बाज़ार में नए प्रतिस्पर्धी के प्रवेश करने एवं उत्पादन और विपणन विभागों के बीच अनबन होने जैसी घटनाएँ जब लेखाबहियों में प्रकट नहीं की जाती हैं, तब किसी इकाई द्वारा निम्नलिखित में से कौन-सी लेखा संकल्पना का प्रयोग किया जाता है ?
- (a)मिलान
- (b)मुद्रा मापन
- (c)आगम मान्यता
- (d)लागत
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) मुद्रा मापन । प्रश्न ने दो ऐसी घटनाएँ चुनकर रखी हैं जो व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और फिर भी लेखाबहियों में नहीं आतीं — बाज़ार में किसी नए प्रतिस्पर्धी का प्रवेश, और उत्पादन तथा विपणन विभागों के बीच अनबन । दोनों भविष्य के लाभ पर गहरा असर डाल सकती हैं । फिर भी लेखाकार उन्हें दर्ज नहीं करता, और उसका कारण यही संकल्पना है । मुद्रा मापन संकल्पना कहती है कि लेखाबहियों में केवल वे लेनदेन और घटनाएँ दर्ज होंगी जिन्हें मुद्रा में मापा जा सके ; जिस घटना पर कोई विश्वसनीय रुपया-मूल्य नहीं लगाया जा सकता, वह चाहे कितनी ही महत्वपूर्ण क्यों न हो, बहियों से बाहर रह जाती है । ध्यान दीजिए कि यह प्रश्न यह नहीं पूछ रहा कि कौन-सी संकल्पना लागू नहीं होती ; यह सीधा प्रश्न है — जब ऐसी घटनाएँ प्रकट नहीं की जातीं, तब इकाई किस संकल्पना का प्रयोग कर रही होती है । उत्तर यही संकल्पना है, क्योंकि छोड़ने का निर्णय भी उसी नियम से निकलता है । इस संकल्पना का दूसरा और अधिक उपयोगी पक्ष यह है कि वह लेखांकन को एक साझी इकाई देती है । पाँच मशीनें, तीन भवन और दो सौ टन कच्चा माल आपस में जोड़े नहीं जा सकते, पर उनके रुपया-मूल्य जोड़े जा सकते हैं । इसी कारण तुलन-पत्र में असमान वस्तुएँ एक ही योग में आ पाती हैं । इसके साथ एक मौन मान्यता भी चलती है — यह कि मुद्रा का मूल्य स्थिर है । यही इस संकल्पना की सबसे बड़ी सीमा है, क्योंकि मूल्य-स्तर बदलने पर दस वर्ष पुरानी और आज की राशियाँ एक ही योग में जोड़ दी जाती हैं मानो वे एक ही मूल्य की हों । और जो सूचना बहियों से बाहर रह जाती है, वह प्रबंधन-रिपोर्ट या निदेशक-रिपोर्ट में गुणात्मक रूप से बताई जाती है — अर्थात् संकल्पना उस सूचना को महत्वहीन नहीं कहती, केवल यह कहती है कि उसका स्थान लेखाबहियाँ नहीं हैं ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)मिलान — मिलान संकल्पना का प्रश्न ही दूसरा है । वह यह तय करती है कि जो व्यय दर्ज हो चुके हैं, उन्हें किस अवधि की आय के सामने रखा जाएगा — किसी लेखा-अवधि के आगम के साथ उसी अवधि के वे व्यय जोड़े जाएँ जो उस आगम को कमाने में लगे, चाहे उनका भुगतान हुआ हो या नहीं । अदत्त व्यय, पूर्वदत्त व्यय, उपार्जित आय और ह्रास इसी संकल्पना के व्यावहारिक रूप हैं । किंतु यह पूरा नियम तभी काम करता है जब मद बहियों में आ चुका हो । नए प्रतिस्पर्धी का प्रवेश या दो विभागों की अनबन कभी किसी अवधि में दर्ज ही नहीं होती, इसलिए उन्हें किसी अवधि से मिलाने का प्रश्न ही नहीं उठता । यही इस विकल्प की चूक है — वह उस स्तर का उत्तर दे रहा है जिस स्तर तक प्रश्न पहुँचा ही नहीं ।
- (c)आगम मान्यता — आगम मान्यता की संकल्पना यह बताती है कि आय को किस बिंदु पर अर्जित माना जाए । साधारण दशा में वह बिंदु विक्रय है — जब माल की संपत्ति, या उसके स्वामित्व के महत्वपूर्ण जोखिम और प्रतिफल, क्रेता को अंतरित हो जाएँ । कुछ उद्योगों में यह बिंदु पहले भी आ सकता है ; भारतीय लेखा मानक 9 इसका उदाहरण देता है कि फ़सल की कटाई या खनिज के निष्कर्षण के बाद, जहाँ वायदा संविदा, सरकारी प्रत्याभूति या ऐसा बाज़ार हो जिसमें न बिक पाने का जोखिम नगण्य हो, वहाँ माल का मूल्यांकन शुद्ध वसूली योग्य मूल्य पर किया जाता है । किंतु यह पूरी चर्चा आय के समय की है । प्रश्न में जो दो घटनाएँ दी गई हैं वे आय ही नहीं हैं, इसलिए उनके मान्य होने का समय पूछना निरर्थक है ।
- (d)लागत — लागत संकल्पना यह कहती है कि किसी आस्ति को बहियों में उस राशि पर दर्ज किया जाएगा जो उसे अर्जित करने में वास्तव में लगी, न कि उसके बाज़ार मूल्य पर ; और आगे ह्रास भी उसी अर्जन-लागत पर लगाया जाएगा । इसका परिणाम यह है कि बाज़ार में मूल्य बढ़ने-घटने से बहियों की राशि नहीं बदलती । देखने में यह प्रश्न के निकट लगता है, क्योंकि यहाँ भी बाज़ार की एक घटना बहियों में नहीं आ रही । किंतु दोनों में अंतर मूल का है । लागत संकल्पना उस मद पर लागू होती है जो बहियों में है और जिसका एक निश्चित मूल्य है — वह केवल यह तय करती है कि कौन-सा मूल्य लिखा जाए । प्रश्न की घटनाओं का तो कोई रुपया-मूल्य ही नहीं है, इसलिए वे मापन की सीमा पर रुकती हैं, मूल्यांकन की पद्धति पर नहीं ।
अवधारणा
मुद्रा मापन लेखांकन की उन बुनियादी संकल्पनाओं में है जो यह तय करती हैं कि बहियों में क्या आएगा और क्या नहीं । उसका कथन है कि केवल वही लेनदेन और घटनाएँ अभिलिखित की जाएँगी जिन्हें मुद्रा में मापा जा सके । इससे तीन परिणाम निकलते हैं । पहला, लेखांकन को एक साझी मापन-इकाई मिल जाती है, जिससे असमान वस्तुएँ — मशीनें, भवन, कच्चा माल, देनदार — एक ही योग में जोड़ी जा सकती हैं ; यही तुलन-पत्र को संभव बनाता है । दूसरा, बहुत-सी महत्वपूर्ण सूचनाएँ बहियों से बाहर रह जाती हैं : प्रबंधन की योग्यता, कर्मचारियों का मनोबल, ग्राहक की निष्ठा, विभागों के बीच तनाव, बाज़ार में नई प्रतिस्पर्धा, किसी प्रमुख कर्मचारी का जाना । वे महत्वहीन नहीं हैं, केवल मापन योग्य नहीं हैं, और इसीलिए उनका स्थान निदेशक-रिपोर्ट या प्रबंधन-विवेचन में होता है, खातों में नहीं । तीसरा, इस संकल्पना के साथ एक मौन मान्यता चलती है कि मुद्रा का मूल्य स्थिर है । व्यवहार में मूल्य-स्तर बदलता रहता है, इसलिए बीस वर्ष पहले ख़रीदे गए भवन की राशि और इस वर्ष ख़रीदी गई मशीन की राशि एक ही योग में जोड़ दी जाती हैं यद्यपि उनकी क्रय-शक्ति एक नहीं । यही सीमा मूल्य-स्तर लेखांकन तथा चालू लागत लेखांकन की चर्चाओं की जड़ है । इस संकल्पना को लागत संकल्पना से अलग रखना आवश्यक है : यह तय करती है कि मद बहियों में आएगा या नहीं, और वह तय करती है कि आए हुए मद को किस मूल्य पर लिखा जाए ।
इस प्रश्नपत्र के लेखा-खंड में संकल्पनाओं पर लगातार दो प्रश्न आए हैं, और दोनों की बनावट एक जैसी है — स्टेम में संकल्पना का प्रयोग या कथन, और विकल्पों में चार नाम । दोनों में पहला विकल्प एक ही शब्द है, अर्थात् आयोग एक ही नाम को दो प्रश्नों में विकल्प बनाकर रख देता है । इससे एक तैयारी-नियम निकलता है : संकल्पनाओं को केवल नाम और परिभाषा के रूप में नहीं, प्रयोग के उदाहरणों के रूप में याद कीजिए, क्योंकि प्रश्न प्राय: उदाहरण देकर नाम पूछते हैं । मुद्रा मापन का प्रश्न विशेष रूप से इसी शैली में आता है, क्योंकि उसका सबसे अच्छा उदाहरण वही है जो बहियों में नहीं आता — कर्मचारियों का मनोबल, प्रबंधन की योग्यता, प्रतिस्पर्धा । व्यावहारिक दृष्टि से यह संकल्पना यह भी समझाती है कि वित्तीय विवरण किसी इकाई की पूरी तस्वीर क्यों नहीं देते, और इसीलिए विश्लेषक उनके साथ गुणात्मक सूचना भी पढ़ते हैं । एक लेखा अधिकारी के लिए यह भेद रोज़ का है : जिसका मूल्य नहीं लगाया जा सकता, उसे खाते में नहीं डाला जाता, पर उसे टिप्पणी में बताया जा सकता है ।
मुख्य तथ्य
- मुद्रा मापन संकल्पना के अनुसार लेखाबहियों में केवल वे लेनदेन और घटनाएँ दर्ज होती हैं जिन्हें मुद्रा में मापा जा सके ।
- प्रबंधन की योग्यता, कर्मचारियों का मनोबल, ग्राहक-निष्ठा, विभागों की अनबन और बाज़ार में नई प्रतिस्पर्धा — ये महत्वपूर्ण होते हुए भी बहियों में नहीं आतीं ।
- इस संकल्पना से लेखांकन को एक साझी मापन-इकाई मिलती है, जिससे मशीनें, भवन और स्टॉक जैसी असमान वस्तुएँ एक ही योग में जोड़ी जा सकती हैं ।
- इसके साथ यह मौन मान्यता चलती है कि मुद्रा का मूल्य स्थिर है ; मूल्य-स्तर बदलने पर विभिन्न वर्षों की राशियाँ तुलनीय नहीं रह जातीं ।
- यही सीमा मूल्य-स्तर लेखांकन तथा चालू लागत लेखांकन की चर्चाओं का आधार है ।
- जो सूचना मुद्रा में मापी नहीं जा सकती, उसका स्थान निदेशक-रिपोर्ट अथवा प्रबंधन-विवेचन है, न कि लेखाबहियाँ ।
- लागत संकल्पना आस्ति को उसकी अर्जन-लागत पर दर्ज कराती है और ह्रास उसी लागत पर लगता है ; बाज़ार मूल्य के उतार-चढ़ाव बहियों में नहीं आते ।
- आगम मान्यता की संकल्पना यह तय करती है कि आय किस बिंदु पर अर्जित मानी जाए ; साधारण दशा में वह बिंदु विक्रय है ।
- मिलान संकल्पना किसी अवधि के आगम के सामने उसी अवधि के व्यय रखती है, और उसका प्रयोग तभी होता है जब मद बहियों में आ चुका हो ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- यह समझ लेना कि जो घटना बहियों में नहीं आती वह महत्वहीन है । संकल्पना केवल मापन की सीमा बताती है, महत्व की नहीं ।
- मुद्रा मापन और लागत संकल्पना को एक मान लेना । पहली तय करती है कि मद आएगा या नहीं, दूसरी तय करती है कि आए हुए मद का मूल्य क्या लिखा जाए ।
- मुद्रा के स्थिर मूल्य वाली मान्यता को भूल जाना । यही इस संकल्पना की सबसे बड़ी सीमा है और परीक्षा में अलग से पूछी जाती है ।
- इस प्रश्न को निषेधात्मक मान लेना । यहाँ सीधा पूछा गया है कि कौन-सी संकल्पना लागू होती है, न कि कौन-सी लागू नहीं होती ।
- गुणात्मक सूचना के लिए कोई स्थान ही न मानना । वह वित्तीय विवरणों के साथ की टिप्पणियों और प्रबंधन-रिपोर्ट में दी जाती है ।
लेखांकन की संकल्पनाओं पर आयोग दो शैलियों में प्रश्न बनाता है । पहली शैली में संकल्पना का कथन स्टेम में रख दिया जाता है और नाम पूछा जाता है ; दूसरी शैली में एक व्यावहारिक स्थिति दी जाती है और पूछा जाता है कि उसमें कौन-सी संकल्पना काम कर रही है । यह प्रश्न दूसरी शैली का है, और उसकी पहचान का सूत्र सरल है — देखिए कि स्थिति में कठिनाई किस स्तर पर है । यदि कठिनाई यह है कि मद को किस अवधि में रखा जाए, तो उत्तर मिलान है ; यदि यह है कि आय कब मानी जाए, तो आगम मान्यता ; यदि यह है कि किस मूल्य पर लिखा जाए, तो लागत ; और यदि यह है कि मद को मापा ही नहीं जा सकता, तो मुद्रा मापन । यहाँ दोनों घटनाओं का कोई रुपया-मूल्य नहीं है, इसलिए कठिनाई मापन के स्तर पर है और उत्तर वहीं मिलता है । वाक्य की बनावट पर भी ध्यान दीजिए : स्टेम में जो नकारात्मक शब्द है वह उस उपवाक्य का अंश है जो बताता है कि घटनाएँ प्रकट नहीं की जातीं ; वह अभ्यर्थी के लिए निर्देश नहीं है । इस पेपर में जब निषेध निर्देश होता है तब उसे उभारकर छापा जाता है, और यहाँ वह सामान्य छपाई में है ।
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- (b)कि मुद्रा का मूल्य स्थिर रहता है
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उत्तर(b) कि मुद्रा का मूल्य स्थिर रहता है — इसी कारण विभिन्न वर्षों की राशियाँ बिना समायोजन जोड़ दी जाती हैं ।