उद्योगों के प्रबंधन में कामगारों की सहभागिता का उपबंध किसके अन्तर्गत दिया गया है?
- (a)भारत के संविधान का अनुच्छेद 39A
- (b)भारत के संविधान का अनुच्छेद 43A
- (c)भारत के संविधान का अनुच्छेद 42
- (d)भारत के संविधान का अनुच्छेद 43B
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) भारत के संविधान का अनुच्छेद 43A। यह अनुच्छेद राज्य की नीति के निदेशक तत्त्वों में आता है और उसका शीर्षक ही उसका विषय बता देता है — उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों का भाग लेना। उसमें कहा गया है कि राज्य उपयुक्त विधान द्वारा अथवा किसी अन्य रीति से ऐसे क़दम उठाएगा जिससे किसी उद्योग में लगे हुए उपक्रमों, स्थापनों या अन्य संगठनों के प्रबंध में कर्मकारों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके। इसमें दो बातें ध्यान देने योग्य हैं। पहली, यह भागीदारी किसी एक रूप में बाँधी नहीं गई है — ‘उपयुक्त विधान अथवा किसी अन्य रीति से’ कहकर राज्य को खुला छोड़ दिया गया है, इसीलिए भारत में भागीदारी कभी विधिक निकाय के रूप में आई, जैसे कार्य समिति, और कभी स्वैच्छिक योजना के रूप में, जैसे संयुक्त प्रबंधन परिषद। दूसरी, यह अनुच्छेद निदेशक तत्त्व है, इसलिए किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं है; उसका बल नैतिक और राजनीतिक है, और वह शासन के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत का काम करता है। यह अनुच्छेद मूल संविधान में नहीं था; इसे संविधान के बयालीसवें संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया, उसी संशोधन ने अनुच्छेद 39A और 48A भी इसी भाग में जोड़े। इस हिन्दी स्तंभ में चारों विकल्प ‘भारत के संविधान का अनुच्छेद’ से आरंभ होते हैं और संख्या अंत में आती है, इसलिए विकल्प को अंत तक पढ़ना ही निर्णायक है — भेद केवल अंतिम अक्षरों में है। इसी कारण उत्तर विकल्प (b) है। इस अनुच्छेद की सीमा भी जान लीजिए, क्योंकि परीक्षा उसे भी पूछती है। निदेशक तत्त्व होने के कारण यह किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं है, इसलिए कोई कामगार केवल इसके आधार पर प्रबंध में स्थान नहीं माँग सकता। उसका बल इस बात में है कि वह राज्य को दिशा देता है और उसके आधार पर बनी विधियों तथा योजनाओं को संवैधानिक समर्थन प्राप्त हो जाता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)भारत के संविधान का अनुच्छेद 39A — अनुच्छेद 39A समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता से संबंधित है। उसमें कहा गया है कि राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक तंत्र इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो, और विशेष रूप से यह कि किसी नागरिक को आर्थिक या अन्य निर्योग्यताओं के कारण न्याय पाने के अवसर से वंचित न रहना पड़े, इसके लिए वह उपयुक्त विधान या योजनाओं द्वारा निःशुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा। इसी निदेशक तत्त्व की परिणति आगे चलकर विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम और लोक अदालतों की व्यवस्था में हुई। यह विकल्प इसलिए भ्रम पैदा करता है कि 39A भी उसी बयालीसवें संशोधन से जोड़ा गया था जिसने 43A जोड़ा — अर्थात् दोनों की उत्पत्ति एक है, पर विषय बिल्कुल भिन्न।
- (c)भारत के संविधान का अनुच्छेद 42 — अनुच्छेद 42 काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं तथा प्रसूति सहायता का उपबंध करता है — राज्य इनके लिए व्यवस्था करेगा। यह निदेशक तत्त्व श्रम से ही जुड़ा है, इसलिए यह विकल्प विषयगत रूप से निकट पड़ता है और यही उसे कठिन बनाता है। पर भेद स्पष्ट है: अनुच्छेद 42 काम की दशाओं की बात करता है, अर्थात् इस बात की कि कामगार किन परिस्थितियों में काम करे; जबकि अनुच्छेद 43A इस बात की कि वह प्रबंध के निर्णयों में सम्मिलित हो या नहीं। पहला काम की गुणवत्ता का प्रश्न है, दूसरा निर्णय में हिस्सेदारी का। इसी अनुच्छेद 42 की छाया प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम जैसे विधानों में दिखती है, जबकि 43A की छाया कार्य समितियों और भागीदारी की योजनाओं में।
- (d)भारत के संविधान का अनुच्छेद 43B — अनुच्छेद 43B सहकारी समितियों को बढ़ावा देने से संबंधित है — राज्य सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कार्यकरण, लोकतांत्रिक नियंत्रण और व्यावसायिक प्रबंधन को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा। यह विकल्प इसलिए ख़तरनाक है कि उसकी संख्या 43A से केवल एक अक्षर भिन्न है, और इस हिन्दी स्तंभ में वह अक्षर पंक्ति के बिल्कुल अंत में पड़ता है। एक और भेद स्मृति में बाँधने योग्य है: 43A बयालीसवें संशोधन, 1976 से आया, जबकि 43B बहुत बाद में, सत्तानवेवें संशोधन, 2011 से जोड़ा गया, जिसने सहकारी समितियों को मूल अधिकार तथा एक नया भाग भी दिया। विषय की दृष्टि से भी दोनों अलग हैं — एक नियोक्ता के उपक्रम में कामगार की आवाज़ की बात करता है, दूसरा उस संगठन-रूप की जिसमें सदस्य स्वयं स्वामी होते हैं।
अवधारणा
राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व संविधान के भाग चार में हैं और उनकी प्रकृति अनुच्छेद 37 में बतायी गई है — वे किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होंगे, पर देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाते समय उन्हें लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा। श्रम से जुड़े निदेशक तत्त्व इस भाग में एक शृंखला बनाते हैं और उन्हें साथ-साथ पढ़ना चाहिए। अनुच्छेद 39 में जीविका के पर्याप्त साधन, स्त्री और पुरुष दोनों के लिए समान काम के लिए समान वेतन, तथा कामगारों और बालकों के स्वास्थ्य व शक्ति के दुरुपयोग को रोकने की बात है। अनुच्छेद 41 काम, शिक्षा और कुछ दशाओं में लोक सहायता के अधिकार की बात करता है। अनुच्छेद 42 काम की न्यायसंगत तथा मानवोचित दशाओं और प्रसूति सहायता की। अनुच्छेद 43 सब कामगारों के लिए काम, निर्वाह मजदूरी और ऐसी काम की दशाओं की जो जीवन-स्तर को सभ्य बनाए रखें, तथा कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने की। और अनुच्छेद 43A प्रबंध में भागीदारी की। इस क्रम को देखिए तो वह जीविका से आरंभ होकर काम की दशाओं तक और वहाँ से निर्णय में हिस्सेदारी तक बढ़ता है।
अनुच्छेद 43A के जुड़ने का समय भी उसका अर्थ समझने में सहायक है। बयालीसवाँ संशोधन 1976 में हुआ और उसने संविधान में अनेक परिवर्तन किए, जिनमें भाग चार में तीन नए निदेशक तत्त्व जोड़ना भी था — समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता, उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों की भागीदारी, और पर्यावरण, वन तथा वन्य जीवों का संरक्षण। इससे पहले भी भारत में भागीदारी के प्रयोग चल रहे थे — 1947 के औद्योगिक विवाद अधिनियम से कार्य समिति आई थी, 1958 में संयुक्त प्रबंधन परिषदों की स्वैच्छिक योजना आई, और सत्तर के दशक में कुछ सार्वजनिक उपक्रमों तथा राष्ट्रीयकृत बैंकों के निदेशक मंडल में कामगारों के प्रतिनिधि रखे गए — पर संवैधानिक स्वीकृति 1976 में मिली। इस अनुच्छेद की सीमा यह है कि वह प्रवर्तनीय नहीं है, इसलिए भागीदारी की व्यवस्था वहीं तक चली जहाँ तक कोई विधि या योजना उसे ले गई; इसी कारण भारत में इस विषय पर एक व्यापक केंद्रीय विधान की माँग समय-समय पर उठती रही है।
मुख्य तथ्य
- अनुच्छेद 43A राज्य से यह अपेक्षा करता है कि वह उद्योग में लगे उपक्रमों, स्थापनों तथा अन्य संगठनों के प्रबंध में कर्मकारों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए क़दम उठाए।
- यह भागीदारी उपयुक्त विधान द्वारा अथवा किसी अन्य रीति से सुनिश्चित की जा सकती है, इसलिए भारत में वह कभी विधिक निकाय के रूप में आई और कभी स्वैच्छिक योजना के रूप में।
- यह अनुच्छेद मूल संविधान में नहीं था; उसे संविधान के बयालीसवें संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा भाग चार में जोड़ा गया।
- उसी बयालीसवें संशोधन ने भाग चार में दो और निदेशक तत्त्व जोड़े — अनुच्छेद 39A, जो विधिक सहायता का है, और अनुच्छेद 48A, जो पर्यावरण तथा वन्य जीवों के संरक्षण का।
- अनुच्छेद 39A समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता से संबंधित है, और उसी से आगे चलकर विधिक सेवा प्राधिकरणों तथा लोक अदालतों की व्यवस्था निकली।
- अनुच्छेद 42 काम की न्यायसंगत तथा मानवोचित दशाओं और प्रसूति सहायता का उपबंध करता है, अर्थात् वह काम की गुणवत्ता की बात करता है, निर्णय में हिस्सेदारी की नहीं।
- अनुच्छेद 43B सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कार्यकरण और लोकतांत्रिक नियंत्रण को बढ़ावा देने से संबंधित है और वह सत्तानवेवें संशोधन, 2011 से जोड़ा गया।
- अनुच्छेद 37 के अनुसार निदेशक तत्त्व किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, पर वे देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाते समय उन्हें लागू करना राज्य का कर्तव्य है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- अनुच्छेद 43A और 43B को आपस में बदल देना; इस हिन्दी स्तंभ में अंतर पंक्ति के बिल्कुल अंत में पड़ता है, इसलिए विकल्प अंत तक पढ़ना अनिवार्य है।
- अनुच्छेद 42 और 43A को एक मान लेना; पहला काम की दशाओं का उपबंध है और दूसरा प्रबंध में हिस्सेदारी का — दो अलग प्रश्न।
- अनुच्छेद 39A को श्रम से जोड़ लेना; वह विधिक सहायता का उपबंध है, यद्यपि वह भी उसी बयालीसवें संशोधन से आया है।
- निदेशक तत्त्व को प्रवर्तनीय अधिकार मान लेना; अनुच्छेद 37 उसे न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं बताता, यद्यपि वह शासन में मूलभूत है।
अनुच्छेद-संख्या पूछने वाले प्रश्न इस भर्ती में नियमित हैं और वे प्रायः एक ही परिवार के अनुच्छेदों को विकल्प बनाते हैं, ताकि विषय जानने वाला भी संख्या पर अटक जाए। यहाँ तीनों ग़लत विकल्प उसी भाग चार से हैं और उनमें से दो तो संख्या में भी बहुत निकट हैं। इसलिए तैयारी करते समय अनुच्छेद को उसके विषय के साथ जोड़कर, और यदि वह बाद में जोड़ा गया हो तो उस संशोधन के साथ जोड़कर याद रखिए — यह तीसरी कड़ी बहुत काम आती है, क्योंकि परीक्षा कभी विषय पूछती है और कभी संशोधन। इस पेपर के लिए एक विशेष सावधानी और है: इस हिन्दी स्तंभ में विकल्प ‘भारत के संविधान का अनुच्छेद’ से आरंभ होकर संख्या पर समाप्त होते हैं, इसलिए चारों विकल्प पढ़ने में लगभग एक जैसे दिखते हैं और भेद अंतिम दो-तीन अक्षरों में रह जाता है। ऐसे में विकल्प के अंत को उँगली से चिह्नित करके पढ़ना, और चुनने से पहले एक बार फिर अंतिम अक्षर मिलाना, बहुत सस्ती सावधानी है।
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