औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 के अंतर्गत सत्यापित किसी स्थायी आदेश के अनुप्रयोग या निर्वचन से संबंधित प्रश्नों को विचारार्थ किसे भेजा जा सकता है?
- (a)औद्योगिक अधिकरण
- (b)श्रम आयुक्त
- (c)श्रम न्यायालय
- (d)औद्योगिक नियोजन न्यायालय
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) श्रम न्यायालय। औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 की धारा 13A ठीक यही प्रश्न हल करती है। वह कहती है कि यदि इस अधिनियम के अंतर्गत सत्यापित किसी स्थायी आदेश के अनुप्रयोग या निर्वचन के बारे में कोई प्रश्न उठे, तो कोई भी नियोक्ता, कामगार, ट्रेड यूनियन अथवा कामगारों का कोई अन्य प्रतिनिधि निकाय उस प्रश्न को औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अंतर्गत गठित किसी ऐसे श्रम न्यायालय को भेज सकता है जिसे समुचित सरकार ने राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस प्रयोजन के लिए विनिर्दिष्ट किया हो; और वह श्रम न्यायालय पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के बाद उस प्रश्न का निर्णय करेगा, जो अंतिम और बाध्यकारी होगा। यहाँ दो बातें ध्यान देने योग्य हैं। पहली, यह प्रश्न सत्यापन के बाद का है — सत्यापन के समय आदेशों की उचितता और युक्तियुक्तता पर विचार करना प्रमाणकर्ता अधिकारी तथा अपील प्राधिकारी का काम है, पर एक बार आदेश सत्यापित हो जाने के बाद उनके अर्थ और उनके लागू होने का विवाद न्यायिक प्रश्न बन जाता है। दूसरी, यही उत्तर दूसरे अधिनियम से भी मिल जाता है: औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की दूसरी अनुसूची, जो श्रम न्यायालयों के अधिकार-क्षेत्र के विषय गिनाती है, अपनी आरंभिक प्रविष्टियों में ही स्थायी आदेशों के अनुप्रयोग तथा निर्वचन को, और स्थायी आदेशों के अंतर्गत नियोक्ता द्वारा पारित आदेश की औचित्य या वैधता को रखती है। इस प्रकार दोनों अधिनियम एक ही निकाय की ओर संकेत करते हैं, इसलिए उत्तर विकल्प (c) है। इस उत्तर का एक व्यावहारिक पक्ष भी है। सत्यापन के बाद स्थायी आदेश उस प्रतिष्ठान की सेवा-शर्तों की लिखित संहिता बन जाते हैं, और उन्हीं के आधार पर कदाचार, निलंबन और पदच्युति के मामले तय होते हैं। ऐसे मामलों में प्रायः यही विवाद उठता है कि आदेश का कोई खंड किस स्थिति पर लागू होता है और उसका अर्थ क्या है — और धारा 13A उसी विवाद के लिए श्रम न्यायालय का द्वार खोलती है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)औद्योगिक अधिकरण — औद्योगिक अधिकरण औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 7A के अंतर्गत गठित होता है और वह उन विवादों का निपटारा करता है जो समुचित सरकार उसे निर्देशित करती है; उसका विषय-क्षेत्र प्रायः वे बड़े विषय हैं जो उस अधिनियम की तीसरी अनुसूची में गिनाए गए हैं, जैसे मजदूरी, बोनस, भत्ते, काम के घंटे, छँटनी और तालाबंदी। स्थायी आदेशों के निर्वचन का प्रश्न इस श्रेणी में नहीं रखा गया; उसे विशेष रूप से श्रम न्यायालय को सौंपा गया है। भेद का तर्क भी समझने योग्य है: अधिकरण के पास प्रायः वे विषय जाते हैं जिनमें नई सेवा-शर्तें तय करनी होती हैं, जबकि श्रम न्यायालय के पास वे विषय जाते हैं जिनमें पहले से विद्यमान नियम या आदेश का अर्थ लगाना होता है। स्थायी आदेश पहले से विद्यमान नियम ही हैं, इसलिए उनका निर्वचन श्रम न्यायालय का काम है।
- (b)श्रम आयुक्त — यह विकल्प इसलिए चतुर है कि श्रम आयुक्त का इस अधिनियम से सचमुच गहरा संबंध है — वही प्रायः प्रमाणकर्ता अधिकारी होता है, जिसके सामने नियोक्ता प्रारूप स्थायी आदेश प्रस्तुत करता है और जो कामगारों या उनके संघ को सुनवाई का अवसर देकर आदेशों को सत्यापित करता है। पर उसकी भूमिका सत्यापन की प्रक्रिया तक सीमित है। एक बार आदेश सत्यापित हो जाने पर उनके अनुप्रयोग या निर्वचन पर उठे प्रश्न का निर्णय करना उसका काम नहीं रह जाता; धारा 13A उस काम के लिए श्रम न्यायालय को नामित करती है, और उसका निर्णय अंतिम तथा बाध्यकारी बताया गया है। इस भेद को एक वाक्य में यों रखिए — नियम बनवाना और सत्यापित करना प्रशासनिक काम है, बने हुए नियम का अर्थ तय करना न्यायिक काम है।
- (d)औद्योगिक नियोजन न्यायालय — इस नाम का कोई निकाय है ही नहीं; यह विकल्प अधिनियम के अपने नाम से शब्द उधार लेकर गढ़ा गया है, ताकि पढ़ने में विश्वसनीय लगे। परीक्षा में यह एक जानी-पहचानी युक्ति है — प्रश्न में जिस अधिनियम का नाम आया हो, उसी के शब्दों से एक ऐसा निकाय बना दिया जाता है जो कहीं विद्यमान नहीं। बचाव यह है कि श्रम विधि के वास्तविक निकायों की सूची स्मृति में स्पष्ट रखिए: औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अंतर्गत कार्य समिति, सुलह अधिकारी, सुलह बोर्ड, जाँच न्यायालय, श्रम न्यायालय, औद्योगिक अधिकरण और राष्ट्रीय अधिकरण; और स्थायी आदेश अधिनियम के अंतर्गत प्रमाणकर्ता अधिकारी तथा अपील प्राधिकारी। इस सूची में जो नाम नहीं है, वह विकल्प भी नहीं हो सकता।
अवधारणा
स्थायी आदेशों का विचार बहुत सीधा है। किसी कारखाने या प्रतिष्ठान में काम की शर्तें यदि लिखित न हों, तो वे नियोक्ता की इच्छा पर बदलती रहेंगी और कामगार को कभी यह पता ही नहीं चलेगा कि उससे क्या अपेक्षित है और किस बात पर क्या दंड मिलेगा। इसी अनिश्चितता को समाप्त करने के लिए औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 बनाया गया, जो नियोक्ता से अपेक्षा करता है कि वह रोजगार की शर्तें लिखित रूप में निश्चित करे, उन्हें सत्यापित कराए और कामगारों को स्पष्ट रूप से बताए। केंद्रीय अधिनियम सामान्यतः उन औद्योगिक स्थापनों पर लागू होता है जहाँ एक सौ या उससे अधिक कामगार नियोजित हों या पिछले बारह महीनों में किसी दिन नियोजित रहे हों; कुछ राज्यों ने अपने संशोधनों से यह संख्या घटाई है। नियोक्ता अधिनियम लागू होने के बाद निर्धारित अवधि में प्रारूप स्थायी आदेश प्रमाणकर्ता अधिकारी को प्रस्तुत करता है; वह कामगारों या उनके संघ को सुनवाई का अवसर देकर आदेश सत्यापित करता है, और उसके निर्णय के विरुद्ध अपील प्राधिकारी के पास अपील की जा सकती है।
अधिनियम की अनुसूची उन विषयों की सूची देती है जिन पर स्थायी आदेशों में उपबंध होना चाहिए, और वही सूची इस अधिनियम की असली विषय-वस्तु है। उसमें कामगारों का वर्गीकरण आता है — स्थायी, अस्थायी, प्रशिक्षु, परिवीक्षाधीन और बदली; काम के घंटे, अवकाश, वेतन-दिवस तथा मजदूरी-दरें बताने की रीति; पालियों की व्यवस्था; उपस्थिति और विलंब से आना; छुट्टी की शर्तें और उसे स्वीकृत कराने की प्रक्रिया; अनुभाग बंद करने और फिर खोलने की सूचना; नियोजन की समाप्ति तथा उसके लिए आवश्यक सूचना; कदाचार के लिए निलंबन या पदच्युति तथा वे कार्य जो कदाचार माने जाएँगे; और कामगारों के लिए उपलब्ध निवारण के साधन। सत्यापित आदेश निर्धारित अवधि बीतने पर प्रवृत्त होते हैं और उन्हें कार्यस्थल पर अंग्रेज़ी में तथा उस भाषा में लगाना होता है जिसे अधिकांश कामगार समझते हैं। यही अंतिम बात इस अधिनियम की आत्मा है — नियम तभी बाँधते हैं जब वे सबको ज्ञात हों।
मुख्य तथ्य
- औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 की धारा 13A सत्यापित स्थायी आदेश के अनुप्रयोग या निर्वचन के प्रश्न को श्रम न्यायालय को सौंपती है।
- यह प्रश्न कोई भी नियोक्ता, कोई कामगार, कोई ट्रेड यूनियन अथवा कामगारों का कोई अन्य प्रतिनिधि निकाय श्रम न्यायालय के समक्ष भेज सकता है।
- श्रम न्यायालय पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देकर उस प्रश्न का निर्णय करता है, और वह निर्णय अंतिम तथा पक्षकारों पर बाध्यकारी होता है।
- औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की दूसरी अनुसूची भी स्थायी आदेशों के अनुप्रयोग तथा निर्वचन को श्रम न्यायालय के विषयों में रखती है।
- केंद्रीय अधिनियम सामान्यतः उन स्थापनों पर लागू होता है जहाँ एक सौ या उससे अधिक कामगार नियोजित हों या पिछले बारह महीनों में किसी दिन नियोजित रहे हों।
- प्रारूप स्थायी आदेश प्रमाणकर्ता अधिकारी को प्रस्तुत किए जाते हैं और उसके निर्णय के विरुद्ध अपील प्राधिकारी के पास अपील होती है।
- अधिनियम की अनुसूची उन विषयों की सूची देती है जिन पर स्थायी आदेशों में उपबंध होना आवश्यक है — कामगारों का वर्गीकरण, काम के घंटे, छुट्टी, कदाचार और निवारण के साधन।
- सत्यापित स्थायी आदेश कार्यस्थल पर अंग्रेज़ी में तथा उस भाषा में लगाए जाते हैं जिसे अधिकांश कामगार समझते हैं, क्योंकि नियम तभी बाँधते हैं जब वे सबको ज्ञात हों।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- श्रम आयुक्त को उत्तर मान लेना; वह प्रमाणकर्ता अधिकारी की भूमिका में है और उसका काम सत्यापन तक सीमित है, निर्वचन का निर्णय करना नहीं।
- श्रम न्यायालय और औद्योगिक अधिकरण के अधिकार-क्षेत्र को आपस में बदल देना; पहला विद्यमान नियम का अर्थ तय करता है और दूसरा प्रायः नई सेवा-शर्तें।
- अधिनियम के अपने शब्दों से गढ़े हुए किसी निकाय को वास्तविक मान लेना; श्रम विधि के वास्तविक निकायों की सूची स्पष्ट रखिए।
- सत्यापन के समय की उचितता-परीक्षा और सत्यापन के बाद के निर्वचन को एक मान लेना; दोनों अलग चरण और अलग प्राधिकारी हैं।
स्थायी आदेशों का अधिनियम इस परीक्षा-परिवार में बार-बार लौटता है और प्रायः प्रक्रिया के किसी एक बिंदु पर प्रश्न बनता है — कब प्रारूप देना है, कितने दिनों में आदेश प्रवृत्त होंगे, किस राज्य पर आदर्श स्थायी आदेश लागू नहीं होते, निलंबन में कितना निर्वाह भत्ता मिलेगा, और यहाँ की तरह, निर्वचन का प्रश्न किसके पास जाएगा। EPFO के EO/AO 2023 के पेपर में इसी अधिनियम पर दो प्रश्न आए थे। इसलिए तैयारी का सबसे अच्छा ढंग यह है कि पूरे अधिनियम को एक समयरेखा की तरह लिखिए — अधिनियम लागू होना, प्रारूप प्रस्तुत करना, सत्यापन, अपील, प्रवृत्त होना, संशोधन, और विवाद — और हर चरण के सामने प्राधिकारी तथा अवधि लिख दीजिए। इस एक पृष्ठ से इस अधिनियम के लगभग सभी प्रश्न निकल आते हैं, क्योंकि परीक्षा उसी समयरेखा के किसी एक बिंदु पर उँगली रखती है।
संबंधित PYQ
EPFO_EOAO_2023_Q30As per the provisions of the Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946, standing orders shall come into operation after the expiry of how many days from the date on which copies of the order of the Appellate Authority are sent to the employer and to the trade unions ?
- (a) Seven days
- (b) Ten days
- (c) Fifteen days
- (d) Thirty days
उत्तर(a) Seven days
EPFO EO/AO 2023 में पूछा गया कि स्थायी आदेश प्रतियाँ भेजे जाने के कितने दिन बाद प्रवृत्त होते हैं — उसी अधिनियम की प्रक्रिया का दूसरा बिंदु।
EPFO_EOAO_2023_Q66Model Standing Orders formed under the Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946 shall not apply to an establishment in respect of which the Appropriate Government is that of the State of :
- (a) Madhya Pradesh
- (b) Gujarat
- (c) Kerala
- (d) West Bengal
उत्तर(b) Gujarat
EPFO EO/AO 2023 में यह भी पूछा गया कि आदर्श स्थायी आदेश किस राज्य के स्थापनों पर लागू नहीं होते।
EPFO_EOAO_2017_Q74खोलें व हल करें →Which one of the following is the process in which representatives of workmen and employer involved in an industrial dispute are brought together before a third person or group of persons who facilitates/facilitate through mediation to reach a mutually satisfactory agreement?
- (a) Arbitration
- (b) Adjudication
- (c) Conciliation
- (d) Collective negotiation
उत्तर(c) Conciliation
इसी पेपर का पिछला प्रश्न विवाद-निपटान की प्रक्रियाओं पर है, जिनमें श्रम न्यायालय और अधिकरण का भेद यहाँ भी काम आता है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
केंद्रीय औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 सामान्यतः किस आकार के औद्योगिक स्थापन पर लागू होता है?
- (a)जहाँ दस या अधिक कामगार नियोजित हों
- (b)जहाँ बीस या अधिक कामगार नियोजित हों
- (c)जहाँ एक सौ या अधिक कामगार नियोजित हों, या पिछले बारह महीनों में किसी दिन नियोजित रहे हों
- (d)जहाँ तीन सौ या अधिक कामगार नियोजित हों
उत्तर(c) जहाँ एक सौ या अधिक कामगार नियोजित हों, या पिछले बारह महीनों में किसी दिन नियोजित रहे हों
- practice — not a real PYQ
स्थायी आदेशों में जिन विषयों पर उपबंध होना आवश्यक है, उनकी सूची निम्नलिखित में से किस दस्तावेज़ में दी गई है?
- (a)औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 की अनुसूची में
- (b)औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की तीसरी अनुसूची में
- (c)कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची III में
- (d)भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची में
उत्तर(a) औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 की अनुसूची में