औद्योगिक संबंधों का निम्नलिखित में से कौन-सा एक परिप्रेक्ष्य इस परिकल्पना पर आधारित है कि दोनों ही दल आर्थिक (मजदूरी और लाभ) और साथ ही साथ राजनीतिक (नियंत्रण) शक्ति के लिए प्रयास करते हैं (और उनके पास अवसर होता है)?
- (a)बहुवादी परिप्रेक्ष्य
- (b)एकात्मक परिप्रेक्ष्य
- (c)आमूल परिवर्तनवादी परिप्रेक्ष्य
- (d)न्यासिता परिप्रेक्ष्य
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) बहुवादी परिप्रेक्ष्य। प्रश्न-वाक्य में तीन कोष्ठक हैं और उनमें से पहले दो केवल स्पष्टीकरण देते हैं — आर्थिक शक्ति का अर्थ मजदूरी और लाभ, राजनीतिक शक्ति का अर्थ नियंत्रण। असली शर्त तीसरे कोष्ठक में है, जो इस हिन्दी स्तंभ में वाक्य के अंत में, प्रश्नचिह्न से ठीक पहले आता है: ‘और उनके पास अवसर होता है’। इसे पहले दो शब्दों के साथ मिलाकर पढ़िए — दोनों ही दल शक्ति के लिए प्रयास करते हैं, और दोनों के पास उसका अवसर भी होता है। यही बहुवादी परिप्रेक्ष्य की मूल परिकल्पना है। बहुवाद संगठन को एक सुसंगत इकाई नहीं, बल्कि अलग-अलग हितों वाले समूहों का गठबंधन मानता है, जिनमें प्रबंधन और कामगार दोनों के अपने-अपने वैध उद्देश्य हैं। इससे तीन निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, संघर्ष अस्वाभाविक नहीं है; वह अलग-अलग हितों का स्वाभाविक परिणाम है और उसे समाप्त नहीं, संस्थागत रूप से प्रबंधित किया जाना चाहिए। दूसरा, ट्रेड यूनियन घुसपैठिया नहीं, कामगारों का वैध प्रतिनिधि है। तीसरा — और यही इस प्रश्न की कुंजी है — शक्ति दोनों पक्षों में बँटी होती है, इसलिए दोनों उसका प्रयोग कर सकते हैं; प्रबंधन के पास प्रबंध और संसाधन की शक्ति है और कामगारों के पास संगठित होकर काम रोक देने की। इसी सापेक्ष संतुलन के कारण सामूहिक सौदेबाज़ी संभव होती है, क्योंकि सौदेबाज़ी तभी होती है जब दोनों पक्ष एक-दूसरे को कुछ हानि पहुँचाने में समर्थ हों। यही कारण है कि उत्तर विकल्प (a) है। इस परिकल्पना का एक और परिणाम ध्यान देने योग्य है। यदि दोनों पक्षों के पास शक्ति है, तो कोई भी पक्ष दूसरे को स्थायी रूप से हरा नहीं सकता; इसलिए समाधान जीत में नहीं, समझौते में खोजना पड़ता है। यही कारण है कि इस दृष्टि में संघर्ष को समाप्त करने का नहीं, उसे नियम-बद्ध करने का प्रयत्न किया जाता है — और वही प्रयत्न मान्यता, सौदेबाज़ी और विवाद-निपटान की संस्थाओं के रूप में मूर्त होता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)एकात्मक परिप्रेक्ष्य — एकात्मक परिप्रेक्ष्य संगठन को एक परिवार अथवा एक टीम की तरह देखता है — एक ही उद्देश्य, एक ही सत्ता-स्रोत और एक ही निष्ठा-केंद्र। इस दृष्टि में सबका हित एक ही है, इसलिए संघर्ष स्वाभाविक नहीं माना जाता; उसे या तो ग़लतफ़हमी का परिणाम समझा जाता है, या कुछ असंतुष्ट लोगों की करतूत। इसी से आगे यह भी निकलता है कि ट्रेड यूनियन को बाहरी हस्तक्षेप की तरह देखा जाता है और प्रबंध करने का अधिकार प्रश्न से परे मान लिया जाता है। स्पष्ट है कि यह दृष्टि प्रश्न-वाक्य की शर्त पूरी नहीं करती, क्योंकि उसमें दो दल शक्ति के लिए प्रयास करते हुए दिखाए गए हैं, जबकि एकात्मक दृष्टि में शक्ति का एक ही केंद्र होता है और उसके विरुद्ध किसी प्रयास को वैध ही नहीं माना जाता।
- (c)आमूल परिवर्तनवादी परिप्रेक्ष्य — यह विकल्प इसलिए ख़तरनाक है कि वह भी संघर्ष को स्वाभाविक मानता है, और यहीं तक बहुवाद से उसका मेल है। आगे दोनों अलग हो जाते हैं। आमूल परिवर्तनवादी दृष्टि औद्योगिक संबंधों को समाज के व्यापक वर्ग-संघर्ष का ही एक रूप मानती है और कहती है कि शक्ति दोनों पक्षों में बराबर नहीं बँटी — वह उत्पादन के साधनों के स्वामियों के पास केंद्रित है, और कामगार का संगठित होना उसी असमानता की प्रतिक्रिया है। इस दृष्टि में सामूहिक सौदेबाज़ी से मिलने वाले लाभ अस्थायी माने जाते हैं, क्योंकि व्यवस्था का ढाँचा ही असमान है। इसलिए ‘दोनों दलों के पास अवसर होता है’ वाली शर्त इस दृष्टि की अपनी मान्यता के विरुद्ध जाती है — और यही एक वाक्यांश इसे इस प्रश्न से बाहर कर देता है।
- (d)न्यासिता परिप्रेक्ष्य — न्यासिता का विचार भारत में महात्मा गांधी से जुड़ा है और वह औद्योगिक संबंधों को शक्ति के नहीं, नैतिक दायित्व के प्रश्न के रूप में देखता है। इसके अनुसार धनवान अपनी संपत्ति का स्वामी नहीं, समाज का न्यासी है, और नियोक्ता को अपने कामगारों तथा समाज के हित में उसका उपयोग करना चाहिए। विवाद का समाधान इस दृष्टि में शक्ति-परीक्षण से नहीं, बल्कि नैतिक अपील, स्वैच्छिक माध्यस्थम् और अहिंसक साधनों से खोजा जाता है; अहमदाबाद के वस्त्र-उद्योग में इसी दृष्टि पर आधारित एक स्थायी व्यवस्था बनी थी। स्पष्ट है कि यह प्रश्न-वाक्य से मेल नहीं खाता, जो दोनों दलों को आर्थिक और राजनीतिक शक्ति के लिए प्रयास करते हुए दिखाता है। न्यासिता की धारणा में लक्ष्य शक्ति प्राप्त करना नहीं, कर्तव्य निभाना है।
अवधारणा
औद्योगिक संबंधों के परिप्रेक्ष्य वे चश्मे हैं जिनसे कोई यह तय करता है कि कारखाने के भीतर होने वाला संघर्ष क्या है और उससे कैसे निपटा जाए; और चश्मा बदलते ही नीति भी बदल जाती है। एकात्मक चश्मे से देखने वाला प्रबंधक संघर्ष को समस्या मानेगा और उसका उपाय बेहतर संचार, नेतृत्व या अनुशासन में खोजेगा। बहुवादी चश्मे से देखने वाला उसे स्वाभाविक मानेगा और उसका उपाय संस्थाओं में खोजेगा — मान्यता, सामूहिक सौदेबाज़ी, शिकायत-निवारण की प्रक्रिया, और विवाद-निपटान का तंत्र। आमूल परिवर्तनवादी चश्मे से देखने वाला इन संस्थाओं को अपर्याप्त बताएगा, क्योंकि उसकी दृष्टि में असमानता ढाँचे में है। इन तीनों में से पहले दो को स्पष्ट रूप से अलग करके प्रस्तुत करने का श्रेय एलन फ़ॉक्स को दिया जाता है, जिन्होंने 1960 के दशक में ब्रिटेन में औद्योगिक संबंधों की जाँच के लिए बने आयोग के लिए लिखे अपने अध्ययन में इन्हें ‘फ़्रेम ऑफ़ रेफ़रेंस’ के रूप में रखा। भारत में इनके साथ न्यासिता की गांधीवादी धारणा भी पढ़ायी जाती है।
बहुवादी दृष्टि की व्यावहारिक उपज वह पूरा संस्थागत ढाँचा है जिसे आज औद्योगिक संबंधों का तंत्र कहा जाता है। यदि दोनों पक्षों के हित भिन्न हैं और दोनों के पास कुछ शक्ति है, तो टकराव अवश्यंभावी है; और यदि टकराव अवश्यंभावी है, तो उसे नियम-बद्ध करना ही एकमात्र व्यावहारिक उपाय बचता है। इसी से संघों की मान्यता, समझौतों की अवधि, हड़ताल और तालाबंदी की सूचना, सुलह की अनिवार्य कार्यवाही, और अंत में न्यायनिर्णयन जैसी व्यवस्थाएँ निकलती हैं। भारत में यह ढाँचा मुख्यतः औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 और ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 से बना है, और उसकी एक विशेषता यह रही है कि उसमें राज्य की भूमिका बहुत बड़ी है — विवाद को न्यायनिर्णयन के लिए भेजने का निर्णय प्रायः सरकार का होता है। इसी कारण कुछ विद्वान भारतीय व्यवस्था को शुद्ध बहुवादी नहीं, बल्कि राज्य-प्रधान बहुवाद कहते हैं, जिसमें सामूहिक सौदेबाज़ी की तुलना में सरकारी हस्तक्षेप अधिक प्रभावी रहा है।
मुख्य तथ्य
- बहुवादी परिप्रेक्ष्य संगठन को अलग-अलग हितों वाले समूहों का गठबंधन मानता है, जिनमें प्रबंधन और कामगार दोनों के वैध उद्देश्य हैं।
- इस दृष्टि में संघर्ष स्वाभाविक और अपरिहार्य है; उसे समाप्त करने का नहीं, बल्कि संस्थागत रूप से प्रबंधित करने और नियम-बद्ध करने का प्रयत्न किया जाता है।
- इसमें शक्ति दोनों पक्षों में बँटी हुई मानी जाती है, इसलिए दोनों उसे प्रयोग करने का प्रयास करते हैं और दोनों के पास उसका अवसर भी होता है।
- एकात्मक परिप्रेक्ष्य में संगठन को एक ही सत्ता-स्रोत और एक ही निष्ठा-केंद्र वाली इकाई माना जाता है, संघर्ष को असामान्य समझा जाता है और संघ को बाहरी हस्तक्षेप।
- आमूल परिवर्तनवादी परिप्रेक्ष्य शक्ति को उत्पादन के साधनों के स्वामियों के पास केंद्रित मानता है और संघर्ष को व्यवस्था में अंतर्निहित।
- न्यासिता की धारणा गांधीवादी है, जिसमें धनवान संपत्ति का न्यासी माना जाता है और समाधान नैतिक अपील तथा अहिंसक साधनों से खोजा जाता है।
- एकात्मक और बहुवादी दृष्टियों को स्पष्ट रूप से अलग करके ‘फ़्रेम ऑफ़ रेफ़रेंस’ के रूप में प्रस्तुत करने का श्रेय एलन फ़ॉक्स को दिया जाता है, जिन्होंने यह काम 1960 के दशक में किया।
- बहुवादी दृष्टि की व्यावहारिक उपज वही पूरा तंत्र है जिसे आज औद्योगिक संबंध कहा जाता है — मान्यता, सामूहिक सौदेबाज़ी, शिकायत-निवारण और विवाद-निपटान।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- बहुवादी और आमूल परिवर्तनवादी को एक मान लेना; दोनों संघर्ष को स्वाभाविक मानते हैं, पर शक्ति के वितरण पर उनका मत अलग है।
- प्रश्न-वाक्य के तीसरे कोष्ठक को छोड़ देना, जिसमें ‘और उनके पास अवसर होता है’ वाली निर्णायक शर्त रखी गई है।
- एकात्मक दृष्टि को केवल पुरानी या ग़लत दृष्टि मान लेना; वह आज भी अनेक प्रबंधन-पद्धतियों की आधारभूत मान्यता है।
- न्यासिता को केवल दान या कल्याण मान लेना; वह वस्तुतः स्वामित्व की प्रकृति के बारे में एक नैतिक दावा है, जिसमें स्वामी स्वयं को न्यासी मानता है।
सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्यों पर बने प्रश्न प्रायः किसी एक परिकल्पना का वर्णन देकर उसका नाम पूछते हैं, और चारों विकल्प एक ही परिवार के होते हैं — जैसे यहाँ चारों में ‘परिप्रेक्ष्य’ शब्द आता है। ऐसे प्रश्न को हल करने का सबसे अच्छा ढंग यह है कि हर परिप्रेक्ष्य के लिए दो प्रश्नों के उत्तर याद रखिए — संघर्ष को वह क्या मानता है, और शक्ति को वह कैसे बँटा हुआ मानता है। इन्हीं दो उत्तरों से चारों अलग हो जाते हैं, और लंबे प्रश्न-वाक्य में जो शर्त छिपी होती है वह इन्हीं दो में से किसी एक को छूती है। दूसरी उपयोगी आदत यह है कि लंबे वाक्य के कोष्ठकों को छोड़कर पहले मूल वाक्य पढ़िए, फिर कोष्ठकों को एक-एक करके जोड़िए; इस हिन्दी स्तंभ में तीसरा कोष्ठक वाक्य के अंत में रखा गया है और उसी में निर्णायक शब्द है, इसलिए उसे अनदेखा करना पूरे प्रश्न को बदल देता है।
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