निर्माण-कार्य समिति, सुरक्षा समिति और कैंटीन प्रबंधन समिति किसके उदाहरण हैं?
- (a)प्रबंधन में कामगारों की भागीदारी
- (b)कामगारों की शिक्षा योजना
- (c)कामगारों की सहकारी समिति
- (d)कामगारों की सुझाव योजना
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) प्रबंधन में कामगारों की भागीदारी। प्रश्न में गिनाई गई तीनों समितियों में एक ही बात साझी है — तीनों द्विपक्षीय हैं, अर्थात् उनमें नियोक्ता के प्रतिनिधि और कामगारों के प्रतिनिधि साथ बैठते हैं और प्रतिष्ठान से जुड़े किसी विषय पर मिलकर विचार करते हैं। यही प्रबंधन में कामगारों की भागीदारी की परिभाषा है। तीनों को अलग-अलग देखिए। कार्य समिति औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 3 से आती है; ऐसे औद्योगिक स्थापन में जहाँ पिछले बारह महीनों में किसी दिन एक सौ या उससे अधिक कामगार नियोजित रहे हों, समुचित सरकार नियोक्ता से इसे गठित कराने की अपेक्षा कर सकती है। इसमें नियोक्ता और कामगारों दोनों के प्रतिनिधि होते हैं और कामगारों के प्रतिनिधियों की संख्या नियोक्ता के प्रतिनिधियों से कम नहीं होगी। उसका काम है नियोक्ता और कामगारों के बीच सद्भाव तथा अच्छे संबंध बनाए रखने के उपायों को बढ़ावा देना और साझे हित के विषयों पर अपनी राय देना। सुरक्षा समिति फैक्टरी अधिनियम, 1948 की धारा 41G से आती है, जो संकटमय प्रक्रिया चलाने वाली प्रत्येक फैक्टरी में ऐसी समिति गठित कराती है जिसमें श्रमिकों और प्रबंधन के प्रतिनिधि समान संख्या में हों। कैंटीन प्रबंधन समिति उसी अधिनियम की धारा 46 और उसके अधीन बने राज्य-नियमों से आती है, जिनमें कैंटीन के संचालन पर निगरानी के लिए कामगारों के प्रतिनिधियों वाली समिति की व्यवस्था है। तीनों में कामगार निर्णय-प्रक्रिया में सम्मिलित होते हैं, इसलिए तीनों भागीदारी के उदाहरण हैं और उत्तर विकल्प (a) है। एक बात और, जो इस प्रश्न को आगे के प्रश्नों से जोड़ती है: ये तीनों समितियाँ द्विपक्षीय हैं, अर्थात् उनमें केवल नियोक्ता और कामगार बैठते हैं। इनसे भिन्न त्रिपक्षीय निकाय भी होते हैं, जिनमें सरकार भी सम्मिलित होती है, जैसे भारतीय श्रम सम्मेलन और स्थायी श्रम समिति। दोनों प्रकार के निकायों का उद्देश्य अलग है — द्विपक्षीय निकाय प्रतिष्ठान के भीतर के प्रश्न सुलझाते हैं और त्रिपक्षीय निकाय नीति के प्रश्न।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)कामगारों की शिक्षा योजना — कामगारों की शिक्षा का उद्देश्य प्रशिक्षण है, निर्णय में सहभागिता नहीं। ऐसी योजनाओं में कामगारों को उनके अधिकारों, कर्तव्यों, ट्रेड यूनियन की कार्यपद्धति, सुरक्षा तथा उत्पादकता के विषय में पढ़ाया जाता है, और इसके लिए प्रायः श्रमिक-शिक्षकों को तैयार किया जाता है जो अपने ही प्रतिष्ठान में कक्षाएँ लेते हैं। यह उपयोगी काम है और भागीदारी की पूर्व-शर्त भी माना जाता है, क्योंकि अशिक्षित प्रतिनिधि समिति में प्रभावी नहीं हो पाता — पर वह भागीदारी स्वयं नहीं है। भेद इस प्रश्न से पूछिए: क्या इस व्यवस्था में कामगार का प्रतिनिधि प्रबंधन के साथ किसी विषय पर विचार-विमर्श करता है? शिक्षा योजना में ऐसा नहीं होता; तीनों नामित समितियों में होता है।
- (c)कामगारों की सहकारी समिति — कामगारों की सहकारी समिति में कामगार स्वयं स्वामी होते हैं — वे मिलकर एक उपक्रम बनाते हैं, उसकी पूँजी लगाते हैं और उसे सहकारी विधि के अंतर्गत पंजीकृत कराकर चलाते हैं। यह स्वामित्व का रूप है, किसी दूसरे के उपक्रम के प्रबंधन में भाग लेने का नहीं। प्रश्न में गिनाई गई तीनों समितियाँ नियोक्ता के प्रतिष्ठान के भीतर बनती हैं, जहाँ स्वामित्व नियोक्ता का ही रहता है और कामगार केवल कुछ विषयों पर विचार-विमर्श में सम्मिलित होते हैं। इस भेद को इस प्रकार पकड़िए: सहकारी समिति में पूँजी और लाभ कामगारों के होते हैं; भागीदारी में केवल आवाज़ कामगारों की होती है, पूँजी नहीं। दोनों को एक मान लेना श्रम-संबंधों की सबसे बुनियादी सीमा को मिटा देना है।
- (d)कामगारों की सुझाव योजना — सुझाव योजना में कोई भी कामगार अकेले, अपने नाम से, उत्पादन या कार्य-पद्धति सुधारने का सुझाव पेटी में डालता है; प्रबंधन उसे परखता है और उपयोगी निकलने पर पुरस्कार दे देता है। इसमें तीन बातें अनुपस्थित हैं जो भागीदारी के लिए आवश्यक हैं — प्रतिनिधित्व, संस्थागत मंच, और नियमित विचार-विमर्श। सुझाव व्यक्ति देता है, कामगारों का चुना हुआ प्रतिनिधि नहीं; कोई स्थायी निकाय नहीं बनता; और सुझाव मानना या न मानना पूरी तरह प्रबंधन के विवेक पर रहता है। इसके विपरीत कार्य समिति, सुरक्षा समिति और कैंटीन प्रबंधन समिति तीनों स्थायी निकाय हैं, तीनों में कामगारों के प्रतिनिधि बैठते हैं, और तीनों की व्यवस्था विधि अथवा उसके अधीन बने नियमों में की गई है।
अवधारणा
प्रबंधन में कामगारों की भागीदारी का अर्थ है कि उपक्रम से जुड़े निर्णयों में कामगारों को किसी न किसी रूप में आवाज़ मिले। इसकी कई सीढ़ियाँ मानी जाती हैं और वे बढ़ते क्रम में चलती हैं। सबसे नीचे सूचना का आदान-प्रदान है, जिसमें प्रबंधन कामगारों को अपने निर्णय बताता है। उससे ऊपर परामर्श है, जिसमें निर्णय से पहले कामगारों की राय ली जाती है, पर निर्णय प्रबंधन का ही रहता है — कार्य समिति और सुरक्षा समिति मुख्यतः इसी स्तर पर काम करती हैं। उससे ऊपर सह-निर्णय है, जिसमें कुछ विषयों पर निर्णय संयुक्त रूप से लिया जाता है। और सबसे ऊपर स्व-प्रबंधन है, जिसमें कामगार स्वयं उपक्रम चलाते हैं। भारत में भागीदारी मुख्यतः पहली तीन सीढ़ियों तक ही रही है, और उसका सबसे व्यापक रूप विधिक अथवा योजनागत समितियाँ ही हैं। इसी कारण किसी भी द्विपक्षीय समिति का नाम आते ही उसे भागीदारी के परिवार में रखना चाहिए, चाहे उसका विषय सुरक्षा हो, कैंटीन हो या सामान्य संबंध। भारत में यह पूरी सीढ़ी एक साथ नहीं चढ़ी गई, बल्कि अलग-अलग समय पर अलग-अलग पायदान आज़माए गए।
भारत में इस विषय की नींव संविधान में ही रखी गई है — राज्य की नीति के निदेशक तत्त्वों में अनुच्छेद 43A राज्य से यह अपेक्षा करता है कि वह उपयुक्त विधान अथवा किसी अन्य रीति से उद्योगों में लगे उपक्रमों, स्थापनों या अन्य संगठनों के प्रबंध में कामगारों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए क़दम उठाए; इसी पेपर का प्रश्न 78 इसी अनुच्छेद पर है। विधिक स्तर पर सबसे पुराना निकाय कार्य समिति है, जो 1947 के औद्योगिक विवाद अधिनियम से आई। उसके बाद 1958 में संयुक्त प्रबंधन परिषदों की योजना आरंभ हुई, जो द्वितीय पंचवर्षीय योजना और भारतीय श्रम सम्मेलन की संस्तुतियों से निकली थी और जो स्वैच्छिक थी। सत्तर के दशक में सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ उपक्रमों तथा राष्ट्रीयकृत बैंकों में निदेशक मंडल में कामगारों के प्रतिनिधि रखने का प्रयोग हुआ। 1975 में संकट-काल के दौरान दुकान परिषदों और संयुक्त परिषदों की योजना आई, और 1983 में उसका संशोधित रूप। इन सब प्रयोगों की साझी कठिनाई यही रही कि अधिकांश व्यवस्थाएँ परामर्शी थीं, इसलिए उनके निर्णय बाध्यकारी नहीं होते थे।
मुख्य तथ्य
- कार्य समिति औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 3 के अंतर्गत गठित होती है और वह इस अधिनियम का सबसे पुराना भागीदारी-निकाय है।
- यह उन औद्योगिक स्थापनों के लिए है जहाँ एक सौ या उससे अधिक कामगार नियोजित हों, अथवा पिछले बारह महीनों में किसी दिन नियोजित रहे हों।
- कार्य समिति में नियोक्ता और कामगार दोनों के प्रतिनिधि होते हैं, और कामगारों के प्रतिनिधियों की संख्या नियोक्ता के प्रतिनिधियों की संख्या से कम नहीं होगी।
- उसका कार्य नियोक्ता और कामगारों के बीच सद्भाव तथा अच्छे संबंध बनाए रखने के उपायों को बढ़ावा देना और साझे हित के विषयों पर अपनी राय देना है।
- सुरक्षा समिति फैक्टरी अधिनियम, 1948 की धारा 41G के अंतर्गत संकटमय प्रक्रिया वाली फैक्टरियों में गठित होती है, जिसमें श्रमिकों और प्रबंधन के प्रतिनिधि समान संख्या में होते हैं।
- कैंटीन की व्यवस्था फैक्टरी अधिनियम, 1948 की धारा 46 से आती है और कैंटीन प्रबंधन समिति की व्यवस्था उसके अधीन बने राज्य-नियमों में है।
- संविधान का अनुच्छेद 43A राज्य से उद्योगों के प्रबंध में कामगारों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए क़दम उठाने की अपेक्षा करता है।
- संयुक्त प्रबंधन परिषदों की योजना 1958 में आरंभ हुई, वह द्वितीय पंचवर्षीय योजना तथा भारतीय श्रम सम्मेलन की संस्तुतियों से निकली थी, और वह स्वैच्छिक थी।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- भागीदारी और सहकारी स्वामित्व को एक मान लेना; सहकारी समिति में पूँजी और लाभ दोनों कामगारों के होते हैं, जबकि भागीदारी में केवल आवाज़ उनकी होती है।
- सुझाव योजना को भागीदारी मान लेना; उसमें प्रतिनिधित्व, स्थायी मंच और नियमित विचार-विमर्श — तीनों अनुपस्थित हैं।
- कार्य समिति को विवाद निपटाने वाला निकाय समझ लेना; वह सद्भाव बढ़ाने और साझे हित के विषयों पर राय देने वाला निकाय है, निर्णायक नहीं।
- यह मान लेना कि तीनों समितियाँ एक ही अधिनियम से आती हैं; कार्य समिति 1947 के अधिनियम से और शेष दो 1948 के फैक्टरी अधिनियम से आती हैं।
इस पेपर का सबसे बड़ा खंड श्रम विधि और औद्योगिक संबंधों का है — प्रश्न 71 से 90 तक पूरे बीस प्रश्न — और उसमें दो प्रकार के प्रश्न बार-बार आते हैं। पहला प्रकार वर्गीकरण का है, जैसे यहाँ: कुछ नाम गिनाकर पूछ लिया जाता है कि वे किस श्रेणी के उदाहरण हैं। दूसरा प्रकार धारा, अनुच्छेद या अनुसूची की संख्या पूछता है। पहले प्रकार के लिए सबसे अच्छी तैयारी यह है कि हर संस्था के साथ तीन बातें याद रखिए — वह किस अधिनियम से आती है, उसमें कौन-कौन बैठता है, और उसका काम क्या है। तीसरी बात ही श्रेणी तय करती है: जिसमें दोनों पक्ष साथ बैठकर विचार करते हों वह भागीदारी है; जिसमें केवल पढ़ाया जाता हो वह शिक्षा है; जिसमें कामगार स्वयं स्वामी हों वह सहकारिता है। इस एक कसौटी से इस श्रेणी के अधिकांश प्रश्न सीधे निकल आते हैं।
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