परेषण (भेजे हुए माल) पर असामान्य हानि किस लेखे में क्रेडिट की जाती है?
- (a)लाभ और हानि लेखा
- (b)परेषिती का लेखा
- (c)परेषण लेखा
- (d)आय एवं व्यय लेखा
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) परेषण लेखा। परेषण में माल भेजने वाला परेषक कहलाता है और जिसे भेजा जाता है वह परेषिती; माल बिकने तक उसका स्वामित्व परेषक के ही पास रहता है, इसलिए उस माल की हर हानि परेषक के खाते में हिसाब में आती है। परेषक अपनी बहियों में एक परेषण लेखा बनाता है, जिसके नामे पक्ष में भेजे गए माल की लागत और सभी व्यय जाते हैं और जमा पक्ष में बिक्री तथा अंतिम शेष माल का मूल्य। इस लेखे का काम यह बताना है कि उस एक परेषण से वास्तव में कितना लाभ या हानि हुई। अब असामान्य हानि पर आइए। असामान्य हानि वह है जो माल के स्वभाव से नहीं, किसी दुर्घटना से होती है — आग, चोरी, वाहन-दुर्घटना। ऐसी हानि को परेषण के परिणाम में मिलाकर छोड़ देना ग़लत होगा, क्योंकि तब यह पता ही नहीं चलेगा कि सामान्य कारोबार कितना लाभ देता है; इसलिए उसे परेषण लेखे से बाहर निकाला जाता है। बाहर निकालने की प्रविष्टि यही है — असामान्य हानि लेखा नामे और परेषण लेखा जमा। इसी कारण उत्तर विकल्प (c) है। असामान्य हानि का मूल्यांकन आनुपातिक लागत में उन व्ययों का आनुपातिक भाग जोड़कर किया जाता है जो माल को उस स्थिति तक लाने में लगे थे। इसके बाद यदि बीमा था तो बीमा कंपनी से मिलने वाली राशि असामान्य हानि लेखे में जमा होती है, और जो शुद्ध हानि बचती है वह लाभ और हानि लेखे में भेज दी जाती है — पर वहाँ वह नामे होती है, जमा नहीं, और यही इस प्रश्न की असली परीक्षा है। इसकी तुलना सामान्य हानि से कीजिए, जो सूखने, रिसने या उड़ जाने से होती है; उसके लिए कोई अलग प्रविष्टि नहीं होती और बची हुई इकाइयों की प्रति इकाई लागत अपने आप बढ़ जाती है। अंत में एक तुलना, जो इस अध्याय को स्मृति में बाँध देती है: सामान्य हानि लागत का अंग बन जाती है और परेषण लेखे में कहीं अलग से दिखती ही नहीं, जबकि असामान्य हानि परेषण लेखे से बाहर निकाली जाती है ताकि उस परेषण का असली परिणाम विकृत न हो। दोनों का उद्देश्य एक ही है — यह बताना कि सामान्य कारोबार से कितना लाभ हुआ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)लाभ और हानि लेखा — यह विकल्प इसलिए ख़तरनाक है कि उसमें आधी बात सच है — असामान्य हानि अंततः लाभ और हानि लेखे तक पहुँचती ही है। पर दो अंतर निर्णायक हैं। पहला, दिशा का: लाभ और हानि लेखे में वह नामे की जाती है, क्योंकि वह हानि है; प्रश्न पूछ रहा है कि जमा किस लेखे में की जाती है। दूसरा, क्रम का: वह वहाँ सीधे नहीं जाती, बल्कि पहले असामान्य हानि लेखा बनता है, उसमें बीमा से मिलने वाली राशि जमा होती है, और तब जो शुद्ध हानि बचती है वही लाभ और हानि लेखे में भेजी जाती है। इसलिए यदि बीमा से पूरी भरपाई हो गई हो तो लाभ और हानि लेखे तक कुछ पहुँचेगा ही नहीं, जबकि परेषण लेखे का जमा तब भी होगा। इससे स्पष्ट है कि प्रश्न का उत्तर परेषण लेखा ही है।
- (b)परेषिती का लेखा — परेषिती का लेखा एक वैयक्तिक लेखा है, जो परेषक की बहियों में परेषिती के साथ हिसाब रखता है। उसमें परेषिती को बिक्री की राशि से नामे किया जाता है, और उसके द्वारा किए गए व्यय, उसका कमीशन तथा उसके द्वारा भेजी गई राशि से जमा किया जाता है। असामान्य हानि का उससे कोई संबंध नहीं है, क्योंकि माल का स्वामित्व परेषक के पास रहता है और आग या चोरी से हुई हानि परेषिती का दायित्व नहीं बनती — जब तक कि वह उसकी लापरवाही से न हुई हो, जो एक अलग स्थिति है और अलग प्रविष्टि माँगती है। परेषण के प्रश्नों में यह भेद बार-बार काम आता है: जो कुछ माल के स्वामित्व से जुड़ा है वह परेषण लेखे में जाता है, और जो कुछ परेषिती के साथ लेन-देन से जुड़ा है वह उसके वैयक्तिक लेखे में।
- (d)आय एवं व्यय लेखा — आय एवं व्यय लेखा अलाभकारी संस्थाएँ बनाती हैं — क्लब, अस्पताल, पुस्तकालय, धर्मार्थ न्यास — और वह उनके लिए लाभ और हानि लेखे का स्थान लेता है। परेषण एक व्यापारिक व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य लाभ कमाना है, इसलिए उसकी बहियों में यह लेखा बनता ही नहीं। यह विकल्प इसी पेपर के दूसरे लेखांकन प्रश्नों से उठाकर यहाँ रख दिया गया है, ताकि परिचित नाम देखकर हाथ उधर चला जाए। ऐसे विकल्प को काटने का सबसे तेज़ तरीका यह पूछना है कि यह लेखा किस प्रकार की इकाई बनाती है; यदि वह इकाई प्रश्न में है ही नहीं, तो लेखा भी नहीं हो सकता।
अवधारणा
परेषण उस व्यवस्था का नाम है जिसमें एक व्यापारी अपना माल दूसरे व्यापारी को इसलिए भेजता है कि वह उसे अपनी ओर से बेचे और बदले में कमीशन ले। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बिक्री नहीं है — माल का स्वामित्व अंतिम ग्राहक को बेचे जाने तक परेषक के ही पास रहता है। इसी एक तथ्य से परेषण के सारे लेखांकन नियम निकलते हैं: बिना बिका माल परेषक का स्टॉक कहलाता है और उसकी बहियों में दिखता है; माल की हानि परेषक की हानि होती है; और परेषिती केवल एक अभिकर्ता है, क्रेता नहीं। परेषक तीन लेखे बनाता है — परेषण लेखा, जो उस परेषण का लाभ-हानि निकालता है; परेषिती का लेखा, जो उसके साथ का हिसाब रखता है; और भेजे गए माल का लेखा, जो अंत में क्रय या व्यापार लेखे में बंद कर दिया जाता है। कमीशन भी कई प्रकार का होता है — साधारण कमीशन, अधिशेष मूल्य पर मिलने वाला कमीशन, और डेल क्रेडेरे कमीशन, जो लेने पर परेषिती डूबत ऋण का जोखिम भी अपने ऊपर ले लेता है। इन तीनों लेखों को साथ-साथ बनाना ही परेषण के प्रश्नों का सामान्य रूप है।
हानि के दो प्रकारों का भेद परेषण के अध्याय का सबसे अधिक पूछा जाने वाला भाग है। सामान्य हानि माल के अपने स्वभाव से होती है — तरल का उड़ जाना, अनाज का सूखना, कोयले का चूरा हो जाना — और वह अपरिहार्य होती है, इसलिए उसे लागत का ही एक अंग माना जाता है। उसके लिए कोई अलग प्रविष्टि नहीं होती; केवल यह होता है कि कुल लागत को बची हुई कम इकाइयों पर बाँटा जाता है, जिससे प्रति इकाई लागत बढ़ जाती है और अंतिम शेष माल उसी बढ़ी हुई दर पर आँका जाता है। असामान्य हानि आकस्मिक और परिहार्य होती है — आग, चोरी, दुर्घटना — और उसे परेषण लेखे से अलग निकाला जाता है, ताकि परेषण का परिणाम विकृत न हो। उसका मूल्यांकन आनुपातिक लागत में उन व्ययों का आनुपातिक भाग जोड़कर होता है जो माल को उस स्थिति तक लाने में लगे; परेषिती के वे व्यय जो माल आने के बाद के हैं, इसमें नहीं जुड़ते। यही तर्क अंतिम शेष माल के मूल्यांकन में भी लगता है, इसलिए दोनों गणनाएँ साथ-साथ सीखनी चाहिए।
मुख्य तथ्य
- परेषण में माल का स्वामित्व अंतिम ग्राहक को बिक्री होने तक परेषक के पास ही रहता है; परेषिती स्वामी नहीं, केवल कमीशन पर बेचने वाला अभिकर्ता होता है।
- असामान्य हानि की जर्नल प्रविष्टि है — असामान्य हानि लेखा नामे और परेषण लेखा जमा, अर्थात् वह हानि परेषण के परिणाम से बाहर निकाल दी जाती है।
- इसी प्रविष्टि के कारण असामान्य हानि परेषण लेखे में जमा की जाती है, और यही इस प्रश्न का उत्तर है।
- असामान्य हानि का मूल्यांकन आनुपातिक लागत में उन व्ययों का आनुपातिक भाग जोड़कर होता है जो माल को उस स्थिति तक लाने में लगे।
- बीमा से मिलने वाली राशि असामान्य हानि लेखे में जमा होती है, और उसके बाद जो शुद्ध हानि बचती है वही लाभ और हानि लेखे में नामे की जाती है।
- सामान्य हानि माल के अपने स्वभाव से होती है और उसके लिए कोई अलग प्रविष्टि नहीं होती; कुल लागत बची हुई कम इकाइयों पर बँटने से प्रति इकाई लागत बढ़ जाती है।
- परेषिती का लेखा वैयक्तिक लेखा है — उसे बिक्री की राशि से नामे किया जाता है, तथा उसके किए व्ययों, उसके कमीशन और उसके भेजे गए धन से जमा किया जाता है।
- डेल क्रेडेरे कमीशन लेने पर परेषिती उधार बिक्री के डूबत ऋण का जोखिम स्वयं अपने ऊपर ले लेता है, इसलिए वह सामान्य कमीशन से अधिक होता है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- लाभ और हानि लेखे को उत्तर मान लेना; वहाँ असामान्य हानि नामे होती है और वह भी असामान्य हानि लेखे से होकर आती है।
- सामान्य और असामान्य हानि का व्यवहार आपस में बदल देना; सामान्य हानि की कोई अलग प्रविष्टि होती ही नहीं, वह शेष इकाइयों की लागत में समा जाती है।
- असामान्य हानि के मूल्यांकन में परेषिती के आवर्ती व्यय भी जोड़ देना; उसमें केवल वे व्यय आते हैं जो माल को उस स्थिति तक लाने में लगे थे।
- परेषिती को क्रेता मान लेना; माल बिकने तक स्वामित्व परेषक के पास ही रहता है और बिना बिका माल उसी का स्टॉक कहलाता है।
परेषण, संयुक्त उद्यम और शाखा लेखे — ये तीनों मिलकर लेखाशास्त्र का वह खंड बनाते हैं जिसे विशिष्ट लेखे कहा जाता है, और EPFO की लेखा-अधिकारी वाली भर्ती में यह खंड लगभग हर बार आता है। इसी पेपर में तीनों एक साथ पूछे गए हैं, प्रश्न 64, 65 और 67 में। इनमें प्रश्न प्रायः एक ही ढाँचे के होते हैं: कोई एक घटना बताकर पूछ लिया जाता है कि वह किस लेखे में नामे या जमा होगी, और विकल्पों में उसी अध्याय के तीन-चार लेखे रख दिए जाते हैं। ऐसे प्रश्न में दो बातें साथ-साथ जाँचिए — कौन-सा लेखा, और कौन-सा पक्ष; क्योंकि विकल्प प्रायः सही लेखे का ग़लत पक्ष या सही पक्ष का ग़लत लेखा देते हैं। तैयारी की दृष्टि से सबसे उपयोगी अभ्यास यह है कि हर अध्याय की प्रमुख प्रविष्टियों की एक सूची बनाइए, जिसमें बाईं ओर घटना और दाईं ओर पूरी जर्नल प्रविष्टि लिखी हो; उससे लेखा और पक्ष दोनों एक साथ स्मृति में बैठते हैं।
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