वह आधारभूत लेखांकन संकल्पना क्या है, जो लाभों की किसी प्रत्याशा का नहीं, अपितु सभी संभावित हानियों के प्रावधान का समर्थन करती है ?
- (a)मिलान
- (b)सारता
- (c)समनुरूपता
- (d)रूढ़िवादिता
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) रूढ़िवादिता । प्रश्न ने संकल्पना का नाम नहीं पूछा, उसकी परिभाषा पढ़कर सुना दी है : लाभों की किसी प्रत्याशा का समर्थन नहीं, किंतु सभी संभावित हानियों के प्रावधान का समर्थन । लेखाशास्त्र में इस वाक्य को ही रूढ़िवादिता की संकल्पना कहते हैं, जिसे सतर्कता (prudence) भी कहा जाता है, और अंग्रेज़ी में इसका पुराना सूत्रवाक्य आज भी वैसा ही पढ़ाया जाता है — लाभ की प्रत्याशा मत कीजिए, पर हर संभावित हानि का प्रावधान कीजिए । वाक्य के दोनों आधे हिस्सों पर ध्यान दीजिए, क्योंकि संकल्पना उन दोनों से मिलकर बनती है और अकेला कोई आधा उसे नहीं बताता । पहला आधा कहता है कि जो लाभ अभी अर्जित नहीं हुआ, उसे बहियों में मत लाइए — बाज़ार में स्टॉक का मूल्य बढ़ गया तो वह वृद्धि लाभ नहीं है, जब तक वह माल बिक न जाए । दूसरा आधा कहता है कि जो हानि अभी हुई नहीं है पर होने की उचित संभावना है, उसका प्रावधान अभी कीजिए — इसीलिए संदिग्ध ऋणों के लिए प्रावधान बनाया जाता है, यद्यपि यह पक्का नहीं होता कि वे ऋण वास्तव में डूबेंगे । अर्थात् संकल्पना दोनों दिशाओं में सममित नहीं है, और वही उसका सार है : अनिश्चितता की दशा में लेखांकन उस विकल्प की ओर झुकता है जो आस्तियों और लाभ को कम दिखाए, अधिक नहीं । इसका सबसे परिचित प्रयोग स्टॉक का मूल्यांकन है — अंतिम स्टॉक लागत अथवा शुद्ध वसूली योग्य मूल्य, इन दोनों में से जो कम हो उस पर लगाया जाता है । यह नियम सीधे रूढ़िवादिता से निकलता है, क्योंकि मूल्य गिरने पर हानि तुरंत मान ली जाती है जबकि मूल्य बढ़ने पर लाभ नहीं । देनदारों पर बट्टे का प्रावधान बनाया जाता है, लेनदारों पर मिलने वाले बट्टे की प्रत्याशा नहीं की जाती । यही असममिति देखते ही उत्तर पहचाना जा सकता है ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)मिलान — मिलान संकल्पना यह तय करती है कि किस अवधि का व्यय किस अवधि की आय से जोड़ा जाएगा, न कि यह कि अनिश्चितता में किस ओर झुका जाए । उसका नियम है कि किसी लेखा-अवधि के आगम के सामने उसी अवधि के वे व्यय रखे जाएँ जो उस आगम को कमाने में लगे, चाहे उनका नकद भुगतान उस अवधि में हुआ हो या नहीं । उपार्जित आधार पर बहियाँ इसी संकल्पना के कारण बनती हैं, और अदत्त व्यय, पूर्वदत्त व्यय, उपार्जित आय तथा ह्रास — ये सब उसी के व्यावहारिक रूप हैं । ध्यान दीजिए कि मिलान और रूढ़िवादिता कभी-कभी एक-दूसरे से टकराती भी हैं : संदिग्ध ऋणों का प्रावधान भविष्य की संभावित हानि को आज की अवधि में ले आता है । ऐसी टकराहट में लेखांकन सतर्कता की ओर झुकता है, और यही इस प्रश्न का उत्तर तय करता है ।
- (b)सारता — सारता की संकल्पना मात्रा का प्रश्न उठाती है, दिशा का नहीं । वह कहती है कि जिस मद का आकार या स्वरूप ऐसा हो कि उसकी जानकारी किसी प्रयोगकर्ता के निर्णय को बदल सके, वही अलग से दिखाई और बताई जाए ; जो मद इतना छोटा हो कि किसी निर्णय पर असर न डाले, उसके साथ सुविधा से व्यवहार किया जा सकता है । इसी कारण छोटे उपकरण या कम मूल्य की वस्तुएँ ख़रीद के वर्ष में ही व्यय मान ली जाती हैं, यद्यपि सैद्धांतिक रूप से वे कई वर्ष चलेंगी । यह संकल्पना यह नहीं बताती कि अनिश्चित लाभ दिखाया जाए या नहीं ; वह केवल यह बताती है कि किस मद पर अलग से ध्यान देने की आवश्यकता है । प्रश्न में लाभ और हानि का असममित व्यवहार पूछा गया है, आकार का प्रश्न नहीं ।
- (c)समनुरूपता — समनुरूपता की संकल्पना समय के आर-पार तुलना को संभव बनाती है । वह कहती है कि जो लेखा-नीतियाँ एक अवधि में अपनाई गई हैं, वही अगली अवधियों में भी अपनाई जाएँ, ताकि दो वर्षों के वित्तीय विवरण आपस में तुलनीय रहें — यदि ह्रास सीधी रेखा पद्धति से लगाया जा रहा है तो वह हर वर्ष उसी पद्धति से लगे, और स्टॉक का मूल्यांकन जिस पद्धति से हो रहा है वह हर वर्ष वही रहे । यह संकल्पना परिवर्तन पर पूरी रोक नहीं लगाती ; वह इतना माँगती है कि परिवर्तन का कारण बताया जाए और लाभ पर उसका प्रभाव मात्रा में दिखाया जाए । यहाँ भी दिशा का कोई प्रश्न नहीं है । अनिश्चितता की दशा में किस ओर झुका जाए, यह प्रश्न केवल रूढ़िवादिता उठाती है ।
अवधारणा
लेखांकन की मूल संकल्पनाएँ और अभिसमय मिलकर वह ढाँचा बनाते हैं जिसके भीतर बहियाँ लिखी जाती हैं । उनमें रूढ़िवादिता, जिसे सतर्कता भी कहते हैं, अनिश्चितता से निपटने का नियम है । उसका कथन सरल है — लाभ की प्रत्याशा मत कीजिए, किंतु सभी संभावित हानियों का प्रावधान कीजिए — और उसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि जहाँ एक से अधिक स्वीकार्य उपचार संभव हों, वहाँ वह चुनिए जो आस्तियों और आय को कम तथा देयताओं और व्यय को अधिक दिखाए । इसके सबसे परिचित प्रयोग चार हैं । पहला, अंतिम स्टॉक का मूल्यांकन लागत अथवा शुद्ध वसूली योग्य मूल्य में जो कम हो उस पर । दूसरा, संदिग्ध ऋणों के लिए प्रावधान, जो हानि निश्चित होने से पहले ही बना लिया जाता है । तीसरा, देनदारों पर बट्टे का प्रावधान बनाना किंतु लेनदारों से मिलने वाले संभावित बट्टे को आय न मानना । चौथा, समाशोधित न हुई आस्तियों के मूल्य में वृद्धि को लाभ न मानना । इस संकल्पना की सीमा भी पढ़ाई जाती है : अत्यधिक सतर्कता गुप्त संचय बना देती है और लाभ को वास्तविकता से कम दिखाकर उसी पूर्ण प्रकटीकरण के अभिसमय का उल्लंघन करती है जिसकी रक्षा के लिए ये नियम बने हैं । इसीलिए आधुनिक मानक सतर्कता को पक्षपात नहीं, अनिश्चितता में विवेक के रूप में परिभाषित करते हैं ।
लेखांकन की संकल्पनाओं पर बनने वाले प्रश्न लगभग हमेशा एक ही ढाँचे के होते हैं : आयोग किसी संकल्पना का कथन उठाकर स्टेम में रख देता है और चार संकल्पनाओं के नाम विकल्पों में डाल देता है । इसलिए तैयारी का सबसे उपयोगी तरीक़ा यह है कि हर संकल्पना का एक-वाक्य कथन और एक ठोस उदाहरण साथ-साथ याद किया जाए, क्योंकि उदाहरण ही संकल्पना को पहचानने की सबसे तेज़ कुंजी है — स्टॉक का मूल्यांकन सुनते ही रूढ़िवादिता, अदत्त व्यय सुनते ही मिलान, ह्रास की पद्धति न बदलना सुनते ही समनुरूपता । इस प्रश्नपत्र में यह प्रवृत्ति स्पष्ट दिखती है, क्योंकि इसके ठीक अगले प्रश्न में भी एक संकल्पना का प्रयोग पूछा गया है और वहाँ भी पहला विकल्प मिलान ही है । एक ही पृष्ठ पर एक ही नाम दो बार विकल्प बनकर आया है, जो बताता है कि आयोग इन नामों को आपस में बदल-बदलकर प्रयोग करता है । इसलिए नाम याद रखना पर्याप्त नहीं ; हर नाम के साथ यह भी याद रखना पड़ता है कि वह किस प्रश्न का उत्तर देता है ।
मुख्य तथ्य
- रूढ़िवादिता अथवा सतर्कता की संकल्पना का कथन है — लाभों की प्रत्याशा मत कीजिए, किंतु सभी संभावित हानियों का प्रावधान कीजिए ।
- अनिश्चितता की दशा में यह संकल्पना उस उपचार की ओर झुकती है जो आस्तियों और आय को कम तथा देयताओं और व्यय को अधिक दिखाए ।
- अंतिम स्टॉक का मूल्यांकन लागत अथवा शुद्ध वसूली योग्य मूल्य में जो कम हो उस पर करना — इसी संकल्पना का सबसे परिचित प्रयोग है ।
- संदिग्ध ऋणों के लिए प्रावधान बनाना, यद्यपि हानि अभी निश्चित नहीं हुई, इसी संकल्पना से निकलता है ।
- देनदारों पर बट्टे का प्रावधान बनाया जाता है, किंतु लेनदारों से मिलने वाले संभावित बट्टे को आय नहीं माना जाता — यही असममिति संकल्पना की पहचान है ।
- मिलान संकल्पना किसी अवधि के आगम के सामने उसी अवधि के व्यय रखती है, और अदत्त व्यय, पूर्वदत्त व्यय तथा ह्रास उसी के रूप हैं ।
- सारता की संकल्पना कहती है कि जिस मद की जानकारी प्रयोगकर्ता के निर्णय को बदल सके, वही अलग से दिखाई और बताई जाए ।
- समनुरूपता की संकल्पना एक ही लेखा-नीति को अवधि दर अवधि बनाए रखने की माँग करती है ; परिवर्तन पर उसका कारण और प्रभाव बताना होता है ।
- अत्यधिक रूढ़िवादिता गुप्त संचय बना देती है और लाभ को कम दिखाकर पूर्ण प्रकटीकरण के अभिसमय से टकराती है ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- संकल्पना के केवल एक आधे हिस्से को पकड़ लेना । यह संकल्पना दोनों हिस्सों से बनती है — लाभ की प्रत्याशा नहीं, और हानि का प्रावधान अवश्य ।
- रूढ़िवादिता को लाभ छिपाने की अनुमति समझ लेना । अत्यधिक सतर्कता गुप्त संचय बनाती है और स्वयं एक दोष है ।
- स्टॉक के मूल्यांकन वाले नियम को मिलान संकल्पना से जोड़ देना । लागत अथवा शुद्ध वसूली योग्य मूल्य में जो कम हो, वह नियम सतर्कता से निकलता है ।
- मिलान और रूढ़िवादिता को एक मान लेना । एक अवधि का प्रश्न उठाती है, दूसरी अनिश्चितता की दिशा का ।
- मिलान और रूढ़िवादिता को एक मान लेना । मिलान अवधि का प्रश्न उठाती है — कौन-सा व्यय किस आगम से जुड़े — और रूढ़िवादिता अनिश्चितता में झुकाव की दिशा का ।
यह प्रश्न लेखांकन की संकल्पनाओं वाले उस ढाँचे का शुद्ध उदाहरण है जिसमें उत्तर स्टेम में ही लिखा होता है, बस नाम के बिना । स्टेम पढ़ते ही यह देखिए कि कथन किस प्रकार का है — क्या वह समय की बात कर रहा है, मात्रा की, दिशा की, या तुलनीयता की । समय की बात हो तो मिलान अथवा लेखांकन अवधि, मात्रा की हो तो सारता, तुलनीयता की हो तो समनुरूपता, और अनिश्चितता में झुकाव की हो तो रूढ़िवादिता । यहाँ कथन में लाभ और हानि के साथ जानबूझकर अलग-अलग व्यवहार किया गया है, और यही असममिति उत्तर तक पहुँचा देती है । वाक्य की बनावट पर भी ध्यान दीजिए : यहाँ जो नकारात्मक शब्द आया है वह अभ्यर्थी को दिया गया निर्देश नहीं है, जैसा कि कौन-सा सही नहीं है वाले प्रश्नों में होता है ; वह स्वयं उत्तर की सामग्री का अंश है, क्योंकि संकल्पना ही यह कहती है कि लाभ की प्रत्याशा नहीं की जाएगी । इसीलिए इस पेपर में वह शब्द सामान्य छपाई में है, जबकि निषेधात्मक प्रश्नों में उसे उभारकर छापा जाता है । छपाई का यह संकेत पढ़ना सीख लीजिए, समय बचता है ।
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