PYQ
काँग्रेस मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र के बाद, मुस्लिम लीग ने 22 दिसंबर 1939 को किस रूप में मनाया था ?
- (a)पाकिस्तान दिवस
- (b)मुक्ति दिवस
- (c)प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस
- (d)स्वतंत्रता दिवस
उत्तर(b) मुक्ति दिवस — प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस अगस्त 1946 का है और पाकिस्तान दिवस लाहौर प्रस्ताव की वर्षगाँठ से जुड़ा है, इसलिए दोनों इस तिथि से भिन्न हैं ।