भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत ‘राज्य सूची’ में आने वाला बिन्दु निम्नलिखित में से कौन-सा है?
- (a)अपंगों और अनियोज्यों को सहायता
- (b)खदानों में श्रमिक और सुरक्षा का विनियमन
- (c)नमक के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण का व्यवस्थापन एवं नियंत्रण
- (d)सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) अपंगों और अनियोज्यों को सहायता। भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची विधायी विषयों को तीन सूचियों में बाँटती है — संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची — और अनुच्छेद 246 बताता है कि इन पर विधि बनाने की शक्ति किसके पास है। इस प्रश्न के चारों विकल्प इन्हीं तीन सूचियों में बिखरे हुए हैं, और उनमें से केवल एक राज्य सूची का है। ‘अपंगों और अनियोज्यों को सहायता’ राज्य सूची की प्रविष्टि है, और उसका राज्य सूची में होना तर्क-संगत भी है: यह विषय प्रत्यक्ष सामाजिक सहायता का है, जिसे उन्हीं लोगों तक पहुँचाना होता है जो राज्य के भीतर बसे हैं और जिनकी पहचान, जाँच तथा सहायता का काम स्थानीय प्रशासन ही कर सकता है। शेष तीन विकल्पों में से दो संघ सूची के हैं और एक समवर्ती सूची का, और तीनों का वहाँ होना भी अपने-अपने कारण से है, जो नीचे बताया गया है। यहाँ एक व्यापक बात ध्यान में रखिए, क्योंकि वह इस पूरे खंड में काम आती है: श्रम से जुड़े अधिकांश विषय समवर्ती सूची में हैं — ट्रेड यूनियन तथा औद्योगिक और श्रम विवाद, तथा श्रमिकों का कल्याण, जिसमें काम की दशाएँ, भविष्य निधि, नियोक्ता का दायित्व, कर्मकार प्रतिकर, अशक्तता तथा वृद्धावस्था पेंशन और प्रसूति प्रसुविधाएँ आती हैं। इसी कारण भारत में श्रम-विधियाँ केंद्र भी बनाता है और राज्य भी, और यही कारण है कि फैक्टरी अधिनियम तथा स्थायी आदेश अधिनियम जैसी केंद्रीय विधियों में राज्यों के अपने संशोधन और अपने नियम मिलते हैं। इसलिए उत्तर विकल्प (a) है। इस प्रश्न का एक और उपयोगी पक्ष है — वह दिखाता है कि एक ही क्षेत्र के विषय तीनों सूचियों में बिखरे हो सकते हैं। श्रम और सामाजिक सुरक्षा का अधिकांश भाग समवर्ती सूची में है, खानों का श्रम संघ सूची में, और अपंगों तथा अनियोज्यों की सहायता राज्य सूची में। इसी बिखराव के कारण भारत में एक ही विषय पर केंद्रीय विधि, राज्य-संशोधन और राज्य-नियम — तीनों साथ-साथ मिलते हैं।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)खदानों में श्रमिक और सुरक्षा का विनियमन — यह संघ सूची की प्रविष्टि है, राज्य सूची की नहीं — वहाँ यह खानों और तेल-क्षेत्रों में श्रम तथा सुरक्षा के विनियमन के रूप में आती है। यही इस विकल्प को सबसे कठिन बनाता है, क्योंकि श्रम का अधिकांश भाग तो समवर्ती सूची में है और सहज अनुमान यही कहता है कि खानों का श्रम भी वहीं होगा। पर खनन के लिए संविधान ने अलग व्यवस्था की है: खान और खनिज-विकास का विनियमन संघ सूची में रखा गया है, और उसी के साथ खानों में श्रम तथा सुरक्षा भी। इसका कारण व्यावहारिक है — खनन का काम अत्यंत जोखिम भरा है, उसकी तकनीकी मानक-व्यवस्था और निरीक्षण एक ही स्तर पर होना चाहिए, और खनिज-संपदा का राष्ट्रीय महत्त्व भी है। इसी से खान अधिनियम, 1952 जैसी केंद्रीय विधि और खान सुरक्षा महानिदेशालय जैसी केंद्रीय व्यवस्था निकलती है।
- (c)नमक के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण का व्यवस्थापन एवं नियंत्रण — यह भी संघ सूची की प्रविष्टि है। वहाँ यह इस रूप में आती है कि संघ की अभिकरणों द्वारा नमक का विनिर्माण, प्रदाय और वितरण, तथा अन्य अभिकरणों द्वारा किए जाने वाले ऐसे कार्यों का विनियमन और नियंत्रण, संघ के विषय हैं। नमक का संघ सूची में होना भारत के इतिहास से भी जुड़ा है, क्योंकि औपनिवेशिक काल में नमक पर कर और उसका एकाधिकार केंद्रीय विषय रहा था और वही व्यवस्था वर्गीकरण में आगे चली आई। इस प्रश्न में यह विकल्प इसलिए रखा गया है कि उसका विषय शेष तीनों से बिल्कुल भिन्न है और वह ध्यान बँटाता है — तीन विकल्प श्रम, कल्याण और सामाजिक सुरक्षा के हैं और चौथा एक वस्तु का। ऐसे अलग दिखने वाले विकल्प को कभी-कभी अभ्यर्थी इसी कारण उत्तर मान लेता है कि वह ‘अलग’ है, जो एक ख़तरनाक तर्क है।
- (d)सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा — यह समवर्ती सूची की प्रविष्टि है, जहाँ वह सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा तथा नियोजन और बेरोजगारी के रूप में आती है। इसका समवर्ती सूची में होना ही इस विकल्प को इस प्रश्न का सबसे निकट का प्रतिद्वंद्वी बनाता है, क्योंकि विषय की दृष्टि से वह विकल्प (a) से बहुत मिलता-जुलता है — दोनों ही किसी न किसी रूप में सहायता की बात करते हैं। भेद स्पष्ट रखिए: अपंगों और अनियोज्यों को सहायता प्रत्यक्ष सामाजिक सहायता है, जो राज्य देता है और जिसमें अंशदान की कोई व्यवस्था नहीं होती; जबकि सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा एक व्यापक विषय है, जिसमें अंशदायी योजनाएँ भी आती हैं और जिस पर केंद्र तथा राज्य दोनों विधि बना सकते हैं। कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम और भविष्य निधि से जुड़ी केंद्रीय विधियाँ इसी समवर्ती अधिकारिता से निकलती हैं।
अवधारणा
भारत का संघीय ढाँचा विधायी शक्तियों के बँटवारे पर टिका है और वह बँटवारा सातवीं अनुसूची में है। संघ सूची के विषयों पर संसद विधि बनाती है, राज्य सूची के विषयों पर राज्य विधानमंडल, और समवर्ती सूची के विषयों पर दोनों; टकराव की स्थिति में संसद की विधि प्रभावी होती है, यद्यपि कुछ शर्तों के साथ राज्य की विधि भी बच सकती है यदि उसे राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हो। जो विषय किसी सूची में नहीं हैं, उन पर विधि बनाने की अवशिष्ट शक्ति संसद के पास है। मूल संविधान में संघ सूची में सत्तानवे, राज्य सूची में छियासठ और समवर्ती सूची में सैंतालीस प्रविष्टियाँ थीं, और समय-समय पर संशोधनों से इनमें परिवर्तन होते रहे हैं। सबसे उल्लेखनीय परिवर्तन बयालीसवें संशोधन, 1976 से हुआ, जिसने पाँच विषय राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर दिए — शिक्षा; वन; नाप-तौल; वन्य जीव-जंतुओं और पक्षियों का संरक्षण; तथा न्याय-प्रशासन और उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालयों को छोड़कर सब न्यायालयों का गठन और संगठन।
श्रम और सामाजिक सुरक्षा का विषय इस बँटवारे में एक साथ तीनों सूचियों में फैला है, और यही इस क्षेत्र की विधियों की बहुलता का कारण है। समवर्ती सूची में ट्रेड यूनियन तथा औद्योगिक और श्रम विवाद हैं; श्रमिकों का कल्याण है, जिसमें काम की दशाएँ, भविष्य निधि, नियोक्ता का दायित्व, कर्मकार प्रतिकर, अशक्तता तथा वृद्धावस्था पेंशन और प्रसूति प्रसुविधाएँ आती हैं; तथा सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा, नियोजन और बेरोजगारी है। संघ सूची में खानों और तेल-क्षेत्रों में श्रम तथा सुरक्षा का विनियमन है, और संघ के कर्मचारियों से जुड़े औद्योगिक विवाद भी। राज्य सूची में अपंगों और अनियोज्यों को सहायता है। इस बिखराव का व्यावहारिक परिणाम यह है कि एक ही केंद्रीय विधि पर राज्यों के अपने नियम बनते हैं, और कई केंद्रीय विधियों में राज्य-संशोधन भी मिलते हैं। इसी बहुलता को कम करने के लिए बाद में केंद्रीय विधियों को कुछ संहिताओं में समेटने का प्रयास हुआ, जिनमें मजदूरी संहिता तथा सामाजिक सुरक्षा संहिता सम्मिलित हैं।
मुख्य तथ्य
- ‘अपंगों और अनियोज्यों को सहायता’ भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि है, अर्थात् उस पर विधि बनाने की शक्ति राज्य विधानमंडल के पास है।
- ‘खानों और तेल-क्षेत्रों में श्रम तथा सुरक्षा का विनियमन’ संघ सूची की प्रविष्टि है, क्योंकि खनन के तकनीकी मानक और निरीक्षण एक ही स्तर पर होने चाहिए।
- नमक के विनिर्माण, प्रदाय और वितरण से जुड़ा विषय भी संघ सूची में रखा गया है, और उसका ऐतिहासिक कारण औपनिवेशिक काल की केंद्रीय व्यवस्था में है।
- ‘सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा; नियोजन और बेरोजगारी’ समवर्ती सूची की प्रविष्टि है, इसलिए उस पर केंद्र और राज्य दोनों विधि बना सकते हैं।
- ट्रेड यूनियन तथा औद्योगिक और श्रम विवाद, और श्रमिकों का कल्याण — जिसमें काम की दशाएँ, भविष्य निधि और प्रसूति प्रसुविधाएँ आती हैं — दोनों समवर्ती सूची में हैं।
- अनुच्छेद 246 विधायी शक्तियों के बँटवारे की व्यवस्था करता है, और जो विषय किसी सूची में नहीं हैं उन पर अवशिष्ट शक्ति संसद के पास रहती है।
- मूल संविधान में संघ सूची में सत्तानवे, राज्य सूची में छियासठ और समवर्ती सूची में सैंतालीस प्रविष्टियाँ थीं, जिनमें संशोधनों से समय-समय पर परिवर्तन होते रहे हैं।
- बयालीसवें संशोधन, 1976 ने शिक्षा, वन, नाप-तौल, वन्य जीव-जंतुओं और पक्षियों का संरक्षण, तथा न्याय-प्रशासन को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित किया।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- श्रम का हर विषय समवर्ती सूची में मान लेना; खानों और तेल-क्षेत्रों में श्रम तथा सुरक्षा का विनियमन संघ सूची में रखा गया है।
- अपंगों और अनियोज्यों को सहायता को सामाजिक सुरक्षा के साथ मिला देना; पहला राज्य सूची में है और दूसरा समवर्ती सूची में।
- जो विकल्प विषय की दृष्टि से शेष तीनों से सबसे अलग दिखे, उसे ही उत्तर मान लेना; यह तर्क सूची-आधारित प्रश्नों में प्रायः भ्रामक निकलता है।
- संविधान की सातवीं अनुसूची को किसी अधिनियम की सातवीं अनुसूची के साथ मिला देना; हर विधान की अपनी अलग अनुसूचियाँ और अलग विषय होते हैं।
सातवीं अनुसूची पर प्रश्न इस भर्ती में लगातार आते हैं और वे प्रायः दो रूप लेते हैं — या तो चार विषय देकर पूछा जाता है कि कौन-सा किस सूची का है, जैसे यहाँ, या किसी एक विषय के बारे में पूछा जाता है कि वह किस सूची में आता है। दोनों के लिए एक ही तैयारी काम आती है: सूची की सब प्रविष्टियाँ रटने के बजाय अपने पाठ्यक्रम से जुड़े विषयों की एक छोटी सूची बनाइए और उसमें केवल वे प्रविष्टियाँ रखिए जो श्रम, सामाजिक सुरक्षा, उद्योग और वाणिज्य से जुड़ी हैं। साथ ही हर प्रविष्टि के पीछे का तर्क भी लिख लीजिए — कोई विषय संघ सूची में इसलिए है कि उसका राष्ट्रीय महत्त्व है या उसमें एकरूपता चाहिए; कोई राज्य सूची में इसलिए है कि उसका क्रियान्वयन स्थानीय है; और कोई समवर्ती सूची में इसलिए है कि उसमें दोनों की भूमिका है। तर्क याद रहे तो अनजान प्रविष्टि पर भी सही अनुमान लगाया जा सकता है, जो केवल स्मृति से संभव नहीं होता।
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