निम्नलिखित में से कौन-सी संस्था प्राप्ति और भुगतान लेखा तैयार करती है ?
- (a)व्यापारिक संस्थाएँ
- (b)ग़ैर-व्यापारिक संस्थाएँ
- (c)विनिर्माण संस्थाएँ
- (d)कंपनी अधिनियम के अधीन पंजीकृत कंपनियाँ
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) ग़ैर-व्यापारिक संस्थाएँ । प्राप्ति और भुगतान लेखा उन संस्थाओं का अंतिम खाता है जो लाभ कमाने के उद्देश्य से नहीं चलतीं — क्लब, पुस्तकालय, विद्यालय, चिकित्सालय, धर्मार्थ न्यास, खेल संघ, व्यावसायिक संगठन । ऐसी संस्थाओं में न क्रय-विक्रय का सिलसिला होता है और न लाभ का बँटवारा, इसलिए वे व्यापार खाता और लाभ-हानि खाता नहीं बनातीं । उनके स्थान पर वे तीन विवरण बनाती हैं : प्राप्ति और भुगतान लेखा, आय और व्यय लेखा, तथा तुलन-पत्र । इनमें पहला ही इस प्रश्न का विषय है । प्राप्ति और भुगतान लेखा वास्तव में पूरी अवधि की रोकड़-बही का सारांश है । उसके नामे पक्ष में अवधि की सारी प्राप्तियाँ आती हैं और जमा पक्ष में सारे भुगतान, और वह प्रारंभिक रोकड़ तथा बैंक शेष से आरंभ होकर अंतिम शेष पर समाप्त होता है । उसकी तीन विशेषताएँ याद रखने योग्य हैं, क्योंकि प्रश्न प्राय: उन्हीं पर बनते हैं । पहली, वह पूँजीगत और आगमगत में कोई भेद नहीं करता — भवन के लिए किया गया भुगतान और बिजली का बिल दोनों एक ही खाते में साथ बैठते हैं । दूसरी, वह अवधि का भेद भी नहीं करता — पिछले वर्ष का बकाया चंदा, इस वर्ष का चंदा और अगले वर्ष का अग्रिम चंदा, तीनों उसी वर्ष में दिखेंगे जिस वर्ष नकद मिले । तीसरी, वह केवल नकदी की बात करता है, इसलिए ह्रास, अदत्त व्यय या उपार्जित आय जैसे बिना नकदी वाले मद उसमें आते ही नहीं । खातों के वर्गीकरण में यह वास्तविक लेखा है, क्योंकि यह रोकड़ नामक आस्ति का ही विस्तार है, और इसका अंतिम शेष तुलन-पत्र में रोकड़ तथा बैंक शेष के रूप में दिखता है । इसी कारण वह संस्था की वास्तविक आय-स्थिति नहीं बताता ; उसके लिए अगला विवरण, आय और व्यय लेखा, बनाया जाता है ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)व्यापारिक संस्थाएँ — व्यापारिक संस्थाएँ भी रोकड़-बही रखती हैं, पर वे प्राप्ति और भुगतान लेखा अपने अंतिम खातों के रूप में नहीं बनातीं । उनका उद्देश्य लाभ कमाना है, इसलिए उनका अंतिम खातों का क्रम दूसरा है — पहले व्यापार खाता, जिसमें प्रारंभिक स्टॉक, शुद्ध क्रय और प्रत्यक्ष व्यय एक ओर तथा शुद्ध विक्रय और अंतिम स्टॉक दूसरी ओर रखकर सकल लाभ निकाला जाता है ; फिर लाभ-हानि खाता, जिसमें अप्रत्यक्ष व्यय घटाकर और अन्य आय जोड़कर निवल लाभ निकलता है ; और अंत में तुलन-पत्र । ध्यान दीजिए कि रोकड़-बही और प्राप्ति एवं भुगतान लेखा दो अलग चीज़ें हैं । रोकड़-बही रोज़ की प्रविष्टियों की मूल बही है, जिसे हर इकाई रखती है ; प्राप्ति और भुगतान लेखा उसी का अवधि-अंत में बनाया गया सारांश है, और वह ग़ैर-व्यापारिक संस्थाओं के अंतिम खातों का अंग है ।
- (c)विनिर्माण संस्थाएँ — विनिर्माण संस्थाएँ प्राप्ति और भुगतान लेखा नहीं, बल्कि व्यापारिक संस्थाओं से एक क़दम अधिक विस्तृत खाते बनाती हैं । उनके यहाँ पहले विनिर्माण खाता बनता है, जिसमें कच्चा माल, प्रत्यक्ष मज़दूरी और कारख़ाना उपरिव्यय रखकर उत्पादित माल की लागत निकाली जाती है ; वह लागत व्यापार खाते में जाती है, जहाँ सकल लाभ निकलता है ; फिर लाभ-हानि खाता और तुलन-पत्र । अर्थात् यहाँ भी उद्देश्य लाभ की गणना है, और खातों का पूरा ढाँचा उसी दिशा में बना है । इस विकल्प का आकर्षण यह है कि विनिर्माण में नकद लेनदेन बहुत होते हैं, इसलिए अभ्यर्थी को लगता है कि नकदी का सारांश यहीं बनता होगा । नकदी का ब्योरा वहाँ भी रहता है, पर वह रोकड़-बही और रोकड़ प्रवाह विवरण में आता है, अंतिम खातों में नहीं ।
- (d)कंपनी अधिनियम के अधीन पंजीकृत कंपनियाँ — कंपनी अधिनियम के अधीन पंजीकृत कंपनियाँ जो वित्तीय विवरण बनाती हैं, उनमें प्राप्ति और भुगतान लेखा सम्मिलित नहीं है । कंपनी को तुलन-पत्र तथा लाभ-हानि विवरण उस प्रारूप में बनाने होते हैं जो अधिनियम की अनुसूची में निर्धारित है, और उनके साथ लेखों पर टिप्पणियाँ लगती हैं । नकदी की गति दिखाने के लिए वहाँ रोकड़ प्रवाह विवरण बनता है, जो प्राप्ति और भुगतान लेखा जैसा दिखने पर भी उससे भिन्न है — वह नकदी की गति को प्रचालन, निवेश और वित्तपोषण तीन क्रियाकलापों में बाँटकर दिखाता है, जबकि प्राप्ति और भुगतान लेखा केवल प्राप्तियों और भुगतानों की दो सूचियाँ रखता है । यह भी ध्यान रखिए कि कोई ग़ैर-व्यापारिक संस्था कंपनी अधिनियम के अधीन पंजीकृत हो सकती है ; तब भी यह विकल्प उत्तर नहीं होगा, क्योंकि प्रश्न पंजीकरण नहीं, संस्था के स्वरूप का है ।
अवधारणा
लाभ न कमाने वाली संस्थाओं के लेखे तीन विवरणों में पूरे होते हैं । पहला प्राप्ति और भुगतान लेखा है — पूरी अवधि की रोकड़-बही का सारांश, जो प्रारंभिक रोकड़ तथा बैंक शेष से आरंभ होकर अंतिम शेष पर समाप्त होता है, नामे पक्ष में सारी प्राप्तियाँ और जमा पक्ष में सारे भुगतान रखता है, पूँजीगत तथा आगमगत में कोई भेद नहीं करता, अवधि का भी भेद नहीं करता, और बिना नकदी वाले किसी मद को नहीं लेता । वर्गीकरण में यह वास्तविक लेखा है और इसका अंतिम शेष तुलन-पत्र में रोकड़ तथा बैंक के रूप में आता है । दूसरा आय और व्यय लेखा है, जो लाभ-हानि खाते के समकक्ष है : उसमें केवल चालू अवधि के आगमगत मद आते हैं, उपार्जित आधार पर, और उसका परिणाम आधिक्य या न्यूनता कहलाता है । तीसरा तुलन-पत्र है, जिसमें पूँजी के स्थान पर पूँजी निधि दिखती है । दोनों खातों का भेद परीक्षा का प्रिय विषय है, इसलिए उसे एक पंक्ति में याद रखिए : प्राप्ति और भुगतान लेखा नकदी बताता है, आय और व्यय लेखा परिणाम । ग़ैर-व्यापारिक संस्थाओं की कुछ विशिष्ट मदें भी इसी संदर्भ में पढ़ी जाती हैं — चंदा, आजीवन सदस्यता शुल्क, प्रवेश शुल्क, दान, विरासत, विशेष निधियाँ और उनसे जुड़े व्यय — क्योंकि हर मद के बारे में यह तय करना पड़ता है कि वह पूँजीगत है या आगमगत, और उसी से यह निकलता है कि वह किस विवरण में जाएगी ।
EPFO के लेखा अधिकारी पद के लिए यह खंड इसलिए महत्वपूर्ण है कि सरकारी और अर्ध-सरकारी निकाय, न्यास, सहकारी समितियाँ और कल्याण-कोष सभी लाभ न कमाने वाली इकाइयाँ हैं, और उनके लेखे इसी ढाँचे पर बनते हैं । ऐसे निकाय का लेखा-परीक्षण करते समय पहला प्रश्न यही होता है कि नकदी का सारांश क्या कहता है और उसमें से चालू अवधि का वास्तविक परिणाम कैसे निकाला जाए । यही दोनों विवरणों का व्यावहारिक भेद है । परीक्षा की दृष्टि से इस विषय पर तीन तरह के प्रश्न बनते हैं : कौन-सी संस्था कौन-सा विवरण बनाती है, प्राप्ति और भुगतान लेखा तथा आय और व्यय लेखा में अंतर, और किसी विशेष मद का उपचार । इस प्रश्नपत्र में पहले और तीसरे प्रकार दोनों दिखते हैं, क्योंकि इसका अगला प्रश्न आय और व्यय लेखा के वर्गीकरण पर है । दोनों को साथ पढ़िए, क्योंकि आयोग ने उन्हें साथ रखा है, और इस विषय का अधिकांश भ्रम इसी जोड़ी को अलग-अलग याद करने से पैदा होता है ।
मुख्य तथ्य
- प्राप्ति और भुगतान लेखा लाभ न कमाने वाली अर्थात् ग़ैर-व्यापारिक संस्थाओं द्वारा बनाया जाता है — क्लब, विद्यालय, चिकित्सालय, न्यास, खेल संघ और ऐसे ही निकाय ।
- यह पूरी अवधि की रोकड़-बही का सारांश है ; प्रारंभिक रोकड़ तथा बैंक शेष से आरंभ होकर अंतिम शेष पर समाप्त होता है ।
- इसमें पूँजीगत और आगमगत का कोई भेद नहीं किया जाता — भवन का भुगतान और बिजली का बिल एक ही खाते में साथ आते हैं ।
- इसमें अवधि का भी भेद नहीं होता — पिछले वर्ष का बकाया, इस वर्ष का और अगले वर्ष का अग्रिम, तीनों उसी वर्ष दिखते हैं जिस वर्ष नकद मिले ।
- बिना नकदी वाले मद — ह्रास, अदत्त व्यय, उपार्जित आय — इसमें कभी नहीं आते, क्योंकि यह केवल नकदी की गति दिखाता है ।
- वर्गीकरण में यह वास्तविक लेखा है और इसका अंतिम शेष तुलन-पत्र में रोकड़ तथा बैंक शेष के रूप में आता है ।
- ग़ैर-व्यापारिक संस्थाएँ तीन विवरण बनाती हैं — प्राप्ति और भुगतान लेखा, आय और व्यय लेखा तथा तुलन-पत्र ; उनके तुलन-पत्र में पूँजी के स्थान पर पूँजी निधि दिखती है ।
- व्यापारिक तथा विनिर्माण संस्थाएँ व्यापार खाता और लाभ-हानि खाता बनाती हैं ; विनिर्माण संस्थाएँ उनसे पहले विनिर्माण खाता भी बनाती हैं ।
- कंपनी अधिनियम के अधीन बनने वाले वित्तीय विवरणों में प्राप्ति और भुगतान लेखा नहीं आता ; वहाँ नकदी की गति रोकड़ प्रवाह विवरण में दिखाई जाती है ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- रोकड़-बही और प्राप्ति एवं भुगतान लेखा को एक मान लेना । पहली मूल बही है, दूसरा अवधि-अंत में बनाया गया उसका सारांश ।
- यह मान लेना कि प्राप्ति और भुगतान लेखा संस्था का परिणाम बताता है । वह केवल नकदी बताता है ; परिणाम आय और व्यय लेखा से निकलता है ।
- उसमें ह्रास या अदत्त व्यय जोड़ देना । बिना नकदी वाला कोई मद इस खाते में नहीं आता ।
- उसमें केवल चालू वर्ष के मद रखना । वह अवधि का भेद नहीं करता ; पिछले और अगले वर्ष की नकदी भी उसी में आती है ।
- रोकड़ प्रवाह विवरण को उसका दूसरा नाम समझ लेना । वह नकदी को तीन क्रियाकलापों में बाँटता है, जबकि यह केवल दो सूचियाँ रखता है ।
लाभ न कमाने वाली संस्थाओं के लेखों पर आयोग तीन प्रकार के प्रश्न बनाता है, और तीनों इसी प्रश्नपत्र में दिखाई देने वाली शैली के हैं । पहला प्रकार यही है — कौन-सी संस्था कौन-सा विवरण बनाती है । दूसरा प्रकार दो विवरणों के अंतर पर होता है, और तीसरा किसी विशेष मद के उपचार पर, जैसे आजीवन सदस्यता शुल्क या विशेष निधि से हुआ व्यय । इनमें से पहला प्रकार सबसे सरल है, बशर्ते संस्थाओं का वर्गीकरण स्पष्ट हो । इसलिए तैयारी में सबसे पहले यह सूची बना लीजिए कि कौन-सी इकाई कौन-से अंतिम खाते बनाती है — व्यापारिक इकाई व्यापार तथा लाभ-हानि खाता, विनिर्माण इकाई उनसे पहले विनिर्माण खाता, ग़ैर-व्यापारिक संस्था प्राप्ति और भुगतान तथा आय और व्यय लेखा, और कंपनी अधिनियम के अधीन पंजीकृत कंपनी निर्धारित प्रारूप में तुलन-पत्र तथा लाभ-हानि विवरण । यह सूची बन जाने पर इस प्रकार के विकल्प अपने आप छँट जाते हैं । एक और आदत उपयोगी है : हर विवरण के साथ यह भी लिखिए कि वह किस प्रकार का खाता है, क्योंकि आयोग उसी वर्गीकरण पर अगला प्रश्न बना देता है ।
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