चिकनगुनिया का कारणात्मक कारक क्या है?
- (a)नॉन-क्लोरोफिलस जीवाणु
- (b)सूत्रकृमि
- (c)विषाणु
- (d)कवक
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) विषाणु। चिकनगुनिया एक विषाणुजनित रोग है; उसका कारक चिकनगुनिया विषाणु है, जो एक आरएनए विषाणु है और अल्फ़ावाइरस वंश में रखा जाता है। मनुष्य तक वह अपने आप नहीं पहुँचता — उसका वाहक मच्छर है, और वह भी विशेष रूप से एडीज़ वंश का मच्छर, अर्थात् एडीज़ एजिप्टाई तथा एडीज़ एल्बोपिक्टस। संक्रमित व्यक्ति को काटने पर विषाणु मच्छर में पहुँचता है और फिर उसी मच्छर के काटने से दूसरे व्यक्ति में। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यही दोनों मच्छर डेंगू और ज़ीका के भी वाहक हैं, इसीलिए ये तीनों रोग प्रायः एक ही मौसम में और एक ही क्षेत्र में साथ-साथ फैलते हैं।
रोग की पहचान उसके लक्षणों से होती है: अचानक तेज़ बुख़ार और उसके साथ जोड़ों में तीव्र पीड़ा, जो कुछ रोगियों में बुख़ार उतरने के बाद भी लंबे समय तक बनी रह सकती है; इसके साथ सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द तथा त्वचा पर चकत्ते भी हो सकते हैं। रोग का नाम ही इस लक्षण से आया है — 'चिकनगुनिया' किमाकोंडे भाषा के उस शब्द से बना है जिसका अर्थ है मुड़ या ऐंठ जाना, क्योंकि जोड़ों की पीड़ा से रोगी झुककर चलता है। इस रोग की पहली प्रलेखित प्रकोप-घटना 1952 में तत्कालीन टांगानिका, अर्थात् आज के तंज़ानिया में दर्ज की गई थी।
चूँकि कारक विषाणु है, इसका उपचार भी उसी के अनुरूप है। प्रतिजैविक औषधियाँ यहाँ काम नहीं करतीं, क्योंकि वे जीवाणुओं पर असर करती हैं, विषाणुओं पर नहीं; इस रोग के लिए कोई विशिष्ट विषाणुरोधी औषधि सामान्य उपचार में उपलब्ध नहीं है और चिकित्सा मुख्यतः लक्षणों को सँभालने की होती है — विश्राम, पर्याप्त तरल पदार्थ तथा पीड़ा और ज्वर का शमन। इसलिए बचाव का असली उपाय वाहक-नियंत्रण है: घरों के आसपास ठहरे हुए स्वच्छ जल को जमा न होने देना, क्योंकि एडीज़ मच्छर वहीं अंडे देता है, तथा दिन में काटने वाले इस मच्छर से बचाव करना। यही कारण है कि चिकनगुनिया, डेंगू और ज़ीका की रोकथाम की रणनीति एक जैसी है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)नॉन-क्लोरोफिलस जीवाणु — यह विकल्प जीवाणु को कारक बताता है, जो सही नहीं। जीवाणु प्रोकैरियोटी एककोशिकीय जीव हैं, उनकी अपनी कोशिका होती है, उनका अपना उपापचय होता है, और वे उपयुक्त माध्यम में स्वतंत्र रूप से बढ़ सकते हैं — इसी कारण उन पर प्रतिजैविक औषधियाँ प्रभावी होती हैं। विषाणु इनसे मूलतः भिन्न हैं: उनकी अपनी कोशिका नहीं होती, वे किसी परपोषी कोशिका के भीतर पहुँचे बिना गुणन नहीं कर सकते, और प्रतिजैविक उन पर निष्प्रभावी रहती हैं। चिकनगुनिया का कारक इन्हीं दूसरे प्रकार का है। विकल्प में जोड़ा गया विशेषण भी ध्यान देने योग्य है — अधिकांश जीवाणु वैसे भी क्लोरोफ़िल-रहित होते हैं, इसलिए यह विशेषण कोई अलग श्रेणी नहीं बनाता; अपवाद नील-हरित जीवाणु हैं, जो प्रकाश-संश्लेषण करते हैं। यहाँ भ्रम से बचने का सरल सहारा यह है कि प्रमुख जीवाणुजनित रोग अलग से याद रखे जाएँ — क्षय रोग, हैज़ा, टाइफ़ॉइड, धनुस्तंभ, प्लेग तथा कुष्ठ — और चिकनगुनिया उस सूची में नहीं आता।
- (b)सूत्रकृमि — सूत्रकृमि इस रोग का कारक नहीं हैं, यद्यपि यह विकल्प एक वास्तविक भ्रम पर खड़ा है और उसी कारण उपयोगी है। सूत्रकृमि बहुकोशिकीय परजीवी कृमि हैं, विषाणुओं या जीवाणुओं की तुलना में कहीं बड़े और पूरी तरह भिन्न श्रेणी के जीव। भ्रम इसलिए संभव है कि मच्छर से फैलने वाला एक प्रसिद्ध रोग वास्तव में सूत्रकृमि से ही होता है — फ़ाइलेरिया, जिसे हाथीपाँव भी कहा जाता है; उसका कारक एक सूत्रकृमि है और उसका वाहक क्यूलेक्स मच्छर है। इसी से यह धारणा बन सकती है कि मच्छर से फैलने वाले रोग एक ही प्रकार के कारक से होते हैं, जो सही नहीं। मच्छरजनित रोगों को कारक के अनुसार बाँटकर याद रखना ही इस भ्रम का उत्तर है: मलेरिया का कारक प्रोटोज़ोआ है, डेंगू, चिकनगुनिया, ज़ीका तथा जापानी मस्तिष्क-ज्वर के कारक विषाणु हैं, और फ़ाइलेरिया का कारक सूत्रकृमि। अन्य सूत्रकृमि-जनित रोगों में गोलकृमि तथा अंकुशकृमि के संक्रमण आते हैं, जो मच्छर से नहीं फैलते।
- (d)कवक — कवक भी इस रोग का कारक नहीं। कवक यूकैरियोटी जीव हैं जिनकी कोशिका-भित्ति में काइटिन होती है और जो क्लोरोफ़िल-रहित होने के कारण अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते; वे मृतोपजीवी अथवा परजीवी रूप में पोषण लेते हैं। मनुष्य में कवक-जनित रोग मुख्यतः त्वचा, नाख़ून तथा श्लेष्म झिल्लियों के रोग होते हैं — दाद, पाँव की उँगलियों के बीच होने वाला संक्रमण, तथा कैंडिडा से होने वाले संक्रमण; प्रतिरक्षा-दुर्बल रोगियों में फेफड़ों के गंभीर कवक-संक्रमण भी हो सकते हैं। इनका फैलाव प्रायः स्पर्श, नमी तथा बीजाणुओं के साँस के साथ भीतर जाने से होता है, मच्छर के काटने से नहीं। लक्षणों की दृष्टि से भी अंतर स्पष्ट है: चिकनगुनिया में अचानक तेज़ बुख़ार और जोड़ों की तीव्र पीड़ा प्रमुख हैं, जो कवक-जनित त्वचा रोगों का चित्र नहीं है। इसलिए यह विकल्प भी छूट जाता है।
अवधारणा
रोगों को उनके कारक के अनुसार वर्गीकृत करना इस परीक्षा की सबसे उपयोगी तैयारी है, क्योंकि प्रश्न प्रायः इसी वर्गीकरण से बनते हैं। पाँच बड़ी श्रेणियाँ हैं। पहली विषाणु हैं — कोशिका-रहित, केवल परपोषी कोशिका के भीतर गुणन करने वाले; इनसे होने वाले रोगों में डेंगू, चिकनगुनिया, ज़ीका, पीत ज्वर, जापानी मस्तिष्क-ज्वर, इन्फ़्लुएंज़ा, ख़सरा, पोलियो तथा रेबीज़ आते हैं और प्रतिजैविक औषधियाँ इन पर काम नहीं करतीं। दूसरी जीवाणु हैं — प्रोकैरियोटी एककोशिकीय जीव, जिनसे क्षय रोग, हैज़ा, टाइफ़ॉइड, धनुस्तंभ, प्लेग तथा कुष्ठ होते हैं और जिन पर प्रतिजैविक प्रभावी होती हैं। तीसरी प्रोटोज़ोआ हैं — एककोशिकीय यूकैरियोट, जिनसे मलेरिया, अमीबीय पेचिश तथा कालाजार होते हैं। चौथी कृमि हैं, जिनमें सूत्रकृमि आते हैं और जिनसे फ़ाइलेरिया, गोलकृमि तथा अंकुशकृमि के संक्रमण होते हैं। पाँचवीं कवक हैं, जिनसे दाद तथा कैंडिडा-संक्रमण जैसे रोग होते हैं। इसी के समांतर दूसरा वर्गीकरण वाहक का है, और मच्छरजनित रोगों में वह विशेष रूप से काम आता है: एडीज़ मच्छर डेंगू, चिकनगुनिया, ज़ीका तथा पीत ज्वर फैलाता है और दिन में काटता है; एनोफ़ेलीज़ मलेरिया फैलाता है; और क्यूलेक्स फ़ाइलेरिया तथा जापानी मस्तिष्क-ज्वर। दोनों वर्गीकरण साथ-साथ याद रखने पर इस विषय के अधिकांश प्रश्न सीधे हल हो जाते हैं।
चिकनगुनिया भारत में एक परिचित सार्वजनिक स्वास्थ्य विषय है और वर्षा-ऋतु के बाद के महीनों में उसके प्रकोप की चर्चा नियमित रूप से होती है, इसीलिए वह प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार आता है। परीक्षा की दृष्टि से यह प्रश्न विज्ञान से अधिक वर्गीकरण का प्रश्न है — चारों विकल्प चार अलग-अलग जैविक श्रेणियाँ हैं और अभ्यर्थी से केवल यह पूछा जा रहा है कि यह रोग किस श्रेणी में आता है। इसी कारण इसका उत्तर याद करने के बजाय समझकर रखा जाना चाहिए: यदि मच्छरजनित रोगों की सूची कारक के अनुसार बँटी हुई स्मृति में हो, तो चिकनगुनिया, डेंगू और ज़ीका एक साथ विषाणु वाले खाने में बैठ जाते हैं और उत्तर स्वतः निकल आता है। विकल्प (a) की शब्द-रचना पर भी ध्यान देने योग्य है — उसमें विशेषण अंग्रेज़ी से लिप्यंतरित है और संज्ञा अनूदित, जो इस पुस्तिका में कई जगह मिलने वाली मिश्रित शैली है; शेष तीन विकल्प पूरी तरह अनूदित हैं। यह मिश्रण अर्थ पर कोई प्रभाव नहीं डालता, पर पढ़ते समय ठिठकाव अवश्य पैदा करता है।
मुख्य तथ्य
- चिकनगुनिया का कारक चिकनगुनिया विषाणु है, जो एक आरएनए विषाणु है और अल्फ़ावाइरस वंश में रखा जाता है।
- इस रोग के वाहक एडीज़ एजिप्टाई तथा एडीज़ एल्बोपिक्टस मच्छर हैं, और यही दोनों मच्छर डेंगू तथा ज़ीका के भी वाहक हैं।
- रोग के प्रमुख लक्षण हैं अचानक तेज़ बुख़ार और जोड़ों में तीव्र पीड़ा, जो कुछ रोगियों में बुख़ार उतरने के बाद भी लंबे समय तक बनी रह सकती है।
- 'चिकनगुनिया' नाम किमाकोंडे भाषा के उस शब्द से आया है जिसका अर्थ मुड़ या ऐंठ जाना है, क्योंकि जोड़ों की पीड़ा से रोगी झुककर चलता है।
- इस रोग की पहली प्रलेखित प्रकोप-घटना 1952 में तत्कालीन टांगानिका, अर्थात् आज के तंज़ानिया में दर्ज की गई थी।
- प्रतिजैविक औषधियाँ विषाणुओं पर प्रभावी नहीं होतीं, इसलिए चिकित्सा मुख्यतः लक्षणों को सँभालने की होती है — विश्राम, पर्याप्त तरल तथा ज्वर और पीड़ा का शमन।
- बचाव का मुख्य उपाय वाहक-नियंत्रण है, क्योंकि एडीज़ मच्छर ठहरे हुए स्वच्छ जल में अंडे देता है और दिन के समय काटता है।
- मच्छरजनित रोगों के कारक अलग-अलग श्रेणियों के हैं — मलेरिया का प्रोटोज़ोआ, डेंगू तथा चिकनगुनिया का विषाणु, और फ़ाइलेरिया का सूत्रकृमि।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- मच्छर से फैलने वाले सभी रोगों का कारक एक ही मान लेना; मलेरिया प्रोटोज़ोआ से, डेंगू तथा चिकनगुनिया विषाणु से और फ़ाइलेरिया सूत्रकृमि से होता है।
- चिकनगुनिया में प्रतिजैविक औषधि को उपचार मान लेना; प्रतिजैविक जीवाणुओं पर असर करती हैं, विषाणुओं पर नहीं।
- जीवाणु के साथ 'क्लोरोफ़िल-रहित' विशेषण देखकर उसे कोई अलग श्रेणी मान लेना; अधिकांश जीवाणु वैसे भी क्लोरोफ़िल-रहित होते हैं और अपवाद नील-हरित जीवाणु हैं।
- डेंगू तथा चिकनगुनिया को एक ही रोग मान लेना; वाहक और मौसम समान हैं, पर कारक विषाणु अलग हैं और लक्षणों का ज़ोर भी भिन्न है।
- यह भूल जाना कि एडीज़ मच्छर दिन में काटता है और स्वच्छ ठहरे जल में अंडे देता है; इसी से बचाव के उपाय तय होते हैं।
सामान्य विज्ञान के जीव विज्ञान वाले हिस्से में रोग और उनके कारक सबसे नियमित विषयों में हैं, और इस परीक्षा में वे प्रायः चार रूपों में पूछे जाते हैं: रोग का कारक कौन-सी जैविक श्रेणी है, रोग का वाहक कौन है, रोग किस अंग या तंत्र को प्रभावित करता है, और उसकी रोकथाम या टीके की स्थिति क्या है। इन चारों की तैयारी एक ही सारणी से हो जाती है, इसलिए पढ़ते समय हर रोग के सामने चार खाने बनाइए — कारक, वाहक, प्रमुख लक्षण और रोकथाम। मच्छरजनित रोगों के लिए यह सारणी विशेष रूप से आवश्यक है, क्योंकि यहाँ वाहक समान होते हुए भी कारक भिन्न होते हैं, और विकल्प ठीक इसी अंतर पर बनाए जाते हैं। एक और उपयोगी आदत यह है कि जिन रोगों के नाम समाचारों में साथ-साथ आते हैं, उन्हें एक समूह में पढ़िए — डेंगू, चिकनगुनिया और ज़ीका ऐसा ही समूह है, क्योंकि तीनों का वाहक एक है, तीनों के कारक विषाणु हैं, और तीनों की रोकथाम की रणनीति एक जैसी है। जहाँ प्रश्न किसी रोग के नाम की उत्पत्ति या पहली प्रकोप-घटना जैसी बात पूछे, वहाँ भी यही समूहवार पढ़ाई काम आती है।
संबंधित PYQ
EPFO_EOAO_2020_Q45The word ‘Vaccine’ has been derived from a Latin word having meaning
- (a) Antibody
- (b) Immunity
- (c) Cow
- (d) Guinea pig
उत्तर(c) Cow
EPFO EO/AO 2020 में 'वैक्सीन' शब्द की व्युत्पत्ति पर प्रश्न — रोग, रोगकारक तथा उनसे बचाव के इसी विषय-क्षेत्र का दूसरा प्रश्न।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
निम्नलिखित में से कौन-सा रोग सूत्रकृमि के कारण होता है और क्यूलेक्स मच्छर द्वारा फैलता है?
- (a)मलेरिया
- (b)फ़ाइलेरिया
- (c)चिकनगुनिया
- (d)डेंगू
उत्तर(b) फ़ाइलेरिया
- practice — not a real PYQ
डेंगू, चिकनगुनिया तथा ज़ीका — इन तीनों रोगों में कौन-सी बात समान है?
- (a)तीनों जीवाणु से होते हैं और प्रतिजैविक से ठीक हो जाते हैं
- (b)तीनों का वाहक एनोफ़ेलीज़ मच्छर है
- (c)तीनों के कारक विषाणु हैं और तीनों एडीज़ मच्छर से फैलते हैं
- (d)तीनों दूषित जल तथा भोजन से फैलते हैं
उत्तर(c) तीनों के कारक विषाणु हैं और तीनों एडीज़ मच्छर से फैलते हैं