न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के अंतर्गत केन्द्रीय सरकार द्वारा संस्थापित केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में निम्नलिखित में से किसे नियुक्त किया जा सकता है?
- (a)बोर्ड के निर्दलीय सदस्यों में से कोई एक
- (b)बोर्ड के नियोक्ताओं के प्रतिनिधियों में से कोई एक
- (c)बोर्ड के कर्मचारियों के प्रतिनिधियों में से कोई एक
- (d)सरकार द्वारा मनोनीत केन्द्र सरकार का एक पदाधिकारी
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) बोर्ड के निर्दलीय सदस्यों में से कोई एक। न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 की धारा 8 केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड की व्यवस्था करती है। उसका प्रयोजन दो है — न्यूनतम मजदूरी दरों के निर्धारण तथा पुनरीक्षण के विषयों में केंद्र और राज्य सरकारों को सलाह देना, और राज्यों में बने सलाहकार बोर्डों के काम में समन्वय करना। उसकी संरचना उसी धारा में दी गई है और वही इस प्रश्न का उत्तर देती है: बोर्ड में अनुसूचित नियोजनों के नियोक्ताओं और कर्मचारियों के प्रतिनिधि होंगे, जिनकी संख्या बराबर होगी, तथा स्वतंत्र व्यक्ति होंगे, जिनकी संख्या बोर्ड के कुल सदस्यों के एक-तिहाई से अधिक नहीं होगी; और ऐसे स्वतंत्र व्यक्तियों में से एक को केंद्र सरकार अध्यक्ष नियुक्त करेगी। हिन्दी स्तंभ में इन्हीं स्वतंत्र सदस्यों के लिए ‘निर्दलीय’ शब्द छपा है। इस व्यवस्था का तर्क समझने योग्य है, क्योंकि उसी से यह नियम याद भी रह जाता है। बोर्ड त्रिपक्षीय है और उसमें दोनों हितबद्ध पक्ष जान-बूझकर बराबर संख्या में रखे गए हैं, ताकि कोई पक्ष संख्या-बल से दूसरे पर भारी न पड़े। अब यदि अध्यक्ष भी इन्हीं दोनों में से किसी एक पक्ष का हो, तो वह संतुलन टूट जाएगा, क्योंकि अध्यक्ष के पास बैठक चलाने और प्रायः निर्णायक मत देने का अधिकार होता है। इसलिए अध्यक्ष का तीसरी, तटस्थ श्रेणी से होना आवश्यक है — और वही तीसरी श्रेणी स्वतंत्र सदस्यों की है। यही व्यवस्था इस अधिनियम के अंतर्गत बनने वाली समितियों, उप-समितियों तथा राज्य के सलाहकार बोर्ड के लिए भी है। अतः उत्तर विकल्प (a) है। इसी तर्क से यह भी समझ लीजिए कि स्वतंत्र सदस्यों की संख्या पर एक-तिहाई की सीमा क्यों रखी गई है। यदि यह सीमा न होती तो बोर्ड में तटस्थ विशेषज्ञ बहुमत में आ सकते थे और वह त्रिपक्षीय निकाय के बजाय विशेषज्ञों की समिति बन जाता। सीमा उसे त्रिपक्षीय बनाए रखती है, और अध्यक्ष का उसी श्रेणी से होना उसे निष्पक्ष।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)बोर्ड के नियोक्ताओं के प्रतिनिधियों में से कोई एक — यह विकल्प ठीक उस संतुलन को तोड़ता है जिसके लिए बोर्ड की संरचना बनायी गई है। अधिनियम नियोक्ताओं और कर्मचारियों के प्रतिनिधियों को बराबर संख्या में रखता है; यदि अध्यक्ष भी नियोक्ताओं में से हो, तो एक पक्ष को अतिरिक्त प्रभाव मिल जाएगा और वह बोर्ड की तटस्थता समाप्त कर देगा। यहाँ यह भी ध्यान रखिए कि इस बोर्ड का काम सलाह देना है, और सलाह की विश्वसनीयता उसके तटस्थ दिखने पर भी निर्भर करती है — न्यूनतम मजदूरी सीधे नियोक्ता की लागत और कर्मचारी की आय दोनों को छूती है, इसलिए यहाँ पक्षपात की आशंका सबसे अधिक रहती है। इस विकल्प और अगले विकल्प को साथ रखकर देखिए तो प्रश्न की चाल स्पष्ट हो जाती है: दोनों एक ही ढाँचे के हैं और केवल एक शब्द में भिन्न हैं, जिससे अभ्यर्थी इन्हीं दोनों के बीच चुनाव करने लगता है और तीसरी श्रेणी को भूल जाता है।
- (c)बोर्ड के कर्मचारियों के प्रतिनिधियों में से कोई एक — यह विकल्प पिछले विकल्प का दर्पण-प्रतिबिंब है और उसी कारण से ग़लत है। कर्मचारियों के प्रतिनिधि बोर्ड में हितबद्ध पक्ष के रूप में बैठते हैं, तटस्थ के रूप में नहीं; उनका काम अपने पक्ष की बात रखना है, और वह पूरी तरह वैध है — पर वही उन्हें अध्यक्ष-पद के अयोग्य बनाता है। अधिनियम ने अध्यक्ष के लिए स्वतंत्र सदस्यों की श्रेणी इसीलिए रखी है। एक व्यावहारिक बात और जान लीजिए: स्वतंत्र सदस्य प्रायः वे लोग होते हैं जिनका न नियोक्ता पक्ष से संबंध होता है न कर्मचारी पक्ष से — जैसे अर्थशास्त्री, श्रम-विशेषज्ञ अथवा सार्वजनिक जीवन के तटस्थ व्यक्ति — और उनकी संख्या कुल सदस्यों के एक-तिहाई से अधिक नहीं रखी जाती, ताकि बोर्ड का त्रिपक्षीय स्वरूप बना रहे और वह विशेषज्ञों का निकाय बनकर न रह जाए।
- (d)सरकार द्वारा मनोनीत केन्द्र सरकार का एक पदाधिकारी — यह विकल्प इसलिए विश्वसनीय लगता है कि बोर्ड की नियुक्ति करती ही केंद्र सरकार है, इसलिए यह मान लेना स्वाभाविक लगता है कि अध्यक्ष भी सरकार का ही कोई अधिकारी होगा — और अनेक सरकारी समितियों में ऐसा होता भी है। पर यह अधिनियम अध्यक्ष के लिए एक विशिष्ट शर्त रखता है: वह स्वतंत्र सदस्यों में से ही होगा। इसलिए ‘सरकार का पदाधिकारी’ कहकर बनाया गया यह विकल्प अधिनियम की उस शर्त का उत्तर नहीं देता। ऐसे प्रश्नों में यही सबसे उपयोगी सावधानी है — अधिनियम जिस श्रेणी का नाम लेता है, विकल्प भी उसी श्रेणी का होना चाहिए; कोई ऐसी श्रेणी, जो सुनने में उचित लगे पर अधिनियम में हो ही नहीं, उत्तर नहीं बन सकती। नियुक्ति कौन करता है और नियुक्त कौन होगा, ये दो अलग प्रश्न हैं और यह विकल्प दोनों को मिला देता है।
अवधारणा
न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 का मूल विचार यह है कि कुछ नियोजनों में कामगार की सौदेबाज़ी की शक्ति इतनी कमज़ोर होती है कि बाज़ार उसे जीवन-निर्वाह लायक़ मजदूरी भी नहीं दिला पाता; ऐसे नियोजनों को अधिनियम की अनुसूची में रखकर उनके लिए न्यूनतम दरें विधि से तय की जाती हैं। यह काम समुचित सरकार करती है और उसके लिए अधिनियम दो पद्धतियाँ देता है। पहली, समिति पद्धति, जिसमें सरकार जाँच के लिए समितियाँ और उप-समितियाँ नियुक्त करती है और उनकी सलाह पर दर तय करती है। दूसरी, अधिसूचना पद्धति, जिसमें सरकार अपने प्रस्ताव राजपत्र में प्रकाशित करके प्रभावित व्यक्तियों से आपत्तियाँ और सुझाव माँगती है और तब निर्णय करती है। दोनों पद्धतियों को जोड़ने वाला निकाय सलाहकार बोर्ड है, और उसके ऊपर, समन्वय के लिए, केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड है। इस पूरे ढाँचे की एक ही स्थापत्य-शैली है: हर निकाय त्रिपक्षीय होगा, दोनों हितबद्ध पक्ष बराबर संख्या में होंगे, स्वतंत्र सदस्य एक-तिहाई से अधिक नहीं होंगे, और अध्यक्ष उन्हीं स्वतंत्र सदस्यों में से होगा।
इस अधिनियम की कुछ और बातें परीक्षा में साथ-साथ पूछी जाती हैं, इसलिए उन्हें एक साथ रखना उपयोगी है। न्यूनतम मजदूरी दर में केवल मूल दर हो सकती है, या मूल दर के साथ जीवन-निर्वाह लागत भत्ता, या फिर सब कुछ मिलाकर एक समावेशी दर; रियायती दर पर दी जाने वाली आवश्यक वस्तुओं का नक़द मूल्य भी उसमें जोड़ा जा सकता है। दरें अलग-अलग नियोजनों, अलग-अलग वर्गों के कामगारों, अलग-अलग क्षेत्रों तथा काम की अलग-अलग अवधियों के लिए भिन्न-भिन्न तय की जा सकती हैं। एक बार तय की गई दरों का पुनरीक्षण पाँच वर्ष से अधिक के अंतराल पर नहीं होना चाहिए। अधिनियम की अनुसूची के दो भाग हैं — पहले में ग़ैर-कृषि नियोजन और दूसरे में कृषि — और सरकार उसमें नए नियोजन जोड़ भी सकती है। यह भी जान लीजिए कि यह अधिनियम आगे चलकर मजदूरी संहिता, 2019 में समाहित कर दिया गया, जिसने मजदूरी से जुड़ी कई पुरानी विधियों को एक साथ ला दिया — और इसी कारण नए प्रश्नों में इस अधिनियम का उल्लेख प्रायः उसके साथ आता है।
मुख्य तथ्य
- न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 की धारा 8 केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड की व्यवस्था करती है, जिसे केंद्र सरकार नियुक्त करती है।
- उसका प्रयोजन है न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण तथा पुनरीक्षण पर सरकारों को सलाह देना और सलाहकार बोर्डों के काम में समन्वय करना।
- बोर्ड में अनुसूचित नियोजनों के नियोक्ताओं और कर्मचारियों के प्रतिनिधि नामनिर्दिष्ट किए जाते हैं, और दोनों की संख्या बराबर रखी जाती है।
- स्वतंत्र सदस्यों की संख्या बोर्ड के कुल सदस्यों के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती, जिससे उसका त्रिपक्षीय स्वरूप बना रहता है।
- अध्यक्ष इन्हीं स्वतंत्र सदस्यों में से केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है, ताकि किसी हितबद्ध पक्ष को अतिरिक्त प्रभाव न मिले।
- यही संरचना इस अधिनियम के अंतर्गत बनने वाली समितियों, उप-समितियों और राज्य के सलाहकार बोर्ड पर भी लागू होती है, इसलिए नियम एक ही बार सीखना पर्याप्त है।
- न्यूनतम मजदूरी तय करने की दो पद्धतियाँ हैं — समिति पद्धति, जिसमें जाँच के लिए समितियाँ बनती हैं, और अधिसूचना पद्धति, जिसमें प्रस्ताव प्रकाशित करके आपत्तियाँ माँगी जाती हैं।
- तय की गई दरों का पुनरीक्षण पाँच वर्ष से अधिक के अंतराल पर नहीं होना चाहिए, और अधिनियम की अनुसूची के दो भाग हैं — ग़ैर-कृषि और कृषि।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- अध्यक्ष को नियोक्ता या कर्मचारी पक्ष से मान लेना; अधिनियम अध्यक्ष के लिए स्वतंत्र सदस्यों की श्रेणी निर्धारित करता है।
- यह मान लेना कि नियुक्ति सरकार करती है तो अध्यक्ष भी सरकारी अधिकारी होगा; नियुक्ति करने वाला और नियुक्त होने वाला दो अलग प्रश्न हैं।
- स्वतंत्र सदस्यों पर लगी एक-तिहाई वाली सीमा भूल जाना; वही सीमा बोर्ड का त्रिपक्षीय स्वरूप बनाए रखती है और उसे विशेषज्ञ-समिति बनने से रोकती है।
- सलाहकार बोर्ड और केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड को एक मान लेना; दूसरा समन्वय के लिए है और उसे केंद्र सरकार नियुक्त करती है।
श्रम-विधियों में गठित निकायों की संरचना पर प्रश्न इस भर्ती में नियमित रूप से आते हैं और वे प्रायः चार बातों में से किसी एक पर केंद्रित होते हैं — निकाय की नियुक्ति कौन करता है, उसमें कौन-कौन बैठता है, अध्यक्ष कहाँ से आएगा, और किसी वर्ग की संख्या पर क्या सीमा है। इसलिए हर निकाय के लिए ये चार बातें एक साथ नोट कीजिए; अलग-अलग याद रखने पर वे आपस में मिल जाती हैं, क्योंकि श्रम-विधियों के अधिकांश निकाय एक ही ढाँचे पर बने हैं। यहाँ ढाँचा त्रिपक्षीय है और उसका मूल तर्क संतुलन का है — दो हितबद्ध पक्ष बराबर, तीसरा तटस्थ, और अध्यक्ष तटस्थ श्रेणी से। यह तर्क याद रहे तो नियम भी याद रहता है, और तब अध्यक्ष वाला प्रश्न किसी भी अधिनियम के बारे में पूछा जाए, उत्तर लगभग सदा तटस्थ श्रेणी की ओर जाता है। दूसरी सावधानी विकल्पों की बनावट को लेकर है: यहाँ दो विकल्प केवल एक शब्द में भिन्न हैं, और उन्हीं के बीच उलझ जाना सबसे बड़ी भूल है — तीसरी श्रेणी को देखना ही उत्तर है।
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