वसीयतें साधारणतया
- (a)पूँजीकृत होती हैं तथा तुलनपत्र में ली जाती हैं
- (b)आय के रूप में मानी जाती हैं
- (c)व्यय के रूप में मानी जाती हैं
- (d)पूँजीकृत होती हैं तथा उचंत लेखा में ली जाती हैं
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) पूँजीकृत होती हैं तथा तुलनपत्र में ली जाती हैं। वसीयत या वसीयती दान वह राशि है जो किसी अलाभकारी संस्था को किसी मृत व्यक्ति की वसीयत के अनुसार मिलती है। ऐसी प्राप्ति की दो पहचानें हैं और दोनों एक ही निष्कर्ष पर ले जाती हैं। पहली, वह बार-बार नहीं मिलती — वसीयत एक ही बार फलित होती है, इसलिए उसे चालू वर्ष की सामान्य आय मानकर उसी वर्ष के आय एवं व्यय लेखे में डाल देना संस्था की उस वर्ष की स्थिति को झूठा अच्छा दिखा देगा। दूसरी, वह संस्था के स्थायी संसाधनों में वृद्धि करती है, चालू संचालन की कमाई नहीं है। इन दोनों कारणों से लेखांकन उसे पूँजीगत प्राप्ति मानता है: उसे पूँजीकृत किया जाता है और तुलनपत्र के दायित्व पक्ष में पूँजी कोष में जोड़कर दिखाया जाता है। प्रश्न-वाक्य का शब्द ‘साधारणतया’ ध्यान देने योग्य है, क्योंकि वह अपवाद के लिए जगह छोड़ता है — यदि वसीयत की राशि बहुत छोटी हो तो पाठ्यपुस्तकें उसे उसी वर्ष की आय मानकर आय एवं व्यय लेखे में ले जाने की छूट देती हैं, और यदि वसीयत किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए हो तो उसे उसी नाम का अलग कोष बनाकर रखना होता है। पर सामान्य नियम, जो प्रश्न पूछ रहा है, वही है जो विकल्प (a) में लिखा है। ध्यान रखिए कि वसीयत रोकड़ में मिलती है, इसलिए वह प्राप्ति एवं भुगतान लेखे के प्राप्ति पक्ष में भी दिखेगी — पर वहाँ दिखना उसके वर्गीकरण का प्रश्न हल नहीं करता, क्योंकि उस लेखे में हर प्रकार की रोकड़ आती है। एक अंतिम कसौटी, जो इस अध्याय के हर प्रश्न पर काम करती है: पूछिए कि यह प्राप्ति हर वर्ष लौटेगी या नहीं। जो हर वर्ष लौटती है वह आगमी है और आय एवं व्यय लेखे में जाती है; जो एक बार आती है और संस्था के स्थायी संसाधन बढ़ाती है वह पूँजीगत है और तुलनपत्र में जाती है। वसीयत दूसरी श्रेणी की है, इसलिए उसका ठिकाना तुलनपत्र है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)आय के रूप में मानी जाती हैं — यह विकल्प अपवाद को नियम बना देता है। यह सच है कि जब वसीयत की राशि बहुत छोटी होती है, तब उसे उसी वर्ष की आय मानकर आय एवं व्यय लेखे के जमा पक्ष में ले जाने की छूट पाठ्यपुस्तकें देती हैं; पर वह छूट है, सामान्य व्यवहार नहीं, और प्रश्न-वाक्य ने ‘साधारणतया’ कहकर सामान्य व्यवहार ही पूछा है। सामान्य व्यवहार पूँजीकरण का है, क्योंकि वसीयत आवर्ती प्राप्ति नहीं है। इस भेद को याद रखने का सरल सूत्र यह है कि अलाभकारी संस्था में वार्षिक सदस्यता शुल्क जैसी नियमित मदें आगमी होती हैं, और आजीवन सदस्यता शुल्क, वसीयत तथा किसी विशिष्ट कोष के लिए मिला दान जैसी एक-बारगी मदें पूँजीगत होती हैं।
- (c)व्यय के रूप में मानी जाती हैं — यह विकल्प दिशा ही उलट देता है। वसीयत संस्था को प्राप्त होने वाली राशि है, संस्था द्वारा किया गया कोई भुगतान नहीं; इसलिए वह किसी भी स्थिति में व्यय नहीं हो सकती। सबसे उदार पाठ में भी उसके दो ही ठिकाने बनते हैं — या तो पूँजी कोष में जोड़ी जाए, या छोटी राशि होने पर आय मानकर आय एवं व्यय लेखे के जमा पक्ष में ले ली जाए; दोनों ही स्थितियों में वह जमा पक्ष की मद है। चार विकल्पों वाले ऐसे प्रश्न में यह विकल्प वस्तुतः उपहार है, क्योंकि इसे पहचानने के लिए वसीयत के लेखांकन का ज्ञान भी आवश्यक नहीं — केवल यह देखना पर्याप्त है कि पैसा आ रहा है या जा रहा है।
- (d)पूँजीकृत होती हैं तथा उचंत लेखा में ली जाती हैं — इस विकल्प का पहला आधा सही है और दूसरा आधा ग़लत — यही इसे विकल्प (a) का सबसे निकट का प्रतिद्वंद्वी बनाता है। उचंत लेखा एक अस्थायी खाता है, जो तब खोला जाता है जब तलपट मेल न खाए या जब कोई प्राप्ति अथवा भुगतान किस खाते का है यह तत्काल तय न हो सके; उसका काम केवल अनिश्चितता को कहीं रोक रखना है, और भूल पकड़ते ही उसे बंद कर दिया जाता है। वसीयत में ऐसी कोई अनिश्चितता नहीं है — वह किसकी है, किस कारण मिली है और किस कोष में जाएगी, यह सब ज्ञात रहता है। इसके अलावा ‘पूँजीकृत करना’ और ‘उचंत लेखे में रखना’ आपस में विरोधी हैं, क्योंकि पूँजीकरण का अर्थ ही यह है कि राशि को स्थायी रूप से पूँजी कोष में मिला दिया जाए।
अवधारणा
अलाभकारी संस्था के लेखांकन की धुरी यह भेद है कि कौन-सी प्राप्ति आगमी है और कौन-सी पूँजीगत। आगमी प्राप्तियाँ वे हैं जो संस्था के सामान्य वार्षिक संचालन से बार-बार आती हैं — वार्षिक सदस्यता शुल्क, सामान्य दान, निवेश पर ब्याज, कमरों का किराया, पुराने अख़बारों की बिक्री। ये आय एवं व्यय लेखे के जमा पक्ष में जाती हैं और उसी वर्ष की आय बनती हैं। पूँजीगत प्राप्तियाँ वे हैं जो एक बार मिलती हैं या जिनसे संस्था के स्थायी संसाधन बढ़ते हैं — वसीयत, आजीवन सदस्यता शुल्क, किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए मिला दान, स्थायी संपत्ति की बिक्री, पूँजीगत प्रयोजन के लिए मिला अनुदान। ये तुलनपत्र में जाती हैं, प्रायः पूँजी कोष में जुड़कर या अपने नाम का अलग कोष बनकर। यही कारण है कि वसीयत को पूँजीकृत किया जाता है। विशिष्ट प्रयोजन वाली प्राप्ति का व्यवहार और भी कड़ा है: उसे उसी प्रयोजन के कोष में रखना पड़ता है और उससे जुड़ा व्यय उसी कोष में से घटाया जाता है, आय एवं व्यय लेखे में नहीं। यही कारण है कि अलाभकारी संस्था के प्रश्नों में सबसे पहले हर मद को इन्हीं दो खानों में बाँटने की आदत डालनी चाहिए।
अलाभकारी संस्थाएँ — क्लब, अस्पताल, विद्यालय, पुस्तकालय, धर्मार्थ न्यास — तीन विवरण बनाती हैं। पहला, प्राप्ति एवं भुगतान लेखा, जो रोकड़ बही का वर्गीकृत सारांश है; उसमें वर्ष भर की हर रोकड़ आवक-जावक आती है, चाहे आगमी हो या पूँजीगत, और चाहे चालू वर्ष की हो या किसी और वर्ष की। इसीलिए वसीयत उसमें भी दिखेगी, और उसमें दिखने से वह आय नहीं बन जाती। दूसरा, आय एवं व्यय लेखा, जो लाभ और हानि लेखे का समतुल्य है और उपचय आधार पर केवल चालू वर्ष की आगमी मदें लेता है; उसका शेष अधिशेष या घाटा कहलाता है। तीसरा, तुलनपत्र, जिसमें पूँजी के स्थान पर पूँजी कोष होता है और जिसमें विशिष्ट कोष अलग-अलग दिखाए जाते हैं। इन तीनों के बीच वसीयत का रास्ता स्पष्ट है — वह पहले विवरण में रोकड़ के रूप में आती है और तीसरे विवरण में कोष के रूप में ठहरती है; दूसरे विवरण से वह साधारणतया होकर नहीं गुज़रती।
मुख्य तथ्य
- वसीयत अथवा वसीयती दान वह राशि है जो किसी अलाभकारी संस्था को किसी मृत व्यक्ति की वसीयत के अनुसार, उसकी अंतिम इच्छा के पालन में प्राप्त होती है।
- साधारणतया वह पूँजीगत प्राप्ति मानी जाती है, अर्थात् उसे पूँजीकृत किया जाता है और तुलनपत्र के दायित्व पक्ष में पूँजी कोष में जोड़कर दिखाया जाता है।
- यदि राशि बहुत छोटी हो तो उसे उसी वर्ष की आय मानकर आय एवं व्यय लेखे में ले जाने की छूट दी जाती है — यह अपवाद है, नियम नहीं।
- यदि वसीयत किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए दी गई हो, तो उसे सामान्य पूँजी कोष में न मिलाकर उसी प्रयोजन के नाम का अलग कोष बनाकर रखा जाता है।
- वसीयत रोकड़ के रूप में आती है, इसलिए वह प्राप्ति एवं भुगतान लेखे के प्राप्ति पक्ष में भी दिखती है; पर उस लेखे में हर प्रकार की रोकड़ आती है, इसलिए वहाँ दिखना उसे आय नहीं बनाता।
- अलाभकारी संस्था की अन्य प्रमुख पूँजीगत प्राप्तियाँ हैं — आजीवन सदस्यता शुल्क, किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए मिला दान, स्थायी संपत्ति की बिक्री, तथा पूँजीगत प्रयोजन का अनुदान।
- उचंत लेखा एक अस्थायी खाता है, जो तलपट के मेल न खाने पर अथवा किसी प्राप्ति या भुगतान के वर्गीकरण में अनिश्चितता होने पर खोला जाता है और भूल पकड़ते ही बंद कर दिया जाता है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- छोटी राशि वाले अपवाद को सामान्य नियम मान लेना; प्रश्न-वाक्य ने ‘साधारणतया’ कहकर सामान्य व्यवहार ही पूछा है, अपवाद नहीं।
- प्राप्ति एवं भुगतान लेखे में वसीयत को देखकर उसे आगमी मद मान लेना; उस लेखे में आगमी और पूँजीगत दोनों प्रकार की रोकड़ आती है।
- विकल्प (d) का पहला आधा सही देखकर पूरा विकल्प चुन लेना; पूँजीकरण और उचंत लेखा आपस में विरोधी हैं, क्योंकि उचंत लेखा अनिश्चितता का अस्थायी ठिकाना है।
- विशिष्ट प्रयोजन की वसीयत को भी सीधे सामान्य पूँजी कोष में जोड़ देना, जबकि उसके लिए उसी प्रयोजन के नाम का अलग कोष बनाना होता है।
अलाभकारी संस्थाओं का यह भाग EPFO की लेखा-अधिकारी वाली भर्ती में दो रूपों में आता है। पहला रूप यही है — किसी एक मद का नाम देकर पूछ लेना कि उसका व्यवहार क्या है, और विकल्पों में आय, व्यय, पूँजीकरण तथा किसी अस्थायी खाते को मिला देना। दूसरा रूप छोटी संख्यात्मक गणना का है, जिसमें चंदे की बकाया और अग्रिम राशियाँ समायोजित करवायी जाती हैं। पहले रूप के लिए सबसे अच्छा उपकरण एक छोटी दो-स्तंभ वाली सूची है, जिसमें एक ओर आगमी मदें और दूसरी ओर पूँजीगत मदें लिखी हों; उसे एक बार बना लेने पर इस प्रकार के अधिकांश प्रश्न सीधे उसी सूची से हल हो जाते हैं। साथ में यह भी याद रखिए कि प्रश्न-वाक्य में ‘साधारणतया’, ‘सामान्यतः’ या ‘मुख्य रूप से’ जैसे शब्द जान-बूझकर रखे जाते हैं — वे बताते हैं कि उत्तर सामान्य नियम है और अपवाद वाला विकल्प जाल है।
संबंधित PYQ
EPFO_EOAO_2020_Q109Which one of the following concerns prepares Receipts and Payments Account ?
- (a) Trading concerns
- (b) Non-trading concerns
- (c) Manufacturing concerns
- (d) Companies registered under Companies Act
उत्तर(b) Non-trading concerns
EPFO EO/AO 2020 में पूछा गया कि प्राप्ति एवं भुगतान लेखा कौन-सी संस्थाएँ बनाती हैं — उसी अलाभकारी संस्था वाले खंड का दूसरा प्रश्न।
EPFO_EOAO_2017_Q62खोलें व हल करें →Income and Expenditure Account is
- (a) Real Account
- (b) Personal Account
- (c) Nominal Account
- (d) Capital Account
उत्तर(c) Nominal Account
इसी पेपर का प्रश्न 62 आय एवं व्यय लेखे का वर्ग पूछता है, जो इस प्रश्न के ठीक पहले वाला विषय है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
किसी अलाभकारी संस्था को मृत व्यक्ति की वसीयत के अनुसार प्राप्त होने वाला दान साधारणतया किस प्रकार की प्राप्ति माना जाता है?
- (a)आगमी प्राप्ति
- (b)पूँजीगत प्राप्ति
- (c)आस्थगित आगमी व्यय
- (d)संदिग्ध प्राप्ति
उत्तर(b) पूँजीगत प्राप्ति
- practice — not a real PYQ
निम्नलिखित में से कौन-सी मद किसी अलाभकारी संस्था के लिए आगमी प्राप्ति है, अर्थात् उसी वर्ष की आय मानी जाती है?
- (a)आजीवन सदस्यता शुल्क
- (b)वसीयती दान
- (c)वार्षिक सदस्यता शुल्क
- (d)भवन कोष के लिए मिला विशिष्ट दान
उत्तर(c) वार्षिक सदस्यता शुल्क