वह अधिकतम अवधि क्या है, जिसमें समुचित सरकार न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 के अधीन मज़दूरी की न्यूनतम दरों की समीक्षा करेगी और उन्हें संशोधित करेगी ?
- (a)2 वर्ष
- (b)3 वर्ष
- (c)4 वर्ष
- (d)5 वर्ष
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) 5 वर्ष । न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 की धारा 3(1)(b) समुचित सरकार पर यह कर्तव्य डालती है कि वह ऐसे अंतरालों पर, जो वह ठीक समझे किंतु जो पाँच वर्ष से अधिक न हों, नियत की गई न्यूनतम मज़दूरी दरों की पुनरीक्षा करे और आवश्यक हो तो उन दरों को संशोधित करे । शब्द ध्यान से पढ़िए : अधिनियम कोई निश्चित अवधि नहीं बाँधता, वह एक बाहरी छत रखता है । सरकार चाहे तो हर वर्ष पुनरीक्षा कर सकती है, दो वर्ष में कर सकती है, पर पाँच वर्ष से आगे नहीं टाल सकती । प्रश्न ने भी यही पूछा है — अधिकतम अवधि, कोई निर्धारित अवधि नहीं । इसी उपधारा का परंतुक इस उपबंध को समझने की कुंजी है, और वही सबसे अधिक ग़लत समझा जाता है । वह कहता है कि यदि किसी कारण से समुचित सरकार पाँच वर्ष के किसी अंतराल के भीतर पुनरीक्षा नहीं कर पाई, तो इस बात से वह उस अवधि की समाप्ति के बाद पुनरीक्षा और संशोधन करने से नहीं रुकेगी ; और जब तक वे दरें संशोधित नहीं होतीं, तब तक अवधि समाप्त होने के ठीक पहले प्रवृत्त दरें ही प्रवृत्त बनी रहेंगी । अर्थात् पाँच वर्ष बीत जाने से न तो पुरानी अधिसूचना अपने आप शून्य होती है और न सरकार की शक्ति समाप्त होती है — कर्मकार बिना न्यूनतम मज़दूरी के नहीं छोड़ा जाता । यह उपबंध अधिनियम के मूल तर्क से निकलता है । न्यूनतम मज़दूरी कोई एक बार तय होकर सदा के लिए ठीक रहने वाली संख्या नहीं है, क्योंकि जिस जीवन-निर्वाह लागत पर वह टिकी है वह लगातार बदलती है । इसीलिए धारा 4 न्यूनतम मज़दूरी को मूल दर तथा जीवन-निर्वाह लागत भत्ते के जोड़ के रूप में गढ़ने की अनुमति देती है — भत्ते वाला हिस्सा बार-बार बदलता रहता है, और मूल दर की पुनरीक्षा वह बड़ा काम है जिसे धारा 3(1)(b) पाँच वर्ष की छत के भीतर बाँधती है ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)2 वर्ष — दो वर्ष की कोई अवधि इस अधिनियम में नहीं आती । यह विकल्प इसलिए ठीक लगता है कि व्यवहार में न्यूनतम मज़दूरी से जुड़े कई काम पाँच वर्ष से कहीं जल्दी होते हैं — विशेषकर धारा 4 के अंतर्गत जीवन-निर्वाह लागत भत्ते का पुनरीक्षण, जो मूल दर की पुनरीक्षा से कहीं अधिक बार होता है । अभ्यर्थी उस बार-बार होने वाले काम को धारा 3(1)(b) की अवधि समझ बैठता है । दोनों को अलग रखिए : धारा 4 यह बताती है कि न्यूनतम मज़दूरी किन घटकों से बनती है — मूल दर और जीवन-निर्वाह लागत भत्ता, या दोनों समेटे हुए एक समग्र दर — जबकि धारा 3(1)(b) यह बताती है कि उस पूरी दर की पुनरीक्षा कब तक हो जानी चाहिए । एक घटक का सूचकांक-आधारित समायोजन पुनरीक्षा नहीं है ।
- (b)3 वर्ष — तीन वर्ष का आँकड़ा भी इस अधिनियम का नहीं है । इस विकल्प का आकर्षण दूसरी जगह से आता है : सामूहिक सौदेकारी में तय होने वाले दीर्घकालिक समझौते प्राय: तीन वर्ष की अवधि के लिए होते हैं, और अभ्यर्थी उस परिचित अवधि को क़ानूनी अपेक्षा मान लेता है । किंतु धारा 3(1)(b) समझौते की नहीं, सरकार के वैधानिक कर्तव्य की बात कर रही है, और वहाँ छत पाँच वर्ष है । यहाँ एक और भेद याद रखने योग्य है । न्यूनतम मज़दूरी का निर्धारण और पुनरीक्षण दोनों धारा 5 की प्रक्रिया से होते हैं, जो दो रास्ते देती है — समिति नियुक्त कर सलाह लेने का रास्ता, और राजपत्र में प्रस्ताव प्रकाशित कर आपत्तियाँ आमंत्रित करने का रास्ता । अवधि और प्रक्रिया दो अलग प्रश्न हैं ।
- (c)4 वर्ष — चार वर्ष का कोई वैधानिक आधार नहीं है । यह विकल्प उस अभ्यर्थी को फँसाने के लिए है जिसे यह तो याद है कि अवधि लंबी है, पर ठीक अंक याद नहीं — और चार, पाँच के इतने निकट है कि अनुमान लगाने वाला यहीं रुक जाता है । ऐसे प्रश्नों में अनुमान का कोई लाभ नहीं ; धारा का पाठ याद होना पड़ता है । ध्यान रखिए कि पाँच वर्ष वाली छत ही अधिनियम का एकमात्र संख्यात्मक उपबंध नहीं है । धारा 3(1A) कहती है कि जिस अनुसूचित नियोजन में पूरे राज्य में एक हज़ार से कम कर्मचारी लगे हों, उसमें समुचित सरकार न्यूनतम मज़दूरी दरें नियत करने से विरत रह सकती है, और संख्या एक हज़ार या उससे अधिक हो जाने पर उसे दरें नियत करनी होंगी । पाँच और एक हज़ार — दोनों संख्याएँ अलग-अलग काम करती हैं ।
अवधारणा
न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 का ढाँचा तीन प्रश्नों के इर्द-गिर्द बना है — किन नियोजनों में मज़दूरी नियत होगी, कौन नियत करेगा, और कब तक उसे दुबारा देखा जाएगा । पहला प्रश्न अनुसूची से उत्तर पाता है : धारा 2(g) ‘अनुसूचित नियोजन’ को अनुसूची के भाग I या भाग II में गिनाए गए नियोजनों के रूप में परिभाषित करती है । दूसरा प्रश्न धारा 3 और 5 से : धारा 3(1)(a) समुचित सरकार को अनुसूचित नियोजनों में न्यूनतम मज़दूरी दरें नियत करने की शक्ति देती है, और धारा 5 उसकी प्रक्रिया — या तो समिति एवं उप-समितियाँ नियुक्त करके सलाह ली जाए, या राजपत्र में प्रस्ताव प्रकाशित कर प्रभावित व्यक्तियों से आपत्तियाँ और सुझाव माँगे जाएँ । तीसरा प्रश्न धारा 3(1)(b) से : पुनरीक्षा ऐसे अंतरालों पर जो पाँच वर्ष से अधिक न हों, और उसका परंतुक यह सुनिश्चित करता है कि विलंब से न तो सरकार की शक्ति जाती है और न पुरानी दरें । धारा 4 बताती है कि दर किन घटकों से बन सकती है — मूल दर के साथ जीवन-निर्वाह लागत भत्ता, या दोनों को समेटे हुए एक समग्र दर । सलाहकार तंत्र धारा 7 से 9 में है : राज्य स्तर पर सलाहकार बोर्ड, केंद्र में केंद्रीय सलाहकार बोर्ड, और तीनों जगह वही त्रिपक्षीय सूत्र — नियोजकों और कर्मचारियों के बराबर प्रतिनिधि तथा कुल सदस्य संख्या के एक-तिहाई से अनधिक स्वतंत्र व्यक्ति, जिनमें से एक स्वतंत्र सदस्य ही अध्यक्ष बनाया जाता है । शेष अधिनियम प्रवर्तन का है — धारा 12 नियत दर से कम मज़दूरी देने पर रोक, धारा 20 दावों की सुनवाई, धारा 22 शास्तियाँ ।
न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 उन चार केंद्रीय अधिनियमों में है जिन्हें मज़दूरी संहिता, 2019 अपने में समेटती है — शेष तीन हैं मज़दूरी संदाय अधिनियम 1936, बोनस संदाय अधिनियम 1965 और समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 ; और चारों श्रम संहिताएँ 21 नवंबर 2025 से प्रवृत्त हुई हैं । विषय-वस्तु की दृष्टि से यह अधिनियम उस बड़ी बहस का व्यावहारिक रूप है जो न्यूनतम, उचित और जीवन-निर्वाह मज़दूरी के बीच चलती है । उचित मज़दूरी समिति, 1948 ने यही सीढ़ी बनाई थी — न्यूनतम से उचित, उचित से जीवन-निर्वाह । आगे चलकर पंद्रहवें भारतीय श्रम सम्मेलन ने 1957 में आवश्यकता-आधारित न्यूनतम मज़दूरी के मानक तय किए, जिनकी जड़ डॉक्टर एक्रॉयड की उस गणना में है जो एक औसत भारतीय वयस्क के लिए प्रतिदिन 2,700 कैलोरी का संतुलित आहार मानती है । उन मानकों में प्रति अर्जक तीन उपभोग इकाइयाँ, प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष अठारह गज कपड़ा, सरकारी औद्योगिक आवास योजना के न्यूनतम क्षेत्रफल के अनुरूप किराया, तथा ईंधन एवं प्रकाश सहित प्रकीर्ण मदों के लिए कुल न्यूनतम मज़दूरी का बीस प्रतिशत शामिल है । उच्चतम न्यायालय ने 1992 के रेप्टाकोस ब्रेट मामले में इसमें एक और मद जोड़ी — बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा, त्योहार सहित न्यूनतम मनोरंजन तथा वृद्धावस्था एवं विवाह के लिए प्रावधान, कुल का पच्चीस प्रतिशत ।
मुख्य तथ्य
- न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 की धारा 3(1)(b) : समुचित सरकार ऐसे अंतरालों पर, जो पाँच वर्ष से अधिक न हों, नियत दरों की पुनरीक्षा करेगी और आवश्यक हो तो उन्हें संशोधित करेगी ।
- धारा 3(1) का परंतुक : पाँच वर्ष के भीतर पुनरीक्षा न हो पाने से सरकार बाद में पुनरीक्षा करने से नहीं रुकती, और संशोधन होने तक पुरानी प्रवृत्त दरें ही लागू बनी रहती हैं ।
- धारा 3(1A) : जिस अनुसूचित नियोजन में पूरे राज्य में एक हज़ार से कम कर्मचारी लगे हों, उसमें सरकार दरें नियत करने से विरत रह सकती है ; संख्या एक हज़ार या अधिक होने पर उसे दरें नियत करनी होंगी ।
- धारा 2(g) ‘अनुसूचित नियोजन’ को अनुसूची के भाग I या भाग II में विनिर्दिष्ट नियोजनों के रूप में परिभाषित करती है ।
- धारा 5 निर्धारण तथा पुनरीक्षण की दो प्रक्रियाएँ देती है — समिति नियुक्त कर सलाह लेना, अथवा राजपत्र में प्रस्ताव प्रकाशित कर आपत्तियाँ एवं सुझाव आमंत्रित करना ।
- धारा 4 : न्यूनतम मज़दूरी मूल दर तथा जीवन-निर्वाह लागत भत्ते के रूप में, या दोनों को समेटे हुए एक समग्र दर के रूप में गढ़ी जा सकती है ।
- धारा 7, 8 और 9 : राज्य सलाहकार बोर्ड, केंद्रीय सलाहकार बोर्ड और समितियाँ — तीनों में नियोजक तथा कर्मचारी प्रतिनिधि बराबर, स्वतंत्र सदस्य कुल के एक-तिहाई से अनधिक, और अध्यक्ष कोई स्वतंत्र सदस्य ।
- न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 उन चार अधिनियमों में है जिन्हें मज़दूरी संहिता, 2019 समाहित करती है ; शेष हैं मज़दूरी संदाय 1936, बोनस संदाय 1965 और समान पारिश्रमिक 1976 ।
- पंद्रहवें भारतीय श्रम सम्मेलन (1957) के आवश्यकता-आधारित मानक डॉक्टर एक्रॉयड की 2,700 कैलोरी वाली गणना पर टिके हैं और प्रति अर्जक तीन उपभोग इकाइयाँ मानते हैं ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- पाँच वर्ष को नियत अवधि मान लेना । अधिनियम अधिकतम बताता है ; सरकार उससे पहले भी पुनरीक्षा कर सकती है ।
- यह समझ लेना कि पाँच वर्ष बीतते ही पुरानी अधिसूचना शून्य हो जाती है । परंतुक कहता है कि संशोधन होने तक पुरानी दरें प्रवृत्त बनी रहती हैं ।
- जीवन-निर्वाह लागत भत्ते के बार-बार होने वाले समायोजन को धारा 3(1)(b) की पुनरीक्षा समझ लेना — घटक का समायोजन पुनरीक्षा नहीं है ।
- अवधि और प्रक्रिया को मिला देना । अवधि धारा 3(1)(b) में है, प्रक्रिया धारा 5 में ।
- एक हज़ार कर्मचारियों वाली धारा 3(1A) की छूट को अवधि से जोड़ देना । वह इस बात की शर्त है कि दरें नियत की जाएँ या नहीं ।
श्रम विधि के आँकड़ा-प्रश्नों में अवधि पूछने वाले प्रश्न सबसे अधिक आते हैं, और उनमें आयोग प्राय: उस शब्द को बीच में रख देता है जो पूरा अर्थ बदल देता है । यहाँ वह शब्द ‘अधिकतम’ है । यदि प्रश्न पूछता कि सरकार कितने वर्ष में पुनरीक्षा करती है, तो उत्तर एक नहीं होता, क्योंकि अलग-अलग राज्यों की प्रथा अलग है ; प्रश्न ने अधिकतम अवधि पूछी, और अधिकतम अधिनियम में लिखा है । इसलिए ऐसे प्रश्नों में सबसे पहले यह देखिए कि पूछा गया आँकड़ा न्यूनतम है, अधिकतम है या नियत है । दूसरी आदत यह डालिए कि हर अधिनियम की अवधियाँ एक साथ, एक ही पन्ने पर लिखी जाएँ — न्यूनतम मज़दूरी में पुनरीक्षा की पाँच वर्ष वाली छत, कारखाना अधिनियम में घंटों की सीमाएँ, उपदान में पाँच वर्ष की निरंतर सेवा — क्योंकि विकल्प बनाते समय आयोग एक अधिनियम की अवधि दूसरे के प्रश्न में डाल देता है । और तीसरी बात, परंतुक कभी मत छोड़िए : इस प्रश्न में मुख्य उपबंध उत्तर देता है, पर उसका परंतुक ही बताता है कि उत्तर का व्यावहारिक अर्थ क्या है ।
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न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम के सलाहकार बोर्ड की अध्यक्षता किसके पास होती है — इसी अधिनियम के तंत्र पर 2017 का प्रश्न ।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 की धारा 3(1A) के अनुसार, किसी अनुसूचित नियोजन में न्यूनतम मज़दूरी दरें नियत करने से समुचित सरकार कब विरत रह सकती है ?
- (a)जब पूरे राज्य में उस नियोजन में एक सौ से कम कर्मचारी लगे हों
- (b)जब पूरे राज्य में उस नियोजन में पाँच सौ से कम कर्मचारी लगे हों
- (c)जब पूरे राज्य में उस नियोजन में एक हज़ार से कम कर्मचारी लगे हों
- (d)जब पूरे राज्य में उस नियोजन में पाँच हज़ार से कम कर्मचारी लगे हों
उत्तर(c) जब पूरे राज्य में उस नियोजन में एक हज़ार से कम कर्मचारी लगे हों — संख्या एक हज़ार या अधिक होने पर दरें नियत करनी होंगी ।
- practice — not a real PYQ
न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 की धारा 5 के अनुसार, न्यूनतम मज़दूरी दरें नियत या पुनरीक्षित करने के लिए समुचित सरकार के पास कौन-से दो रास्ते हैं ?
- (a)समिति नियुक्त करना, अथवा राजपत्र में प्रस्ताव प्रकाशित कर आपत्तियाँ आमंत्रित करना
- (b)केवल समिति नियुक्त करना
- (c)केवल न्यायालय से निर्देश प्राप्त करना
- (d)नियोजक और कर्मचारी के बीच समझौता कराना
उत्तर(a) समिति नियुक्त करना, अथवा राजपत्र में प्रस्ताव प्रकाशित कर आपत्तियाँ आमंत्रित करना — यही धारा 5 की दो पद्धतियाँ हैं ।