पारम्परिक दृष्टिकोण के अनुसार, राजस्व के साथ खर्च को किसके आधार पर सुमेलित किया जाता है?
- (a)मूल लागत
- (b)विकल्प लागत
- (c)प्रतिस्थापन लागत
- (d)नकद लागत
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) मूल लागत। प्रश्न में 'पारम्परिक दृष्टिकोण' शब्द ही निर्णायक है। पारंपरिक अर्थात् रूढ़ लेखाशास्त्र दो आधारभूत धारणाओं पर चलता है — लागत की धारणा और मिलान का सिद्धांत। लागत की धारणा कहती है कि परिसंपत्ति को उसके अर्जन के समय दी गई वास्तविक क़ीमत पर, अर्थात् मूल या ऐतिहासिक लागत पर, बहियों में दर्ज किया जाए और आगे भी उसी आधार पर उसका लेखा चलाया जाए। मिलान का सिद्धांत कहता है कि किसी अवधि के राजस्व के साथ उसी अवधि के वे व्यय जोड़े जाएँ जो उस राजस्व को अर्जित करने में लगे। दोनों को साथ रखने पर यह निकलता है कि व्यय की जो राशि राजस्व से मिलाई जाएगी, वह उसी मूल लागत में से निकलेगी — उदाहरण के लिए मशीन का मूल्यह्रास उसकी क्रय-लागत पर लगाया जाता है, वर्तमान बाज़ार-भाव पर नहीं; और बेचे गए माल की लागत उस माल के अर्जन-मूल्य से निकाली जाती है। मूल लागत को आधार बनाने के तीन कारण हैं। पहला, वह वस्तुनिष्ठ तथा सत्यापन-योग्य है, क्योंकि उसके पीछे बीजक, संविदा या भुगतान का प्रमाण होता है। दूसरा, वह स्थिर है — बाज़ार-भाव के उतार-चढ़ाव से बहियाँ हिलती नहीं। तीसरा, वह अनुमान तथा व्यक्तिपरक निर्णय की गुंजाइश कम रखती है, जिससे लेखे में मनमानी की संभावना घटती है। इसकी कमज़ोरी भी स्पष्ट है — मूल्य-वृद्धि के दौर में मूल लागत पर आधारित व्यय वास्तविकता से कम बैठते हैं और लाभ बढ़ा हुआ दिखता है — और इसी कमज़ोरी को दूर करने के लिए मुद्रास्फीति-लेखांकन के प्रयोग किए गए। पर वे प्रयोग पारंपरिक दृष्टिकोण से अलग हैं, और प्रश्न पारंपरिक दृष्टिकोण पूछ रहा है। इसे एक वाक्य में यों रखिए: पारंपरिक लेखे में जो चुकाया गया वही आधार है, और जो चुकाना पड़ता यदि आज ख़रीदते, वह आधार नहीं। अतः विकल्प (a) ही सही है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)विकल्प लागत — विकल्प लागत (opportunity cost) अर्थशास्त्र की धारणा है, लेखाशास्त्र की बहियों की नहीं। इसका अर्थ है वह लाभ जो किसी संसाधन के दूसरे सर्वोत्तम उपयोग से मिल सकता था और जिसे चुने हुए उपयोग के कारण छोड़ना पड़ा — जैसे अपने ही भवन में कारोबार चलाने पर वह किराया जो उसे किराए पर देकर मिल सकता था। यह धारणा निर्णय लेने में अत्यंत उपयोगी है और प्रबंधकीय लेखांकन में उसका प्रयोग होता है, पर उसके पीछे कोई वास्तविक लेन-देन नहीं होता, इसलिए वह वित्तीय लेखे में दर्ज नहीं की जाती और न राजस्व से मिलाई जाती है। यही अंतर याद रखिए — विकल्प लागत सोचने का औज़ार है, दर्ज करने का नहीं। यह विकल्प उन अभ्यर्थियों के लिए है जो अर्थशास्त्र तथा लेखाशास्त्र की शब्दावली को एक मान लेते हैं।
- (c)प्रतिस्थापन लागत — प्रतिस्थापन लागत (replacement cost) वह राशि है जो उसी परिसंपत्ति को आज ख़रीदने पर चुकानी पड़ेगी। यह धारणा पारंपरिक दृष्टिकोण की नहीं, बल्कि वर्तमान लागत लेखांकन की है, जो मुद्रास्फीति-लेखांकन के प्रयोगों में से एक है। उसका तर्क यह है कि मूल्य-वृद्धि के दौर में यदि मूल लागत पर मूल्यह्रास लगाया जाए तो जो राशि अलग रखी जाएगी वह परिसंपत्ति के प्रतिस्थापन के लिए पर्याप्त नहीं होगी, और इस प्रकार दिखाया गया लाभ वास्तविक नहीं, आंशिक रूप से पूँजी का ही उपभोग होगा। यह आलोचना गंभीर है और उस पर लंबी बहस हुई है, पर प्रश्न स्पष्ट रूप से 'पारम्परिक दृष्टिकोण' पूछ रहा है, और उस दृष्टिकोण में आधार मूल लागत ही है। इसलिए यह विकल्प सही आलोचना है, सही उत्तर नहीं।
- (d)नकद लागत — नक़द लागत का अर्थ होगा केवल वह व्यय गिनना जिसके लिए नक़द दिया गया हो, और यह उपचय (accrual) की धारणा से ही टकराता है। पारंपरिक लेखाशास्त्र में अनेक व्यय ऐसे होते हैं जो किसी अवधि में नक़द बहिर्वाह उत्पन्न नहीं करते पर उस अवधि के राजस्व से मिलाए जाते हैं — इनमें सबसे स्पष्ट उदाहरण मूल्यह्रास है, जो केवल एक आबंटन है, तथा अलेखनीय ऋण के लिए किया गया प्रावधान, तथा उपार्जित पर अदत्त व्यय। इसके विपरीत कुछ नक़द भुगतान ऐसे भी होते हैं जो उस अवधि के व्यय नहीं होते, जैसे अग्रिम भुगतान अथवा किसी परिसंपत्ति की ख़रीद। इसलिए नक़द को मिलान का आधार बनाना उपचय-आधारित लेखे को ही उलट देगा। यह विकल्प उस भ्रम पर टिका है कि जो चुकाया गया वही व्यय है।
अवधारणा
पारंपरिक अर्थात् रूढ़ लेखाशास्त्र कुछ मान्यताओं तथा सिद्धांतों पर खड़ा है, और यह प्रश्न उनमें से दो को जोड़कर बना है। मान्यताओं में व्यावसायिक इकाई, चालू संस्था, मुद्रा में मापन और लेखांकन अवधि आती हैं। सिद्धांतों में लागत की धारणा, द्वि-पक्षीयता, राजस्व मान्यता, मिलान, पूर्ण प्रकटीकरण, विवेक, सुसंगति तथा तात्त्विकता आते हैं। इनमें लागत की धारणा और मिलान का सिद्धांत मिलकर यह तय करते हैं कि व्यय की राशि कहाँ से आएगी और वह किस अवधि में जाएगी। चालू संस्था की मान्यता इस पूरे ढाँचे को सहारा देती है: चूँकि यह माना जाता है कि व्यवसाय निकट भविष्य में बंद नहीं होगा, इसलिए परिसंपत्तियों को उनके विक्रय-मूल्य पर आँकने की आवश्यकता नहीं रहती और उन्हें मूल लागत पर रखकर उनकी उपयोगिता की अवधि में बाँटा जा सकता है — यही मूल्यह्रास है। इसी कारण मूल लागत केवल एक तकनीकी नियम नहीं, बल्कि पूरे ढाँचे की आंतरिक कड़ी है, और उसे बदलने पर शेष सिद्धांत भी बदलने पड़ते हैं।
मूल लागत की सीमाओं पर लेखाशास्त्र में लंबी बहस चली है, और उसे जान लेना इस प्रश्न को अधिक अर्थपूर्ण बना देता है। मुख्य आपत्ति यह है कि मूल्य-वृद्धि के दौर में मूल लागत पर आधारित आँकड़े भ्रामक हो जाते हैं: राजस्व वर्तमान क़ीमतों में आता है जबकि उससे मिलाए जाने वाले व्यय पुरानी क़ीमतों में होते हैं, इसलिए लाभ बढ़ा हुआ दिखता है और उस पर कर तथा लाभांश भी अधिक दिए जाते हैं, जिससे व्यवसाय की वास्तविक पूँजी घटती जाती है। इस समस्या के समाधान के लिए दो प्रकार के प्रयोग हुए — एक, वर्तमान क्रय-शक्ति लेखांकन, जिसमें सामान्य मूल्य-सूचकांक से आँकड़ों को समायोजित किया जाता है; और दूसरा, वर्तमान लागत लेखांकन, जिसमें परिसंपत्ति की प्रतिस्थापन लागत को आधार बनाया जाता है। इन्हें सामूहिक रूप से मुद्रास्फीति-लेखांकन कहा जाता है। परीक्षा में यह विषय दो तरह से आता है — पारंपरिक दृष्टिकोण का आधार पूछकर, जैसे यहाँ, और मुद्रास्फीति-लेखांकन की पद्धतियों के नाम पूछकर।
मुख्य तथ्य
- पारंपरिक दृष्टिकोण में राजस्व के साथ व्यय का मिलान मूल अर्थात् ऐतिहासिक लागत के आधार पर किया जाता है।
- लागत की धारणा कहती है कि परिसंपत्ति को उसके अर्जन के समय दी गई वास्तविक क़ीमत पर दर्ज किया जाए और आगे भी उसी आधार पर लेखा चलाया जाए।
- मिलान का सिद्धांत कहता है कि किसी अवधि के राजस्व के साथ उसी अवधि के वे व्यय जोड़े जाएँ जो उस राजस्व को अर्जित करने में लगे।
- मशीन का मूल्यह्रास उसकी क्रय-लागत पर लगाया जाता है, वर्तमान बाज़ार-भाव पर नहीं — यह इस नियम का सबसे स्पष्ट उदाहरण है।
- मूल लागत को आधार बनाने के कारण — वह वस्तुनिष्ठ तथा सत्यापन-योग्य है, स्थिर है, और उसमें व्यक्तिपरक निर्णय की गुंजाइश कम है।
- प्रतिस्थापन लागत वर्तमान लागत लेखांकन की धारणा है और विकल्प लागत अर्थशास्त्र तथा प्रबंधकीय निर्णय की — दोनों पारंपरिक वित्तीय लेखे का आधार नहीं हैं।
- नक़द लागत को आधार बनाना उपचय की धारणा से टकराता है, क्योंकि मूल्यह्रास तथा प्रावधान जैसे व्यय नक़द बहिर्वाह उत्पन्न नहीं करते।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- 'पारम्परिक दृष्टिकोण' शब्द की उपेक्षा करना; वही यह तय करता है कि उत्तर मूल लागत है, प्रतिस्थापन लागत नहीं।
- अर्थशास्त्र की विकल्प लागत को लेखे की लागत मान लेना; उसके पीछे कोई वास्तविक लेन-देन नहीं होता, इसलिए वह बहियों में दर्ज नहीं होती।
- प्रतिस्थापन लागत की सही आलोचना को सही उत्तर मान लेना; वह मुद्रास्फीति-लेखांकन की धारणा है, पारंपरिक ढाँचे की नहीं।
- यह मान लेना कि व्यय वही है जो नक़द चुकाया गया; मूल्यह्रास तथा प्रावधान बिना नक़द बहिर्वाह के भी व्यय हैं।
लेखांकन के सिद्धांतों पर बने प्रश्न इस परीक्षा में प्रायः एक-पंक्ति के होते हैं और उनमें चारों विकल्प लागत की चार अलग-अलग धारणाएँ रख दी जाती हैं — मूल, विकल्प, प्रतिस्थापन तथा नक़द। इसलिए तैयारी में इन धारणाओं को उनके ठिकाने के साथ याद रखना सबसे कारगर है: मूल लागत — वित्तीय लेखांकन का आधार; प्रतिस्थापन लागत — वर्तमान लागत लेखांकन; विकल्प लागत — अर्थशास्त्र तथा प्रबंधकीय निर्णय; सीमांत लागत — लागत लेखांकन के निर्णय-प्रश्न; डूबी हुई लागत — वह जो निर्णय में गिनी नहीं जाती। दूसरी उपयोगी आदत यह है कि प्रश्न में आए विशेषण को ध्यान से पढ़ा जाए — 'पारंपरिक', 'रूढ़', 'वर्तमान', 'उचित मूल्य पर आधारित' — क्योंकि यही विशेषण प्रायः उत्तर तय कर देता है। तीसरी बात, इस पेपर का यह प्रश्न हिन्दी में पूरा प्रश्न-वाक्य है, जबकि अंग्रेज़ी स्तंभ वहाँ वाक्य-पूर्ति के रूप में टूटता है; अर्थ पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
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लेखांकन में 'लागत की धारणा' (cost concept) के अनुसार किसी परिसंपत्ति को बहियों में किस मूल्य पर दर्ज किया जाता है?
- (a)उसके वर्तमान बाज़ार-मूल्य पर
- (b)उसकी प्रतिस्थापन लागत पर
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- (d)उसके शुद्ध वसूली-योग्य मूल्य पर
उत्तर(c) उसके अर्जन के समय दी गई वास्तविक क़ीमत पर
- practice — not a real PYQ
मूल्य-वृद्धि के दौर में मूल लागत पर आधारित लेखांकन की मुख्य आलोचना निम्नलिखित में से क्या है?
- (a)उससे लाभ वास्तविकता से कम दिखता है
- (b)उससे लाभ बढ़ा हुआ दिखता है और उस पर अधिक कर तथा लाभांश दिए जाते हैं
- (c)उससे परिसंपत्तियाँ बहियों में दर्ज ही नहीं हो पातीं
- (d)उससे मूल्यह्रास लगाने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है
उत्तर(b) उससे लाभ बढ़ा हुआ दिखता है और उस पर अधिक कर तथा लाभांश दिए जाते हैं