निम्नलिखित में से कौन-सा एक, मजदूर संघ सुरक्षा मापदंड नहीं है?
- (a)संघ-पाबंद प्रतिष्ठान प्रणाली
- (b)हित-शुल्क प्रतिष्ठान प्रणाली
- (c)संघमुक्त प्रतिष्ठान प्रणाली
- (d)संघ-समर्थित प्रतिष्ठान प्रणाली
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) संघमुक्त प्रतिष्ठान प्रणाली। यह निषेधात्मक प्रश्न है और उसका ‘नहीं’ मोटे टाइप में छपा है, इसलिए पूछा यह जा रहा है कि कौन-सी व्यवस्था संघ-सुरक्षा का उपाय नहीं है। पहले यह देखिए कि संघ-सुरक्षा का अर्थ क्या है। किसी संघ की सबसे बड़ी चिंता यह रहती है कि उसकी सदस्यता बनी रहे और उसका कोष चलता रहे, क्योंकि सौदेबाज़ी की उसकी सारी शक्ति इन्हीं दो पर टिकी है; इसलिए संघ नियोक्ता के साथ हुए समझौते में ऐसी शर्तें रखवाना चाहता है जो सदस्यता को स्थिर कर दें। ऐसी शर्तों को संघ-सुरक्षा के उपाय कहा जाता है। इस कसौटी पर चारों विकल्पों को रखिए। संघ-पाबंद व्यवस्था में नियोक्ता केवल संघ के सदस्यों को ही काम पर रखने के लिए सहमत होता है, अर्थात् सदस्यता नौकरी की पूर्व-शर्त बन जाती है — यह सुरक्षा का सबसे कड़ा रूप है। संघ-समर्थित व्यवस्था में नियोक्ता किसी को भी नियुक्त कर सकता है, पर नियुक्त व्यक्ति को निर्धारित अवधि के भीतर संघ का सदस्य बनना और बने रहना होता है — यह कुछ ढीला रूप है। हित-शुल्क वाली व्यवस्था में कामगार को संघ का सदस्य बनना आवश्यक नहीं, पर उसे संघ को एक शुल्क देना पड़ता है, क्योंकि संघ सौदेबाज़ी सबके लिए करता है और उसका लाभ ग़ैर-सदस्यों को भी मिलता है — यह कोष की सुरक्षा है। पर संघमुक्त व्यवस्था में न सदस्यता की शर्त है, न कोई शुल्क; रोजगार सबके लिए खुला है और कोई भी कामगार संघ से बाहर रहकर काम कर सकता है। यह संघ को कोई सुरक्षा नहीं देती, बल्कि उसकी अनुपस्थिति ही है। इसीलिए उत्तर विकल्प (c) है। इस पूरे परिवार को एक सीढ़ी की तरह देखिए, तो वह और स्पष्ट हो जाता है। सबसे कड़ा रूप संघ-पाबंद व्यवस्था है, जिसमें सदस्यता नौकरी की पूर्व-शर्त है; उससे नरम संघ-समर्थित व्यवस्था, जिसमें वह नौकरी बनाए रखने की शर्त है; उससे भी नरम हित-शुल्क वाली व्यवस्था, जिसमें केवल शुल्क देना है; और उससे भी नरम अधिमानी व्यवस्था, जिसमें केवल वरीयता मिलती है। संघमुक्त व्यवस्था इस सीढ़ी का पायदान नहीं, उसका न होना है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)संघ-पाबंद प्रतिष्ठान प्रणाली — यह संघ-सुरक्षा का सबसे कड़ा रूप है, इसलिए यह इस निषेधात्मक प्रश्न का उत्तर नहीं हो सकता। इसमें नियोक्ता यह वचन देता है कि वह केवल संघ के सदस्यों को ही काम पर रखेगा; अर्थात् संघ की सदस्यता नौकरी पाने की पूर्व-शर्त है और सदस्यता समाप्त होते ही नौकरी भी संकट में पड़ सकती है। इससे संघ को दो लाभ मिलते हैं — सदस्यता स्वतः बनी रहती है, और नियुक्ति की प्रक्रिया पर उसका प्रभाव बढ़ जाता है। इसी कारण अनेक देशों में इस रूप को अत्यधिक कठोर माना गया और विधि द्वारा उस पर रोक भी लगायी गई, क्योंकि वह उस व्यक्ति की रोजगार-स्वतंत्रता सीमित कर देता है जो किसी संघ में नहीं जाना चाहता। पर प्रश्न यह नहीं पूछ रहा कि कौन-सा उपाय उचित है; वह केवल यह पूछ रहा है कि कौन-सा उपाय संघ-सुरक्षा का नहीं है।
- (b)हित-शुल्क प्रतिष्ठान प्रणाली — यह भी संघ-सुरक्षा का ही एक रूप है और इसका तर्क विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। इस व्यवस्था में कामगार को संघ का सदस्य बनने के लिए बाध्य नहीं किया जाता, पर उसे संघ को एक निर्धारित शुल्क देना पड़ता है। इसका कारण यह है कि जब संघ सामूहिक सौदेबाज़ी करता है, तो उससे हुए समझौते का लाभ प्रतिष्ठान के सब कामगारों को मिलता है, चाहे वे सदस्य हों या न हों; ऐसे में जो सदस्य नहीं है वह बिना अंशदान दिए लाभ उठाता रहेगा और धीरे-धीरे सदस्यता का कोई आकर्षण नहीं बचेगा। यह शुल्क उसी असंतुलन को ठीक करता है। ध्यान दीजिए कि यहाँ सुरक्षा सदस्यता की नहीं, कोष की है — और संघ के लिए कोष भी उतना ही आवश्यक है, क्योंकि सौदेबाज़ी, मुक़दमेबाज़ी और हड़ताल तीनों में धन लगता है।
- (d)संघ-समर्थित प्रतिष्ठान प्रणाली — यह भी संघ-सुरक्षा का उपाय है, इसलिए यह उत्तर नहीं है। यह संघ-पाबंद व्यवस्था का कुछ नरम रूप है: नियोक्ता नियुक्ति में स्वतंत्र रहता है और किसी को भी काम पर रख सकता है, पर नियुक्त होने के बाद उस व्यक्ति को एक निर्धारित अवधि के भीतर संघ का सदस्य बनना पड़ता है और नौकरी की अवधि तक सदस्य बने रहना पड़ता है। इस प्रकार सदस्यता नियुक्ति की पूर्व-शर्त नहीं, पर नौकरी बनाए रखने की शर्त अवश्य बन जाती है। संघ के लिए यह व्यावहारिक रूप से लगभग उतना ही उपयोगी है जितना संघ-पाबंद व्यवस्था, क्योंकि अंततः प्रतिष्ठान के सब कामगार सदस्य हो ही जाते हैं। इसी परिवार में सदस्यता का अनुरक्षण नाम की एक और व्यवस्था भी आती है, जिसमें जो पहले से सदस्य हैं उन्हें समझौते की अवधि तक सदस्य बने रहना होता है।
अवधारणा
संघ-सुरक्षा की धारणा को समझने के लिए संघ की दो बुनियादी आवश्यकताएँ देखिए — सदस्य और धन। दोनों में उतार-चढ़ाव आता रहता है, क्योंकि कामगार आते-जाते हैं, कुछ संघ से नाराज़ हो जाते हैं, और कुछ अंशदान देने से बचना चाहते हैं। यदि सदस्यता अस्थिर हो तो नियोक्ता के साथ मोल-भाव करते समय संघ का दावा कमज़ोर पड़ जाता है, क्योंकि वह यह नहीं कह पाता कि वह कितने कामगारों का प्रतिनिधित्व करता है। इसी अस्थिरता को कम करने के लिए संघ नियोक्ता से समझौते में कुछ शर्तें रखवाता है, और उन्हीं शर्तों को संघ-सुरक्षा के उपाय कहते हैं। इनके प्रमुख रूप हैं — संघ-पाबंद प्रतिष्ठान, संघ-समर्थित प्रतिष्ठान, अधिमानी प्रतिष्ठान, जिसमें नियुक्ति में संघ के सदस्यों को वरीयता मिलती है, हित-शुल्क वाली व्यवस्था, सदस्यता का अनुरक्षण, और चेक-ऑफ़, जिसमें नियोक्ता कामगार की मजदूरी में से संघ का शुल्क काटकर सीधे संघ को भेज देता है। इन सबका उद्देश्य एक ही है: संघ को अपनी शक्ति बार-बार सिद्ध करने की चिंता से मुक्त करके सौदेबाज़ी पर ध्यान देने योग्य बनाना।
इन व्यवस्थाओं के साथ एक स्थायी तनाव जुड़ा है, और परीक्षा में उसकी भी अपेक्षा रहती है। एक ओर संघ की सामूहिक शक्ति है, जिसके बिना अकेला कामगार नियोक्ता के सामने मोल-भाव कर ही नहीं सकता; दूसरी ओर व्यक्ति की स्वतंत्रता है, जिसमें किसी संगठन में सम्मिलित न होने की स्वतंत्रता भी सम्मिलित है। कड़े रूप, विशेषतः संघ-पाबंद व्यवस्था, इस दूसरी स्वतंत्रता को बहुत सीमित कर देते हैं, इसलिए अनेक देशों में उन पर विधिक प्रतिबंध लगे और अपेक्षाकृत नरम रूप ही चलन में रहे। भारत में यह विषय दो कारणों से कम विकसित रहा। पहला, यहाँ बहु-संघवाद है, अर्थात् एक ही प्रतिष्ठान में कई संघ होते हैं, इसलिए किसी एक संघ की अनिवार्य सदस्यता की शर्त व्यावहारिक ही नहीं बनती। दूसरा, संघ की मान्यता के लिए यहाँ कोई एकरूप केंद्रीय विधान नहीं रहा और मान्यता प्रायः राज्य के नियमों अथवा सत्यापन की पद्धति से तय होती रही। इसी कारण भारत में संघ की शक्ति का प्रश्न प्रायः मान्यता के प्रश्न के रूप में सामने आता है, संघ-सुरक्षा की शर्तों के रूप में नहीं।
मुख्य तथ्य
- संघ-सुरक्षा के उपाय वे शर्तें हैं जिन्हें संघ नियोक्ता के साथ हुए समझौते में रखवाता है, ताकि उसकी सदस्यता और उसका कोष दोनों स्थिर बने रहें।
- संघमुक्त प्रतिष्ठान प्रणाली में न सदस्यता की कोई शर्त होती है न कोई शुल्क, इसलिए वह संघ को कोई सुरक्षा नहीं देती — वह उसकी अनुपस्थिति ही है।
- संघ-पाबंद प्रणाली में नियोक्ता केवल संघ के सदस्यों को ही काम पर रखने के लिए सहमत होता है, अर्थात् सदस्यता नौकरी पाने की पूर्व-शर्त बन जाती है।
- संघ-समर्थित प्रणाली में नियोक्ता किसी को भी नियुक्त कर सकता है, पर नियुक्त व्यक्ति को निर्धारित अवधि के भीतर संघ का सदस्य बनना और नौकरी की अवधि तक बने रहना पड़ता है।
- हित-शुल्क वाली प्रणाली में सदस्यता अनिवार्य नहीं, पर संघ को शुल्क देना पड़ता है, क्योंकि सौदेबाज़ी का लाभ सबको मिलता है।
- अधिमानी प्रतिष्ठान वाली व्यवस्था में नियुक्ति के समय संघ के सदस्यों को वरीयता दी जाती है, यद्यपि ग़ैर-सदस्य को नियुक्त करने पर रोक नहीं होती।
- सदस्यता के अनुरक्षण वाली व्यवस्था में जो कामगार पहले से संघ के सदस्य हैं, उन्हें समझौते की पूरी अवधि तक सदस्य बने रहना होता है।
- चेक-ऑफ़ की व्यवस्था में नियोक्ता कामगार की मजदूरी में से संघ का शुल्क काटकर सीधे संघ को भेज देता है, जिससे संघ का कोष नियमित बना रहता है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- ‘संघमुक्त’ शब्द को संघ से जुड़ा कोई उपाय समझ लेना; वह वस्तुतः संघ-सुरक्षा की अनुपस्थिति है, इसीलिए वही इस प्रश्न का उत्तर बनता है।
- संघ-पाबंद और संघ-समर्थित व्यवस्था को एक मान लेना; पहली में सदस्यता नियुक्ति की पूर्व-शर्त है, दूसरी में नियुक्ति के बाद की।
- हित-शुल्क वाली व्यवस्था को इसलिए बाहर कर देना कि उसमें सदस्यता अनिवार्य नहीं; वह कोष की सुरक्षा करती है।
- प्रश्न के मोटे ‘नहीं’ को पढ़कर भी उत्तर में सबसे कड़ा या सबसे परिचित उपाय चुन लेना; निषेधात्मक प्रश्न में परिचय ही सबसे बड़ा जाल होता है।
इस पेपर में निषेधात्मक प्रश्न सत्रह हैं और उनमें दोनों प्रकार की बनावट मिलती है — कहीं चारों विकल्प एक ही परिवार के होते हैं और एक बाहर का, और कहीं तीन सही कथन होते हैं और एक बदला हुआ। यहाँ पहली बनावट है: चारों विकल्पों का अंत ‘प्रतिष्ठान प्रणाली’ पर होता है और भेद केवल पहले शब्द में है, इसलिए आँख जल्दी में उन्हें एक जैसा पढ़ सकती है। ऐसे प्रश्न में सबसे सुरक्षित तरीका यह है कि हर विकल्प के सामने मन में एक ही प्रश्न रखिए — क्या इससे संघ को कुछ मिलता है? यदि हाँ, तो वह सुरक्षा का उपाय है; यदि नहीं, तो वही उत्तर है। यह कसौटी तीनों उपायों को एक साथ पहचान लेती है और चौथे को अलग कर देती है, बिना किसी परिभाषा को शब्दशः याद किए। दूसरी सावधानी यह है कि निषेधात्मक प्रश्न में विकल्प चुनने के बाद एक बार प्रश्न-वाक्य पर लौटकर ‘नहीं’ को फिर पढ़ लीजिए; इस पुस्तिका में वह मोटे टाइप में है, इसलिए यह जाँच एक क्षण में हो जाती है।
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संघ-सुरक्षा की किस व्यवस्था में नियोक्ता किसी को भी नियुक्त कर सकता है, पर नियुक्त व्यक्ति को निर्धारित अवधि के भीतर संघ का सदस्य बनना और बने रहना होता है?
- (a)संघ-पाबंद प्रतिष्ठान प्रणाली
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उत्तर(b) संघ-समर्थित प्रतिष्ठान प्रणाली
- practice — not a real PYQ
वह व्यवस्था जिसमें नियोक्ता कामगार की मजदूरी में से संघ का शुल्क काटकर सीधे संघ को भेज देता है, क्या कहलाती है?
- (a)चेक-ऑफ़
- (b)अधिमानी प्रतिष्ठान
- (c)संघमुक्त प्रतिष्ठान
- (d)सदस्यता का अनुरक्षण
उत्तर(a) चेक-ऑफ़