भारत की स्वतंत्रता के समय, निम्नलिखित में से कौन भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अध्यक्ष थे ?
- (a)पट्टाभि सीतारमैया
- (b)जवाहरलाल नेहरू
- (c)अबुल कलाम आज़ाद
- (d)जे.बी. कृपलानी
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) जे.बी. कृपलानी । पंद्रह अगस्त 1947 को, जब भारत स्वतंत्र हुआ, भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अध्यक्ष आचार्य जे.बी. कृपलानी थे । वे नवंबर 1946 के मेरठ अधिवेशन में अध्यक्ष चुने गए थे और स्वतंत्रता के कुछ महीनों बाद, उसी वर्ष के अंत में, उन्होंने पद छोड़ दिया । इस प्रश्न को हल करने का सबसे भरोसेमंद तरीक़ा यह है कि 1940 से 1949 तक अध्यक्षों का क्रम एक बार व्यवस्थित रूप से याद कर लिया जाए । मौलाना अबुल कलाम आज़ाद वर्ष 1940 के रामगढ़ अधिवेशन में अध्यक्ष बने और असाधारण परिस्थितियों के कारण 1946 तक उसी पद पर रहे — भारत छोड़ो आंदोलन और उसके बाद के लंबे कारावास के कारण इस बीच कोई नियमित अधिवेशन नहीं हो सका । वर्ष 1946 में जवाहरलाल नेहरू अध्यक्ष बने, और उसी वर्ष के अंत में यह पद कृपलानी के पास आया । स्वतंत्रता के बाद, कृपलानी के त्यागपत्र पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद अध्यक्ष बने, और उनके बाद वर्ष 1948 में पट्टाभि सीतारमैया । अर्थात् प्रश्न में दिए गए चारों नाम इसी क्रम के आसपास के हैं, और सही उत्तर वही है जो ठीक अगस्त 1947 के समय पद पर था । इसीलिए विकल्प (d) उत्तर है । एक और भेद यहाँ निर्णायक है : काँग्रेस का अध्यक्ष और सरकार का प्रधानमंत्री दो अलग पद हैं, और स्वतंत्रता के समय ये दोनों अलग-अलग व्यक्तियों के पास थे । कृपलानी के बारे में दो बातें और याद रखने योग्य हैं, क्योंकि वे इस उत्तर को स्मृति में बाँध देती हैं । पहली, वे चंपारण के दिनों से गाँधीजी के साथ रहे और इसीलिए उन्हें ‘आचार्य’ कहा जाता था । दूसरी, स्वतंत्रता के कुछ ही महीनों बाद उन्होंने अध्यक्ष-पद छोड़ दिया, क्योंकि संगठन और सरकार के बीच अधिकारों के बँटवारे पर उनका मतभेद हो गया था — और यही प्रकरण आगे चलकर काँग्रेस के भीतर संगठन बनाम सरकार की बहस का आरंभ-बिंदु बना । बाद के वर्षों में वे काँग्रेस से अलग होकर विपक्ष की राजनीति में सक्रिय रहे ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)पट्टाभि सीतारमैया — पट्टाभि सीतारमैया काँग्रेस के अध्यक्ष अवश्य बने, पर स्वतंत्रता के बाद — वर्ष 1948 के जयपुर अधिवेशन में । अगस्त 1947 में वे इस पद पर नहीं थे, इसलिए यह विकल्प कालक्रम से बाहर है । उनका नाम इतिहास में एक और कारण से याद रखा जाता है : वर्ष 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन के लिए हुए अध्यक्ष-पद के चुनाव में वे गाँधीजी द्वारा समर्थित प्रत्याशी थे और सुभाष चंद्र बोस से पराजित हुए ; गाँधीजी ने उस पराजय को अपनी पराजय कहा था, और आगे चलकर वही प्रकरण बोस के त्यागपत्र तथा फ़ॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना तक पहुँचा । यह विकल्प इसीलिए आकर्षक है — नाम स्वतंत्रता के आसपास के वर्षों से जुड़ा है, पर ठीक उस तिथि से नहीं ।
- (b)जवाहरलाल नेहरू — जवाहरलाल नेहरू वर्ष 1946 में काँग्रेस के अध्यक्ष रहे, किन्तु स्वतंत्रता के समय वे इस पद पर नहीं थे — वे अंतरिम सरकार के प्रमुख थे और पंद्रह अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने । यही इस विकल्प का पूरा जाल है : अभ्यर्थी स्वतंत्रता के समय सबसे प्रमुख दिखाई देने वाले नेता को अध्यक्ष मान लेता है । नेहरू इससे पहले भी अध्यक्ष रह चुके थे — वर्ष 1929 के लाहौर अधिवेशन में, जहाँ पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित हुआ और रावी के तट पर तिरंगा फहराया गया । पर प्रश्न ठीक अगस्त 1947 के समय की स्थिति पूछ रहा है, और उस समय अध्यक्ष कोई और था । संगठन का पद और सरकार का पद अलग-अलग गिनिए ।
- (c)अबुल कलाम आज़ाद — अबुल कलाम आज़ाद काँग्रेस के अध्यक्ष के रूप में सबसे लंबे कालखंड तक रहे — वर्ष 1940 के रामगढ़ अधिवेशन से लेकर 1946 तक, क्योंकि भारत छोड़ो आंदोलन और उसके बाद के लंबे कारावास के कारण इस बीच नियमित अधिवेशन नहीं हो सके । इसी कारण क्रिप्स मिशन और कैबिनेट मिशन के साथ हुई बातचीत में वे काँग्रेस अध्यक्ष के रूप में सम्मिलित रहे, और यही तथ्य भ्रम पैदा करता है : जो नेता विभाजन-पूर्व की सारी वार्ताओं में अध्यक्ष के रूप में दिखता है, उसे अभ्यर्थी स्वतंत्रता के समय भी अध्यक्ष मान लेता है । पर वर्ष 1946 में यह पद उनके हाथ से निकल चुका था, और स्वतंत्र भारत में वे शिक्षा मंत्री बने ।
अवधारणा
भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अध्यक्ष-पद का इतिहास परीक्षा की दृष्टि से एक स्थायी विषय है, और उसे याद रखने का सही तरीक़ा वर्ष-वार सूची रटना नहीं, बल्कि उन बिंदुओं को पकड़ना है जहाँ कोई महत्त्वपूर्ण घटना अधिवेशन से जुड़ी हो । वर्ष 1929 का लाहौर अधिवेशन, जहाँ पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित हुआ ; वर्ष 1939 का त्रिपुरी अधिवेशन, जहाँ अध्यक्ष-पद का चुनाव विवाद का विषय बना ; वर्ष 1940 का रामगढ़ अधिवेशन, जिसके बाद अध्यक्ष का कार्यकाल असाधारण रूप से लंबा खिंच गया ; और वर्ष 1946, जब स्वतंत्रता की वार्ताएँ निर्णायक मोड़ पर थीं । इसके साथ यह भेद भी स्पष्ट रखना चाहिए कि काँग्रेस एक राजनीतिक संगठन है और उसका अध्यक्ष संगठन का प्रमुख होता है, जबकि प्रधानमंत्री सरकार का प्रमुख होता है । स्वतंत्रता के समय ये दोनों पद अलग-अलग व्यक्तियों के पास थे, और आगे चलकर भी काँग्रेस में संगठन तथा सरकार के नेतृत्व के बीच का संबंध कई बार चर्चा का विषय बना — वर्ष 1950 में अध्यक्ष-पद के चुनाव को लेकर हुआ मतभेद इसी का उदाहरण है ।
स्वतंत्रता के आसपास के वर्षों पर बनने वाले प्रश्न प्रायः किसी नियत तिथि पर किसी पद के धारक को पूछते हैं, और यही उनकी कठिनाई है — नाम सब परिचित होते हैं, केवल तिथि का मिलान करना पड़ता है । यहाँ चारों नाम काँग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं, इसलिए ‘कौन अध्यक्ष रहा’ जानना पर्याप्त नहीं ; जानना यह पड़ता है कि किस वर्ष । परीक्षक ने तीन ऐसे नाम रखे हैं जो स्वतंत्रता के ठीक पहले या ठीक बाद अध्यक्ष रहे, और उत्तर वह है जो ठीक बीच में पड़ता है । इस प्रकार के प्रश्नों में एक छोटी समय-रेखा बहुत काम आती है, जिसमें 1940 से 1950 तक के अध्यक्षों के नाम क्रम से लिखे हों । यह भी ध्यान दीजिए कि हिन्दी स्तंभ में नाम देवनागरी में लिप्यंतरित हैं, ‘आज़ाद’ नुक़्ते के साथ छपा है और विकल्प (d) में आद्याक्षर देवनागरी में पूर्ण विराम के साथ दिए गए हैं ।
मुख्य तथ्य
- पंद्रह अगस्त 1947 को भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अध्यक्ष आचार्य जे.बी. कृपलानी थे, जो नवंबर 1946 के मेरठ अधिवेशन में इस पद पर चुने गए थे ।
- मौलाना अबुल कलाम आज़ाद वर्ष 1940 के रामगढ़ अधिवेशन से 1946 तक अध्यक्ष रहे — यह सबसे लंबा कार्यकाल था, क्योंकि भारत छोड़ो आंदोलन और कारावास के कारण नियमित अधिवेशन नहीं हो सके ।
- जवाहरलाल नेहरू वर्ष 1946 में काँग्रेस अध्यक्ष रहे, पर स्वतंत्रता के समय वे प्रधानमंत्री बने ; इससे पहले वे वर्ष 1929 के लाहौर अधिवेशन के भी अध्यक्ष थे, जहाँ पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित हुआ ।
- कृपलानी के त्यागपत्र के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद अध्यक्ष बने, और उनके बाद वर्ष 1948 के जयपुर अधिवेशन में पट्टाभि सीतारमैया ।
- पट्टाभि सीतारमैया वर्ष 1939 के त्रिपुरी अध्यक्ष-पद चुनाव में सुभाष चंद्र बोस से पराजित हुए थे ; गाँधीजी ने उस पराजय को अपनी पराजय कहा था ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- प्रधानमंत्री और काँग्रेस अध्यक्ष को एक मान लेना । स्वतंत्रता के समय ये दो अलग पद थे और दो अलग व्यक्तियों के पास थे ।
- लंबे कार्यकाल को स्वतंत्रता तक खींच देना । आज़ाद 1940 से 1946 तक अध्यक्ष रहे, पर 1947 में यह पद उनके पास नहीं था ।
- स्वतंत्रता के ठीक बाद बने अध्यक्ष को उस समय का अध्यक्ष मान लेना । पट्टाभि सीतारमैया 1948 में अध्यक्ष बने, अगस्त 1947 में नहीं ।
काँग्रेस अध्यक्षों पर आयोग तीन तरह के प्रश्न बनाते हैं । पहला प्रकार यही है — किसी नियत तिथि या घटना के समय अध्यक्ष कौन था, जहाँ उत्तर के लिए एक छोटी समय-रेखा चाहिए । दूसरा प्रकार अधिवेशन और प्रस्ताव को जोड़ने का होता है : किस अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित हुआ, किसमें असहयोग का, किसमें भारत छोड़ो का — और वहाँ स्थान, वर्ष तथा अध्यक्ष तीनों याद रखने पड़ते हैं । तीसरा प्रकार सुमेलन का होता है, जिसमें चार अधिवेशन और चार अध्यक्ष या चार वर्ष अलग-अलग सूचियों में रखे जाते हैं । तीनों की तैयारी के लिए 1885 से 1950 तक के सारे अध्यक्ष याद करने की आवश्यकता नहीं है ; पर्याप्त यह है कि लगभग पंद्रह ऐसे अधिवेशन चुन लिए जाएँ जिनसे कोई निर्णायक प्रस्ताव या विवाद जुड़ा हो, और उन्हीं के साथ अध्यक्ष का नाम, वर्ष तथा स्थान एक पंक्ति में लिख लिया जाए ।
संबंधित PYQ
EPFO_EOAO_2023_Q23Match List I with List II and select the correct answer using the code given below the Lists : List I (Congress Session) A. Lahore Session, 1909 B. Calcutta Session, 1911 C. Bankipore Session, 1912 D. Madras Session, 1914 List II (President) 1. Madan Mohan Malaviya 2. Raghunath Narasinha Mudholkar 3. Bishan Narayan Dar 4. Bhupendra Nath Bose Code :
- (a) A-1, B-3, C-2, D-4
- (b) A-1, B-2, C-3, D-4
- (c) A-4, B-2, C-3, D-1
- (d) A-4, B-3, C-2, D-1
उत्तर(a) A-1, B-3, C-2, D-4
काँग्रेस अधिवेशनों पर बना सुमेलन वाला प्रश्न, जो इसी विषय को दूसरी दिशा से पूछता है — अधिवेशन और उससे जुड़ी घटना या अध्यक्ष को आपस में जोड़ना ।
EPFO_EOAO_2020_Q94खोलें व हल करें →Who among the following was not part of the group of ‘no-changers’ in the Congress Party ?
- (a) Sardar Vallabhbhai Patel
- (b) Dr. Ansari
- (c) Babu Rajendra Prasad
- (d) Motilal Nehru
उत्तर(d) Motilal Nehru
इसी प्रश्नपत्र का दूसरा काँग्रेस-प्रश्न, जो संगठन के भीतर के गुटों पर टिका है — असहयोग की वापसी के बाद बने ‘नो-चेंजर्स’ समूह में कौन नहीं था ।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के लाहौर अधिवेशन (1929) की अध्यक्षता, जिसमें पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित हुआ था, निम्नलिखित में से किसने की थी ?
- (a)मोतीलाल नेहरू
- (b)जवाहरलाल नेहरू
- (c)सुभाष चंद्र बोस
- (d)वल्लभभाई पटेल
उत्तर(b) जवाहरलाल नेहरू — इसी अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित हुआ और रावी के तट पर तिरंगा फहराया गया ; मोतीलाल नेहरू इससे पहले 1928 के कलकत्ता अधिवेशन के अध्यक्ष थे ।
- practice — not a real PYQ
स्वतंत्रता के कुछ महीनों बाद जे.बी. कृपलानी के त्यागपत्र पर भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का अध्यक्ष निम्नलिखित में से कौन बना था ?
- (a)पट्टाभि सीतारमैया
- (b)डॉ. राजेंद्र प्रसाद
- (c)पुरुषोत्तम दास टंडन
- (d)यू.एन. ढेबर
उत्तर(b) डॉ. राजेंद्र प्रसाद — उनके बाद वर्ष 1948 में पट्टाभि सीतारमैया अध्यक्ष बने ; पुरुषोत्तम दास टंडन और यू.एन. ढेबर इससे बाद के वर्षों में इस पद पर आए ।