यह पूर्वधारणा कि ‘‘मनुष्य स्वार्थी और स्व-केन्द्रित है, और यहाँ तक कि वह दूसरों की कीमत पर भी हमेशा अपने स्वार्थों को पूरा करने का प्रयास करता है’’ श्रमिक कल्याण के किस सिद्धांत की व्याख्या करती है?
- (a)तुष्टीकरण सिद्धांत (प्लेकेटिंग थ्योरी)
- (b)पुलिस सिद्धांत
- (c)धार्मिक सिद्धांत
- (d)लोकोपकारी सिद्धांत
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) पुलिस सिद्धांत। प्रश्न में उद्धृत पूर्वधारणा को ध्यान से पढ़िए — मनुष्य स्वार्थी और स्व-केन्द्रित है और दूसरों की क़ीमत पर भी अपना स्वार्थ पूरा करने का प्रयास करता है। यह मनुष्य के स्वभाव के बारे में एक निराशावादी मान्यता है, और उससे एक ही निष्कर्ष निकलता है: यदि नियोक्ता को अपनी इच्छा पर छोड़ दिया जाए, तो वह कामगार को न्यूनतम सुविधाएँ भी स्वेच्छा से नहीं देगा, क्योंकि हर सुविधा उसकी लागत बढ़ाती है। अतः किसी बाहरी शक्ति को हस्तक्षेप करना पड़ेगा, जो नियम बनाए, उनका पालन करवाए और उल्लंघन पर दंड दे। यह बाहरी शक्ति राज्य है, और वह यहाँ ठीक पुलिस की भूमिका में आता है — इसीलिए इस सिद्धांत का नाम पुलिस सिद्धांत है। इसका व्यावहारिक रूप वही पूरा विधिक ढाँचा है जिसे आज हम सामान्य मानते हैं: फैक्टरी अधिनियम में स्वच्छता, प्रकाश, संवातन, पेयजल, शौचालय, कैंटीन और विश्राम-कक्ष जैसी अनिवार्य व्यवस्थाएँ; न्यूनतम मजदूरी की विधि से बाध्यकारी दरें; और इन सबके साथ निरीक्षकों की नियुक्ति, दंड के उपबंध तथा अभियोजन की व्यवस्था। ध्यान दीजिए कि इस सिद्धांत की पहचान केवल यह नहीं है कि उसमें राज्य आता है, बल्कि यह है कि उसमें कल्याण का स्रोत बाध्यता है, स्वेच्छा नहीं। यही उसे शेष तीनों विकल्पों से अलग करता है, क्योंकि उन तीनों में कल्याण नियोक्ता की अपनी किसी प्रेरणा से आता है — कहीं भय से, कहीं आस्था से और कहीं करुणा से। इसलिए उत्तर विकल्प (b) है। इस सिद्धांत का एक व्यावहारिक परिणाम भी है, जो इसे शेष सिद्धांतों से अलग करता है: चूँकि यहाँ कल्याण का स्रोत विधि है, इसलिए उसका स्तर सब प्रतिष्ठानों में लगभग समान रहता है और वह नियोक्ता की उदारता या कारोबार की स्थिति पर नहीं बदलता। शेष सिद्धांतों में मिलने वाला कल्याण असमान होता है, क्योंकि उसका आधार किसी की प्रेरणा है, किसी का दायित्व नहीं।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)तुष्टीकरण सिद्धांत (प्लेकेटिंग थ्योरी) — इस सिद्धांत में कल्याण-कार्य इसलिए किया जाता है कि कामगार शांत रहें। मान्यता यह है कि जब कामगार संगठित और जागरूक हो जाते हैं और अपनी माँगें ज़ोर से रखने लगते हैं, तब नियोक्ता कुछ सुविधाएँ देकर असंतोष को शांत करना चाहता है, ताकि आंदोलन, हड़ताल और टकराव से बचा जा सके। स्पष्ट है कि इसमें प्रेरणा दबाव है, पर वह दबाव राज्य का नहीं, कामगारों का अपना है — और यही इसे पुलिस सिद्धांत से अलग करता है। दूसरा अंतर यह है कि यहाँ कल्याण नियोक्ता स्वयं देता है, अपने विवेक से, इसलिए वह जितना चाहे उतना दे सकता है और जब चाहे रोक सकता है; पुलिस सिद्धांत में वह विधि से बाध्य होता है। यह विकल्प प्रश्न की पूर्वधारणा से भी मेल नहीं खाता, क्योंकि वह पूर्वधारणा मनुष्य के स्वभाव की बात कर रही है, कामगारों की संगठित शक्ति की नहीं।
- (c)धार्मिक सिद्धांत — इस सिद्धांत में कल्याण-कार्य आस्था से प्रेरित होता है। इसके दो पक्ष बताए जाते हैं — एक निवेश का, जिसमें व्यक्ति यह मानकर पुण्य-कार्य करता है कि उसका फल उसे आगे मिलेगा, और दूसरा प्रायश्चित का, जिसमें वह अपने किसी कर्म की भरपाई के रूप में कल्याण-कार्य करता है। भारत में दान, धर्मशाला, प्याऊ, विद्यालय और औषधालय जैसी अनेक व्यवस्थाएँ इसी प्रेरणा से बनी हैं, इसलिए यह सिद्धांत अपरिचित नहीं है। पर प्रश्न की पूर्वधारणा इस सिद्धांत के ठीक विपरीत छोर पर खड़ी है: वह मनुष्य को स्वार्थी बताती है, इसलिए उससे किसी आस्था-प्रेरित उदारता की अपेक्षा ही नहीं की जा सकती। जहाँ मान्यता ही यह हो कि व्यक्ति दूसरों की क़ीमत पर अपना स्वार्थ साधेगा, वहाँ समाधान बाध्यता में खोजा जाएगा, आस्था में नहीं।
- (d)लोकोपकारी सिद्धांत — यह सिद्धांत मानव-प्रेम और करुणा से प्रेरित है — नियोक्ता कामगार की कठिनाई देखकर द्रवित होता है और स्वेच्छा से उसकी दशा सुधारने के लिए कुछ करता है। औद्योगिक इतिहास में इसके प्रसिद्ध उदाहरण मिलते हैं, जहाँ कुछ उद्योगपतियों ने अपने कामगारों के लिए आवास, विद्यालय, चिकित्सालय और सहकारी भंडार बनवाए, और वह भी तब जब कोई विधि उन्हें ऐसा करने को बाध्य नहीं करती थी। यही तथ्य इस विकल्प को इस प्रश्न से बाहर कर देता है, क्योंकि प्रश्न की पूर्वधारणा मनुष्य को स्वार्थी बताती है और लोकोपकार की पूरी धारणा उसके विपरीत मान्यता पर टिकी है। इन दोनों को साथ रखकर देखना उपयोगी है: पुलिस सिद्धांत मनुष्य के स्वभाव पर अविश्वास करता है और लोकोपकारी सिद्धांत उस पर विश्वास; इसलिए एक बाध्यता चुनता है और दूसरा स्वेच्छा।
अवधारणा
श्रमिक कल्याण से आशय उन सेवाओं और सुविधाओं से है जो कामगार को मजदूरी के अतिरिक्त मिलती हैं और जिनका उद्देश्य उसके तथा उसके परिवार के जीवन-स्तर को बेहतर बनाना है — स्वच्छता, पेयजल, शौचालय, कैंटीन, विश्राम-कक्ष, प्राथमिक उपचार, शिशु-गृह, आवास, शिक्षा, मनोरंजन और सहकारी भंडार। इन्हें दो वर्गों में बाँटा जाता है: अंतःप्रतिष्ठान कल्याण, जो कार्यस्थल के भीतर मिलता है, और बाह्य-प्रतिष्ठान कल्याण, जो उसके बाहर। एक और वर्गीकरण इस आधार पर होता है कि सुविधा विधि से अनिवार्य है या स्वैच्छिक। इन्हीं सुविधाओं के पीछे कौन-सी प्रेरणा काम कर रही है, इसी प्रश्न से कल्याण के सिद्धांत बनते हैं, और उनकी परंपरागत सूची इस प्रकार है — पुलिस सिद्धांत, जिसमें राज्य बाध्य करता है; धार्मिक सिद्धांत, जिसमें आस्था प्रेरित करती है, चाहे निवेश के रूप में या प्रायश्चित के रूप में; लोकोपकारी सिद्धांत, जिसमें करुणा प्रेरित करती है; न्यासिता सिद्धांत, जिसमें नियोक्ता स्वयं को संपत्ति का न्यासी मानता है; तुष्टीकरण सिद्धांत, जिसमें असंतोष शांत करना उद्देश्य है; जनसंपर्क सिद्धांत, जिसमें संस्था की छवि बनाना उद्देश्य है; और कार्यात्मक सिद्धांत, जिसमें कल्याण को दक्षता तथा उत्पादकता बढ़ाने का साधन माना जाता है।
भारत में श्रमिक कल्याण का इतिहास इन्हीं सिद्धांतों का क्रमिक मिश्रण रहा है। आरंभिक दौर में कुछ नियोक्ताओं ने स्वेच्छा से कल्याण-कार्य किए, जिनके पीछे कहीं आस्था थी और कहीं करुणा। फिर श्रमिक संगठित हुए और तुष्टीकरण की प्रेरणा भी सक्रिय हुई। पर व्यापक और एकरूप कल्याण तभी आया जब राज्य ने विधि बनाकर उसे अनिवार्य किया — फैक्टरी अधिनियम, 1948 में स्वास्थ्य, सुरक्षा और कल्याण के अलग-अलग अध्याय हैं, जिनमें कैंटीन, विश्राम-कक्ष, भोजन-कक्ष, शिशु-गृह और कल्याण अधिकारी की नियुक्ति जैसी व्यवस्थाएँ आती हैं, और उनके साथ निरीक्षण तथा दंड की व्यवस्था भी। इसी प्रकार खान अधिनियम, बागान श्रम अधिनियम और अन्य विधियों में भी कल्याण के उपबंध हैं, और कुछ उद्योगों के लिए अलग कल्याण कोष भी बनाए गए हैं, जिनमें उपकर से धन आता है। इन सबको देखकर यह कहा जा सकता है कि आधुनिक भारत में कल्याण का मुख्य आधार पुलिस सिद्धांत ही है, यद्यपि दक्षता वाला कार्यात्मक तर्क भी नियोक्ताओं के अपने निर्णयों में लगातार दिखता है।
मुख्य तथ्य
- पुलिस सिद्धांत यह मानता है कि मनुष्य स्वार्थी है, इसलिए राज्य को विधि द्वारा नियोक्ता को न्यूनतम कल्याण देने के लिए बाध्य करना पड़ता है।
- इस सिद्धांत की पहचान यह है कि यहाँ कल्याण का स्रोत बाध्यता है, स्वेच्छा नहीं — और इसीलिए उसका स्तर सब प्रतिष्ठानों में लगभग समान रहता है।
- धार्मिक सिद्धांत में कल्याण आस्था से प्रेरित होता है, और उसके दो पक्ष बताए जाते हैं — निवेश का, जिसमें फल की अपेक्षा है, और प्रायश्चित का।
- लोकोपकारी सिद्धांत में प्रेरणा मानव-प्रेम और करुणा होती है; नियोक्ता कामगार की कठिनाई देखकर स्वेच्छा से उसकी दशा सुधारने का प्रयत्न करता है।
- तुष्टीकरण सिद्धांत में कल्याण जागरूक और संगठित कामगारों का असंतोष शांत करने के लिए दिया जाता है, ताकि आंदोलन और टकराव से बचा जा सके।
- न्यासिता सिद्धांत में नियोक्ता स्वयं को औद्योगिक संपत्ति का स्वामी नहीं, समाज तथा कामगारों के हित में उसका न्यासी मानता है।
- जनसंपर्क सिद्धांत में उद्देश्य संस्था की छवि बनाना होता है, जबकि कार्यात्मक सिद्धांत में कल्याण को दक्षता तथा उत्पादकता बढ़ाने का साधन माना जाता है।
- भारत में विधिक कल्याण की व्यवस्था फैक्टरी अधिनियम, 1948 तथा अन्य श्रम-विधियों में है, जिनके साथ निरीक्षण और दंड के उपबंध भी जुड़े हैं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- पुलिस सिद्धांत और तुष्टीकरण सिद्धांत को एक मान लेना; दोनों में दबाव है, पर एक में राज्य का और दूसरे में कामगारों का।
- ‘पुलिस’ शब्द को शब्दशः लेकर उसे अपराध या सुरक्षा से जोड़ लेना; यहाँ वह राज्य की प्रवर्तक भूमिका का रूपक है।
- प्रश्न में दी गई पूर्वधारणा को ध्यान से पढ़े बिना केवल कोई परिचित नाम देखकर विकल्प चुन लेना; उत्तर उसी पूर्वधारणा से निकलता है।
- न्यासिता, लोकोपकारी और धार्मिक सिद्धांतों को आपस में मिला देना; तीनों में प्रेरणा अलग है — कर्तव्य, करुणा और आस्था।
कल्याण के सिद्धांतों पर प्रश्न प्रायः इसी बनावट के होते हैं — कोई मान्यता, कोई उद्धरण या कोई उदाहरण देकर पूछ लिया जाता है कि वह किस सिद्धांत की व्याख्या करता है, और चारों विकल्प उसी सूची से आते हैं। ऐसे प्रश्न को हल करने की सबसे अच्छी कुंजी यह है कि हर सिद्धांत के साथ एक ही शब्द में उसकी प्रेरक शक्ति याद रखिए — पुलिस के साथ बाध्यता, धार्मिक के साथ आस्था, लोकोपकारी के साथ करुणा, न्यासिता के साथ कर्तव्य, तुष्टीकरण के साथ शांति ख़रीदना, जनसंपर्क के साथ छवि, और कार्यात्मक के साथ दक्षता। फिर प्रश्न में दिए गए कथन से भी उसी एक शब्द को निकालिए और दोनों को मिलाइए। यहाँ कथन कह रहा है कि मनुष्य पर भरोसा नहीं किया जा सकता, अर्थात् प्रेरक शक्ति बाध्यता ही हो सकती है — और वह केवल एक सिद्धांत की है। इस पद्धति से ऐसे प्रश्न बिना किसी परिभाषा को शब्दशः याद किए हल हो जाते हैं।
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