निम्नलिखित में से वह कौन-सी एक प्रक्रिया है, जिसमें किसी औद्योगिक विवाद में शामिल कामगारों एवं नियोक्ता के प्रतिनिधियों को एक तीसरे व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के समक्ष एक साथ लाया जाता है और उसकी मध्यस्थता के द्वारा वे परस्पर संतोषजनक सहमति पर पहुँचते हैं?
- (a)माध्यस्थम्
- (b)न्यायनिर्णयन
- (c)सुलह
- (d)सामूहिक बातचीत
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) सुलह। इस लंबे प्रश्न-वाक्य में तीन शर्तें छिपी हैं और तीनों को अलग-अलग पढ़ना चाहिए। पहली, विवाद में लगे दोनों पक्षों के प्रतिनिधि — कामगारों के और नियोक्ता के — एक साथ लाए जाते हैं। दूसरी, उन्हें किसी तीसरे व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के समूह के समक्ष लाया जाता है, अर्थात् बाहर से कोई आता है। और तीसरी, वह तीसरा पक्ष अपनी मध्यस्थता से उन्हें परस्पर संतोषजनक सहमति तक पहुँचाता है — अर्थात् समझौता स्वयं पक्षकार करते हैं, तीसरा पक्ष केवल उसे संभव बनाता है। ये तीनों शर्तें एक साथ केवल सुलह में पूरी होती हैं। औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में इसकी व्यवस्था है — धारा 4 के अंतर्गत समुचित सरकार सुलह अधिकारी नियुक्त करती है और धारा 5 के अंतर्गत सुलह बोर्ड गठित कर सकती है, जो एक से अधिक व्यक्तियों वाला निकाय होता है और इसीलिए प्रश्न-वाक्य में ‘व्यक्तियों के समूह’ की भी बात कही गई है। सुलह अधिकारी का काम विवाद के निपटारे के लिए ऐसे सब क़दम उठाना है जो वह उचित समझे, ताकि पक्षकार न्यायसंगत और सौहार्दपूर्ण समझौते पर पहुँच सकें; निर्णय थोपने की शक्ति उसके पास नहीं है। यदि समझौता हो जाए तो समझौता-ज्ञापन पर हस्ताक्षर होते हैं और वह पक्षकारों पर बाध्यकारी हो जाता है; यदि न हो तो वह समुचित सरकार को असफलता की रिपोर्ट भेजता है, और तभी आगे न्यायनिर्णयन का प्रश्न उठता है। जनोपयोगी सेवाओं में हड़ताल या तालाबंदी की सूचना दिए जाने पर सुलह की कार्यवाही अनिवार्य होती है। इसलिए उत्तर विकल्प (c) है। व्यवहार की दृष्टि से यह पद्धति इस पूरे तंत्र का सबसे व्यस्त हिस्सा है, क्योंकि अधिकांश विवाद पहले यहीं आते हैं और बहुत से यहीं निपट भी जाते हैं। इसका कारण भी स्पष्ट है: समझौता पक्षकारों का अपना होता है, इसलिए वे उसे मानने के लिए अधिक तैयार रहते हैं, और उसके बाद संबंध भी उतने कटु नहीं रहते जितने किसी थोपे हुए निर्णय के बाद रहते।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)माध्यस्थम् — इसमें तीसरा पक्ष तो होता है, पर उसकी भूमिका बिल्कुल दूसरी है — वह पक्षकारों को सहमति तक पहुँचाने में सहायता नहीं करता, बल्कि विवाद सुनकर स्वयं निर्णय देता है, जिसे पंचाट कहा जाता है, और वह निर्णय दोनों पर बाध्यकारी होता है। औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 10A इसी की व्यवस्था करती है और उसकी विशेषता यह है कि विवाद माध्यस्थम् को तभी भेजा जा सकता है जब दोनों पक्ष लिखित करार से ऐसा तय करें — इसीलिए इसे स्वैच्छिक माध्यस्थम् कहा जाता है। भेद इस एक प्रश्न से पकड़िए: क्या तीसरा पक्ष निर्णय देता है या केवल बातचीत को आगे बढ़ाता है? यदि निर्णय देता है तो वह माध्यस्थम् है, सुलह नहीं। प्रश्न-वाक्य में स्पष्ट लिखा है कि वे ‘परस्पर संतोषजनक सहमति पर पहुँचते हैं’, इसलिए यह विकल्प यहीं कट जाता है।
- (b)न्यायनिर्णयन — न्यायनिर्णयन में विवाद किसी सांविधिक न्यायिक निकाय के सामने जाता है और वही उसका निपटारा करता है। औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में तीन ऐसे निकाय हैं — धारा 7 के अंतर्गत श्रम न्यायालय, धारा 7A के अंतर्गत औद्योगिक अधिकरण, और धारा 7B के अंतर्गत राष्ट्रीय अधिकरण — और विवाद इन्हें प्रायः समुचित सरकार धारा 10 के अंतर्गत निर्देशित करती है। दो बातें इसे सुलह से अलग करती हैं। पहली, इसमें पक्षकारों की सहमति आवश्यक नहीं है, इसीलिए इसे अनिवार्य निपटान-पद्धति कहा जाता है। दूसरी, इसका परिणाम पक्षकारों का समझौता नहीं, निकाय का पंचाट होता है, जो उन पर लागू कर दिया जाता है। व्यवहार में यह अंतिम चरण है — सुलह असफल होने के बाद ही उसकी बारी आती है।
- (d)सामूहिक बातचीत — इसमें तीसरा पक्ष होता ही नहीं, और यही इसे इस प्रश्न से बाहर कर देता है। सामूहिक बातचीत द्विपक्षीय प्रक्रिया है, जिसमें कामगारों का संघ और नियोक्ता आमने-सामने बैठकर मजदूरी, भत्तों, काम के घंटों और सेवा-शर्तों पर मोल-भाव करते हैं और अंत में एक समझौता करते हैं, जो प्रायः कुछ वर्षों के लिए चलता है। यह औद्योगिक संबंधों की सबसे वांछनीय पद्धति मानी जाती है, क्योंकि इसमें समाधान पक्षकारों का अपना होता है और बाहर से थोपा नहीं जाता; भारत में इसे बढ़ावा देने की संस्तुति समय-समय पर होती रही है। पर प्रश्न-वाक्य ने स्पष्ट कहा है कि पक्षकारों को ‘एक तीसरे व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के समक्ष’ लाया जाता है — इस एक वाक्यांश के कारण यह विकल्प नहीं बन सकता।
अवधारणा
औद्योगिक विवादों के निपटारे की पद्धतियों को दो कसौटियों पर रखकर देखिए, तो पूरा ढाँचा एक बार में स्पष्ट हो जाता है। पहली कसौटी — क्या कोई तीसरा पक्ष है? सामूहिक बातचीत में नहीं है; सुलह, माध्यस्थम् और न्यायनिर्णयन तीनों में है। दूसरी कसौटी — तीसरा पक्ष केवल सहायता करता है या स्वयं निर्णय देता है? सुलह में वह केवल सहायता करता है; माध्यस्थम् और न्यायनिर्णयन में वह निर्णय देता है। इन दोनों को अलग करने वाली तीसरी कसौटी यह है कि प्रक्रिया स्वैच्छिक है या अनिवार्य: माध्यस्थम् में विवाद पक्षकारों के लिखित करार से जाता है, जबकि न्यायनिर्णयन में उसे सरकार निर्देशित कर सकती है। इन तीन प्रश्नों के उत्तर मिलाकर चारों पद्धतियाँ अपनी-अपनी जगह बैठ जाती हैं। इनके अलावा अधिनियम में दो और निकाय हैं — धारा 3 के अंतर्गत कार्य समिति, जो विवाद रोकने के लिए है, और धारा 6 के अंतर्गत जाँच न्यायालय, जो किसी विषय की जाँच करके रिपोर्ट देता है, निपटारा नहीं करता। इन्हीं दो-तीन प्रश्नों से पूरा तंत्र अपने आप क्रम में बैठ जाता है।
सुलह भारत में इस ढाँचे का सबसे व्यस्त हिस्सा है, क्योंकि अधिकांश विवाद यहीं से गुज़रते हैं और बहुत से यहीं निपट भी जाते हैं। इसकी कुछ व्यावहारिक बातें याद रखने योग्य हैं। सुलह अधिकारी नियुक्त होता है और वह किसी विशेष क्षेत्र या किसी उद्योग के लिए, स्थायी या अस्थायी रूप से, नियुक्त किया जा सकता है। जनोपयोगी सेवाओं में हड़ताल या तालाबंदी की सूचना दी जाए तो सुलह की कार्यवाही अनिवार्य रूप से आरंभ हो जाती है, और उसी अवधि में हड़ताल पर रोक भी लगी रहती है — यह व्यवस्था इसलिए है कि आवश्यक सेवाएँ अचानक ठप न हों। सुलह में हुआ समझौता उन सब पर बाध्यकारी होता है जो कार्यवाही में पक्षकार थे, और उसका दायरा उस समझौते से अधिक व्यापक होता है जो सुलह के बाहर हुआ हो। यदि सुलह असफल हो जाए तो अधिकारी सरकार को रिपोर्ट भेजता है और सरकार तय करती है कि विवाद न्यायनिर्णयन के लिए भेजा जाए या नहीं; न भेजने पर उसे कारण बताने होते हैं।
मुख्य तथ्य
- सुलह में तीसरा पक्ष दोनों पक्षकारों को एक साथ लाकर मध्यस्थता करता है और उन्हें समझौते तक पहुँचने में सहायता देता है, पर निर्णय स्वयं नहीं देता।
- औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 4 के अंतर्गत समुचित सरकार सुलह अधिकारी नियुक्त करती है, जो किसी क्षेत्र या किसी उद्योग के लिए हो सकते हैं।
- उसी अधिनियम की धारा 5 के अंतर्गत सुलह बोर्ड गठित किया जा सकता है, जो एक से अधिक व्यक्तियों वाला निकाय होता है — इसीलिए प्रश्न में ‘व्यक्तियों के समूह’ भी कहा गया है।
- सुलह सफल होने पर समझौता-ज्ञापन पर हस्ताक्षर होते हैं और वह समझौता कार्यवाही के पक्षकारों पर बाध्यकारी हो जाता है।
- सुलह असफल होने पर अधिकारी समुचित सरकार को असफलता की रिपोर्ट भेजता है, और तभी आगे न्यायनिर्णयन के लिए विवाद भेजने का प्रश्न उठता है।
- माध्यस्थम् की व्यवस्था धारा 10A में है और विवाद वहाँ दोनों पक्षों के लिखित करार से ही जाता है; पंचाट बाध्यकारी होता है।
- न्यायनिर्णयन के निकाय हैं — धारा 7 का श्रम न्यायालय, धारा 7A का औद्योगिक अधिकरण और धारा 7B का राष्ट्रीय अधिकरण।
- सामूहिक बातचीत पूरी तरह द्विपक्षीय प्रक्रिया है, जिसमें कोई तीसरा पक्ष नहीं होता और समाधान पक्षकार स्वयं आमने-सामने बैठकर निकालते हैं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- सुलह और माध्यस्थम् को एक मान लेना; निर्णायक भेद यह है कि तीसरा पक्ष स्वयं निर्णय देता है या केवल बातचीत को आगे बढ़ाने में सहायता करता है।
- माध्यस्थम् और न्यायनिर्णयन को एक मान लेना; पहला पक्षकारों के करार से आता है, दूसरा सरकार के निर्देश से।
- सामूहिक बातचीत को इस प्रश्न का उत्तर मान लेना, जबकि प्रश्न-वाक्य स्पष्ट रूप से किसी तीसरे व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के समक्ष लाए जाने की बात करता है।
- कार्य समिति और जाँच न्यायालय को निपटान-निकाय मान लेना; पहला विवाद रोकने के लिए है और दूसरा जाँच करके रिपोर्ट देता है।
विवाद-निपटान का यह तंत्र EPFO की भर्तियों का सबसे नियमित विषय है और तीन रूपों में आता है। पहला रूप परिभाषा का है, जैसे यहाँ — प्रक्रिया का वर्णन देकर उसका नाम पूछ लेना। दूसरा रूप धारा-संख्या का है। तीसरा रूप निषेधात्मक होता है, जिसमें किसी प्रक्रिया के बारे में चार कथन देकर पूछा जाता है कि कौन-सा सही नहीं है; EPFO की APFC 2023 की परीक्षा में सुलह की कार्यवाही की समाप्ति पर ठीक ऐसा ही प्रश्न आया था। तीनों रूपों के लिए एक ही तैयारी काम आती है: एक छोटी तालिका बनाइए जिसमें हर पद्धति के सामने चार बातें लिखी हों — तीसरा पक्ष है या नहीं, वह निर्णय देता है या नहीं, प्रक्रिया स्वैच्छिक है या अनिवार्य, और परिणाम क्या कहलाता है। लंबे प्रश्न-वाक्य में यही चार बातें छिपी रहती हैं, इसलिए तालिका याद हो तो वाक्य को दो बार पढ़ने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती।
संबंधित PYQ
EPFO_APFC_2023_Q98Which one of the following statements relating to conclusion of conciliation proceedings under the Industrial Disputes Act, 1947 is not correct?
- (a) It is concluded on the date when a memorandum of settlement is signed by the parties.
- (b) It is concluded on the date when it ends in failure resulting in no memorandum of settlement signed between the parties.
- (c) It is concluded on the date when the report of the Conciliation Officer is received by the Appropriate Government when no settlement is arrived.
- (d) It is concluded on the date when the reference is made by the Appropriate Government to the Labour Court/Industrial Tribunal under Section 10 of the Act during pendency of the conciliation proceedings.
उत्तर(b) It is concluded on the date when it ends in failure resulting in no memorandum of settlement signed between the parties.
EPFO APFC 2023 में औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अंतर्गत सुलह की कार्यवाही की समाप्ति पर निषेधात्मक प्रश्न आया — वही प्रक्रिया, बारीक रूप में।
EPFO_APFC_2016_Q71The famous 'Giri' approach in Industrial Relations in India espouses the cause of
- (a) Adjudication
- (b) Compulsory Collective Bargaining
- (c) Conciliation
- (d) Arbitration
उत्तर(b) Compulsory Collective Bargaining
EPFO APFC 2016 में गिरि दृष्टिकोण पर प्रश्न आया, जो भारत में सामूहिक सौदेबाज़ी को प्रोत्साहित करने के पक्ष में था।
EPFO_EOAO_2017_Q71खोलें व हल करें →Works Committee, Safety Committee and Canteen Management Committee are the examples of
- (a) workers’ participation in management
- (b) workers’ education schemes
- (c) workers’ cooperatives
- (d) workers’ suggestion schemes
उत्तर(a) workers’ participation in management
इसी पेपर का प्रश्न 71 कार्य समिति पर है, जो इसी अधिनियम की धारा 3 से आती है और विवाद रोकने के लिए बनाई जाती है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अंतर्गत सुलह अधिकारियों की नियुक्ति किस धारा के अंतर्गत की जाती है?
- (a)धारा 3
- (b)धारा 4
- (c)धारा 5
- (d)धारा 7
उत्तर(b) धारा 4
- practice — not a real PYQ
निम्नलिखित में से किस प्रक्रिया में तीसरा पक्ष विवाद का निर्णय स्वयं देता है और वह निर्णय दोनों पक्षों पर बाध्यकारी होता है?
- (a)सुलह
- (b)सामूहिक सौदेबाज़ी
- (c)माध्यस्थम्
- (d)कार्य समिति की बैठक
उत्तर(c) माध्यस्थम्