किसी वयस्क कर्मकार के लिए एक सप्ताह में काम करने हेतु अनुमत घंटों की अधिकतम संख्या कितनी है ?
- (a)35 घंटे
- (b)40 घंटे
- (c)45 घंटे
- (d)48 घंटे
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) 48 घंटे । यह कारखाना अधिनियम, 1948 की धारा 51 है, जिसका शीर्षक ही ‘साप्ताहिक घंटे’ है और जिसका पूरा पाठ एक ही वाक्य में समा जाता है : किसी वयस्क कर्मकार से किसी कारखाने में एक सप्ताह में अड़तालीस घंटे से अधिक काम करने की अपेक्षा नहीं की जाएगी और न उसे ऐसा करने दिया जाएगा । ध्यान दीजिए कि प्रश्न ने अधिनियम का नाम नहीं लिया — उसने केवल ‘वयस्क कर्मकार’ कहा है, और यही शब्द संकेत है । वयस्क, किशोर और बालक की श्रेणियाँ, और उनके काम के घंटों की सीमाएँ, कारखाना अधिनियम के अध्याय VI तथा VII की भाषा हैं, इसलिए बिना नाम लिए भी प्रश्न वहीं पहुँचाता है । अड़तालीस का यह आँकड़ा अकेला नहीं खड़ा ; उसी अध्याय की दूसरी धाराएँ उसे चारों ओर से बाँधती हैं । धारा 54 दैनिक सीमा नौ घंटे रखती है, धारा 55 कहती है कि कोई कार्य-अवधि पाँच घंटे से अधिक नहीं होगी और पाँच घंटे से अधिक काम कराने से पहले कम से कम आधे घंटे का विश्राम-अंतराल देना होगा, और धारा 56 विश्राम-अंतरालों सहित पूरे फैलाव को किसी एक दिन में साढ़े दस घंटे पर रोक देती है, जिसे मुख्य निरीक्षक लिखित कारणों से बारह घंटे तक बढ़ा सकता है । धारा 52 साप्ताहिक अवकाश देती है और धारा 53 उसके बदले प्रतिकर अवकाश की व्यवस्था करती है । इन सबको साथ पढ़िए तो चित्र स्पष्ट होता है : सप्ताह की छत अड़तालीस है, दिन की छत नौ है, और छह दिन के सप्ताह में यह औसतन आठ घंटे प्रतिदिन बनता है । यदि इन सीमाओं से आगे काम कराया जाए तो वह निःशुल्क नहीं होता — धारा 59(1) के अनुसार जहाँ कोई कर्मकार किसी दिन नौ घंटे से अधिक या किसी सप्ताह में अड़तालीस घंटे से अधिक काम करता है, वहाँ वह अधिसमय कार्य के लिए अपनी साधारण मज़दूरी दर की दुगुनी दर से मज़दूरी का हक़दार होता है । अड़तालीस केवल एक संख्या नहीं, अधिसमय की गणना का प्रारंभ-बिंदु भी है ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)35 घंटे — पैंतीस घंटे का आँकड़ा भारतीय कारखाना विधि के किसी उपबंध में आता ही नहीं । अध्याय VI में जो संख्याएँ छपी हैं वे हैं — धारा 51 में अड़तालीस, धारा 54 में नौ, धारा 55 में पाँच और आधा, धारा 56 में साढ़े दस तथा बारह, और धारा 65(3) में बारह, तेरह, साठ और पचहत्तर । पैंतीस इनमें कहीं नहीं है । यह विकल्प इसलिए रखा गया है कि यह सबसे कम है और ‘कर्मचारी-हितैषी’ लगता है ; अभ्यर्थी सोचता है कि कल्याणकारी क़ानून सबसे उदार सीमा ही रखेगा । वास्तव में 1948 का अधिनियम उस समय की औद्योगिक परिस्थिति में लिखा गया था और उसने अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के आठ घंटे प्रतिदिन तथा अड़तालीस घंटे प्रति सप्ताह वाले मानक को अपनाया, जिसे भारत ने 14 जुलाई 1921 को ही अभिपुष्ट कर दिया था । सीमा उदारता से नहीं, इसी अंतर्राष्ट्रीय मानक से आई है ।
- (b)40 घंटे — चालीस घंटे का सप्ताह कई कार्यालयों और प्रतिष्ठानों की व्यवहार-प्रथा है, और यही इस विकल्प को ख़तरनाक बनाता है — अभ्यर्थी अपने आसपास देखी हुई व्यवस्था को क़ानून समझ लेता है । किंतु प्रश्न व्यवहार नहीं, वैधानिक अधिकतम पूछ रहा है, और कारखाना अधिनियम की धारा 51 वह अधिकतम अड़तालीस घंटे रखती है । अंतर यह है कि क़ानून छत तय करता है, फ़र्श नहीं : कोई नियोजक अपने कर्मकारों से चालीस घंटे ही काम करा सकता है और उसमें अधिनियम का कोई उल्लंघन नहीं होता, पर अड़तालीस से आगे जाते ही धारा 59(1) की दुगुनी मज़दूरी वाली शर्त लग जाती है । इसी प्रकार का भ्रम दैनिक घंटों में भी होता है, जहाँ लोग आठ घंटे को क़ानूनी सीमा मान लेते हैं जबकि धारा 54 नौ घंटे कहती है ।
- (c)45 घंटे — पैंतालीस घंटे का कोई वैधानिक आधार नहीं है, पर यह विकल्प एक विशेष गणना से निकलता दिखता है — धारा 54 की नौ घंटे वाली दैनिक सीमा को पाँच दिन से गुणा कर दीजिए तो पैंतालीस बनता है । यही जाल है । अधिनियम पाँच दिन का सप्ताह नहीं मानता ; धारा 52 सप्ताह में एक अवकाश देती है, अर्थात् छह कार्य-दिवस मानकर चलती है, और छह दिन में नौ-नौ घंटे चौवन घंटे बना देंगे, जो धारा 51 की सीमा से छह घंटे अधिक है । इसीलिए दोनों सीमाएँ साथ पढ़नी पड़ती हैं : दैनिक नौ और साप्ताहिक अड़तालीस मिलकर व्यवहार में छह दिन के सप्ताह को औसतन आठ घंटे प्रतिदिन पर ले आती हैं । दो सीमाओं में से जो पहले टकराए, वही प्रभावी होती है ।
अवधारणा
कारखाना अधिनियम, 1948 का अध्याय VI ‘वयस्कों के काम के घंटे’ शीर्षक से चलता है और धारा 51 से 66 तक फैला है । उसकी धाराएँ एक के बाद एक एक ही ढाँचा खड़ा करती हैं — धारा 51 साप्ताहिक घंटे अड़तालीस पर रोकती है ; धारा 52 साप्ताहिक अवकाश देती है ; धारा 53 उसके बदले प्रतिकर अवकाश की व्यवस्था करती है ; धारा 54 दैनिक घंटे नौ पर रोकती है, जिसमें पाली-परिवर्तन को सुगम बनाने के लिए मुख्य निरीक्षक की अनुमति से छूट का परंतुक है ; धारा 55 कहती है कि कोई कार्य-अवधि पाँच घंटे से अधिक नहीं होगी और उससे पहले कम से कम आधे घंटे का विश्राम-अंतराल मिलेगा, तथा राज्य सरकार या मुख्य निरीक्षक लिखित आदेश से छूट दे तो भी बिना अंतराल के काम छह घंटे से अधिक नहीं हो सकता ; धारा 56 विश्राम सहित फैलाव को साढ़े दस घंटे पर रोकती है, जिसे मुख्य निरीक्षक बारह घंटे तक बढ़ा सकता है ; धारा 57 रात्रि पालियों की, धारा 58 पालियों के अतिव्यापन के प्रतिषेध की और धारा 59 अधिसमय की दुगुनी मज़दूरी की बात करती है ; धारा 60 दोहरे नियोजन पर रोक लगाती है ; धारा 61 से 63 काम की अवधियों की सूचना, वयस्क कर्मकारों का रजिस्टर और दोनों से काम के मेल की अपेक्षा रखती हैं ; और धारा 64 तथा 65 छूट देने वाले नियम एवं आदेश बनाने की शक्ति देती हैं । धारा 65(3) उन छूटों की भी बाहरी दीवार खींचती है — किसी दिन बारह घंटे से अधिक नहीं, फैलाव तेरह घंटे से अधिक नहीं, अधिसमय सहित साप्ताहिक घंटे साठ से अधिक नहीं, और किसी तिमाही में अधिसमय पचहत्तर घंटे से अधिक नहीं तथा लगातार सात दिन से अधिक नहीं ।
कारखाना अधिनियम, 1948 भारत के सबसे पुराने और सबसे अधिक प्रवर्तित श्रम अधिनियमों में है, और उसका घंटों वाला अध्याय प्रवर्तन के काम में रोज़ लौटता है — निरीक्षक रजिस्टर देखकर यही जाँचता है कि धारा 61 की सूचना और धारा 62 का रजिस्टर आपस में मेल खाते हैं या नहीं, और क्या धारा 51 तथा 54 की सीमाएँ पार हुईं । यही कारण है कि EPFO जैसे प्रवर्तन-प्रधान पदों की परीक्षा में इस अध्याय के आँकड़े बार-बार आते हैं । इस प्रश्नपत्र में भी कारखाना अधिनियम अकेला नहीं आया — इसी पेपर के पहले श्रम-विधि खंड में एक प्रश्न उसी अधिनियम की ‘कुमार’ की परिभाषा पर है, अर्थात् आयु-श्रेणियों पर, और यह प्रश्न घंटों पर । दोनों को साथ पढ़ने से अधिनियम का वह तर्क दिखता है जो केवल आँकड़े रटने से नहीं दिखता : पहले तय होता है कि व्यक्ति किस श्रेणी में है, फिर उस श्रेणी के लिए घंटों की सीमा लागू होती है । यह भी याद रखिए कि कारखाना अधिनियम, 1948 उन तेरह केंद्रीय अधिनियमों में है जिन्हें व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशा संहिता, 2020 अपने में समेटती है, और चारों श्रम संहिताएँ 21 नवंबर 2025 से प्रवृत्त हुई हैं ।
मुख्य तथ्य
- कारखाना अधिनियम, 1948 की धारा 51 (साप्ताहिक घंटे) : किसी वयस्क कर्मकार से एक सप्ताह में अड़तालीस घंटे से अधिक काम कराने की अपेक्षा नहीं की जाएगी, न उसे ऐसा करने दिया जाएगा ।
- धारा 54 (दैनिक घंटे) : किसी वयस्क कर्मकार से किसी एक दिन में नौ घंटे से अधिक काम नहीं कराया जाएगा ; पाली-परिवर्तन को सुगम बनाने के लिए मुख्य निरीक्षक की अनुमति से इसका परंतुक है ।
- धारा 55 (विश्राम के अंतराल) : कोई कार्य-अवधि पाँच घंटे से अधिक नहीं होगी और पाँच घंटे से अधिक काम से पहले कम से कम आधे घंटे का अंतराल देना होगा ; छूट की दशा में भी बिना अंतराल छह घंटे से अधिक नहीं ।
- धारा 56 (फैलाव) : विश्राम-अंतरालों सहित काम की अवधियाँ किसी एक दिन में साढ़े दस घंटे से अधिक फैली नहीं होंगी ; मुख्य निरीक्षक लिखित कारणों से इसे बारह घंटे तक बढ़ा सकता है ।
- धारा 59(1) : किसी दिन नौ घंटे से अधिक या किसी सप्ताह में अड़तालीस घंटे से अधिक काम करने पर कर्मकार अधिसमय के लिए साधारण मज़दूरी दर की दुगुनी दर पर मज़दूरी का हक़दार है ।
- धारा 65(3) की बाहरी सीमाएँ : किसी दिन बारह घंटे से अधिक नहीं, फैलाव तेरह घंटे से अधिक नहीं, अधिसमय सहित साप्ताहिक घंटे साठ से अधिक नहीं, तथा किसी तिमाही में अधिसमय पचहत्तर घंटे से अधिक नहीं ।
- धारा 65(3) यह भी कहती है कि किसी कर्मकार से लगातार सात दिन से अधिक अधिसमय काम नहीं कराया जाएगा ।
- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का 1919 का कार्य-घंटे (उद्योग) अभिसमय आठ घंटे प्रतिदिन तथा अड़तालीस घंटे प्रति सप्ताह का सिद्धांत रखता है ; भारत ने उसे 14 जुलाई 1921 को अभिपुष्ट किया ।
- कारखाना अधिनियम, 1948 उन तेरह केंद्रीय अधिनियमों में है जिन्हें व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशा संहिता, 2020 समाहित करती है ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- आठ घंटे को दैनिक वैधानिक सीमा मान लेना । धारा 54 नौ घंटे कहती है ; आठ घंटे अड़तालीस को छह दिन में बाँटने से निकला औसत है, उपबंध नहीं ।
- पाँच दिन का सप्ताह मानकर नौ को पाँच से गुणा कर देना । धारा 52 साप्ताहिक अवकाश देती है, अर्थात् छह कार्य-दिवस मानती है ।
- अपने कार्यालय की चालीस घंटे वाली व्यवस्था को क़ानूनी सीमा समझ लेना । क़ानून छत तय करता है, प्रथा नहीं ।
- छूट वाली सीमाओं को साधारण सीमाओं से गड्डमड्ड कर देना । साठ घंटे धारा 65(3) की छूट-दशा की सीमा है, धारा 51 की नहीं ।
- यह भूल जाना कि अड़तालीस घंटे अधिसमय की गणना का भी प्रारंभ-बिंदु है — धारा 59(1) उसी से दुगुनी मज़दूरी शुरू करती है ।
यह प्रश्न उस श्रेणी का है जिसे आयोग बिना अधिनियम का नाम लिए पूछता है और उत्तर की कुंजी शब्दावली में छिपाकर रख देता है । ‘वयस्क कर्मकार’ शब्द ही बताता है कि प्रश्न कारखाना अधिनियम, 1948 के अध्याय VI से है, क्योंकि वयस्क, कुमार और बालक की तीन श्रेणियाँ उसी अधिनियम की हैं । इसलिए श्रम विधि पढ़ते समय हर अधिनियम की विशिष्ट शब्दावली अलग से याद कीजिए — कारखाना अधिनियम कर्मकार कहता है, औद्योगिक विवाद अधिनियम की अपनी परिभाषाएँ हैं, न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम अनुसूचित नियोजन की भाषा में चलता है । दूसरी बात यह कि इस प्रकार के आँकड़ा-प्रश्नों में विकल्प प्राय: आरोही क्रम में एक ही इकाई की चार संख्याएँ होते हैं, इसलिए अनुमान से कुछ नहीं मिलता ; ठीक-ठीक अंक चाहिए । सबसे अच्छा तैयारी-तरीका यह है कि अध्याय VI की सारी संख्याएँ एक ही पन्ने पर धारा-सहित लिख लीजिए — 51 में अड़तालीस, 54 में नौ, 55 में पाँच और आधा, 56 में साढ़े दस, 59 में दुगुनी दर, 65(3) में बारह, तेरह, साठ और पचहत्तर — क्योंकि आयोग इन्हीं में से किसी एक को उठाकर बाक़ी तीन को विकल्प बना देता है ।
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