फिलाडेल्फिया घोषणा के अनुसार, निम्नलिखित में से कौन-सा एक ILO के लक्ष्यों और उद्देश्यों का भाग नहीं है?
- (a)श्रमिक एक वस्तु नहीं है।
- (b)अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संघ की स्वतंत्रता सतत विकास हेतु अनिवार्य हैं।
- (c)किसी भी स्थान पर गरीबी, हर एक स्थान पर सम्पन्नता के लिए खतरा है।
- (d)गरीबी के खिलाफ जंग के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक राष्ट्र के अंदर इससे निरंतर उत्साह से लड़ा जाए, जो कि पूरी तरह से सरकार का दायित्व है।
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) गरीबी के खिलाफ जंग के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक राष्ट्र के अंदर इससे निरंतर उत्साह से लड़ा जाए, जो कि पूरी तरह से सरकार का दायित्व है। यह निषेधात्मक प्रश्न है और उसका ‘नहीं’ मोटे टाइप में छपा है, इसलिए पूछा यह जा रहा है कि कौन-सा कथन घोषणा का भाग नहीं है। फिलाडेल्फिया घोषणा 1944 में अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन के फिलाडेल्फिया अधिवेशन में अंगीकृत हुई थी और उसका पहला भाग संगठन के उन मूल सिद्धांतों को दोहराता है जिन पर वह टिका है। वे सिद्धांत ये हैं — श्रमिक एक वस्तु नहीं है; अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संघ की स्वतंत्रता सतत विकास के लिए अनिवार्य हैं; किसी भी स्थान पर गरीबी हर स्थान पर सम्पन्नता के लिए ख़तरा है; और अभाव के विरुद्ध संघर्ष प्रत्येक राष्ट्र के भीतर अथक उत्साह से तथा साथ ही निरंतर और समन्वित अंतर्राष्ट्रीय प्रयास से चलाया जाना चाहिए, जिसमें कामगारों और नियोक्ताओं के प्रतिनिधि सरकारों के प्रतिनिधियों के साथ समान दर्जे पर मुक्त विचार-विमर्श और लोकतांत्रिक निर्णय में सम्मिलित हों। इस चौथे सिद्धांत को विकल्प (d) ने ठीक उलट दिया है। घोषणा उसे साझा और त्रिपक्षीय दायित्व बताती है, जबकि विकल्प उसे ‘पूरी तरह से सरकार का दायित्व’ कह देता है, और साथ ही अंतर्राष्ट्रीय प्रयास वाला अंश भी हटा देता है। त्रिपक्षीयता अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की अपनी पहचान है — वह विश्व की एकमात्र ऐसी संस्था है जिसमें सरकारों के साथ नियोक्ता और कामगार भी सदस्य के रूप में बैठते हैं — इसलिए ‘केवल सरकार का दायित्व’ कहना उसके स्वभाव के ही विरुद्ध है। इसी कारण उत्तर विकल्प (d) है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)श्रमिक एक वस्तु नहीं है। — यह घोषणा का पहला और सबसे प्रसिद्ध सिद्धांत है, इसलिए यह विकल्प इस निषेधात्मक प्रश्न का उत्तर नहीं हो सकता। इसका आशय यह है कि श्रम को बाज़ार में बिकने वाली किसी वस्तु की तरह नहीं बरता जा सकता, क्योंकि श्रम मनुष्य से अलग नहीं किया जा सकता — जो बिकता है वह घंटे या श्रम-शक्ति नहीं, बल्कि एक जीवित व्यक्ति का समय और सामर्थ्य है। इसी से यह निष्कर्ष निकलता है कि मजदूरी और काम की दशाएँ केवल माँग और आपूर्ति पर नहीं छोड़ी जा सकतीं और उनके लिए न्यूनतम मानक विधि से तय करने होंगे। इस प्रश्न में एक अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता है: इस विकल्प में भी ‘नहीं’ शब्द आता है, पर वह सामान्य टाइप में है और कथन का अपना अंग है — उसे प्रश्न के मोटे ‘नहीं’ के साथ मिलाकर पढ़ना ही इस प्रश्न की सबसे बड़ी भूल है।
- (b)अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संघ की स्वतंत्रता सतत विकास हेतु अनिवार्य हैं। — यह भी घोषणा का अपना सिद्धांत है, इसलिए यह उत्तर नहीं है। इसका तर्क यह है कि यदि कामगार संगठित नहीं हो सकते और खुलकर बोल नहीं सकते, तो वे अपने हितों के लिए मोल-भाव कर ही नहीं पाएँगे, और तब औद्योगिक संबंध टिकाऊ ढंग से नहीं सुधर सकते। यही सिद्धांत आगे चलकर संगठन के दो सबसे महत्त्वपूर्ण अभिसमयों में मूर्त हुआ — संघ की स्वतंत्रता और संगठित होने के अधिकार के संरक्षण से जुड़ा अभिसमय, तथा संगठित होने और सामूहिक सौदेबाज़ी के अधिकार से जुड़ा अभिसमय — और वे 1998 की मूल सिद्धांतों तथा अधिकारों वाली घोषणा में भी मूल श्रेणी में रखे गए। भारत के संदर्भ में इसी सिद्धांत की छाया संविधान के अनुच्छेद 19 में संगम बनाने की स्वतंत्रता के रूप में दिखती है।
- (c)किसी भी स्थान पर गरीबी, हर एक स्थान पर सम्पन्नता के लिए खतरा है। — यह घोषणा का तीसरा सिद्धांत है और इसीलिए यह भी उत्तर नहीं है। इसका आशय अंतर्राष्ट्रीय है: यदि किसी एक देश में मजदूरी और काम की दशाएँ बहुत नीची रहें, तो वहाँ का सस्ता उत्पादन दूसरे देशों के मानकों पर भी दबाव डालेगा, और इस प्रकार एक जगह की गरीबी सब जगह की समृद्धि के लिए ख़तरा बन जाती है। यही तर्क संगठन के जन्म का भी कारण है — 1919 में उसकी स्थापना इसी विचार पर हुई थी कि श्रम-मानक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तय होने चाहिए, अन्यथा जो देश सुधार करेगा वह प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाएगा। ध्यान दीजिए कि विकल्प (d) इसी तर्क का अंतर्राष्ट्रीय अंश हटा देता है, जिससे वह घोषणा के विरुद्ध चला जाता है, जबकि यह विकल्प उसे ज्यों का त्यों रखता है।
अवधारणा
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना 1919 में वर्साय की संधि के भाग तेरह के अंतर्गत हुई थी, और उसका मूल विचार यही था कि स्थायी शांति सामाजिक न्याय पर ही टिक सकती है। उसकी सबसे बड़ी विशेषता त्रिपक्षीय संरचना है — प्रत्येक सदस्य देश के प्रतिनिधिमंडल में सरकार के दो, नियोक्ताओं का एक और कामगारों का एक प्रतिनिधि होता है, और चारों को समान मताधिकार प्राप्त है। इसके तीन प्रमुख अंग हैं: अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन, जो वर्ष में मिलता है और अभिसमय तथा संस्तुतियाँ अंगीकृत करता है; शासी निकाय, जो कार्यपालक निकाय है; और अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय, जो जिनेवा स्थित स्थायी सचिवालय है। संगठन दो प्रकार के दस्तावेज़ बनाता है — अभिसमय, जिनका अनुसमर्थन करने पर देश विधिक रूप से बँध जाता है, और संस्तुतियाँ, जो मार्गदर्शक होती हैं। भारत इस संगठन का संस्थापक सदस्य है, और संगठन को 1969 में, अपनी पचासवीं वर्षगाँठ पर, नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। ये तीनों अंग मिलकर संगठन की नीति, कार्यपालन और सचिवालय का काम बाँटते हैं।
फिलाडेल्फिया घोषणा 1944 में उस समय अंगीकृत हुई जब दूसरा विश्वयुद्ध समाप्ति की ओर था और युद्ध के बाद की विश्व-व्यवस्था की रूपरेखा बन रही थी। इसीलिए उसका स्वर 1919 के मूल दस्तावेज़ से अधिक व्यापक है: वह केवल काम की दशाओं तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूर्ण रोजगार, जीवन-स्तर में सुधार, सामाजिक सुरक्षा के उपायों के विस्तार, बच्चों के कल्याण तथा मातृत्व के संरक्षण, और सबके लिए शिक्षा तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण के अवसरों की बात करती है। वह यह भी कहती है कि सभी मनुष्यों को, चाहे उनकी नस्ल, धर्म या लिंग कुछ भी हो, स्वतंत्रता और गरिमा के साथ अपनी भौतिक समृद्धि तथा आध्यात्मिक विकास का अधिकार है। 1946 में इस घोषणा को संगठन के संविधान के साथ संलग्न कर दिया गया, जिससे वह संगठन का स्थायी उद्देश्य-वक्तव्य बन गई। इसी परंपरा में आगे 1998 की मूल सिद्धांतों और अधिकारों वाली घोषणा, 2008 की न्यायसंगत वैश्वीकरण हेतु सामाजिक न्याय वाली घोषणा, तथा 2019 की शताब्दी घोषणा आती हैं।
मुख्य तथ्य
- फिलाडेल्फिया घोषणा 1944 में अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन के फिलाडेल्फिया अधिवेशन में अंगीकृत हुई थी और वह संगठन के उद्देश्यों का पुनर्कथन है।
- उसका पहला और सबसे प्रसिद्ध सिद्धांत है — श्रमिक एक वस्तु नहीं है, अर्थात् श्रम को बाज़ार में बिकने वाली किसी वस्तु की तरह नहीं बरता जा सकता।
- दूसरा सिद्धांत है — अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संघ की स्वतंत्रता सतत विकास के लिए अनिवार्य हैं, क्योंकि बिना संगठित हुए मोल-भाव संभव ही नहीं।
- तीसरा सिद्धांत है — किसी भी स्थान पर गरीबी हर स्थान पर सम्पन्नता के लिए ख़तरा है, जो श्रम-मानकों को अंतर्राष्ट्रीय बनाने का मूल तर्क है।
- चौथा सिद्धांत अभाव के विरुद्ध संघर्ष को प्रत्येक राष्ट्र के भीतर तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साझा और त्रिपक्षीय दायित्व बताता है, केवल सरकार का नहीं।
- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना 1919 में वर्साय की संधि के भाग तेरह के अंतर्गत हुई थी, इस विचार पर कि स्थायी शांति सामाजिक न्याय पर ही टिक सकती है।
- उसकी त्रिपक्षीय संरचना में प्रत्येक सदस्य देश की ओर से सरकार के दो तथा नियोक्ताओं और कामगारों का एक-एक प्रतिनिधि होता है; भारत उसका संस्थापक सदस्य है।
- 1946 में यह घोषणा संगठन के संविधान के साथ संलग्न कर दी गई, जिससे वह उसका स्थायी उद्देश्य-वक्तव्य बन गई; संगठन को 1969 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- विकल्प (a) के भीतर आने वाले ‘नहीं’ को प्रश्न के मोटे ‘नहीं’ के साथ मिलाकर पढ़ लेना, जिससे दोहरे निषेध का भ्रम बन जाता है।
- विकल्प (d) का आरंभ पहचाना हुआ लगने से पूरा कथन सही मान लेना; भूल उसके अंतिम अंश में है, जहाँ दायित्व केवल सरकार का बता दिया गया है।
- अभाव के विरुद्ध संघर्ष को केवल राष्ट्रीय दायित्व मान लेना; घोषणा उसे अंतर्राष्ट्रीय प्रयास से भी जोड़ती है।
- फिलाडेल्फिया घोषणा और मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा के उद्धरण आपस में बदल देना; दोनों में सामाजिक सुरक्षा की बात आती है।
इस पेपर में निषेधात्मक प्रश्न सत्रह हैं और उनमें से दो आपके इसी परास में हैं। इस पुस्तिका की एक सुविधा यह है कि वह निषेध को मोटे टाइप में छापती है, इसलिए ‘नहीं’ छूटने की संभावना कम रहती है — पर यहाँ एक और परत है, क्योंकि विकल्प (a) में भी ‘नहीं’ आता है और वह कथन का अपना अंग है। ऐसे प्रश्नों में सबसे सुरक्षित पद्धति यह है कि पहले चारों विकल्पों को सही या ग़लत का चिह्न लगाकर पढ़ लीजिए, और उसके बाद प्रश्न पर लौटकर देखिए कि उसे किस चिह्न वाला विकल्प चाहिए। जहाँ तक इस विषय का प्रश्न है, यह घोषणा और उसके चार सिद्धांत श्रम विधि के हर पाठ्यक्रम की आरंभिक सामग्री हैं, इसलिए इन्हें शब्दशः नहीं तो भाव-रूप में अवश्य याद रखना चाहिए। परीक्षा प्रायः किसी एक सिद्धांत का अंतिम अंश बदलकर विकल्प बनाती है, जैसे यहाँ बनाया गया है — इसलिए कथन को अंत तक पढ़िए, आरंभ पहचानकर रुक मत जाइए।
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EPFO_EOAO_2017_Q86खोलें व हल करें →“Everyone as a member of the society has the right to social security, and is entitled to realization through national efforts and international cooperation and in accordance with the organization and resources of each state of economic, social and cultural rights indispensable for his dignity and free development of his personality.” This statement which is emphasizing the importance of social security has been expressed in which of the following?
- (a) Universal Declaration of Human Rights
- (b) Philadelphia Declaration of the ILO
- (c) Report of the First National Commission on Labour
- (d) Directive Principles of State Policy of the Indian Constitution
उत्तर(a) Universal Declaration of Human Rights
इसी पेपर का प्रश्न 86 सामाजिक सुरक्षा वाले एक उद्धरण का स्रोत पूछता है और उसके विकल्पों में फिलाडेल्फिया घोषणा भी है — दोनों दस्तावेज़ों का भेद वहीं जाँचा जाता है।
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- (d) Under the Welfare Approach to Human Development, the Government protects and promotes private entrepreneurs to maximize expenditure on welfare.
उत्तर(d) Under the Welfare Approach to Human Development, the Government protects and promotes private entrepreneurs to maximize expenditure on welfare.
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अभ्यास
- practice — not a real PYQ
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के उद्देश्यों का पुनर्कथन करने वाली फिलाडेल्फिया घोषणा किस वर्ष अंगीकृत की गई थी?
- (a)1919
- (b)1930
- (c)1944
- (d)1948
उत्तर(c) 1944
- practice — not a real PYQ
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की त्रिपक्षीय संरचना में निम्नलिखित में से किसका प्रतिनिधित्व नहीं होता?
- (a)सरकारें
- (b)नियोक्ता
- (c)कामगार
- (d)ग़ैर-सरकारी संगठन
उत्तर(d) ग़ैर-सरकारी संगठन