बायोरिमेडिएशन एक तकनीक है। इस तकनीक का बड़े पैमाने पर उपयोग किसके नियंत्रण के लिए किया जा रहा है?
- (a)भूमंडलीय तापन
- (b)हिमनदों का पिघलना
- (c)ओज़ोन अवक्षय
- (d)भारी धातु प्रदूषण
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) भारी धातु प्रदूषण। बायोरिमेडिएशन का अर्थ है जीवित जीवों — मुख्यतः जीवाणुओं, कवकों तथा पौधों — का उपयोग करके मृदा, जल अथवा तलछट से प्रदूषकों को हटाना, उन्हें विघटित करना अथवा उन्हें ऐसे रूप में बदल देना कि वे हानि न पहुँचाएँ। यह तकनीक वहीं काम करती है जहाँ प्रदूषक किसी निश्चित स्थान पर, किसी माध्यम में उपस्थित हो और जीव उस तक पहुँच सकें। चारों विकल्पों में केवल भारी धातु प्रदूषण ही ऐसी समस्या है। भारी धातुएँ — सीसा, पारा, कैडमियम, आर्सेनिक, क्रोमियम — उद्योगों के बहिःस्राव, खनन, इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट तथा कुछ कृषि-रसायनों से मृदा और जल में पहुँचती हैं, वहीं टिकी रहती हैं, और खाद्य-शृंखला में ऊपर की ओर सांद्रित होती जाती हैं।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण सूक्ष्मता है, जिसे समझ लेने पर यह विषय स्पष्ट हो जाता है। भारी धातुएँ तत्त्व हैं, इसलिए उन्हें कार्बनिक प्रदूषकों की तरह तोड़कर सरल हानिरहित पदार्थों में बदला नहीं जा सकता। अतः उनके लिए बायोरिमेडिएशन का काम विनाश का नहीं, स्थानांतरण अथवा रूपांतरण का होता है — या तो जीव उन्हें अपने भीतर संचित कर लें और फिर उन जीवों को हटा लिया जाए, या धातु को कम घुलनशील तथा कम विषैले रूप में बदलकर उसे मिट्टी में जकड़ दिया जाए। इसी के अंतर्गत सूक्ष्मजीवों द्वारा जैव-अधिशोषण तथा जैव-संचयन आते हैं, और पौधों के माध्यम से किया जाने वाला वह उपचार भी, जिसे पादप-उपचार कहते हैं। पादप-उपचार में कुछ पौधे धातुओं को असाधारण मात्रा में अपने ऊतकों में इकट्ठा कर लेते हैं और उन्हें काटकर हटा देने से मिट्टी की धातु-मात्रा घटती है; कुछ पौधे धातु को जड़-क्षेत्र में बाँधकर उसे फैलने से रोकते हैं, और जल से धातु सोखने के लिए जड़ों का उपयोग किया जाता है।
इसी तकनीक का दूसरा बड़ा उपयोग तेल-रिसाव तथा हाइड्रोकार्बन से हुए प्रदूषण की सफ़ाई में होता है, जहाँ सूक्ष्मजीव तेल के अणुओं को सचमुच विघटित कर देते हैं; भारत में जैव-प्रौद्योगिकी की इसी धारा में तेल-अपशिष्ट पर काम करने वाले सूक्ष्मजीवी उत्पाद विकसित किए गए हैं। पर प्रश्न में जो चार विकल्प रखे गए हैं, उनमें यह विकल्प नहीं है; और शेष तीन — भूमंडलीय तापन, हिमनदों का पिघलना तथा ओज़ोन अवक्षय — ऐसी वैश्विक वायुमंडलीय परिघटनाएँ हैं जिन पर जीवों को लगाकर उपचार करने का कोई मार्ग नहीं। इसलिए उत्तर विकल्प (d) ही है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)भूमंडलीय तापन — भूमंडलीय तापन का नियंत्रण बायोरिमेडिएशन का काम नहीं। यह परिघटना वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों — मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड, मेथैन तथा नाइट्रस ऑक्साइड — की बढ़ती सांद्रता से पैदा होती है, और वह सांद्रता पूरे वायुमंडल में फैली हुई है, किसी एक स्थल पर सीमित नहीं। बायोरिमेडिएशन तब काम करता है जब प्रदूषक किसी निश्चित माध्यम में, किसी निश्चित स्थान पर हो, जहाँ जीवों को उस तक पहुँचाया जा सके; वायुमंडल भर में फैली गैस पर वह स्थिति लागू नहीं होती। इस समस्या के उपाय दूसरी दिशा के हैं — उत्सर्जन में कमी, ऊर्जा-दक्षता, जीवाश्म ईंधन से नवीकरणीय स्रोतों की ओर संक्रमण, तथा वनरोपण एवं मृदा में कार्बन का प्रग्रहण। वनरोपण में यद्यपि पौधे ही कार्बन लेते हैं, पर उसे बायोरिमेडिएशन नहीं कहा जाता; उसकी अपनी शब्दावली है और उसे कार्बन प्रग्रहण अथवा कार्बन अवशोषण कहा जाता है। इसलिए यह विकल्प छूट जाता है।
- (b)हिमनदों का पिघलना — हिमनदों का पिघलना कोई प्रदूषक नहीं है, वह एक परिणाम है — और यही इस विकल्प के ग़लत होने का सबसे सीधा कारण है। बायोरिमेडिएशन प्रदूषकों पर काम करता है, अर्थात् उन पदार्थों पर जो किसी माध्यम में अवांछित रूप से उपस्थित हों; हिमनदों का पिघलना पदार्थ नहीं, ताप बढ़ने से हुई एक भौतिक प्रक्रिया है। उसे रोकने का अर्थ भूमंडलीय तापन को रोकना है, और उसके उपाय पिछले विकल्प वाले ही हैं। यहाँ कारण और परिणाम का भेद ध्यान में रखना उपयोगी है, क्योंकि परीक्षा प्रायः इसी भेद पर विकल्प बनाती है: भूमंडलीय तापन कारण है, और हिमनदों का पीछे हटना, समुद्र-स्तर का बढ़ना तथा मौसम-चक्र में बदलाव उसके परिणाम। किसी परिणाम पर सीधे कोई उपचार नहीं लगाया जाता; उपचार कारण पर लगता है। इसके अतिरिक्त हिमनद ऐसे ठंडे, दुर्गम और विशाल क्षेत्रों में हैं जहाँ किसी जैविक उपचार की कल्पना ही व्यावहारिक नहीं।
- (c)ओज़ोन अवक्षय — ओज़ोन अवक्षय भी बायोरिमेडिएशन से नियंत्रित नहीं होता, और इसका कारण उस समस्या की भौगोलिक स्थिति में है। ओज़ोन परत समताप मंडल में है, धरातल से बहुत ऊपर, और वहाँ न कोई सूक्ष्मजीव रहता है, न कोई पौधा; अतः जीवों को लगाकर उपचार करने का प्रश्न ही नहीं उठता। समस्या का कारण भी अलग प्रकार का है — क्लोरोफ़्लोरोकार्बन तथा हैलॉन जैसे यौगिक ऊपर पहुँचकर पराबैंगनी विकिरण से टूटते हैं और मुक्त क्लोरीन तथा ब्रोमीन परमाणु देते हैं, जो ओज़ोन अणुओं को शृंखलाबद्ध रूप से नष्ट करते हैं। इसका समाधान भी उपचार का नहीं, रोकथाम का रहा है: मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के अंतर्गत इन पदार्थों के उत्पादन तथा उपभोग को चरणबद्ध रूप से समाप्त करना। यही कारण है कि ओज़ोन अवक्षय को पर्यावरणीय नीति की सफलता का उदाहरण माना जाता है, जबकि उसका मार्ग तकनीकी उपचार का नहीं, अंतर्राष्ट्रीय विनियमन का था।
अवधारणा
बायोरिमेडिएशन जैव-प्रौद्योगिकी की वह शाखा है जिसमें जीवित जीवों की उपापचयी क्षमता का उपयोग करके प्रदूषित मृदा, जल अथवा तलछट को साफ़ किया जाता है। इसे मोटे तौर पर दो प्रकारों में बाँटा जाता है। पहला प्रकार स्व-स्थाने उपचार है, जिसमें प्रदूषित सामग्री को हटाए बिना उसी स्थान पर उपचार किया जाता है — वहाँ या तो स्थानीय सूक्ष्मजीवों को पोषक तत्त्व और वायु देकर सक्रिय किया जाता है, अथवा बाहर से उपयुक्त सूक्ष्मजीव डाले जाते हैं। दूसरा प्रकार अन्य-स्थाने उपचार है, जिसमें प्रदूषित मिट्टी खोदकर या जल निकालकर उसे नियंत्रित परिस्थितियों में, जैसे जैव-रिएक्टर या जैव-ढेर में, उपचारित किया जाता है। पौधों के माध्यम से किया गया उपचार पादप-उपचार कहलाता है और उसकी अपनी उपशाखाएँ हैं — कुछ पौधे धातु को अपने ऊतकों में असाधारण मात्रा में संचित करते हैं, कुछ उसे जड़-क्षेत्र में बाँधकर स्थिर कर देते हैं, और कुछ जल से धातु सोखने के काम आते हैं। एक मूल भेद सदैव ध्यान में रखिए: कार्बनिक प्रदूषक, जैसे पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन तथा अनेक कीटनाशक, सूक्ष्मजीवों द्वारा सचमुच तोड़े जा सकते हैं और अंततः कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल में बदल सकते हैं; पर भारी धातुएँ तत्त्व हैं और तोड़ी नहीं जा सकतीं, इसलिए उनके लिए उपचार का अर्थ केवल संचयन, स्थिरीकरण अथवा कम विषैले रूप में रूपांतरण होता है। इसी कारण भारी धातुओं के उपचार में हटाई गई वनस्पति अथवा जैव-द्रव्यमान का सुरक्षित निपटान भी प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा होता है।
यह प्रश्न पर्यावरण तथा जैव-प्रौद्योगिकी के उस साझा क्षेत्र से आता है जो प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार लौटता है। उसकी बनावट पर ध्यान दीजिए: तीन विकल्प वैश्विक वायुमंडलीय परिघटनाएँ हैं — भूमंडलीय तापन, हिमनदों का पिघलना तथा ओज़ोन अवक्षय — और चौथा एक स्थानीय, माध्यम-बद्ध प्रदूषण है। यही बनावट उत्तर तक पहुँचने का सबसे छोटा रास्ता भी है, क्योंकि बायोरिमेडिएशन की परिभाषा में ही यह निहित है कि प्रदूषक किसी माध्यम में, किसी पहुँच योग्य स्थान पर होना चाहिए। भारत के संदर्भ में यह विषय व्यावहारिक महत्त्व रखता है: औद्योगिक बहिःस्राव, खनन-क्षेत्रों का अपशिष्ट, इलेक्ट्रॉनिक कचरे का असुरक्षित पुनर्चक्रण तथा कुछ क्षेत्रों में भूजल का आर्सेनिक तथा फ़्लुओराइड — इन सबमें भारी धातुओं या विषैले तत्त्वों का प्रश्न आता है, और उपचार की सस्ती तथा कम ऊर्जा-खपत वाली विधि के रूप में जैविक उपचार पर शोध होता रहा है। इस पुस्तिका के हिन्दी स्तंभ में यह प्रश्न दो वाक्यों में है और प्रश्नचिह्न पर समाप्त होता है, तथा 'बायोरिमेडिएशन' शब्द अनूदित नहीं, लिप्यंतरित है — जो इस पुस्तिका की तकनीकी शब्दावली की सामान्य शैली है।
मुख्य तथ्य
- बायोरिमेडिएशन में जीवित जीवों — जीवाणुओं, कवकों तथा पौधों — का उपयोग करके मृदा, जल अथवा तलछट से प्रदूषकों को हटाया, विघटित अथवा रूपांतरित किया जाता है।
- भारी धातुओं में सीसा, पारा, कैडमियम, आर्सेनिक तथा क्रोमियम आते हैं, जो उद्योगों के बहिःस्राव, खनन, इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट तथा कुछ कृषि-रसायनों से मृदा और जल में पहुँचती हैं।
- भारी धातुएँ तत्त्व हैं, इसलिए उन्हें तोड़कर सरल हानिरहित पदार्थों में नहीं बदला जा सकता; उनके लिए उपचार का अर्थ संचयन, स्थिरीकरण अथवा कम विषैले रूप में रूपांतरण होता है।
- पौधों के माध्यम से किए गए उपचार को पादप-उपचार कहते हैं, जिसमें कुछ पौधे धातु को अपने ऊतकों में असाधारण मात्रा में संचित करते हैं और उन्हें काटकर हटाने से मिट्टी की धातु-मात्रा घटती है।
- बायोरिमेडिएशन स्व-स्थाने भी किया जाता है, जहाँ प्रदूषित सामग्री हटाए बिना उपचार होता है, और अन्य-स्थाने भी, जहाँ उसे निकालकर नियंत्रित परिस्थितियों में उपचारित किया जाता है।
- कार्बनिक प्रदूषक, जैसे पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन तथा अनेक कीटनाशक, सूक्ष्मजीवों द्वारा सचमुच विघटित किए जा सकते हैं — यही तेल-रिसाव की सफ़ाई का आधार है।
- भूमंडलीय तापन का कारण वायुमंडल भर में फैली ग्रीनहाउस गैसें हैं, और उसके उपाय उत्सर्जन में कमी, नवीकरणीय ऊर्जा तथा कार्बन प्रग्रहण हैं, कोई जैविक उपचार नहीं।
- ओज़ोन अवक्षय समताप मंडल की समस्या है, जहाँ कोई जीव नहीं रहता; उसका समाधान मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के अंतर्गत ओज़ोन-क्षयकारी पदार्थों के चरणबद्ध उन्मूलन से निकला।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- बायोरिमेडिएशन को हर पर्यावरणीय समस्या का समाधान मान लेना; वह वहीं काम करता है जहाँ प्रदूषक किसी माध्यम में, पहुँच योग्य स्थान पर उपस्थित हो।
- कारण और परिणाम को मिला देना; भूमंडलीय तापन कारण है और हिमनदों का पिघलना उसका परिणाम, और उपचार सदैव कारण पर लगता है।
- यह मान लेना कि भारी धातुएँ भी सूक्ष्मजीवों द्वारा तोड़ी जा सकती हैं; वे तत्त्व हैं और उन्हें केवल संचित, स्थिर अथवा रूपांतरित किया जा सकता है।
- वनरोपण तथा कार्बन प्रग्रहण को बायोरिमेडिएशन कह देना; दोनों में पौधे काम करते हैं, पर शब्दावली और उद्देश्य अलग हैं।
- ओज़ोन अवक्षय और भूमंडलीय तापन को एक समस्या मान लेना; पहला समताप मंडल में ओज़ोन-क्षयकारी पदार्थों से होता है, दूसरा क्षोभमंडल में ग्रीनहाउस गैसों से।
पर्यावरण तथा जैव-प्रौद्योगिकी के प्रश्न इस परीक्षा में प्रायः 'यह तकनीक किस काम आती है' या 'यह समस्या किस कारण से होती है' के रूप में आते हैं, और उनका उत्तर परिभाषा को ठीक-ठीक पकड़ने से निकलता है। इसलिए किसी भी तकनीक का नाम पढ़ते ही तीन बातें एक साथ लिख लेने की आदत डालिए — वह किस माध्यम पर काम करती है, किस प्रकार के प्रदूषक पर काम करती है, और उसकी सीमा क्या है। बायोरिमेडिएशन के लिए ये तीनों उत्तर स्पष्ट हैं: माध्यम मृदा, जल तथा तलछट; प्रदूषक कार्बनिक यौगिक और भारी धातुएँ; और सीमा यह कि वायुमंडल भर में फैली वैश्विक परिघटनाओं पर वह लागू नहीं होता। विकल्पों की बनावट भी संकेत देती है। जब तीन विकल्प एक ही प्रकार के हों और एक अलग प्रकार का, तो प्रश्न प्रायः उसी अलग प्रकार वाले पर बना होता है; यहाँ तीन वैश्विक वायुमंडलीय परिघटनाएँ हैं और एक स्थानीय प्रदूषण, और उत्तर वही अलग विकल्प है। तैयारी की दृष्टि से पर्यावरण के तीन बड़े विषय — भूमंडलीय तापन, ओज़ोन अवक्षय तथा प्रदूषण के प्रकार — अलग-अलग खानों में रखिए, क्योंकि परीक्षा इन्हीं तीनों को आपस में मिलाकर विकल्प बनाती है।
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- (a) 1 only
- (b) 2 only
- (c) Both 1 and 2
- (d) Neither 1 nor 2
उत्तर(c) Both 1 and 2
EPFO EO/AO 2023 में भारत के 'पंचामृत' जलवायु लक्ष्यों पर प्रश्न — भूमंडलीय तापन के शमन का दूसरा सिरा, जो इस प्रश्न के विकल्प (a) से जुड़ता है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
भारी धातुओं से प्रदूषित मृदा के जैविक उपचार में सूक्ष्मजीव अथवा पौधे प्रायः क्या करते हैं?
- (a)वे धातु को तोड़कर कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल में बदल देते हैं
- (b)वे धातु को अपने ऊतकों में संचित कर लेते हैं अथवा उसे कम घुलनशील और कम विषैले रूप में बदल देते हैं
- (c)वे धातु को वाष्पित करके समताप मंडल तक पहुँचा देते हैं
- (d)वे धातु के परमाणुओं को दूसरे तत्त्वों में रूपांतरित कर देते हैं
उत्तर(b) वे धातु को अपने ऊतकों में संचित कर लेते हैं अथवा उसे कम घुलनशील और कम विषैले रूप में बदल देते हैं
- practice — not a real PYQ
समताप मंडल में ओज़ोन परत के क्षय का प्रमुख कारण निम्नलिखित में से कौन-सा है?
- (a)मृदा में भारी धातुओं का संचयन
- (b)क्लोरोफ़्लोरोकार्बन तथा हैलॉन जैसे ओज़ोन-क्षयकारी पदार्थ
- (c)समुद्र-जल का तापमान बढ़ना
- (d)कृषि-भूमि में नाइट्रोजनी उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग
उत्तर(b) क्लोरोफ़्लोरोकार्बन तथा हैलॉन जैसे ओज़ोन-क्षयकारी पदार्थ