केन्द्रीय स्तर पर कार्य करने वाला सांविधिक तंत्र निम्नलिखित में से कौन-सा है?
- (a)केन्द्रीय क्रियान्वयन और मूल्यांकन समिति
- (b)केन्द्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड
- (c)स्थायी श्रमिक समिति
- (d)कर्मचारी राज्य बीमा निगम
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) कर्मचारी राज्य बीमा निगम। प्रश्न में दो शर्तें हैं और दोनों एक साथ पूरी होनी चाहिए — तंत्र सांविधिक हो, अर्थात् किसी अधिनियम से सृजित हो, और वह केन्द्रीय स्तर पर काम करता हो। दूसरी शर्त चारों विकल्प पूरी करते हैं, क्योंकि चारों केन्द्रीय स्तर के निकाय हैं; इसलिए निर्णय पहली शर्त पर होगा। सांविधिक निकाय की पहचान बहुत सरल है: उसके लिए कोई अधिनियम और उस अधिनियम की कोई धारा बतायी जा सकती है जिससे वह अस्तित्व में आया। यहाँ केवल एक विकल्प इस जाँच पर खरा उतरता है — कर्मचारी राज्य बीमा निगम, जो कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 की धारा 3 से स्थापित होता है; वही धारा उसे निगमित निकाय बनाती है, जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होती है, और जो अपने नाम से वाद ला सकता है तथा जिस पर वाद लाया जा सकता है। शेष तीन में से किसी के लिए ऐसा कोई अधिनियम और ऐसी कोई धारा नहीं बतायी जा सकती; वे प्रशासनिक निर्णय, संकल्प अथवा पंजीकरण से बने निकाय हैं। इसी कारण उत्तर विकल्प (d) है। एक बात नाम के बारे में भी जान लीजिए, क्योंकि परीक्षा में वह लौटती है: इस निकाय का अंग्रेज़ी नाम बहुवचन सम्बन्धकारक के साथ Employees’ State Insurance Corporation है — अर्थात् वह किसी एक कर्मचारी का नहीं, सब कर्मचारियों का बीमा है। इस पुस्तिका का अंग्रेज़ी स्तंभ यहाँ उसे एकवचन में छापता है, जबकि इसी पेपर के प्रश्न 87 में वही नाम बहुवचन में छपा है; सही रूप बहुवचन वाला ही है। इस हिन्दी स्तंभ में यह भेद नहीं दिखता, क्योंकि यहाँ नाम ‘कर्मचारी राज्य बीमा निगम’ है। ध्यान दीजिए कि इस प्रश्न में ‘सांविधिक’ शब्द ही पूरा भार उठा रहा है। यदि प्रश्न केवल यह पूछता कि कौन-सा निकाय केन्द्रीय स्तर पर श्रम-नीति में भूमिका निभाता है, तो चारों उत्तर बनते; पर वह उनके विधिक दर्जे की बात कर रहा है, और वह दर्जा केवल अधिनियम से आता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)केन्द्रीय क्रियान्वयन और मूल्यांकन समिति — यह निकाय किसी अधिनियम से सृजित नहीं है, और यही इसे इस प्रश्न से बाहर कर देता है। इसका काम, जैसा नाम से ही स्पष्ट है, समीक्षा और मूल्यांकन का है — यह देखना कि श्रम से जुड़े निर्णय और विधियाँ व्यवहार में कहाँ तक लागू हुईं। ऐसी समितियाँ सरकार अपने प्रशासनिक निर्णय से गठित करती है और उन्हें आवश्यकता के अनुसार पुनर्गठित या समाप्त भी कर सकती है; किसी अधिनियम में संशोधन किए बिना ऐसा करना संभव होता है, और यही उनका सांविधिक निकायों से सबसे बड़ा भेद है। सांविधिक निकाय को समाप्त करने या उसकी संरचना बदलने के लिए विधायिका को अधिनियम में संशोधन करना पड़ता है। परीक्षा में यही भेद बार-बार जाँचा जाता है, इसलिए किसी भी निकाय के बारे में यह प्रश्न पूछने की आदत डालिए कि उसके पीछे कोई अधिनियम है या केवल एक आदेश।
- (b)केन्द्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड — यह बोर्ड 1958 में स्थापित हुआ और सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत एक सोसाइटी के रूप में पंजीकृत है — अर्थात् वह पंजीकरण से बना है, किसी विशेष अधिनियम से सृजित नहीं। यह भेद बारीक है पर निर्णायक: सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम किसी विशेष निकाय की स्थापना नहीं करता, वह केवल यह व्यवस्था करता है कि लोग चाहें तो अपनी सोसाइटी पंजीकृत करा सकें; इसलिए उसके अंतर्गत पंजीकृत निकाय सांविधिक नहीं कहलाता। यह श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त त्रिपक्षीय निकाय है, इसका मुख्यालय नागपुर में है, और यह देश भर के क्षेत्रीय तथा उप-क्षेत्रीय निदेशालयों के माध्यम से कामगारों की शिक्षा और प्रशिक्षण का काम करता है; इसे सरकार से सहायता-अनुदान मिलता है। आगे चलकर इसका नाम बदलकर दत्तोपंत ठेंगड़ी राष्ट्रीय श्रमिक शिक्षा एवं विकास बोर्ड कर दिया गया।
- (c)स्थायी श्रमिक समिति — यह समिति भारत की त्रिपक्षीय परामर्शी व्यवस्था का अंग है, जिसका शीर्ष निकाय भारतीय श्रम सम्मेलन है। इस व्यवस्था में सरकार, नियोक्ता और कामगार तीनों के प्रतिनिधि बैठते हैं और श्रम-नीति के प्रश्नों पर विचार करते हैं; समिति प्रायः उन विषयों पर विचार करती है जो सम्मेलन उसे सौंपे, और आगे की चर्चा के लिए आधार तैयार करती है। इसका महत्त्व नीति-निर्माण में बहुत रहा है, क्योंकि अनेक श्रम-विधियों और योजनाओं की रूपरेखा पहले इसी मंच पर बनी। पर महत्त्व और सांविधिक दर्जा दो अलग बातें हैं। यह समिति किसी अधिनियम से नहीं, सरकार के निर्णय से बनी है, इसलिए वह परामर्शी है और उसकी संस्तुतियाँ बाध्यकारी नहीं होतीं। प्रश्न ‘सांविधिक तंत्र’ पूछ रहा है, इसलिए यह विकल्प नहीं बनता।
अवधारणा
निकायों को उनके स्रोत के अनुसार तीन श्रेणियों में रखिए, तो ऐसे प्रश्न बिना अनुमान के निकल जाते हैं। संवैधानिक निकाय वे हैं जिनका उल्लेख संविधान में ही है, जैसे निर्वाचन आयोग, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक, संघ लोक सेवा आयोग और वित्त आयोग; इनकी संरचना या शक्तियाँ बदलने के लिए प्रायः संविधान संशोधन की आवश्यकता होती है। सांविधिक निकाय वे हैं जो संसद या राज्य विधानमंडल के किसी अधिनियम से सृजित होते हैं; इन्हें बदलने के लिए उसी अधिनियम में संशोधन करना पड़ता है, और कर्मचारी राज्य बीमा निगम इसी श्रेणी का है। तीसरी श्रेणी उन निकायों की है जो कार्यपालिका के आदेश, संकल्प अथवा किसी सामान्य विधि के अंतर्गत पंजीकरण से बनते हैं; इन्हें कार्यपालक या ग़ैर-सांविधिक निकाय कहा जाता है, और सरकार उन्हें अपेक्षाकृत सरलता से पुनर्गठित कर सकती है। ध्यान रखिए कि तीसरी श्रेणी का निकाय कम महत्त्वपूर्ण नहीं होता — भारत की त्रिपक्षीय परामर्शी व्यवस्था ने श्रम-नीति को गहराई से प्रभावित किया है — पर उसका आधार विधि नहीं, प्रशासनिक निर्णय होता है।
कर्मचारी राज्य बीमा निगम भारत की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था का सबसे पुराना बड़ा स्तंभ है। कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 स्वतंत्रता के बाद बना पहला बड़ा सामाजिक सुरक्षा विधान था, और उसकी योजना का वास्तविक शुभारंभ 1952 में कानपुर और दिल्ली से हुआ। यह योजना अंशदायी है — नियोक्ता और कर्मचारी दोनों निर्धारित दरों पर अंशदान करते हैं, जिन्हें सरकार समय-समय पर अधिसूचित करती है — और उसके बदले बीमित व्यक्ति तथा उसके आश्रितों को अनेक प्रसुविधाएँ मिलती हैं: चिकित्सा प्रसुविधा, बीमारी प्रसुविधा, प्रसूति प्रसुविधा, नि:शक्तता प्रसुविधा, आश्रितजन प्रसुविधा और अंत्येष्टि व्यय। इनमें चिकित्सा प्रसुविधा वस्तु-रूप में दी जाती है, अर्थात् नक़द के स्थान पर उपचार के रूप में, और यही इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता है; इसी पेपर का प्रश्न 87 उसी बात पर बना है। निगम के भीतर भी कई निकाय अधिनियम से ही बनते हैं — स्थायी समिति, जो उसकी कार्यकारी शाखा की तरह काम करती है, और चिकित्सा प्रसुविधा परिषद, जो चिकित्सा से जुड़े विषयों पर सलाह देती है। निगम का अध्यक्ष केंद्रीय श्रम मंत्री होते हैं और उसमें केंद्र तथा राज्य सरकारों, नियोक्ताओं, कर्मचारियों, चिकित्सा व्यवसाय और संसद के प्रतिनिधि सम्मिलित होते हैं।
मुख्य तथ्य
- कर्मचारी राज्य बीमा निगम कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 की धारा 3 के अंतर्गत स्थापित होता है और वही धारा उसे शाश्वत उत्तराधिकार तथा सामान्य मुद्रा वाला निगमित निकाय बनाती है।
- यही उसे सांविधिक बनाता है — उसके लिए एक अधिनियम और उस अधिनियम की एक धारा दोनों बतायी जा सकती हैं, जो शेष तीन विकल्पों के लिए संभव नहीं है।
- केन्द्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड 1958 में स्थापित हुआ और सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत पंजीकृत सोसाइटी है, इसलिए सांविधिक नहीं है।
- उसका मुख्यालय नागपुर में है, वह श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अधीन स्वायत्त त्रिपक्षीय निकाय है, और आगे चलकर उसका नाम दत्तोपंत ठेंगड़ी राष्ट्रीय श्रमिक शिक्षा एवं विकास बोर्ड कर दिया गया।
- स्थायी श्रमिक समिति भारत की त्रिपक्षीय परामर्शी व्यवस्था का अंग है, जिसका शीर्ष निकाय भारतीय श्रम सम्मेलन है; वह सरकार के निर्णय से बनी है, किसी अधिनियम से नहीं।
- कर्मचारी राज्य बीमा योजना का वास्तविक शुभारंभ 1952 में कानपुर और दिल्ली से हुआ, और उसके बाद वह क्रमशः देश के अन्य भागों तक फैली।
- यह योजना अंशदायी है — नियोक्ता और कर्मचारी दोनों निर्धारित दरों पर अंशदान करते हैं, और उन दरों को सरकार समय-समय पर अधिसूचित करती है।
- अधिनियम से ही निगम के भीतर दो और निकाय बनते हैं — स्थायी समिति, जो कार्यकारी शाखा की तरह काम करती है, और चिकित्सा प्रसुविधा परिषद, जो चिकित्सा के विषयों पर सलाह देती है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- किसी निकाय के महत्त्व को उसका सांविधिक दर्जा मान लेना; परामर्शी निकाय बहुत प्रभावशाली हो सकता है, फिर भी सांविधिक नहीं होता।
- सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत निकाय को सांविधिक मान लेना; वह अधिनियम किसी विशेष निकाय की स्थापना नहीं करता।
- त्रिपक्षीय होने को सांविधिक होने का प्रमाण मान लेना; अनेक त्रिपक्षीय निकाय केवल सरकार के निर्णय से बने होते हैं और उनका कोई जनक अधिनियम नहीं होता।
- ‘केन्द्रीय’ शब्द देखकर विकल्प चुन लेना; प्रश्न में केन्द्रीय स्तर वाली शर्त चारों विकल्प पूरी करते हैं, इसलिए निर्णय केवल दूसरी शर्त पर होगा।
निकायों के दर्जे पर बने प्रश्न EPFO की भर्तियों में लगातार आते हैं और उनकी बनावट प्रायः यही रहती है — चार परिचित नाम, जिनमें से एक अधिनियम से बना होता है और शेष तीन प्रशासनिक व्यवस्था से। ऐसे प्रश्न को हल करने का एक ही भरोसेमंद तरीका है: हर नाम के सामने यह पूछिए कि इसके लिए कोई अधिनियम और उसकी कोई धारा बतायी जा सकती है या नहीं। यदि हाँ, तो वह सांविधिक है। इसी कारण तैयारी करते समय हर बड़े निकाय के साथ उसका जनक अधिनियम भी लिख लेना चाहिए — कर्मचारी राज्य बीमा निगम के साथ 1948 का अधिनियम, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के केंद्रीय न्यासी बोर्ड के साथ 1952 का अधिनियम, इसी प्रकार आगे। इस पेपर में यह विषय दो बार लौटता है, क्योंकि प्रश्न 87 भी इसी निगम के जनक अधिनियम पर आधारित है। एक अंतिम सावधानी: निकायों के नाम लंबे और मिलते-जुलते होते हैं, इसलिए उन्हें पूरा पढ़िए — ‘बोर्ड’, ‘समिति’, ‘परिषद’ और ‘निगम’ चारों अलग-अलग प्रकार के निकाय हैं और उनका दर्जा भी प्रायः अलग होता है।
संबंधित PYQ
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- (a) the Employees’ State Insurance Act, 1948
- (b) the Factories Act, 1948
- (c) the Maternity Benefit Act, 1961
- (d) the Mines Act, 1952
उत्तर(a) the Employees’ State Insurance Act, 1948
इसी पेपर का प्रश्न 87 पूछता है कि वस्तु-रूप में चिकित्सा प्रसुविधा भारत में पहली बार किस अधिनियम के अंतर्गत मिली — उसी निगम का जनक अधिनियम।
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इसी पेपर का प्रश्न 71 कार्य समिति और अन्य द्विपक्षीय निकायों पर है, जिनसे त्रिपक्षीय परामर्शी निकायों का भेद यहाँ काम आता है।
अभ्यास
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कर्मचारी राज्य बीमा निगम की स्थापना निम्नलिखित में से किस अधिनियम के अंतर्गत, एक निगमित निकाय के रूप में की गई है?
- (a)फैक्टरी अधिनियम, 1948
- (b)कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948
- (c)कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923
- (d)कर्मचारी भविष्य निधि तथा प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952
उत्तर(b) कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948
- practice — not a real PYQ
भारतीय श्रम सम्मेलन और स्थायी श्रम समिति भारत की श्रम-व्यवस्था में किस प्रकार के निकाय माने जाते हैं?
- (a)संवैधानिक निकाय
- (b)सांविधिक निकाय
- (c)त्रिपक्षीय परामर्शी निकाय, जो सांविधिक नहीं हैं
- (d)न्यायिक निकाय
उत्तर(c) त्रिपक्षीय परामर्शी निकाय, जो सांविधिक नहीं हैं