सकल लाभ का आशय निम्नलिखित में से कौन-सा है ?
- (a)बेचे गए माल की लागत और प्रारंभिक स्टॉक का जोड़
- (b)विक्रय में से बेचे गए माल की लागत को घटाने के बाद प्राप्त लाभ
- (c)विक्रय में से क्रय को घटाने के बाद प्राप्त लाभ
- (d)निवल लाभ में से अवधि के व्यय को घटाने के बाद प्राप्त लाभ
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) विक्रय में से बेचे गए माल की लागत को घटाने के बाद प्राप्त लाभ । लेखाशास्त्र में सकल लाभ की परिभाषा यही एक वाक्य है : शुद्ध विक्रय में से बेचे गए माल की लागत घटाने पर जो बचता है, वही सकल लाभ है । इसे समझने का सबसे सीधा रास्ता यह पूछना है कि इस लाभ में से क्या-क्या अभी घटाया नहीं गया । उत्तर है — व्यापार चलाने के अप्रत्यक्ष व्यय : वेतन, किराया, विज्ञापन, बीमा, ह्रास, ब्याज । सकल लाभ केवल यह बताता है कि जो माल बेचा गया, उस पर व्यापारी ने कितना कमाया ; वह यह नहीं बताता कि व्यापार चलाने के बाद उसके हाथ में क्या बचा । वह दूसरा प्रश्न निवल लाभ का है । अब इस सूत्र का दूसरा आधा हिस्सा देखिए, क्योंकि प्रश्न वस्तुत: वहीं जाँचता है — बेचे गए माल की लागत निकाली कैसे जाती है । उसका सूत्र है : प्रारंभिक स्टॉक जोड़ शुद्ध क्रय जोड़ प्रत्यक्ष व्यय घटा अंतिम स्टॉक । प्रत्यक्ष व्यय में वे व्यय आते हैं जो माल को बिक्री योग्य दशा में और बिक्री के स्थान तक लाने में लगते हैं — अंतर्वाही भाड़ा, चुंगी, मज़दूरी, विनिर्माण व्यय । ध्यान दीजिए कि प्रारंभिक स्टॉक इस गणना के भीतर पहले से है, बाहर नहीं । खातों की भाषा में यह पूरा हिसाब व्यापार खाते में लगाया जाता है : उसके नामे पक्ष में प्रारंभिक स्टॉक, क्रय और प्रत्यक्ष व्यय जाते हैं, जमा पक्ष में विक्रय और अंतिम स्टॉक, और दोनों पक्षों का अंतर सकल लाभ या सकल हानि होता है । यही शेष लाभ-हानि खाते में अंतरित होता है, जहाँ उसमें अन्य आय जोड़ी जाती है और अप्रत्यक्ष व्यय घटाए जाते हैं ; तब जाकर निवल लाभ निकलता है । इसलिए विकल्प (b) केवल सही परिभाषा नहीं, अंतिम खातों के क्रम का पहला पड़ाव भी है ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)बेचे गए माल की लागत और प्रारंभिक स्टॉक का जोड़ — यह विकल्प दो लागतों को जोड़ रहा है, और दो लागतों का जोड़ किसी भी दशा में लाभ नहीं होता — लाभ तभी बनता है जब आय में से लागत घटाई जाए । यहाँ आय, अर्थात् विक्रय, गणना में आया ही नहीं । दूसरी चूक और सूक्ष्म है : प्रारंभिक स्टॉक पहले से ही बेचे गए माल की लागत के भीतर सम्मिलित है, क्योंकि उसका सूत्र है प्रारंभिक स्टॉक जोड़ शुद्ध क्रय जोड़ प्रत्यक्ष व्यय घटा अंतिम स्टॉक । उसे फिर से जोड़ देने का अर्थ है एक ही राशि को दो बार गिनना । यही इस विकल्प का असली जाल है — यह उन दोनों शब्दों को उठाता है जो व्यापार खाते के नामे पक्ष में साथ-साथ छपे दिखते हैं, और अभ्यर्थी को लगता है कि साथ छपे हैं तो जोड़े जाते होंगे । खाते में वे साथ अवश्य हैं, पर एक दूसरे के भीतर है ।
- (c)विक्रय में से क्रय को घटाने के बाद प्राप्त लाभ — यह विकल्प सही उत्तर के सबसे निकट है और इसीलिए सबसे कठिन । अंतर केवल एक शब्द का है — यहाँ विक्रय में से क्रय घटाया गया है, जबकि घटाया जाना चाहिए बेचे गए माल की लागत को । दोनों एक चीज़ नहीं हैं । क्रय उस अवधि में ख़रीदा गया माल है, जबकि बेचे गए माल की लागत वह है जो वास्तव में बिका — और दोनों के बीच स्टॉक खड़ा है । यदि अवधि के अंत में स्टॉक बढ़ गया तो कुछ ख़रीदा हुआ माल बिका ही नहीं, और यदि घट गया तो पिछले वर्ष का माल भी बिका । प्रत्यक्ष व्यय भी इस विकल्प में छूट गए हैं । दोनों राशियाँ केवल उस विशेष दशा में बराबर होंगी जब प्रारंभिक और अंतिम स्टॉक समान हों और कोई प्रत्यक्ष व्यय न हो — अर्थात् एक अपवाद में, परिभाषा के रूप में नहीं ।
- (d)निवल लाभ में से अवधि के व्यय को घटाने के बाद प्राप्त लाभ — यह विकल्प दिशा ही उलट देता है । निवल लाभ वह है जो सकल लाभ में से अवधि के व्यय घटाने के बाद बचता है, इसलिए निवल लाभ में से व्यय फिर घटाना उन्हीं व्ययों को दो बार घटाना है । क्रम याद रखिए : पहले विक्रय में से बेचे गए माल की लागत घटती है और सकल लाभ बनता है ; फिर सकल लाभ में अन्य आय जुड़ती है और अप्रत्यक्ष व्यय घटते हैं, तब निवल लाभ बनता है । इस विकल्प में सकल लाभ को निवल लाभ से निकालने की कोशिश है, जबकि खातों में यात्रा उल्टी दिशा में चलती है — व्यापार खाते से लाभ-हानि खाते की ओर । अंतिम खातों के प्रश्नों में यह जाँचने की आदत डालिए कि विकल्प किस खाते की बात कर रहा है ; सकल लाभ व्यापार खाते में बनता है और निवल लाभ लाभ-हानि खाते में ।
अवधारणा
किसी व्यापारिक इकाई के अंतिम खाते दो सीढ़ियों में लाभ निकालते हैं, और सकल लाभ पहली सीढ़ी है । व्यापार खाता केवल माल से जुड़े मदों को लेता है : उसके नामे पक्ष में प्रारंभिक स्टॉक, शुद्ध क्रय और प्रत्यक्ष व्यय आते हैं, तथा जमा पक्ष में शुद्ध विक्रय और अंतिम स्टॉक । दोनों पक्षों का अंतर सकल लाभ है, और यदि लागत पक्ष भारी पड़े तो सकल हानि । सूत्र के रूप में यही बात दो तरह से लिखी जाती है — सकल लाभ बराबर शुद्ध विक्रय घटा बेचे गए माल की लागत, और बेचे गए माल की लागत बराबर प्रारंभिक स्टॉक जोड़ शुद्ध क्रय जोड़ प्रत्यक्ष व्यय घटा अंतिम स्टॉक । प्रत्यक्ष व्यय वे हैं जो माल को क्रय-स्थान से व्यापार-स्थल तक और बिक्री योग्य दशा तक लाते हैं — अंतर्वाही भाड़ा, चुंगी, मज़दूरी, विनिर्माण व्यय, आयात शुल्क । दूसरी सीढ़ी लाभ-हानि खाता है, जहाँ सकल लाभ ऊपर से आता है, उसमें कमीशन, छूट, किराया जैसी अन्य आय जोड़ी जाती है और वेतन, किराया, विज्ञापन, बीमा, ह्रास, ब्याज जैसे अप्रत्यक्ष व्यय घटाए जाते हैं ; जो बचता है वह निवल लाभ है, जो पूँजी खाते में जाता है । दोनों को अलग रखने की एक सरल कसौटी है : जो व्यय माल की लागत बढ़ाते हैं वे व्यापार खाते में जाते हैं, और जो व्यापार चलाने में लगते हैं वे लाभ-हानि खाते में ।
EPFO के लेखा अधिकारी पद के लिए यह प्रश्नपत्र लेखाशास्त्र के दो खंड रखता है, और उनमें अधिकांश प्रश्न बुनियादी परिभाषाओं तथा अंतिम खातों की संरचना से बनते हैं । सकल लाभ की परिभाषा उन्हीं में सबसे बुनियादी है, क्योंकि उससे अनुपात-विश्लेषण की एक पूरी शृंखला जुड़ी है — सकल लाभ अनुपात, प्रचालन अनुपात, स्टॉक आवर्त अनुपात — और उन सबका आधार यही है कि सकल लाभ किस राशि में से किस राशि को घटाने पर बनता है । व्यावहारिक दृष्टि से भी यह भेद काम का है : सकल लाभ बताता है कि व्यापार का मूल सौदा — ख़रीदना और बेचना — कितना लाभप्रद है, जबकि निवल लाभ बताता है कि प्रतिष्ठान चलाने की लागत निकालने के बाद क्या बचा । दो इकाइयों की तुलना में इसीलिए दोनों देखे जाते हैं ; अच्छा सकल लाभ और कमज़ोर निवल लाभ यह संकेत देता है कि सौदा ठीक है पर प्रचालन-व्यय अधिक हैं । इस प्रश्नपत्र के पहले लेखा-खंड में शेष परीक्षण, चालू देयताओं और प्रथम प्रविष्टि की बही पर प्रश्न हैं, अर्थात् आयोग लेखांकन-चक्र को क्रम से पूछता है ।
मुख्य तथ्य
- सकल लाभ बराबर शुद्ध विक्रय घटा बेचे गए माल की लागत ; यह अंतिम खातों की पहली सीढ़ी है और व्यापार खाते में निकलता है ।
- बेचे गए माल की लागत बराबर प्रारंभिक स्टॉक जोड़ शुद्ध क्रय जोड़ प्रत्यक्ष व्यय घटा अंतिम स्टॉक — प्रारंभिक स्टॉक इसी सूत्र के भीतर है ।
- प्रत्यक्ष व्यय वे हैं जो माल को बिक्री योग्य दशा तक लाते हैं — अंतर्वाही भाड़ा, चुंगी, मज़दूरी, विनिर्माण व्यय, आयात शुल्क ।
- व्यापार खाते के नामे पक्ष में प्रारंभिक स्टॉक, शुद्ध क्रय और प्रत्यक्ष व्यय जाते हैं ; जमा पक्ष में शुद्ध विक्रय और अंतिम स्टॉक ।
- निवल लाभ बराबर सकल लाभ जोड़ अन्य आय घटा अप्रत्यक्ष व्यय ; यह लाभ-हानि खाते में निकलता है और पूँजी खाते में अंतरित होता है ।
- अप्रत्यक्ष व्यय वे हैं जो व्यापार चलाने में लगते हैं — वेतन, किराया, विज्ञापन, बीमा, ह्रास, ब्याज ; वे सकल लाभ की गणना में नहीं आते ।
- शुद्ध विक्रय बराबर सकल विक्रय घटा विक्रय वापसी, और शुद्ध क्रय बराबर सकल क्रय घटा क्रय वापसी ।
- विक्रय में से क्रय घटाने पर सकल लाभ केवल उसी विशेष दशा में मिलेगा जब प्रारंभिक और अंतिम स्टॉक समान हों तथा कोई प्रत्यक्ष व्यय न हो ।
- सकल लाभ अनुपात सकल लाभ को शुद्ध विक्रय से भाग देकर निकाला जाता है और व्यापार के मूल सौदे की लाभप्रदता मापता है ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- क्रय और बेचे गए माल की लागत को एक मान लेना । दोनों के बीच प्रारंभिक तथा अंतिम स्टॉक और प्रत्यक्ष व्यय खड़े हैं ।
- प्रारंभिक स्टॉक को बेचे गए माल की लागत में फिर से जोड़ देना । वह उस सूत्र के भीतर पहले से गिना जा चुका है ।
- सकल लाभ की गणना में वेतन या किराए जैसे अप्रत्यक्ष व्यय घटा देना । वे लाभ-हानि खाते के मद हैं ।
- निवल लाभ से सकल लाभ निकालने की कोशिश करना । खातों की यात्रा व्यापार खाते से लाभ-हानि खाते की ओर चलती है, उलटी नहीं ।
- सकल विक्रय और शुद्ध विक्रय का अंतर छोड़ देना । सूत्र में शुद्ध विक्रय आता है, अर्थात् विक्रय वापसी घटाने के बाद ।
लेखाशास्त्र के परिभाषा-प्रश्नों में आयोग प्राय: चारों विकल्प एक ही सूत्र के चार रूपांतर बनाकर रखता है, और उनमें केवल एक शब्द या एक चिह्न बदला होता है । यहाँ भी यही हुआ है — दो विकल्पों में विक्रय में से कुछ घटाया गया है, एक में दो लागतें जोड़ी गई हैं, और एक में निवल लाभ से व्यय घटाए गए हैं । ऐसे प्रश्न पूरा वाक्य पढ़कर नहीं, तीन प्रश्न पूछकर हल होते हैं : किस राशि में से घटाया जा रहा है, क्या घटाया जा रहा है, और परिणाम किस खाते में बनता है । यदि तीनों उत्तर मेल खाएँ तो विकल्प सही है । यह भी ध्यान रखिए कि लेखाशास्त्र में निकटतम ग़लत विकल्प प्राय: वही होता है जो एक विशेष दशा में सही हो जाता है — जैसे यहाँ विक्रय में से क्रय घटाना, जो स्टॉक न बदलने पर सही उत्तर के बराबर आ जाएगा । परीक्षा परिभाषा पूछती है, अपवाद नहीं, इसलिए वह विकल्प चुनिए जो हर दशा में सही हो । तैयारी के लिए सबसे उपयोगी अभ्यास यह है कि अंतिम खातों का एक पूरा प्रारूप हाथ से बनाइए और हर मद को उसके सही पक्ष में रखिए ; उसके बाद इस प्रकार के विकल्प अपने आप छँट जाते हैं ।
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शेष परीक्षण के बारे में सही कथन — अंतिम खाते बनाने से ठीक पहले का पड़ाव ।
अभ्यास
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- (a)प्रारंभिक स्टॉक जोड़ शुद्ध क्रय जोड़ प्रत्यक्ष व्यय घटा अंतिम स्टॉक
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