वर्ष 1931 के दौरान, बिहार के गया जिले में, प्रभावशाली किसान सभा आंदोलन किसके नेतृत्व में विकसित हुआ था ?
- (a)यदुनंदन शर्मा
- (b)सहजानंद
- (c)शीतला सहाय
- (d)तिलका मांझी
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) यदुनंदन शर्मा । बिहार में किसान सभा का आंदोलन 1920 के दशक के अंत से संगठित रूप लेने लगा था, और 1930 के दशक में वह प्रांत के अलग-अलग ज़िलों में अलग-अलग नेताओं के नेतृत्व में फैला । इसी विस्तार में वर्ष 1931 के आसपास गया ज़िले में जो शक्तिशाली किसान सभा आंदोलन खड़ा हुआ, उसका नेतृत्व यदुनंदन शर्मा ने किया । यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह प्रांत-स्तरीय नेतृत्व का प्रश्न नहीं है, ज़िला-स्तरीय नेतृत्व का प्रश्न है — और मानक इतिहास-पुस्तकें बिहार के इस दौर को ठीक इसी तरह ज़िलेवार दर्ज करती हैं । प्रांतीय स्तर पर किसान सभा की धुरी स्वामी सहजानंद सरस्वती थे, जिनका आश्रम पटना ज़िले के बिहटा में था ; मुंगेर ज़िले में कार्यानंद शर्मा सक्रिय थे ; और गया ज़िले में यदुनंदन शर्मा । इन आंदोलनों की माँगें भी एक जैसी थीं — ज़मींदारों द्वारा वसूले जाने वाले अवैध अबवाब बंद हों, बेगार समाप्त हो, लगान घटे, और काश्तकारी के अधिकार सुरक्षित रहें । वर्ष 1930 के दशक की आर्थिक मंदी ने खेती की क़ीमतें गिरा दी थीं, जिससे लगान चुकाना असंभव हो गया और बहुत-सी काश्त भूमियाँ किसानों के हाथ से निकलकर ज़मींदारों के पास चली गईं — यही ‘बकाश्त’ का प्रश्न आगे चलकर बिहार के किसान संघर्ष का केंद्र बना । इस पूरी पृष्ठभूमि में गया ज़िले का आंदोलन यदुनंदन शर्मा के नाम के साथ जुड़ा है, इसलिए उत्तर विकल्प (a) है । इस उत्तर को याद रखने का एक सुविधाजनक ढाँचा यह है कि बिहार के किसान आंदोलन को तीन ख़ानों में बाँट लिया जाए । प्रांतीय संगठन और उसका नेतृत्व एक ख़ाना है ; ज़िलेवार आंदोलन और उनके नेता दूसरा ; और अखिल भारतीय स्तर पर वर्ष 1936 में बना संगठन तीसरा । प्रश्न में जो शब्द आया है — यहाँ ‘गया ज़िले में’ — वही बताता है कि उत्तर किस ख़ाने से आना है । यह आदत बन जाए तो इस विषय के अधिकांश प्रश्न आधे पढ़ते ही छँट जाते हैं ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)सहजानंद — सहजानंद, अर्थात् स्वामी सहजानंद सरस्वती, बिहार के किसान आंदोलन के सबसे बड़े नेता थे — पर यह प्रश्न प्रांत का नहीं, गया ज़िले का नेतृत्व पूछ रहा है, और वहाँ का नाम अलग है । सहजानंद ने बिहार प्रांतीय किसान सभा को खड़ा किया और वर्ष 1936 में लखनऊ में स्थापित अखिल भारतीय किसान सभा के पहले अध्यक्ष बने । उनका कार्यक्षेत्र मुख्यतः पटना ज़िले के बिहटा स्थित आश्रम के चारों ओर था, जहाँ से वे पूरे प्रांत के आंदोलन को दिशा देते रहे । यही विशालता इस विकल्प को आकर्षक बनाती है : जब किसी आंदोलन का एक नाम सबसे ऊँचा दिखता हो, तो ज़िला-स्तर का प्रश्न भी उसी नाम से भर देने की प्रवृत्ति बनती है । ऐसे प्रश्नों में यह पूछिए कि प्रश्न किस स्तर की बात कर रहा है — प्रांत, ज़िला या अखिल भारतीय संगठन ।
- (c)शीतला सहाय — शीतला सहाय का नाम बिहार के इस दौर के किसान सभा नेतृत्व से जुड़ा नहीं मिलता । वर्ष 1930 के दशक के बिहार के किसान आंदोलन का विवरण देते समय मानक पुस्तकें जिन नामों को बार-बार दोहराती हैं वे हैं — स्वामी सहजानंद सरस्वती, यदुनंदन शर्मा, कार्यानंद शर्मा, पंचानन शर्मा और राहुल सांकृत्यायन । इस सूची में यह नाम नहीं आता । ऐसे विकल्प परीक्षा में जान-बूझकर रखे जाते हैं, ताकि वे अभ्यर्थी जिन्होंने विषय पढ़ा तो है पर नाम ठीक से नहीं बाँधे, किसी परिचित-सी लगने वाली ध्वनि पर टिक जाएँ । बचाव का तरीक़ा एक ही है : किसी आंदोलन के तीन-चार नाम ज़िले या क्षेत्र के साथ जोड़कर याद रखिए, अकेले नाम के रूप में नहीं ।
- (d)तिलका मांझी — तिलका मांझी का संबंध इस आंदोलन से नहीं, बल्कि उससे लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले के प्रतिरोध से है । वे अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भागलपुर तथा उसके आसपास के जंगल-क्षेत्र में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लड़ने वाले आदिवासी नेता थे, और उनका संघर्ष 1780 के दशक का है । अर्थात् यह विकल्प कालक्रम से ही बाहर हो जाता है — प्रश्न वर्ष 1931 की बात कर रहा है । यही इस विकल्प की सबसे तेज़ काट है : नाम की परिचितता से पहले उसका काल जाँचिए । बिहार और झारखंड के क्षेत्र में औपनिवेशिक काल के प्रतिरोध की एक लंबी शृंखला रही है, और परीक्षक अक्सर उसी शृंखला से कोई बहुत पुराना नाम उठाकर बीसवीं शताब्दी के प्रश्न में रख देता है ।
अवधारणा
बीसवीं शताब्दी के तीसरे और चौथे दशक में भारत के किसान आंदोलनों ने संगठित रूप लिया, और उसका सबसे सशक्त उदाहरण बिहार है । इसकी पृष्ठभूमि स्थायी बंदोबस्त की ज़मींदारी व्यवस्था थी, जिसमें राजस्व की दर सदा के लिए बाँध दी गई थी पर काश्तकार से वसूली की कोई सीमा नहीं थी । इससे अवैध अबवाब, बेगार और मनमानी बेदख़ली आम हो गए । वर्ष 1930 के दशक की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी ने कृषि उपज की क़ीमतें गिरा दीं, जिससे नक़दी में लगान चुकाना असंभव हो गया और बहुत-सी काश्त भूमियाँ ज़मींदारों के क़ब्ज़े में चली गईं ; इन्हीं भूमियों की वापसी का प्रश्न ‘बकाश्त’ संघर्ष कहलाया । संगठन की दृष्टि से बिहार प्रांतीय किसान सभा इस दौर की धुरी थी, और वर्ष 1936 में लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई, जिसके पहले अध्यक्ष स्वामी सहजानंद सरस्वती बने और महासचिव एन.जी. रंगा । इसी दौर में अन्य प्रांतों में भी समानांतर संगठन बने — केरल में कर्षक संघम, आंध्र में रैयत संघ, और संयुक्त प्रांत में किसान सभाएँ, जिनकी जड़ें बाबा रामचंद्र के अवध आंदोलन तक जाती हैं ।
इस प्रश्न की कठिनाई नाम की नहीं, स्तर की है । अभ्यर्थी प्रायः किसी आंदोलन का एक ही नाम याद रखता है — वह जो सबसे प्रसिद्ध हो — और परीक्षक ठीक इसी आदत को जाँचता है, ज़िला बताकर पूछकर । बिहार के किसान आंदोलन में प्रांतीय नेतृत्व और ज़िला-स्तरीय नेतृत्व दोनों दर्ज हैं, और उन्हें अलग-अलग याद रखना ही यहाँ निर्णायक है । विकल्पों की रचना भी यही बताती है : एक नाम प्रांतीय नेता का, एक ज़िले के नेता का, एक अठारहवीं शताब्दी के आदिवासी प्रतिरोध का, और एक ऐसा जो इस दौर के किसान नेतृत्व में मिलता ही नहीं । इस प्रकार चार विकल्प चार अलग-अलग परीक्षाएँ हैं — स्तर की, काल की, और नाम की । ऐसे प्रश्नों की तैयारी के लिए किसान आंदोलनों की एक तालिका बनाइए, जिसमें क्षेत्र, वर्ष, नेता और मुख्य माँग चार स्तंभों में हों ; इसी एक तालिका से इस विषय के अधिकांश प्रश्न सध जाते हैं ।
मुख्य तथ्य
- वर्ष 1931 के आसपास बिहार के गया ज़िले में शक्तिशाली किसान सभा आंदोलन यदुनंदन शर्मा के नेतृत्व में विकसित हुआ ।
- स्वामी सहजानंद सरस्वती बिहार प्रांतीय किसान सभा के प्रमुख नेता थे और वर्ष 1936 में लखनऊ में स्थापित अखिल भारतीय किसान सभा के पहले अध्यक्ष बने ; उनका आश्रम पटना ज़िले के बिहटा में था ।
- बिहार के इसी दौर में मुंगेर ज़िले का किसान आंदोलन कार्यानंद शर्मा के नेतृत्व में चला, अर्थात् प्रांत का आंदोलन ज़िलेवार नेतृत्व में बँटा हुआ था ।
- किसान सभाओं की मुख्य माँगें थीं — अवैध अबवाब की वसूली बंद हो, बेगार समाप्त हो, लगान घटे और काश्तकारी के अधिकार सुरक्षित रहें ।
- वर्ष 1930 के दशक की आर्थिक मंदी में उपज की क़ीमतें गिरने से बहुत-सी काश्त भूमियाँ ज़मींदारों के क़ब्ज़े में चली गईं ; उनकी वापसी का संघर्ष ‘बकाश्त’ आंदोलन कहलाया ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- प्रांतीय नेता को ज़िला-स्तरीय प्रश्न का उत्तर बना देना । सहजानंद पूरे बिहार की धुरी थे, पर गया ज़िले का आंदोलन यदुनंदन शर्मा के नाम से जुड़ा है ।
- नाम की परिचितता पर टिक जाना । तिलका मांझी अठारहवीं शताब्दी के प्रतिरोध से जुड़े हैं, इसलिए 1931 का प्रश्न उन तक पहुँच ही नहीं सकता ।
- किसान सभा और काँग्रेस के आंदोलनों को एक मान लेना । किसान सभाओं की माँगें ज़मींदारी और लगान से जुड़ी थीं और उनका संगठन अलग था ।
किसान आंदोलनों पर प्रश्न तीन साँचों में आते हैं । पहला साँचा नेतृत्व का है, जैसा यहाँ है — किस क्षेत्र या ज़िले का आंदोलन किसके नेतृत्व में चला । दूसरा साँचा संगठन और तिथि का है : अखिल भारतीय किसान सभा कब और कहाँ बनी, उसके पहले अध्यक्ष तथा महासचिव कौन थे, और उसका घोषणापत्र क्या कहता था । तीसरा साँचा शब्दावली का है — बकाश्त, अबवाब, बेगार, तेभागा, कर्षक संघम जैसे पद देकर उनका अर्थ या क्षेत्र पूछना । तीनों में एक ही तैयारी काम आती है : आंदोलनों की एक तालिका, जिसमें क्षेत्र, वर्ष, नेता और मुख्य माँग अलग-अलग स्तंभों में हों, और उसमें ज़िला-स्तरीय नेतृत्व अलग से दर्ज हो । ध्यान रखिए कि परीक्षक प्रायः प्रसिद्ध नाम को विकल्पों में रखकर कम प्रसिद्ध, पर सही, नाम को उत्तर बनाता है — इसलिए तालिका में केवल सबसे बड़ा नाम लिखकर काम नहीं चलता ।
संबंधित PYQ
EPFO_EOAO_2017_Q24What were the peasant associations set up in Kerala in the 1930s called?
- (a) Kisan Sabha
- (b) Kirti Kisan
- (c) Karshaka Sangam
- (d) Kisan Morcha
उत्तर(c) Karshaka Sangam
उसी दशक का समानांतर प्रश्न दूसरे प्रांत से — केरल में 1930 के दशक में बनी किसान संस्थाओं का नाम, जो दिखाता है कि यह संगठन-निर्माण अखिल भारतीय परिघटना थी ।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना वर्ष 1936 में किस स्थान पर हुई थी और उसके प्रथम अध्यक्ष निम्नलिखित में से कौन थे ?
- (a)लखनऊ — स्वामी सहजानंद सरस्वती
- (b)पटना — यदुनंदन शर्मा
- (c)फैज़ाबाद — बाबा रामचंद्र
- (d)कलकत्ता — एन.जी. रंगा
उत्तर(a) लखनऊ — स्वामी सहजानंद सरस्वती ; एन.जी. रंगा उसी संगठन के पहले महासचिव बने, और बाबा रामचंद्र का संबंध अवध के किसान आंदोलन से है ।
- practice — not a real PYQ
बिहार में 1930 के दशक के किसान आंदोलनों का केंद्रीय मुद्दा बनी ‘बकाश्त भूमि’ निम्नलिखित में से किससे संबंधित थी ?
- (a)जंगल से लकड़ी काटने के परंपरागत अधिकार
- (b)वे काश्त भूमियाँ जो मंदी के दौर में किसानों के हाथ से निकलकर ज़मींदारों के पास चली गई थीं
- (c)नहरों के पानी पर लगने वाला सिंचाई कर
- (d)समुद्र तट पर नमक बनाने का अधिकार
उत्तर(b) वे काश्त भूमियाँ जो मंदी के दौर में किसानों के हाथ से निकलकर ज़मींदारों के पास चली गई थीं — उनकी वापसी की माँग ही बकाश्त आंदोलन का केंद्र थी ।