कथन I : यह एक सामान्य अवलोकन है कि यदि हम एक गिलास हिमजल एक मेज पर कमरे के तापमान पर रख दें, तो हिमजल कोष्ण हो जाएगा। कथन II : ऊष्मा एक ऊर्जा है जो एक प्रणाली और उसके वातावरण के बीच प्रवाहित होती है क्योंकि उनके बीच तापमान का अंतर होता है।
- (a)दोनों कथन अलग-अलग सत्य हैं, और कथन I का सही स्पष्टीकरण कथन II है
- (b)दोनों कथन अलग-अलग सत्य हैं, किन्तु कथन I का सही स्पष्टीकरण कथन II नहीं है
- (c)कथन I सत्य है, किन्तु कथन II असत्य है
- (d)कथन I असत्य है, किन्तु कथन II सत्य है
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) दोनों कथन अलग-अलग सत्य हैं, और कथन I का सही स्पष्टीकरण कथन II है। कथन II ऊष्मा की मानक परिभाषा है — ऊष्मा वह ऊर्जा है जो किसी प्रणाली और उसके परिवेश के बीच केवल इसलिए प्रवाहित होती है कि दोनों के तापमान भिन्न हैं। यह परिभाषा ऊष्मागतिकी की आधारशिला है और असत्य नहीं हो सकती। कथन I एक साधारण अवलोकन है और वह भी सत्य है: बर्फ़ मिले पानी का गिलास कमरे के तापमान पर रखे रहने पर कुछ समय बाद कोष्ण हो जाता है, यह हर व्यक्ति का अनुभव है। अब देखिए कि दूसरा पहले को समझाता है या नहीं। बर्फ़ मिला पानी लगभग शून्य डिग्री सेल्सियस पर होता है और कमरा उससे कहीं अधिक तापमान पर; यही तापांतर वह कारण है जिसके चलते ऊर्जा कमरे से गिलास की ओर बहती है। जब तक यह अंतर बना रहता है, प्रवाह चलता रहता है, और जैसे-जैसे गिलास गर्म होता है अंतर घटता जाता है और प्रवाह मंद पड़ता जाता है, यहाँ तक कि दोनों एक ही तापमान पर आ जाएँ। अर्थात् कथन II ठीक वह क्रियाविधि बताता है जिससे कथन I की घटना घटती है — इसलिए संबंध केवल दो सत्य कथनों के साथ-साथ होने का नहीं, कारण का है, और यही विकल्प (a) को विकल्प (b) से अलग करता है।
एक सूक्ष्मता यहाँ समझ लेने योग्य है, क्योंकि परीक्षा उसी पर अगला प्रश्न बना सकती है। जब तक गिलास में बर्फ़ बची है, बाहर से आती ऊर्जा तापमान बढ़ाने में नहीं, बर्फ़ को गलाने में खर्च होती है; इस दौरान मिश्रण का तापमान लगभग स्थिर रहता है और यही गुप्त ऊष्मा कहलाती है। तापमान चढ़ना तब आरंभ होता है जब सारी बर्फ़ गल चुकी हो। कथन I इस क्रम का खंडन नहीं करता — वह अंतिम परिणाम की बात करता है, और अंततः पानी कोष्ण हो ही जाता है। इसलिए यह सूक्ष्मता कथन I को असत्य नहीं बनाती, केवल उसे और ठीक-ठीक समझाती है।
दो और बातें ध्यान में रखिए। पहली, ऊष्मा का प्रवाह सदैव अधिक तापमान से कम तापमान की ओर होता है, उलटा अपने आप नहीं होता — यही ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम की सामान्य भाषा में कही गई बात है। दूसरी, ऊष्मा कोई ऐसी वस्तु नहीं जो पिंड में 'भरी' रहती हो; पिंड में आंतरिक ऊर्जा होती है, और 'ऊष्मा' नाम केवल उस ऊर्जा को दिया जाता है जो तापांतर के कारण एक जगह से दूसरी जगह जा रही हो। इसी कारण कहा जाता है कि ऊष्मा संक्रमण में रहने वाली ऊर्जा है। कमरे का तापमान इस प्रक्रिया में मापने योग्य रूप से नहीं गिरता, क्योंकि कमरा गिलास की तुलना में बहुत बड़ा ऊष्मा-भंडार है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)दोनों कथन अलग-अलग सत्य हैं, किन्तु कथन I का सही स्पष्टीकरण कथन II नहीं है — यह विकल्प दोनों कथनों को सत्य मानता है पर उनके बीच कारण-संबंध से इनकार करता है, और यहीं यह चूकता है। स्पष्टीकरण की जाँच का सीधा तरीक़ा यह पूछना है कि क्या दूसरा कथन वह कारण या क्रियाविधि है जिससे पहला कथन निकलता है। यहाँ कथन I एक घटना बताता है — बर्फ़ मिला पानी कमरे में रखे रहने पर कोष्ण हो जाता है — और कथन II ठीक वह कारण बताता है जिससे यह घटती है, अर्थात् तापांतर के चलते ऊर्जा का प्रवाह। दूसरे कथन को हटा दीजिए और पहली घटना के पास अपना कोई कारण नहीं बचता। इस विकल्प के सही होने के लिए कुछ ऐसी स्थिति चाहिए जहाँ दोनों कथन सत्य तो हों पर अलग-अलग विषयों के हों — जैसे यदि कथन I बर्फ़ के गलने की बात करता और कथन II यह कहता कि जल का घनत्व चार डिग्री सेल्सियस पर अधिकतम होता है; दोनों सत्य होते, पर दूसरा पहले का कारण न होता। इस प्रश्न में वैसी दूरी नहीं है, इसलिए यह विकल्प छूट जाता है।
- (c)कथन I सत्य है, किन्तु कथन II असत्य है — यह विकल्प कथन II को असत्य ठहराता है, अर्थात् ऊष्मा की उस परिभाषा को नकारता है जो ऊष्मागतिकी की नींव है। यह भ्रम प्रायः ऊष्मा और तापमान को एक मान लेने से पैदा होता है। दोनों अलग हैं: तापमान किसी पिंड की उस अवस्था का माप है जो यह तय करती है कि ऊर्जा किस दिशा में बहेगी, जबकि ऊष्मा वह ऊर्जा है जो बह रही है। एक और पुराना भ्रम यह मानने का है कि ऊष्मा कोई द्रव जैसी वस्तु है जो पिंडों में भरी रहती है — यह धारणा विज्ञान के इतिहास में रह चुकी है और छोड़ी जा चुकी है। आज की समझ यह है कि पिंड में आंतरिक ऊर्जा होती है, और उसमें से जो अंश तापांतर के कारण स्थानांतरित होता है, उसी को ऊष्मा कहते हैं; इसी कारण ऊष्मा को संक्रमण में रहने वाली ऊर्जा कहा जाता है। कथन II इसी मानक परिभाषा को दोहराता है, इसलिए उसे असत्य कहने का कोई आधार नहीं और यह विकल्प गिर जाता है।
- (d)कथन I असत्य है, किन्तु कथन II सत्य है — यह विकल्प कथन I को असत्य ठहराता है, जबकि वह एक सामान्य अवलोकन है जिसे कोई भी दोहरा सकता है। इस पर संदेह करने का एक ही संभावित कारण है, और वह गुप्त ऊष्मा से जुड़ी सूक्ष्मता है: जब तक गिलास में बर्फ़ बची रहती है, तापमान लगभग शून्य डिग्री सेल्सियस पर टिका रहता है, क्योंकि आती हुई ऊर्जा बर्फ़ को गलाने में खर्च हो रही होती है। इससे यह लग सकता है कि पानी गर्म हो ही नहीं रहा। पर कथन I किसी क्षण-विशेष की बात नहीं करता, वह अंतिम परिणाम की बात करता है — और सारी बर्फ़ गल जाने के बाद तापमान चढ़ने लगता है तथा पानी अंततः कमरे के तापमान तक पहुँच जाता है। यह प्रक्रिया तब रुकती है जब गिलास और कमरा तापीय संतुलन में आ जाएँ। दूसरा संभावित भ्रम यह मान लेना है कि ठंडी वस्तु आसपास को 'ठंडक' देती है; ठंडक कोई बहने वाली वस्तु नहीं, बहती केवल ऊर्जा है और वह गर्म से ठंडे की ओर बहती है। अतः कथन I सत्य है।
अवधारणा
ऊष्मा, तापमान और आंतरिक ऊर्जा — ये तीन पद अलग-अलग हैं और अधिकांश भ्रम इन्हें मिला देने से पैदा होते हैं। किसी पिंड के कणों की अव्यवस्थित गति तथा उनके पारस्परिक बलों से जुड़ी कुल ऊर्जा उसकी आंतरिक ऊर्जा कहलाती है। तापमान इस आंतरिक अवस्था का वह माप है जो यह तय करता है कि दो पिंडों को छुआने पर ऊर्जा किस दिशा में बहेगी। और ऊष्मा वह ऊर्जा है जो तापांतर के कारण एक पिंड से दूसरे पिंड में जा रही होती है — इसीलिए कहा जाता है कि ऊष्मा संक्रमण में रहने वाली ऊर्जा है, पिंड की कोई संचित सम्पत्ति नहीं। ऊष्मागतिकी का शून्यवाँ नियम इसी से जुड़ा है: यदि दो प्रणालियाँ किसी तीसरी प्रणाली के साथ तापीय संतुलन में हों, तो वे आपस में भी तापीय संतुलन में होंगी, और यही नियम तापमान को एक अर्थपूर्ण राशि बनाता है। द्वितीय नियम दिशा तय करता है — ऊष्मा स्वतः अधिक तापमान से कम तापमान की ओर जाती है, उलटी दिशा में बिना बाहरी कार्य के नहीं। स्थानांतरण की तीन विधियाँ हैं: चालन, जिसमें कण अपनी जगह पर रहते हुए ऊर्जा आगे बढ़ाते हैं; संवहन, जिसमें द्रव या गैस स्वयं बहकर ऊर्जा ले जाती है; और विकिरण, जिसमें ऊर्जा विद्युत-चुंबकीय तरंगों के रूप में जाती है और जिसे किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती। एक गिलास बर्फ़ीले पानी के गर्म होने में तीनों की भूमिका होती है — काँच से चालन, आसपास की वायु से संवहन, और परिवेश से विकिरण।
यह प्रश्न उसी निर्देश-खंड से शासित है जो इससे पहले वाले प्रश्नांश के ऊपर एक बार छपा है, और चारों कूट भी वहीं दिए गए हैं; इस प्रश्न के नीचे अपने अलग विकल्प नहीं छपे। इसलिए इसे हल करने से पहले वह निर्देश-खंड पढ़ना अनिवार्य है। कूट की चार शाखाओं में से पहली दो दोनों कथनों को सत्य मानती हैं और केवल स्पष्टीकरण के प्रश्न पर बँटती हैं; तीसरी और चौथी शाखा में एक कथन सत्य और दूसरा असत्य होता है। जो शाखा इस कूट में है ही नहीं, वह यह है कि दोनों कथन असत्य हों — और यह अनुपस्थिति स्वयं काम की सूचना है, क्योंकि इससे निश्चित हो जाता है कि दोनों प्रश्नांशों में कम से कम एक कथन सत्य है। विषय की दृष्टि से यह प्रश्न सामान्य विज्ञान के उस हिस्से से आता है जो रोज़मर्रा के अनुभव पर टिका है, और परीक्षा ऐसे प्रश्न प्रायः इसी रूप में पूछती है — एक परिचित घटना को कथन I में रखकर, और उसका सैद्धांतिक कारण कथन II में। ऐसे प्रश्नों में जल्दबाज़ी की सबसे बड़ी क़ीमत यह होती है कि अभ्यर्थी परिचित घटना देखकर सीधे विकल्प (a) चुन लेता है, बिना यह जाँचे कि दूसरा कथन वास्तव में उसी घटना का कारण बता रहा है या किसी और बात का।
मुख्य तथ्य
- ऊष्मा वह ऊर्जा है जो किसी प्रणाली और उसके परिवेश के बीच केवल तापांतर के कारण प्रवाहित होती है; इसीलिए उसे संक्रमण में रहने वाली ऊर्जा कहा जाता है।
- पिंड में ऊष्मा 'भरी' नहीं रहती — पिंड में आंतरिक ऊर्जा होती है, और 'ऊष्मा' नाम केवल उस ऊर्जा को मिलता है जो तापांतर के कारण स्थानांतरित हो रही हो।
- ऊष्मा का स्वतः प्रवाह सदैव अधिक तापमान से कम तापमान की ओर होता है; उलटी दिशा में प्रवाह बिना बाहरी कार्य के नहीं होता।
- जब तक गिलास में बर्फ़ बची रहती है, आती हुई ऊर्जा तापमान बढ़ाने में नहीं बल्कि बर्फ़ को गलाने में खर्च होती है और मिश्रण का तापमान लगभग स्थिर रहता है; इसे गुप्त ऊष्मा कहते हैं।
- तापमान का बढ़ना सारी बर्फ़ गल जाने के बाद आरंभ होता है, और प्रक्रिया तब रुकती है जब गिलास तथा कमरा तापीय संतुलन में आ जाएँ।
- शून्यवाँ नियम कहता है कि यदि दो प्रणालियाँ किसी तीसरी के साथ तापीय संतुलन में हों तो वे आपस में भी तापीय संतुलन में होंगी; यही नियम तापमान को अर्थपूर्ण राशि बनाता है।
- ऊष्मा-स्थानांतरण की तीन विधियाँ हैं — चालन, संवहन और विकिरण; इनमें विकिरण को किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती।
- कमरे का तापमान इस प्रक्रिया में मापने योग्य रूप से नहीं गिरता, क्योंकि कमरा गिलास की तुलना में बहुत बड़ा ऊष्मा-भंडार है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- ऊष्मा और तापमान को एक मान लेना; तापमान प्रवाह की दिशा तय करने वाला माप है, जबकि ऊष्मा वह ऊर्जा है जो बह रही है।
- यह मान लेना कि ठंडी वस्तु आसपास को 'ठंडक' देती है; ठंडक कोई बहने वाली वस्तु नहीं, बहती केवल ऊर्जा है और वह गर्म से ठंडे की ओर बहती है।
- गुप्त ऊष्मा की सूक्ष्मता देखकर कथन I को ही असत्य मान लेना; कथन I अंतिम परिणाम की बात करता है, किसी क्षण-विशेष की नहीं।
- परिचित घटना देखकर बिना जाँचे विकल्प (a) चुन लेना; यह देखना आवश्यक है कि दूसरा कथन उसी घटना का कारण बता रहा है या किसी और बात का।
- यह सोचना कि प्रक्रिया में कमरा भी उतना ही ठंडा हो जाएगा; कमरा गिलास की तुलना में बहुत बड़ा ऊष्मा-भंडार है, इसलिए उसका तापमान मापने योग्य रूप से नहीं गिरता।
- निर्देश-खंड को छोड़कर सीधे कथनों पर चले जाना, जबकि चारों कूट उसी खंड में छपे हैं और उसे पिछले प्रश्नांश के ऊपर एक ही बार छापा गया है।
सामान्य विज्ञान में ऊष्मागतिकी के प्रश्न प्रायः दो रूपों में आते हैं। पहला रूप परिभाषा का है — ऊष्मा क्या है, तापमान क्या है, गुप्त ऊष्मा क्या है — और उसमें विकल्प इन्हीं पदों को आपस में बदलकर बनाए जाते हैं। दूसरा रूप, जो यहाँ है, किसी रोज़मर्रा की घटना को सामने रखकर उसका कारण पूछता है। इस दूसरे रूप में अभ्यर्थी की असली परीक्षा यह होती है कि वह घटना और कारण के बीच का जोड़ पहचान पाता है या नहीं। कथन I तथा कथन II वाले ढाँचे में इसे हल करने का सुरक्षित क्रम दो चरणों का है: पहले दोनों कथनों की सत्यता अलग-अलग जाँचिए, और यदि कोई एक असत्य निकले तो उत्तर वहीं तय हो जाता है; दोनों सत्य निकलें, तभी यह पूछिए कि क्या दूसरा कथन पहले का कारण या क्रियाविधि है। एक उपयोगी परख यह है कि दूसरे कथन को हटाकर देखिए — यदि पहली घटना के पास अपना कोई कारण न बचे तो वह स्पष्टीकरण है। तैयारी की दृष्टि से इस विषय में तीन जोड़े स्पष्ट रखने चाहिए: ऊष्मा बनाम तापमान, विशिष्ट ऊष्मा बनाम गुप्त ऊष्मा, और चालन बनाम संवहन बनाम विकिरण। इन्हीं तीन जोड़ों से इस परीक्षा के अधिकांश ऊष्मा-प्रश्न बनते हैं।
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- (a) Both the statements are individually true and Statement II is the correct explanation of Statement I
- (b) Both the statements are individually true but Statement II is not the correct explanation of Statement I
- (c) Statement I is true but Statement II is false
- (d) Statement I is false but Statement II is true
उत्तर(a) Both the statements are individually true and Statement II is the correct explanation of Statement I
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- (b)क्योंकि उसे केवल तभी ऊष्मा कहा जाता है जब वह तापांतर के कारण एक पिंड से दूसरे पिंड में जा रही हो
- (c)क्योंकि वह केवल गैसों में ही एक स्थान से दूसरे स्थान तक जा सकती है
- (d)क्योंकि उसका मापन केवल तापमान के पैमाने पर ही संभव है
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- (a)तापमान लगातार बढ़ता रहता है
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- (c)तापमान लगभग स्थिर रहता है, क्योंकि दी गई ऊर्जा बर्फ़ को गलाने में खर्च होती है
- (d)तापमान पहले घटता है और फिर बढ़ने लगता है
उत्तर(c) तापमान लगभग स्थिर रहता है, क्योंकि दी गई ऊर्जा बर्फ़ को गलाने में खर्च होती है