आय और व्यय लेखा के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है ?
- (a)यह वास्तविक लेखा है ।
- (b)यह वैयक्तिक लेखा है ।
- (c)यह अवास्तविक लेखा है ।
- (d)यह प्रतिनिधि वैयक्तिक लेखा है ।
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) यह अवास्तविक लेखा है । आय और व्यय लेखा वही काम करता है जो किसी व्यापारिक इकाई में लाभ-हानि खाता करता है — वह चालू अवधि के आगमगत मदों को आमने-सामने रखकर परिणाम निकालता है । लाभ-हानि खाता अवास्तविक लेखा है, इसलिए उसका समकक्ष भी अवास्तविक लेखा ही होगा । खातों के परंपरागत वर्गीकरण में अवास्तविक अथवा नाममात्र लेखे वे हैं जो व्यय, हानि, आय और लाभ से संबंधित होते हैं, और उनका नियम है — सारे व्यय तथा हानियाँ नामे, सारी आय तथा लाभ जमा । ऐसे खातों की एक निर्णायक पहचान यह है कि वे अवधि के अंत में बंद कर दिए जाते हैं ; उनका कोई शेष अगली अवधि में नहीं ले जाया जाता और न तुलन-पत्र में दिखता है । आय और व्यय लेखा ठीक इसी तरह व्यवहार करता है । उसके नामे पक्ष में वेतन, किराया, बिजली, मरम्मत, ह्रास जैसे चालू अवधि के व्यय जाते हैं और जमा पक्ष में चंदा, सदस्यता शुल्क, ब्याज, किराया-आय जैसे चालू अवधि के आगम ; दोनों का अंतर आधिक्य या न्यूनता कहलाता है, जो पूँजी निधि में जोड़ या घटा दिया जाता है । इसके बाद खाता स्वयं समाप्त हो जाता है — उसका कोई शेष तुलन-पत्र में नहीं ले जाया जाता, जैसा किसी आस्ति या देयता के खाते में होता है । यहाँ इसी खंड के पिछले प्रश्न से तुलना कीजिए, क्योंकि दोनों साथ पूछे गए हैं । प्राप्ति और भुगतान लेखा वास्तविक लेखा है, क्योंकि वह रोकड़ नामक आस्ति का विस्तार है और उसका अंतिम शेष तुलन-पत्र में जाता है । आय और व्यय लेखा अवास्तविक है, क्योंकि वह आय और व्यय का लेखा है और शेष के रूप में कुछ नहीं छोड़ता । एक ही संस्था के दो विवरण, दो अलग श्रेणियाँ — और यही भेद इस प्रश्न का पूरा उत्तर है ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)यह वास्तविक लेखा है । — वास्तविक लेखे आस्तियों के होते हैं — रोकड़, बैंक, भवन, फ़र्नीचर, स्टॉक, और अमूर्त आस्तियाँ जैसे ख्याति भी । उनका नियम है कि जो भीतर आए वह नामे और जो बाहर जाए वह जमा, और उनकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि वे अवधि के अंत में बंद नहीं होते ; उनका शेष तुलन-पत्र में जाता है और अगली अवधि में आगे ले जाया जाता है । आय और व्यय लेखा ऐसा नहीं करता । इस विकल्प का असली ख़तरा यह है कि उसी संस्था का दूसरा विवरण — प्राप्ति और भुगतान लेखा — सचमुच वास्तविक लेखा है, क्योंकि वह रोकड़ का सारांश है और उसका अंतिम शेष तुलन-पत्र में रोकड़ तथा बैंक के रूप में दिखता है । अभ्यर्थी दोनों विवरणों को एक ही श्रेणी में रख देता है । उन्हें अलग रखिए : नकदी का विवरण वास्तविक, परिणाम का विवरण अवास्तविक ।
- (b)यह वैयक्तिक लेखा है । — वैयक्तिक लेखे व्यक्तियों और व्यक्ति के रूप में मान्य निकायों के होते हैं — किसी देनदार या लेनदार का खाता, किसी कंपनी या फ़र्म का खाता, बैंक का खाता, तथा स्वामी की पूँजी और आहरण के खाते । उनका नियम है कि पाने वाला नामे और देने वाला जमा । आय और व्यय लेखा किसी व्यक्ति से जुड़ा हुआ खाता नहीं है ; वह किसी से न पाता है, न किसी को देता है । वह पूरी संस्था की एक अवधि की आय और व्यय को एक ही स्थान पर रखकर परिणाम निकालने का उपकरण है । इस विकल्प का आकर्षण केवल शब्दों से आता है — क्लब या समिति में सदस्य होते हैं, और सदस्य व्यक्ति हैं, इसलिए अभ्यर्थी को लगता है कि खाता भी वैयक्तिक होगा । सदस्यों के अपने खाते अवश्य वैयक्तिक हैं, पर यह विवरण उनका खाता नहीं है ।
- (d)यह प्रतिनिधि वैयक्तिक लेखा है । — प्रतिनिधि वैयक्तिक लेखे वैयक्तिक लेखों का ही एक उपभेद हैं, और उनकी परिभाषा में ही उत्तर छिपा है — वे किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं । अदत्त वेतन का खाता उन कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करता है जिन्हें वेतन देना शेष है ; पूर्वदत्त बीमा का खाता उस बीमाकर्ता का, जिससे सेवा मिलनी शेष है ; अदत्त किराया, उपार्जित ब्याज और अग्रिम प्राप्त आय के खाते भी इसी श्रेणी में हैं । उनकी दूसरी पहचान यह है कि वे तुलन-पत्र में देयता या आस्ति के रूप में आते हैं । आय और व्यय लेखा किसी का प्रतिनिधित्व नहीं करता और तुलन-पत्र में जाता भी नहीं । यह विकल्प उसी अभ्यर्थी के लिए है जो अदत्त व्यय को इस खाते में देखकर पूरे खाते को उसी श्रेणी में डाल देता है — मद और खाता दो अलग चीज़ें हैं ।
अवधारणा
खातों के परंपरागत वर्गीकरण में तीन श्रेणियाँ हैं । वैयक्तिक लेखे व्यक्तियों तथा व्यक्ति के रूप में मान्य निकायों के होते हैं और उनमें प्रतिनिधि वैयक्तिक लेखे भी आते हैं, जैसे अदत्त वेतन, पूर्वदत्त बीमा, अग्रिम प्राप्त आय ; इनका नियम है पाने वाला नामे, देने वाला जमा । वास्तविक लेखे आस्तियों के होते हैं — रोकड़, भवन, मशीनरी, स्टॉक, ख्याति — और उनका नियम है जो आए वह नामे, जो जाए वह जमा । अवास्तविक अथवा नाममात्र लेखे व्यय, हानि, आय और लाभ के होते हैं ; उनका नियम है सारे व्यय तथा हानियाँ नामे, सारी आय तथा लाभ जमा । इन तीनों में सबसे उपयोगी भेद यह है कि अवधि के अंत में क्या होता है : वैयक्तिक और वास्तविक लेखों के शेष तुलन-पत्र में जाते हैं और अगली अवधि में आगे बढ़ते हैं, जबकि अवास्तविक लेखे बंद कर दिए जाते हैं और उनका कुल परिणाम लाभ-हानि खाते में, अथवा लाभ न कमाने वाली संस्था में आय और व्यय लेखे में अंतरित हो जाता है । आय और व्यय लेखा इसी तीसरी श्रेणी में है । उसके नामे पक्ष में चालू अवधि के व्यय और हानियाँ, जमा पक्ष में चालू अवधि के आगम और लाभ, और अंतर आधिक्य या न्यूनता, जो पूँजी निधि में समायोजित होता है । उसकी दो और विशेषताएँ याद रखिए : वह उपार्जित आधार पर बनता है, अर्थात् अदत्त और पूर्वदत्त मदों का समायोजन करता है, और वह केवल आगमगत मद लेता है — किसी आस्ति की ख़रीद उसमें कभी नहीं आती ।
खातों का वर्गीकरण लेखांकन के पाठ्यक्रम का सबसे आरंभिक अध्याय है और परीक्षा में सबसे लंबे समय तक लौटने वाला भी, क्योंकि उसी पर नामे-जमा के नियम टिके हैं । EPFO के इस प्रश्नपत्र में आयोग ने वर्गीकरण को अलग से नहीं, किसी विवरण के साथ जोड़कर पूछा है — यह पूछने के बजाय कि अवास्तविक लेखा क्या होता है, यह पूछा है कि एक विशेष विवरण किस श्रेणी में आता है । यह अधिक कठिन शैली है, क्योंकि इसमें दो बातें एक साथ आनी चाहिए : वर्गीकरण की परिभाषाएँ, और उस विवरण की प्रकृति । ध्यान देने योग्य बात यह है कि इसी खंड का पिछला प्रश्न उसी संस्था के दूसरे विवरण पर था, अर्थात् आयोग ने ग़ैर-व्यापारिक संस्थाओं के दोनों खातों को लगातार दो प्रश्नों में रखा है । इसलिए उन्हें जोड़ी बनाकर पढ़ना ही सही तरीक़ा है : एक नकदी बताता है और वास्तविक है, दूसरा परिणाम बताता है और अवास्तविक है । एक लेखा अधिकारी के लिए यह भेद रोज़ का है, क्योंकि किसी निकाय के लेखे देखते समय पहले यह तय करना पड़ता है कि कौन-सा शेष आगे जाएगा और कौन-सा वहीं समाप्त हो जाएगा ।
मुख्य तथ्य
- आय और व्यय लेखा अवास्तविक अथवा नाममात्र लेखा है ; वह लाभ न कमाने वाली संस्थाओं में वही काम करता है जो व्यापारिक इकाई में लाभ-हानि खाता करता है ।
- अवास्तविक लेखे व्यय, हानि, आय और लाभ से संबंधित होते हैं ; नियम है सारे व्यय तथा हानियाँ नामे और सारी आय तथा लाभ जमा ।
- अवास्तविक लेखे अवधि के अंत में बंद कर दिए जाते हैं ; उनका कोई शेष तुलन-पत्र में नहीं जाता और न अगली अवधि में आगे बढ़ता है ।
- आय और व्यय लेखे के दोनों पक्षों का अंतर आधिक्य अथवा न्यूनता कहलाता है, और वह तुलन-पत्र की पूँजी निधि में जोड़ या घटा दिया जाता है ।
- यह खाता उपार्जित आधार पर बनता है और केवल चालू अवधि के आगमगत मद लेता है ; किसी आस्ति की ख़रीद उसमें नहीं आती ।
- प्राप्ति और भुगतान लेखा इसके विपरीत वास्तविक लेखा है, क्योंकि वह रोकड़ का सारांश है और उसका अंतिम शेष तुलन-पत्र में जाता है ।
- वास्तविक लेखे आस्तियों के होते हैं — रोकड़, भवन, मशीनरी, स्टॉक, ख्याति ; नियम है जो आए वह नामे, जो जाए वह जमा ।
- वैयक्तिक लेखे व्यक्तियों तथा व्यक्ति के रूप में मान्य निकायों के होते हैं — देनदार, लेनदार, बैंक, कंपनी, फ़र्म ; नियम है पाने वाला नामे, देने वाला जमा ।
- प्रतिनिधि वैयक्तिक लेखे किसी व्यक्ति या समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं — अदत्त वेतन, पूर्वदत्त बीमा, अग्रिम प्राप्त आय — और तुलन-पत्र में देयता या आस्ति के रूप में आते हैं ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- एक ही संस्था के दोनों विवरणों को एक श्रेणी में रख देना । प्राप्ति और भुगतान लेखा वास्तविक है, आय और व्यय लेखा अवास्तविक ।
- खाते में आने वाले मद को देखकर खाते की श्रेणी तय कर देना । अदत्त वेतन प्रतिनिधि वैयक्तिक है, पर उसका व्यय आय और व्यय लेखे में जाता है ।
- अवास्तविक का अर्थ काल्पनिक समझ लेना । ये खाते वास्तविक व्यय और आय के हैं ; उन्हें अवास्तविक इसलिए कहा जाता है कि उनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं ।
- यह भूल जाना कि अवास्तविक लेखों का शेष तुलन-पत्र में नहीं जाता । यही उन्हें आस्ति और देयता के खातों से अलग करता है ।
- आय और व्यय लेखे में आस्ति की ख़रीद या ऋण की वापसी दिखा देना । वह केवल चालू अवधि के आगमगत मद लेता है ।
वर्गीकरण वाले प्रश्न दो तरह से आते हैं । सरल रूप में सीधे पूछ लिया जाता है कि कोई एक खाता किस श्रेणी का है, जैसे किराया खाता या मशीनरी खाता । कठिन रूप वही है जो यहाँ आया — किसी पूरे विवरण की श्रेणी पूछ ली जाती है । दूसरे रूप में उत्तर तक पहुँचने का सबसे भरोसेमंद रास्ता परिभाषा नहीं, व्यवहार है : यह पूछिए कि अवधि के अंत में उस विवरण का क्या होता है । यदि उसका शेष तुलन-पत्र में जाता है तो वह वास्तविक या वैयक्तिक है ; यदि वह वहीं बंद हो जाता है और उसका परिणाम कहीं और अंतरित होता है तो वह अवास्तविक है । आय और व्यय लेखे का आधिक्य पूँजी निधि में चला जाता है और खाता समाप्त हो जाता है, इसलिए वह अवास्तविक है । इस प्रश्नपत्र की शैली से एक और बात सीखिए : यहाँ चारों विकल्प एक ही वाक्य-ढाँचे के हैं और उनमें केवल श्रेणी का नाम बदलता है, इसलिए विकल्प पढ़ने में समय नहीं लगाना चाहिए ; सारा निर्णय श्रेणी की परिभाषा और विवरण के व्यवहार से होता है । और चूँकि आयोग ने दोनों विवरण लगातार दो प्रश्नों में रखे हैं, उन्हें जोड़ी बनाकर याद कीजिए ।
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