श्रमिक की ‘नागरिक संकल्पना’ निम्नलिखित में से किसके द्वारा वर्णित होती है?
- (a)उद्योग में नियोक्ताओं द्वारा श्रमिक को मुख्यतः परिचालन संगठनों के रूप में समझा जाता है।
- (b)माँग और आपूर्ति के सिद्धांत से श्रमिक प्रभावित होता है।
- (c)श्रमिक को यह अधिकार है कि जिन निबंधनों और शर्तों के अंतर्गत उसे काम करना है, उनके संबंध में उससे परामर्श किया जाए।
- (d)श्रमिक, मशीन में एक पुर्जा है।
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) श्रमिक को यह अधिकार है कि जिन निबंधनों और शर्तों के अंतर्गत उसे काम करना है, उनके संबंध में उससे परामर्श किया जाए। ‘नागरिक संकल्पना’ का पूरा भाव उसके नाम में ही छिपा है। नागरिक वह होता है जिसके पास किसी समुदाय में केवल कर्तव्य ही नहीं, अधिकार भी होते हैं — विशेषतः उन निर्णयों में आवाज़ का अधिकार जो उस पर लागू होते हैं। यही धारणा जब उद्योग पर लगायी जाती है, तो कामगार को कारखाने की उस लघु-राजनीति का नागरिक माना जाता है जिसमें वह काम करता है; और उसका सबसे बुनियादी अधिकार यह ठहरता है कि जिन शर्तों पर उसे काम करना है, वे उस पर एकपक्षीय रूप से थोपी न जाएँ, बल्कि उनके बारे में उससे परामर्श किया जाए। विकल्प (c) ठीक यही कहता है, इसलिए वही उत्तर है। इस संकल्पना का महत्त्व यह है कि वह मजदूरी या सुविधा की माँग से आगे बढ़कर प्रक्रिया की बात करती है — कितना मिले यह अलग प्रश्न है, पर यह तय करने की प्रक्रिया में कामगार सम्मिलित हो या नहीं, यह उससे बड़ा प्रश्न है। इसी विचार से आगे चलकर वे सब संस्थाएँ निकलती हैं जिन्हें आज हम सामान्य मानते हैं: सामूहिक सौदेबाज़ी, शिकायत-निवारण की व्यवस्था, कदाचार के आरोप में सुनवाई का अवसर, और प्रबंधन में भागीदारी वाली समितियाँ। ध्यान दीजिए कि इसी पेपर में यह विचार दो और स्थानों पर लौटता है — प्रश्न 71 में भागीदारी की समितियों के रूप में और प्रश्न 78 में संविधान के उस अनुच्छेद के रूप में जो प्रबंध में भागीदारी की बात करता है। इस संकल्पना का ऐतिहासिक महत्त्व भी समझ लीजिए। जब तक कामगार को केवल उत्पादन का साधन माना जाता रहा, तब तक उसकी सेवा-शर्तें नियोक्ता की इच्छा से तय होती रहीं। नागरिक संकल्पना ने इस प्रश्न को ही बदल दिया — उसने पूछा कि जिस व्यवस्था में कोई जीवन भर काम करता है, उसमें उसकी आवाज़ क्यों न हो; और वही प्रश्न आगे चलकर विधि और संस्थाओं का रूप ले गया।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)उद्योग में नियोक्ताओं द्वारा श्रमिक को मुख्यतः परिचालन संगठनों के रूप में समझा जाता है। — यह कथन श्रमिक को नियोक्ता की दृष्टि से देखता है और उसे उद्योग चलाने वाले तंत्र का एक अंग बताता है। इसमें कहीं भी कामगार के किसी अधिकार, किसी आवाज़ या किसी परामर्श की बात नहीं है — केवल यह है कि उसे किस रूप में देखा जाता है। नागरिक संकल्पना की कसौटी ठीक यही है कि उसमें अधिकार का उल्लेख हो, और वह इस कथन में अनुपस्थित है, इसलिए यह विकल्प नहीं बनता। इस प्रश्न के चारों विकल्पों को इसी एक कसौटी पर परखिए: तीन कथन यह बताते हैं कि श्रमिक को किस रूप में देखा जाता है, और केवल एक कथन यह बताता है कि उसे क्या अधिकार प्राप्त है। जो अधिकार की बात करता है, वही नागरिक संकल्पना है।
- (b)माँग और आपूर्ति के सिद्धांत से श्रमिक प्रभावित होता है। — यह श्रमिक की वस्तु-संकल्पना का कथन है, नागरिक संकल्पना का नहीं। उस संकल्पना में श्रम को बाज़ार में बिकने वाली किसी और वस्तु की तरह देखा जाता है, जिसका मूल्य माँग और आपूर्ति से तय होता है — माँग अधिक हो तो मजदूरी बढ़े, श्रमिक अधिक हों तो घटे। यह दृष्टि उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभिक औद्योगिक चिंतन में प्रबल थी और उसी के विरुद्ध आगे चलकर सबसे तीखी प्रतिक्रिया हुई। इसी पेपर के प्रश्न 72 में फिलाडेल्फिया घोषणा का पहला सिद्धांत आया है — श्रमिक एक वस्तु नहीं है — जो सीधे इसी संकल्पना का खंडन है। यह विकल्प इसीलिए रखा गया है कि दोनों संकल्पनाएँ एक ही सूची की सदस्य हैं और परीक्षा उन्हें आपस में बदलकर पूछती है। भेद सरल है: यह कथन क़ीमत की बात करता है, नागरिक संकल्पना आवाज़ की।
- (d)श्रमिक, मशीन में एक पुर्जा है। — यह यंत्र-संकल्पना का कथन है, जिसमें कामगार को उत्पादन-तंत्र का एक निर्वैयक्तिक अंग माना जाता है — जैसे मशीन का कोई पुर्जा, जो घिस जाने पर बदल दिया जाता है। यह दृष्टि उस युग की उपज है जब उत्पादन को केवल दक्षता के प्रश्न के रूप में देखा जाता था और कामगार की भावनाओं, सामाजिक संबंधों तथा अभिप्रेरणा को अप्रासंगिक समझा जाता था। इसी दृष्टि की सीमाओं से आगे चलकर मानवीय संबंधों वाला दृष्टिकोण निकला, जिसने यह दिखाया कि उत्पादकता केवल कार्य-पद्धति से नहीं, कार्य-समूह और अभिप्रेरणा से भी तय होती है। पर इस प्रश्न के लिए इतना ही पर्याप्त है कि इस कथन में भी कोई अधिकार नहीं है, केवल एक उपमा है — और उपमा नागरिक की नहीं, यंत्र की है, जो नागरिक संकल्पना के ठीक विपरीत छोर पर खड़ी है।
अवधारणा
श्रमिक के बारे में प्रबंधन-चिंतन में कई संकल्पनाएँ चलती रही हैं और उन्हें एक क्रम में रखकर देखना सबसे उपयोगी है, क्योंकि वह क्रम स्वयं ही औद्योगिक संबंधों का इतिहास बता देता है। सबसे पहले वस्तु-संकल्पना आती है, जिसमें श्रम की क़ीमत माँग और आपूर्ति से तय होती है। फिर यंत्र-संकल्पना, जिसमें कामगार उत्पादन-तंत्र का एक निर्वैयक्तिक पुर्जा है। फिर सद्भावना और पितृवत् संकल्पनाएँ, जिनमें नियोक्ता कामगार का ध्यान रखता है — पर अपनी इच्छा से, कर्तव्य के रूप में नहीं। फिर मानवीय संकल्पना, जिसमें कामगार को भावनाओं, आवश्यकताओं और गरिमा वाला मनुष्य माना जाता है। फिर नागरिक संकल्पना, जिसमें उसे उद्योग के समुदाय का सदस्य मानकर अधिकार दिए जाते हैं, विशेषतः परामर्श का अधिकार। और अंत में भागीदार संकल्पना, जिसमें उसे उद्यम का साझीदार माना जाता है और लाभ तथा निर्णय दोनों में हिस्सा दिया जाता है। ध्यान दीजिए कि इस क्रम में एक निर्णायक मोड़ है — पहले चार संकल्पनाओं में सब कुछ नियोक्ता की दृष्टि और उसकी उदारता पर निर्भर है, जबकि अंतिम दो में कामगार का दावा अधिकार बन जाता है।
यह विषय केवल सैद्धांतिक नहीं है; इन संकल्पनाओं की छाया विधि और संस्थाओं में स्पष्ट दिखती है। वस्तु-संकल्पना का खंडन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 1944 की फिलाडेल्फिया घोषणा में हुआ, जिसका पहला ही सिद्धांत कहता है कि श्रमिक एक वस्तु नहीं है; इसी से यह निष्कर्ष निकला कि मजदूरी और काम की दशाएँ केवल बाज़ार पर नहीं छोड़ी जा सकतीं और उनके लिए न्यूनतम मानक विधि से तय करने होंगे। नागरिक संकल्पना की छाया भारत में कई जगह दिखती है — औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 में, जो सेवा-शर्तों को लिखित और ज्ञात बनाता है और उन्हें सत्यापित कराते समय कामगारों को सुनवाई का अवसर देता है; औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की कार्य समिति में; और संविधान के उस निदेशक तत्त्व में जो प्रबंध में कामगारों की भागीदारी की बात करता है। इस प्रकार जो बात एक सैद्धांतिक संकल्पना के रूप में आरंभ हुई, वह क्रमशः प्रक्रिया और अधिकार में बदल गई — और परीक्षा प्रायः इसी कड़ी को जोड़ने की अपेक्षा करती है।
मुख्य तथ्य
- नागरिक संकल्पना कामगार को उद्योग के समुदाय का सदस्य मानती है और उसे अधिकार देती है, विशेषतः सेवा-शर्तों पर परामर्श किए जाने का अधिकार।
- वस्तु-संकल्पना में श्रम को बाज़ार में बिकने वाली किसी और वस्तु की तरह देखा जाता है, जिसका मूल्य पूरी तरह माँग और आपूर्ति से तय होता है।
- यंत्र-संकल्पना में कामगार को उत्पादन-तंत्र का एक निर्वैयक्तिक अंग माना जाता है, जैसे मशीन का कोई पुर्जा, जो घिस जाने पर बदल दिया जाता है।
- मानवीय संकल्पना कामगार को भावनाओं, आवश्यकताओं और गरिमा वाला मनुष्य मानती है, और उसी से मानवीय संबंधों वाला प्रबंधन-दृष्टिकोण निकलता है।
- भागीदार संकल्पना में कामगार को उद्यम का साझीदार माना जाता है और उसे निर्णय तथा लाभ दोनों में हिस्सा दिया जाता है; यह इस क्रम की सबसे ऊपरी सीढ़ी है।
- पहली कुछ संकल्पनाओं में सब कुछ नियोक्ता की उदारता पर निर्भर है, जबकि नागरिक और भागीदार संकल्पना में कामगार का दावा अधिकार बन जाता है।
- फिलाडेल्फिया घोषणा का पहला सिद्धांत — श्रमिक एक वस्तु नहीं है — वस्तु-संकल्पना का सीधा और सुविचारित खंडन है, और उसी से न्यूनतम मानकों का तर्क निकलता है।
- नागरिक संकल्पना की व्यावहारिक उपज हैं सामूहिक सौदेबाज़ी, शिकायत-निवारण की व्यवस्था, कदाचार के आरोप में सुनवाई का अवसर, और भागीदारी की समितियाँ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- वस्तु-संकल्पना और नागरिक संकल्पना को आपस में बदल देना; पहली श्रम की क़ीमत की बात करती है और दूसरी कामगार की आवाज़ की।
- कामगार के प्रति उदारता वाले कथन को अधिकार वाला कथन मान लेना; नागरिक संकल्पना में दावा अधिकार का है, उदारता का नहीं।
- उपमा वाले कथनों को गंभीरता से न पढ़ना; ‘मशीन में एक पुर्जा’ जैसा छोटा वाक्य पूरी संकल्पना का सार होता है और उसी से श्रेणी पहचानी जाती है।
- इन संकल्पनाओं को औद्योगिक संबंधों के परिप्रेक्ष्यों के साथ मिला देना; दोनों अलग वर्गीकरण हैं, यद्यपि दोनों के निष्कर्ष एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
इस प्रकार के प्रश्न में विकल्प पूरे वाक्य होते हैं, इसलिए उन्हें पढ़ने में समय लगता है और जल्दबाज़ी में कोई परिचित वाक्यांश देखकर हाथ चल जाता है। इससे बचने का सबसे अच्छा उपाय यह है कि प्रश्न में दी गई संकल्पना का एक शब्द में सार निकाल लीजिए, और फिर चारों वाक्यों में वही शब्द खोजिए। यहाँ संकल्पना ‘नागरिक’ की है और नागरिक का सार अधिकार है; अतः उस वाक्य को खोजिए जिसमें अधिकार की बात हो — वह केवल एक है। यही पद्धति दूसरी संकल्पनाओं पर भी चलती है: वस्तु का सार क़ीमत है, यंत्र का सार निर्वैयक्तिकता, भागीदार का सार हिस्सेदारी। दूसरी उपयोगी आदत यह है कि इस पूरे परिवार को एक ही पृष्ठ पर, एक ही क्रम में लिखकर याद रखिए, क्योंकि परीक्षा इसी सूची में से कोई एक उठाकर पूछती है और शेष तीन विकल्प भी उसी सूची से आते हैं।
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