निर्देश : निम्नलिखित दो (2) प्रश्नांशों में दो कथन हैं, कथन I और कथन II. इन दोनों कथनों का सावधानीपूर्वक परीक्षण कीजिए और नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। कूट : (a) दोनों कथन अलग-अलग सत्य हैं, और कथन I का सही स्पष्टीकरण कथन II है (b) दोनों कथन अलग-अलग सत्य हैं, किन्तु कथन I का सही स्पष्टीकरण कथन II नहीं है (c) कथन I सत्य है, किन्तु कथन II असत्य है (d) कथन I असत्य है, किन्तु कथन II सत्य है कथन I : पृथ्वी के कारण चंद्रमा पर लगने वाला बल क्रिया है, जबकि चंद्रमा के कारण पृथ्वी पर लगने वाला बल प्रतिक्रिया है। कथन II : प्रत्येक क्रिया की एक बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।
- (a)दोनों कथन अलग-अलग सत्य हैं, और कथन I का सही स्पष्टीकरण कथन II है
- (b)दोनों कथन अलग-अलग सत्य हैं, किन्तु कथन I का सही स्पष्टीकरण कथन II नहीं है
- (c)कथन I सत्य है, किन्तु कथन II असत्य है
- (d)कथन I असत्य है, किन्तु कथन II सत्य है
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) दोनों कथन अलग-अलग सत्य हैं, और कथन I का सही स्पष्टीकरण कथन II है। कथन II न्यूटन का गति-विषयक तृतीय नियम है और वह भौतिकी का एक स्थापित नियम है, इसलिए उसे असत्य कहने का कोई आधार नहीं बचता। कथन I उसी नियम का एक विशिष्ट उदाहरण है। पृथ्वी चंद्रमा को अपनी ओर खींचती है, और ठीक उतने ही परिमाण का बल चंद्रमा भी पृथ्वी पर लगाता है; दोनों बल दोनों पिंडों के केंद्रों को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश लगते हैं और उनकी दिशाएँ परस्पर विपरीत होती हैं। इस युग्म में किसे 'क्रिया' कहा जाए और किसे 'प्रतिक्रिया', यह केवल नामकरण की बात है; नियम की माँग इतनी ही है कि दोनों साथ-साथ हों, परिमाण में बराबर हों और दिशा में विपरीत हों। कथन I ने एक बल को क्रिया और दूसरे को प्रतिक्रिया कहा है, जो इस नियम के ठीक अनुरूप है, अतः वह सत्य है। अब निर्णायक प्रश्न यही बचता है कि क्या कथन II कथन I का स्पष्टीकरण भी है। है — क्योंकि पृथ्वी और चंद्रमा के इन दो बलों को क्रिया-प्रतिक्रिया युग्म कहा ही इसलिए जाता है कि तृतीय नियम ऐसा कहता है। सामान्य नियम अपने विशिष्ट उदाहरण को समझाता है, इसलिए दोनों कथनों का संबंध केवल साथ-साथ सत्य होने का नहीं, कारण का है। यही विकल्प (a) और विकल्प (b) के बीच का पूरा भेद है।
इस युग्म को समझने की असली कुंजी एक और बात में है: क्रिया और प्रतिक्रिया कभी एक ही पिंड पर नहीं लगतीं। पृथ्वी वाला बल चंद्रमा पर लगता है और चंद्रमा वाला बल पृथ्वी पर, इसीलिए ये दोनों एक-दूसरे को काटते नहीं। यदि ये एक ही पिंड पर लगते तो उनका परिणामी शून्य होता और संसार में कोई वस्तु कभी त्वरित ही न होती। बल बराबर होने पर भी दोनों पिंडों के त्वरण बराबर नहीं होते, क्योंकि त्वरण बल और द्रव्यमान के अनुपात से तय होता है और पृथ्वी का द्रव्यमान चंद्रमा के द्रव्यमान से कहीं अधिक है — इसीलिए चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा करता दिखता है, जबकि पृथ्वी की अपनी गति उसकी तुलना में बहुत कम प्रतीत होती है।
निराकरण की दृष्टि से इस प्रश्न में एक अतिरिक्त सहारा भी है, और वह प्रश्न के ऊपर छपे कूट में है। कूट चार शाखाएँ देता है और उनमें 'दोनों कथन असत्य हैं' वाली कोई शाखा है ही नहीं। इसका सीधा अर्थ यह है कि इस निर्देश-खंड से शासित दोनों प्रश्नांशों में कम से कम एक कथन सत्य अवश्य है। जहाँ एक कथन कोई स्थापित नियम हो, वहाँ जाँच का सारा बोझ दूसरे कथन पर और दोनों के आपसी संबंध पर आ जाता है — और यही इस प्रश्न का वास्तविक काम है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)दोनों कथन अलग-अलग सत्य हैं, किन्तु कथन I का सही स्पष्टीकरण कथन II नहीं है — यह विकल्प दोनों कथनों को सत्य तो मानता है, पर उनके बीच कारण-संबंध से इनकार करता है। यहीं यह चूकता है। स्पष्टीकरण की जाँच का एक सीधा तरीक़ा है: पूछिए कि क्या दूसरा कथन वह सामान्य नियम या कारण है जिससे पहला कथन निकलता है। यहाँ कथन I कहता है कि पृथ्वी और चंद्रमा के दो बल क्रिया-प्रतिक्रिया युग्म हैं, और कथन II ठीक वही नियम है जो किसी युग्म को क्रिया-प्रतिक्रिया युग्म बनाता है। दूसरे शब्दों में, कथन I के दावे का आधार ही कथन II है — कथन II हटा दीजिए और कथन I के पास अपनी बात कहने का कोई कारण नहीं बचता। इसकी तुलना उस स्थिति से कीजिए जहाँ यह विकल्प सही होता: मान लीजिए कथन I कहता कि चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है और कथन II कहता कि प्रत्येक क्रिया की बराबर प्रतिक्रिया होती है; दोनों सत्य होते, पर परिक्रमा का कारण तृतीय नियम नहीं, गुरुत्वाकर्षण का नियम और वृत्तीय गति है — तब स्पष्टीकरण न होने की बात बनती। इस प्रश्न में वैसी दूरी नहीं है, इसलिए यह विकल्प छूट जाता है।
- (c)कथन I सत्य है, किन्तु कथन II असत्य है — यह विकल्प कथन II को असत्य बताता है, अर्थात् न्यूटन के तृतीय नियम को ही नकारता है, और यह किसी भी परिस्थिति में टिकने वाली बात नहीं। विद्यार्थी इस नियम पर संदेह प्रायः दो ग़लतफ़हमियों के कारण करते हैं। पहली यह कि यदि क्रिया और प्रतिक्रिया बराबर तथा विपरीत हैं, तो वे एक-दूसरे को काट देंगी और कुछ भी हिलेगा नहीं। इसका उत्तर यह है कि दोनों बल एक ही पिंड पर नहीं, दो भिन्न पिंडों पर लगते हैं, इसलिए उनका जोड़ लगाने का प्रश्न ही नहीं उठता; किसी एक पिंड की गति उसी पर लगने वाले बलों से तय होती है। दूसरी ग़लतफ़हमी यह है कि प्रतिक्रिया क्रिया के बाद उत्पन्न होती है, मानो कोई क्रम हो। ऐसा नहीं है — दोनों एक ही क्षण में अस्तित्व में आते हैं और एक ही क्षण में समाप्त होते हैं; वे एक ही अन्योन्यक्रिया के दो पहलू हैं। इन दोनों भ्रमों के दूर होते ही यह विकल्प अपने आप गिर जाता है।
- (d)कथन I असत्य है, किन्तु कथन II सत्य है — यह विकल्प कथन I को असत्य बताता है। इस भ्रम का स्रोत यह धारणा है कि गुरुत्वाकर्षण एकतरफ़ा होता है — बड़ा पिंड छोटे को खींचता है, छोटा बड़े को नहीं। न्यूटन का सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण का नियम इसके ठीक विपरीत है और अपने रूप में ही सममित है: दो पिंडों के बीच लगने वाला बल उनके द्रव्यमानों के गुणनफल के समानुपाती और उनकी दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है, और यही एक व्यंजक दोनों पिंडों पर लगने वाले बल का परिमाण देता है। इसका सबसे परिचित प्रमाण हमारे सामने ही है — समुद्र में ज्वार-भाटा चंद्रमा द्वारा पृथ्वी पर लगाए गए गुरुत्वाकर्षण बल का ही परिणाम है, और वह बल यदि होता ही नहीं तो ज्वार भी न होता। दूसरा भ्रम यह है कि 'क्रिया' किसी बड़े या पहल करने वाले पिंड का बल होती है; ऐसा कोई नियम नहीं, दोनों नाम आपस में बदले जा सकते हैं। अतः कथन I सत्य है और यह विकल्प छूट जाता है।
अवधारणा
न्यूटन के गति के तीन नियम इस प्रश्न की पूरी पृष्ठभूमि हैं। पहला नियम जड़त्व का है — कोई वस्तु अपनी विराम या समान वेग वाली सरल-रेखीय गति की अवस्था तब तक बनाए रखती है जब तक उस पर कोई बाह्य असंतुलित बल न लगे। दूसरा नियम बल को संवेग के परिवर्तन की दर से जोड़ता है, और स्थिर द्रव्यमान की दशा में वही परिचित रूप ले लेता है जिसमें बल द्रव्यमान और त्वरण का गुणनफल होता है। तीसरा नियम बलों की प्रकृति के बारे में है और वही यहाँ कसौटी है: बल कभी अकेले नहीं आते, वे सदैव युग्म में आते हैं, और युग्म का प्रत्येक बल किसी एक पिंड पर नहीं, दो भिन्न पिंडों पर बँटा होता है। इस युग्म के तीन लक्षण याद रखने योग्य हैं — दोनों बल परिमाण में बराबर होते हैं, दिशा में विपरीत होते हैं, और एक ही प्रकार के होते हैं, अर्थात् यदि एक गुरुत्वाकर्षण बल है तो दूसरा भी गुरुत्वाकर्षण बल ही होगा। इसी से जुड़ा दूसरा स्तंभ सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण का नियम है, जो कहता है कि ब्रह्मांड का प्रत्येक कण प्रत्येक दूसरे कण को खींचता है, और यह खिंचाव उनके द्रव्यमानों के गुणनफल के समानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है। इस नियम का व्यंजक स्वयं सममित है — उसमें दोनों द्रव्यमान एक ही तरह आते हैं — इसलिए पृथ्वी चंद्रमा पर जितना बल लगाती है, चंद्रमा भी पृथ्वी पर उतना ही लगाता है। तृतीय नियम से संवेग-संरक्षण का नियम भी निकलता है, और यही कारण है कि टक्करों तथा राकेट की गति जैसे विषय इसी नियम से पढ़ाए जाते हैं।
इस प्रश्न का रूप भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितनी उसकी विषय-वस्तु। यह प्रश्न और इसके बाद वाला प्रश्न, दोनों एक ही निर्देश-खंड से शासित हैं, जो प्रश्न 91 के ऊपर एक बार छपा है और वहीं चारों कूट देता है; किसी भी प्रश्नांश के नीचे अलग से विकल्प नहीं छपे। इसलिए इन दो प्रश्नों को हल करने से पहले वह निर्देश-खंड पढ़ना अनिवार्य है, वरना विकल्पों का अर्थ ही स्पष्ट नहीं होगा। कूट की बनावट पर ध्यान दीजिए: पहली दो शाखाएँ दोनों कथनों को सत्य मानती हैं और केवल स्पष्टीकरण के प्रश्न पर बँटती हैं, तीसरी शाखा कहती है कि पहला सत्य और दूसरा असत्य है, चौथी कहती है कि पहला असत्य और दूसरा सत्य है। जो शाखा यहाँ नहीं है, वह यह है कि दोनों कथन असत्य हों। यह अनुपस्थिति स्वयं एक सूचना है और उसका उपयोग किया जाना चाहिए — दोनों प्रश्नांशों में कम से कम एक कथन सत्य अवश्य होगा। इस तरह के प्रश्न को हल करने का सुरक्षित क्रम यह है: पहले दोनों कथनों की सत्यता अलग-अलग जाँचिए, और तभी, जब दोनों सत्य निकलें, स्पष्टीकरण के प्रश्न पर आइए। जो अभ्यर्थी सीधे स्पष्टीकरण से शुरू करते हैं, वे प्रायः एक असत्य कथन को सत्य मान बैठते हैं, क्योंकि दो कथनों को जोड़ने वाली कोई कहानी मन में गढ़ लेना सरल होता है।
मुख्य तथ्य
- न्यूटन का तृतीय नियम कहता है कि प्रत्येक क्रिया की एक बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है; बल सदैव युग्म में आते हैं और अकेले कभी नहीं।
- क्रिया और प्रतिक्रिया के दोनों बल दो भिन्न पिंडों पर लगते हैं, एक ही पिंड पर नहीं, इसीलिए वे एक-दूसरे को निरस्त नहीं करते और गति संभव रहती है।
- दोनों बल एक ही क्षण में उत्पन्न होते हैं और एक ही क्षण में समाप्त होते हैं; उनमें पहले-बाद का कोई क्रम नहीं होता, वे एक ही अन्योन्यक्रिया के दो पहलू हैं।
- किसी युग्म में किसे क्रिया और किसे प्रतिक्रिया कहा जाए, यह केवल नामकरण की सुविधा है; दोनों नाम आपस में बदले जा सकते हैं और नियम पर कोई अंतर नहीं पड़ता।
- सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण का नियम अपने रूप में सममित है — बल दोनों द्रव्यमानों के गुणनफल के समानुपाती और दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है, इसलिए दोनों पिंडों पर बल का परिमाण एक ही होता है।
- बल बराबर होने पर भी त्वरण बराबर नहीं होते, क्योंकि त्वरण बल और द्रव्यमान के अनुपात से तय होता है; पृथ्वी का द्रव्यमान बहुत अधिक होने से उसका त्वरण नगण्य प्रतीत होता है।
- चंद्रमा द्वारा पृथ्वी पर लगाया गया गुरुत्वाकर्षण बल केवल सैद्धांतिक बात नहीं है — समुद्र का ज्वार-भाटा उसी बल का प्रत्यक्ष परिणाम है।
- इस प्रश्न के कूट में 'दोनों कथन असत्य हैं' वाली शाखा नहीं है, इसलिए इस निर्देश-खंड के दोनों प्रश्नांशों में कम से कम एक कथन सत्य अवश्य है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- यह मान लेना कि क्रिया और प्रतिक्रिया एक-दूसरे को काट देती हैं, इसलिए कोई गति संभव नहीं; वास्तव में वे दो भिन्न पिंडों पर लगती हैं और किसी एक पिंड की गति उसी पर लगने वाले बलों से तय होती है।
- यह समझना कि प्रतिक्रिया क्रिया के बाद उत्पन्न होती है; दोनों एक ही क्षण में अस्तित्व में आते हैं और एक साथ ही समाप्त होते हैं।
- गुरुत्वाकर्षण को एकतरफ़ा मान लेना — कि बड़ा पिंड छोटे को खींचता है पर छोटा बड़े को नहीं; नियम का व्यंजक दोनों पिंडों के लिए एक ही है।
- बलों के बराबर होने से त्वरणों के भी बराबर होने का निष्कर्ष निकाल लेना; त्वरण द्रव्यमान से भाग देने पर मिलता है, इसलिए भारी पिंड का त्वरण कम होता है।
- दो सत्य कथनों को देखकर सीधे यह मान लेना कि दूसरा पहले का स्पष्टीकरण है; जाँच यह है कि क्या दूसरा वह सामान्य नियम या कारण है जिससे पहला निकलता है।
- प्रश्न 91 के ऊपर छपा निर्देश-खंड न पढ़ना, जबकि उसी में चारों कूट हैं और वह प्रश्न 92 पर भी लागू होता है।
कथन I तथा कथन II वाले प्रश्न इस परीक्षा में नियमित रूप से आते हैं, और उनकी कठिनाई विषय में उतनी नहीं होती जितनी पद्धति में। सुरक्षित क्रम यह है कि पहले दोनों कथनों को अलग-अलग, एक-दूसरे से बिना जोड़े, सत्य या असत्य ठहराइए। यदि कोई एक असत्य निकल आया तो उत्तर वहीं तय हो जाता है और स्पष्टीकरण पर विचार करने की आवश्यकता ही नहीं रहती। दोनों सत्य निकलें, तभी दूसरा चरण आता है — यह पूछना कि क्या दूसरा कथन वह सामान्य नियम, कारण या क्रियाविधि है जिससे पहला कथन निकलता है। यहाँ एक उपयोगी परख यह है कि दूसरे कथन को हटाकर देखिए; यदि पहले कथन का आधार ही ढह जाए तो वह स्पष्टीकरण है, और यदि पहला कथन किसी तीसरे कारण से भी टिका रह जाए तो वह स्पष्टीकरण नहीं। विषय की दृष्टि से न्यूटन के नियम इस परीक्षा के सामान्य विज्ञान खंड के स्थायी विषय हैं, और वे प्रायः तीन रूपों में पूछे जाते हैं — नियम का कथन, नियम का कोई रोज़मर्रा का उदाहरण, अथवा किसी परिघटना का सही नियम से मिलान। इसलिए तीनों नियमों को उनके उदाहरणों सहित याद रखना, और यह जानना कि कौन-सी परिघटना किस नियम से समझाई जाती है, तैयारी का सबसे उपयोगी हिस्सा है।
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- (c)प्रतिक्रिया क्रिया के कुछ समय पश्चात् उत्पन्न होती है
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- (d)चंद्रमा पृथ्वी पर कोई गुरुत्वाकर्षण बल नहीं लगाता
उत्तर(c) दोनों बल परिमाण में बराबर हैं, पर पृथ्वी का त्वरण चंद्रमा के त्वरण से कम है