उपदान संदाय अधिनियम, 1972 के अधीन कर्मचारियों को देय उपदान की अधिकतम राशि कितनी है ?
- (a)₹ 5,00,000
- (b)₹ 10,00,000
- (c)₹ 15,00,000
- (d)₹ 20,00,000
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) ₹ 20,00,000 । उपदान संदाय अधिनियम, 1972 की धारा 4(3) ही वह उपबंध है जो देय उपदान की ऊपरी सीमा बाँधता है, और इस समय वह सीमा बीस लाख रुपये है । यहाँ जो बात प्रश्न से भी अधिक महत्व की है वह यह है कि आज यह आँकड़ा स्वयं धारा में लिखा हुआ नहीं मिलेगा । उपदान संदाय (संशोधन) अधिनियम, 2018 — 2018 का अधिनियम संख्यांक 12 — ने धारा 4(3) में से ‘दस लाख रुपये’ शब्द हटाकर उनके स्थान पर ‘ऐसी राशि जो केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित की जाए’ रख दिए । इसके बाद केंद्र सरकार ने अधिसूचना S.O. 1420(E), दिनांक 29 मार्च 2018 के द्वारा उस राशि को बीस लाख रुपये विनिर्दिष्ट किया और उसी तिथि से वह प्रभावी हुई । अर्थात् संसद ने सीमा तय करना छोड़ दिया और सीमा बदलने की शक्ति अपने पास रखते हुए कार्यपालिका को सौंप दी — अब आगे बढ़ाने के लिए संशोधन विधेयक की आवश्यकता नहीं, एक राजपत्र अधिसूचना पर्याप्त है । यही कारण है कि इस प्रश्न का उत्तर आँकड़े के रूप में याद रखना अधूरा है ; उसे अधिसूचना के साथ याद रखना पूरा है । सीमा किस पर लगती है, यह भी स्पष्ट रहना चाहिए । धारा 4(2) के अनुसार उपदान की गणना प्रत्येक पूर्ण सेवा-वर्ष के लिए, तथा छह मास से अधिक के भाग के लिए भी, अंतिम आहरित मज़दूरी दर पर पंद्रह दिन की मज़दूरी के हिसाब से होती है । यह गणना जो राशि निकाले, धारा 4(3) उसे बीस लाख रुपये पर काट देती है । किंतु यह कर्मचारी के हाथ आने वाली अधिकतम राशि नहीं, केवल अधिनियम के अधीन देय अधिकतम राशि है — धारा 4(5) स्पष्ट रूप से कहती है कि इस धारा की कोई बात किसी पंचाट, करार या नियोजक के साथ संविदा के अधीन उपदान की बेहतर शर्तें पाने के कर्मचारी के अधिकार पर प्रभाव नहीं डालेगी । इसलिए कोई नियोजक इससे अधिक दे सकता है ; अधिनियम केवल वह न्यूनतम खींचता है जिसका दावा विधिक रूप से किया जा सकता है, और उस दावे की छत बीस लाख रुपये है ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)₹ 5,00,000 — पाँच लाख रुपये धारा 4(3) के हाल के किसी भी चरण से मेल नहीं खाता । इस सदी में इस धारा ने केवल तीन आँकड़े देखे हैं — 2010 तक तीन लाख पचास हज़ार रुपये, 24 मई 2010 से दस लाख रुपये, और 29 मार्च 2018 से बीस लाख रुपये । पाँच लाख उनमें कहीं नहीं आता । यह विकल्प इसलिए ठीक लगता है कि श्रम विधि में पाँच का अंक बार-बार लौटता है — धारा 4(1) पाँच वर्ष की निरंतर सेवा माँगती है, और अभ्यर्थी सेवा-वर्षों की संख्या को राशि की संख्या समझ बैठता है । इस भ्रम से बचने का सीधा तरीका यह है कि हर आँकड़े के साथ उसकी इकाई याद रखी जाए : पाँच का संबंध वर्षों से है, बीस लाख का रुपयों से । ध्यान रहे कि धारा 4(1) का परंतुक पाँच वर्ष की शर्त को भी हटा देता है, यदि नियोजन का पर्यवसान कर्मचारी की मृत्यु या निःशक्तता के कारण हुआ हो ।
- (b)₹ 10,00,000 — यही चारों में सबसे कठिन विकल्प है, क्योंकि यह ग़लत नहीं बल्कि पुराना है । दस लाख रुपये ठीक वही सीमा थी जो 24 मई 2010 से 28 मार्च 2018 तक धारा 4(3) में छपी रहती थी । उपदान संदाय (संशोधन) अधिनियम, 2010 ने धारा 4(3) में से ‘तीन लाख पचास हज़ार रुपये’ शब्द हटाकर ‘दस लाख रुपये’ रखे थे ; उसे राष्ट्रपति की अनुमति 17 मई 2010 को मिली और वह 24 मई 2010 से प्रवृत्त हुआ । फिर 2018 के संशोधन ने यही ‘दस लाख रुपये’ शब्द हटाकर अधिसूचना का रास्ता खोला । इसलिए जो अभ्यर्थी अद्यतन नहीं है, वह इसी विकल्प पर रुकेगा । श्रम विधि में यह एक सामान्य ख़तरा है : आँकड़े बदलते रहते हैं, इसलिए हर आँकड़े के साथ उसकी तिथि याद कीजिए, और परीक्षा में वही मान लीजिए जो प्रश्न-तिथि पर प्रवृत्त था ।
- (c)₹ 15,00,000 — पंद्रह लाख रुपये कभी इस धारा की सीमा नहीं रहा । सीमा दस लाख से सीधे बीस लाख पर गई, बीच में कोई पंद्रह लाख वाला चरण नहीं आया । फिर भी यह विकल्प आकर्षक लगता है, क्योंकि यह दो सही आँकड़ों के ठीक बीच में बैठा है और अनुमान लगाने वाले को ‘सुरक्षित मध्य’ जैसा दिखता है । दूसरा कारण यह है कि पंद्रह का अंक इसी धारा में मौजूद तो है, पर बिलकुल दूसरे अर्थ में — धारा 4(2) की गणना पंद्रह दिन की मज़दूरी पर चलती है । ‘पंद्रह दिन’ को ‘पंद्रह लाख’ बना देना इस प्रश्न की सबसे आसान चूक है । जहाँ भी एक ही उपबंध में दो संख्याएँ अलग-अलग इकाइयों में आती हों, उन्हें इकाई सहित याद कीजिए, केवल अंक के रूप में नहीं ।
अवधारणा
उपदान संदाय अधिनियम, 1972 उपदान को नियोजक का दान नहीं, कर्मचारी का विधिक अधिकार बनाता है, और उसका पूरा गणित धारा 4 में बँधा है । धारा 4(1) पात्रता तय करती है : अधिवर्षिता, सेवानिवृत्ति, त्यागपत्र, मृत्यु या निःशक्तता पर नियोजन समाप्त होने पर उपदान देय होता है, बशर्ते कर्मचारी ने पाँच वर्ष की निरंतर सेवा पूरी की हो — और उसका परंतुक कहता है कि मृत्यु या निःशक्तता की दशा में यह पाँच वर्ष वाली शर्त आवश्यक नहीं है । धारा 4(2) गणना का सूत्र देती है : प्रत्येक पूर्ण सेवा-वर्ष के लिए, और छह मास से अधिक के भाग के लिए भी, अंतिम आहरित मज़दूरी दर पर पंद्रह दिन की मज़दूरी । धारा 4(3) उस पर छत रखती है । 2018 के संशोधन के बाद यह छत धारा में लिखा हुआ आँकड़ा नहीं, केंद्र सरकार की अधिसूचना से आने वाली राशि है, और वर्तमान अधिसूचना S.O. 1420(E), दिनांक 29 मार्च 2018 उसे बीस लाख रुपये पर रखती है । धारा 4(5) यह सुरक्षित रखती है कि किसी पंचाट, करार या संविदा से मिलने वाली बेहतर शर्तें इस धारा से प्रभावित नहीं होंगी, और धारा 4(6) उन दशाओं की गिनती करती है जिनमें उपदान अंशत: या पूर्णत: ज़ब्त किया जा सकता है । इसी अधिनियम की धारा 4A नियोजक पर अनिवार्य बीमा का दायित्व डालती है — केंद्र या राज्य सरकार को छोड़कर हर नियोजक को जीवन बीमा निगम या किसी अन्य बीमाकर्ता से बीमा लेना होता है, और जिनके पास स्थापित तथा पंजीकृत उपदान निधि है वे इससे छूट पाते हैं ।
श्रम विधि के आँकड़ों में उपदान की सीमा सबसे तेज़ी से बदलने वाले आँकड़ों में है, और यही उसे परीक्षा का प्रिय विषय बनाता है । 2010 और 2018 के दो संशोधनों ने इसे तीन लाख पचास हज़ार से दस लाख और फिर बीस लाख तक पहुँचाया, और दूसरे संशोधन ने आँकड़े को क़ानून से निकालकर अधिसूचना में डाल दिया । एक प्रवर्तन अधिकारी के लिए यह अंतर व्यावहारिक है : अब सीमा जानने के लिए बेयर ऐक्ट पढ़ना पर्याप्त नहीं, नवीनतम अधिसूचना देखनी पड़ती है । ध्यान रहे कि उपदान संदाय अधिनियम, 1972 अब उन नौ केंद्रीय अधिनियमों में है जिन्हें सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 अपने में समेटती है — शेष आठ हैं कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम 1923, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम 1948, कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम 1952, नियोजन कार्यालय अधिनियम 1959, प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम 1961, सिने कर्मकार कल्याण निधि अधिनियम 1981, भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार उपकर अधिनियम 1996 तथा असंगठित कर्मकार सामाजिक सुरक्षा अधिनियम 2008 । चारों श्रम संहिताएँ 21 नवंबर 2025 से प्रवृत्त हुई हैं । प्रश्न 1972 के अधिनियम के नाम से पूछा गया है, इसलिए उत्तर भी उसी अधिनियम के ढाँचे में देना है ।
मुख्य तथ्य
- उपदान संदाय अधिनियम, 1972 की धारा 4(3) देय उपदान की अधिकतम राशि तय करती है ; वर्तमान में यह बीस लाख रुपये है ।
- उपदान संदाय (संशोधन) अधिनियम, 2018 (2018 का अधिनियम संख्यांक 12) ने धारा 4(3) में ‘दस लाख रुपये’ के स्थान पर ‘ऐसी राशि जो केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित की जाए’ रखा ।
- अधिसूचना S.O. 1420(E), दिनांक 29 मार्च 2018 ने उस राशि को बीस लाख रुपये विनिर्दिष्ट किया और वह उसी तिथि से प्रभावी है ।
- इससे पहले उपदान संदाय (संशोधन) अधिनियम, 2010 ने ‘तीन लाख पचास हज़ार रुपये’ के स्थान पर ‘दस लाख रुपये’ रखा था ; अनुमति 17 मई 2010, प्रवृत्त 24 मई 2010 ।
- धारा 4(2) : प्रत्येक पूर्ण सेवा-वर्ष के लिए तथा छह मास से अधिक के भाग के लिए, अंतिम आहरित मज़दूरी दर पर पंद्रह दिन की मज़दूरी के हिसाब से उपदान देय होता है ।
- धारा 4(1) : पाँच वर्ष की निरंतर सेवा अपेक्षित है, किंतु मृत्यु या निःशक्तता से नियोजन समाप्त होने पर यह शर्त लागू नहीं होती ।
- धारा 4(5) : किसी पंचाट, करार या संविदा के अधीन उपदान की बेहतर शर्तें पाने का कर्मचारी का अधिकार इस धारा से अप्रभावित रहता है ।
- धारा 4A : केंद्र या राज्य सरकार को छोड़कर प्रत्येक नियोजक को उपदान के दायित्व के लिए बीमा लेना होता है ; स्थापित तथा पंजीकृत उपदान निधि रखने वाले नियोजक छूट पा सकते हैं ।
- उपदान संदाय अधिनियम, 1972 उन नौ केंद्रीय अधिनियमों में है जिन्हें सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 समाहित करती है ; चारों श्रम संहिताएँ 21 नवंबर 2025 से प्रवृत्त हैं ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- आँकड़ा याद रखना पर तिथि भूल जाना । दस लाख रुपये आज भी एक सही आँकड़ा है, बस 28 मार्च 2018 तक के लिए ।
- यह मान लेना कि सीमा अब भी धारा में छपी है । 2018 के बाद धारा केवल अधिसूचना की ओर संकेत करती है ; राशि राजपत्र में है ।
- पंद्रह दिन की मज़दूरी वाले सूत्र को पंद्रह लाख की सीमा समझ लेना — एक ही धारा में दो संख्याएँ, दो अलग इकाइयाँ ।
- पाँच वर्ष की निरंतर सेवा को सीमा-राशि से जोड़ लेना । पाँच का संबंध पात्रता से है, राशि से नहीं ।
- यह समझ लेना कि नियोजक बीस लाख से अधिक दे ही नहीं सकता । धारा 4(5) बेहतर शर्तों का रास्ता खुला रखती है ।
इस प्रश्नपत्र में श्रम विधि दो खंडों में आती है और उनमें एक बड़ा हिस्सा शुद्ध आँकड़ों का है — सीमा, अवधि, आयु, संख्या । ऐसे प्रश्नों में चारों विकल्प एक ही इकाई की चार संख्याएँ होते हैं, इसलिए अवधारणा समझ लेने भर से काम नहीं चलता ; ठीक-ठीक अंक याद होना पड़ता है । इस प्रश्न का ढाँचा और भी संकेत देता है : चारों विकल्प आरोही क्रम में हैं और उनमें से दो — दस लाख और बीस लाख — विधि के इतिहास से सीधे उठाए गए हैं । जब भी किसी विकल्प-समुच्चय में एक आँकड़ा वर्तमान और दूसरा तत्काल पूर्ववर्ती हो, तो प्रश्न वस्तुत: यह जाँच रहा होता है कि अभ्यर्थी अद्यतन है या नहीं । इसलिए श्रम विधि पढ़ते समय हर आँकड़े के साथ तीन बातें लिखिए — धारा, राशि और वह तिथि जिससे वह प्रवृत्त हुई । यही आदत उपदान, बोनस, न्यूनतम मज़दूरी और भविष्य निधि — चारों के आँकड़ों को अलग-अलग रखती है, और यही अंतर परीक्षा में दिखता है ।
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