स्वर्ण के मामले में, उस लेखाकरण अवधि में राजस्व को मान्यता दी जाती है, जिसमें
- (a)स्वर्ण की सुपुर्दगी हो जाती है
- (b)स्वर्ण की बिक्री हो जाती है
- (c)स्वर्ण का खनन कर लिया जाता है
- (d)खनन के लिए स्वर्ण की पहचान कर ली जाती है
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) स्वर्ण का खनन कर लिया जाता है। यह लेखाशास्त्र के 'राजस्व मान्यता' (revenue recognition) के अपवाद वाले नियम का प्रश्न है। सामान्य नियम यह है कि माल की बिक्री से राजस्व तब माना जाता है जब स्वामित्व से जुड़े महत्त्वपूर्ण जोखिम तथा प्रतिफल क्रेता को अंतरित हो जाएँ, जो प्रायः सुपुर्दगी के समय होता है — यही लेखा मानक 9 का मुख्य कथन है। पर उसी मानक में यह भी कहा गया है कि कुछ विशिष्ट उद्योगों में — जैसे जब कृषि-फ़सल काट ली गई हो या खनिज अयस्क निकाल लिया गया हो — निष्पादन उस लेन-देन से पहले ही पर्याप्त रूप से पूरा हो जाता है जिससे राजस्व उत्पन्न होता है। ऐसी स्थिति में, जहाँ वायदा संविदा अथवा सरकारी गारंटी से बिक्री सुनिश्चित हो, अथवा जहाँ बाज़ार मौजूद हो और बिक्री न हो पाने का जोखिम नगण्य हो, वस्तुओं का मूल्यन शुद्ध वसूली-योग्य मूल्य पर कर लिया जाता है। यही 'उत्पादन-पूर्णता का आधार' (completion of production basis) कहलाता है। स्वर्ण इसका पाठ्यपुस्तकीय उदाहरण है, क्योंकि उसकी तीन विशेषताएँ इस अपवाद को न्यायसंगत बनाती हैं: उसका मूल्य निर्धारित तथा सार्वजनिक रूप से उद्धृत रहता है, उसका बाज़ार सदा उपलब्ध रहता है, और उसकी इकाइयाँ परस्पर विनिमेय होती हैं — एक तोला स्वर्ण दूसरे तोले से भिन्न नहीं। अर्थात् खनन पूरा होते ही आय-अर्जन की मुख्य क्रिया समाप्त हो जाती है और बिक्री केवल एक औपचारिकता रह जाती है, जिसमें अनिश्चितता नगण्य है। इसीलिए मान्यता का क्षण खनन का क्षण माना जाता है। इस पूरे तर्क को एक वाक्य में इस तरह रखा जा सकता है: राजस्व वहाँ माना जाता है जहाँ आय-अर्जन की महत्त्वपूर्ण अनिश्चितता समाप्त हो जाती है, और स्वर्ण के मामले में वह क्षण बिक्री का नहीं, खनन का है। अतः विकल्प (c) ही सही है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)स्वर्ण की सुपुर्दगी हो जाती है — सुपुर्दगी सामान्य नियम का क्षण है, अपवाद का नहीं — और प्रश्न विशेष रूप से स्वर्ण की बात कर रहा है, इसलिए यहाँ अपवाद लागू होता है। साधारण व्यापार में राजस्व तब माना जाता है जब स्वामित्व से जुड़े महत्त्वपूर्ण जोखिम तथा प्रतिफल क्रेता को अंतरित हो जाएँ; व्यवहार में यह प्रायः माल की सुपुर्दगी के साथ होता है, इसीलिए 'सुपुर्दगी' और 'बिक्री' दोनों को व्यावहारिक कसौटी मान लिया जाता है। पर स्वर्ण जैसे पदार्थ में यह कसौटी अनावश्यक रूप से कठोर हो जाती है, क्योंकि खनन के बाद बिक्री में कोई सार्थक अनिश्चितता बची ही नहीं रहती। यह विकल्प उन अभ्यर्थियों के लिए है जो सामान्य नियम तो जानते हैं पर अपवाद नहीं; और लेखाशास्त्र के प्रश्नों में अपवाद ही प्रायः पूछा जाता है।
- (b)स्वर्ण की बिक्री हो जाती है — बिक्री का क्षण भी सामान्य नियम से आता है, और वही कारण यहाँ भी लागू होता है। लेखा-मानकों में यह इसलिए मुख्य कसौटी बनाया गया कि अधिकांश वस्तुओं की बिक्री में वास्तविक अनिश्चितता रहती है — ग्राहक मिलेगा या नहीं, किस मूल्य पर मिलेगा, भुगतान होगा या नहीं। जब तक ये अनिश्चितताएँ बनी हों, आय को पहले मान लेना विवेकपूर्ण नहीं होगा और लाभ का अधिक-मूल्यन कर देगा। स्वर्ण का प्रसंग इससे भिन्न है, क्योंकि वहाँ मूल्य उद्धृत रहता है, बाज़ार सदा उपलब्ध रहता है और वस्तु विनिमेय है। इसलिए यहाँ बिक्री की प्रतीक्षा करने से लेखे की तस्वीर अधिक सही नहीं होगी, केवल विलंबित हो जाएगी। यह विकल्प सामान्य नियम को अपवाद पर लागू कर देने की भूल है।
- (d)खनन के लिए स्वर्ण की पहचान कर ली जाती है — यह विकल्प तो अपवाद से भी बहुत आगे चला जाता है। खनन के लिए स्वर्ण की केवल पहचान कर लेना, अर्थात् यह जान लेना कि कहीं भंडार मौजूद है, किसी भी अर्थ में निष्पादन नहीं है — वहाँ न उत्पादन हुआ है, न कोई वस्तु अस्तित्व में आई है, और न कोई बेचने योग्य परिसंपत्ति बनी है। यदि इस आधार पर आय मान ली जाए तो केवल संभावना के बल पर लाभ दिखाया जाने लगेगा, जो लेखाशास्त्र के विवेक तथा वास्तविक-प्राप्ति के सिद्धांतों के सर्वथा विरुद्ध है। यही कारण है कि खनिज भंडारों के अनुमान को परिसंपत्ति के रूप में दर्ज करने के प्रश्न पर अलग तथा कठोर नियम हैं। यह विकल्प इसीलिए रखा गया है कि जो अभ्यर्थी 'खनन' शब्द देखकर उत्तर चुन रहा हो, वह दोनों 'खनन' वाले विकल्पों में भ्रमित हो जाए।
अवधारणा
राजस्व मान्यता का प्रश्न यह है कि आय को किस लेखांकन अवधि में दर्ज किया जाए, और इसका उत्तर उपचय (accrual) की धारणा से निकलता है — आय तब दर्ज होती है जब वह अर्जित हो जाए, न कि तब जब नक़दी मिले। 'अर्जित' कब मानें, इसका उत्तर तीन मानक स्थितियों में दिया जाता है। माल की बिक्री में — जब स्वामित्व से जुड़े महत्त्वपूर्ण जोखिम तथा प्रतिफल क्रेता को अंतरित हो जाएँ और प्रतिफल की वसूली में महत्त्वपूर्ण अनिश्चितता न हो। सेवाओं में — या तो पूर्णता के अनुपात में, या सेवा-संविदा पूरी होने पर। ब्याज, स्वामित्व-शुल्क तथा लाभांश में — ब्याज समय के अनुपात में, स्वामित्व-शुल्क संविदा के अनुसार, और लाभांश तब जब उसे पाने का अधिकार स्थापित हो जाए। इन तीनों के साथ एक अपवाद-श्रेणी भी है, जिसे उत्पादन-पूर्णता का आधार कहते हैं और जो काटी गई फ़सल तथा निकाले गए खनिज अयस्क जैसी वस्तुओं पर लागू होती है — इसी श्रेणी से यह प्रश्न आता है। इस पूरे ढाँचे के पीछे दो सिद्धांत काम करते हैं: विवेक का सिद्धांत, जो आय को समय से पहले न मानने को कहता है, और मिलान का सिद्धांत, जो आय तथा उससे संबंधित व्यय को एक ही अवधि में रखने को कहता है।
इस अपवाद के बारे में एक सूक्ष्मता जान लेनी चाहिए, क्योंकि वह पाठ्यपुस्तक और मानक के पाठ के बीच का अंतर है। लेखा मानक 9 इस स्थिति का वर्णन करते हुए यह भी कहता है कि इस प्रकार दर्ज की गई राशियाँ, यद्यपि उस मानक की परिभाषा के अनुसार 'राजस्व' नहीं हैं, कभी-कभी लाभ-हानि विवरण में दर्ज कर ली जाती हैं और उन्हें उपयुक्त रूप से वर्णित किया जाता है। अर्थात् मानक इस व्यवहार को स्वीकार तो करता है, पर उसे सामान्य राजस्व से अलग रखता है और प्रकटीकरण की अपेक्षा करता है। परीक्षा की दृष्टि से यह भेद इसलिए उपयोगी है कि प्रश्न कभी 'किस अवधि में मान्यता दी जाती है' पूछता है और कभी 'क्या यह मानक की परिभाषा के अनुसार राजस्व है' — और दोनों के उत्तर एक नहीं हैं। यह भी ध्यान रखिए कि आगे चलकर भारतीय लेखा मानकों में राजस्व का विषय संविदा-आधारित ढाँचे में पुनर्गठित हुआ, जिसमें निष्पादन-दायित्वों की पूर्ति पर बल है; पर इस प्रश्न का उत्तर उसी पारंपरिक अपवाद से निकलता है जिसे पाठ्यपुस्तकें उत्पादन-पूर्णता का आधार कहती हैं।
मुख्य तथ्य
- स्वर्ण के मामले में राजस्व की मान्यता उस लेखांकन अवधि में दी जाती है जिसमें उसका खनन कर लिया जाता है — यह उत्पादन-पूर्णता का आधार कहलाता है।
- सामान्य नियम यह है कि माल की बिक्री से राजस्व तब माना जाता है जब स्वामित्व से जुड़े महत्त्वपूर्ण जोखिम तथा प्रतिफल क्रेता को अंतरित हो जाएँ।
- लेखा मानक 9 कहता है कि कुछ उद्योगों में — जैसे फ़सल काट लेने या खनिज अयस्क निकाल लेने पर — निष्पादन राजस्व-जनक लेन-देन से पहले ही पर्याप्त रूप से पूरा हो जाता है।
- ऐसी स्थिति में, जहाँ वायदा संविदा या सरकारी गारंटी से बिक्री सुनिश्चित हो अथवा बाज़ार मौजूद हो और बिक्री न हो पाने का जोखिम नगण्य हो, वस्तुओं का मूल्यन शुद्ध वसूली-योग्य मूल्य पर किया जाता है।
- स्वर्ण इस अपवाद का उदाहरण इसलिए है कि उसका मूल्य उद्धृत रहता है, बाज़ार सदा उपलब्ध है और उसकी इकाइयाँ परस्पर विनिमेय हैं।
- मानक यह भी कहता है कि इस प्रकार दर्ज राशियाँ उसकी परिभाषा के अनुसार 'राजस्व' नहीं हैं, यद्यपि वे लाभ-हानि विवरण में उपयुक्त वर्णन के साथ दर्ज कर ली जाती हैं।
- राजस्व मान्यता का पूरा ढाँचा उपचय की धारणा तथा विवेक और मिलान के सिद्धांतों पर टिका है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- सामान्य नियम को अपवाद पर लागू कर देना; प्रश्न विशेष रूप से स्वर्ण की बात कर रहा है, और वहाँ उत्पादन-पूर्णता का आधार लागू होता है।
- 'खनन कर लिया जाता है' और 'खनन के लिए पहचान कर ली जाती है' को गड्डमड्ड कर देना; दूसरा किसी भी अर्थ में निष्पादन नहीं है।
- सुपुर्दगी और बिक्री को दो भिन्न कसौटियाँ मान लेना; दोनों सामान्य नियम के ही व्यावहारिक रूप हैं और यहाँ दोनों ही लागू नहीं होते।
- यह मान लेना कि मानक इस राशि को 'राजस्व' कहता है; वह उसे लाभ-हानि विवरण में दर्ज करने की अनुमति देता है, पर अपनी परिभाषा से बाहर रखता है।
लेखाशास्त्र के खंड में राजस्व मान्यता पर प्रश्न लगभग हर वर्ष आते हैं और वे तीन रूपों में मिलते हैं। पहला रूप सामान्य नियम पूछता है — माल की बिक्री, सेवा, ब्याज या लाभांश में मान्यता का क्षण। दूसरा रूप, जो यहाँ है, अपवाद पूछता है, और उसमें प्रश्न किसी विशिष्ट वस्तु का नाम लेकर आता है — स्वर्ण, कृषि उपज, खनिज अयस्क। तीसरा रूप संख्यात्मक होता है, जिसमें दी गई सूचनाओं से यह निकालना होता है कि किस अवधि में कितना राजस्व दर्ज होगा। तीनों के लिए एक ही तैयारी काम आती है — मानक की चार-पाँच पंक्तियाँ, अर्थात् मान्यता का क्षण और उसकी शर्तें, तथा अपवाद-श्रेणी के उदाहरण। परीक्षा-कक्ष में एक उपयोगी संकेत यह है कि जब प्रश्न किसी वस्तु का नाम विशेष रूप से ले — जैसे यहाँ स्वर्ण — तो वह प्रायः अपवाद पूछ रहा होता है; अन्यथा वस्तु का नाम लेने की आवश्यकता ही नहीं थी।
संबंधित PYQ
EPFO_APFC_2023_Q42According to the Accounting Standard–1, which of the following are the fundamental accounting assumptions?
- (a) Going Concern, Consistency, Accrual
- (b) Going Concern, Money Measurement, Conservatism
- (c) Going Concern, Consistency, Conservatism
- (d) Going Concern, Accounting Period, Accrual
उत्तर(a) Going Concern, Consistency, Accrual
EPFO APFC 2023 में लेखा मानक 1 की मूलभूत लेखांकन मान्यताओं पर प्रश्न है — उसी मानक-परिवार का दूसरा प्रश्न, जिसमें उपचय की धारणा भी आती है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
माल की बिक्री से राजस्व की मान्यता का सामान्य नियम लेखा मानक 9 के अनुसार निम्नलिखित में से क्या है?
- (a)जब क्रेता से आदेश प्राप्त हो जाए
- (b)जब स्वामित्व से जुड़े महत्त्वपूर्ण जोखिम तथा प्रतिफल क्रेता को अंतरित हो जाएँ
- (c)जब बीजक तैयार कर लिया जाए
- (d)जब नक़द भुगतान प्राप्त हो जाए
उत्तर(b) जब स्वामित्व से जुड़े महत्त्वपूर्ण जोखिम तथा प्रतिफल क्रेता को अंतरित हो जाएँ
- practice — not a real PYQ
उत्पादन-पूर्णता के आधार पर राजस्व की मान्यता निम्नलिखित में से किस स्थिति में उपयुक्त मानी जाती है?
- (a)जब वस्तु का कोई बाज़ार न हो और मूल्य अनिश्चित हो
- (b)जब वस्तु का बाज़ार मौजूद हो, मूल्य निर्धारित हो और बिक्री न हो पाने का जोखिम नगण्य हो
- (c)जब वस्तु शीघ्र नष्ट होने वाली हो
- (d)जब वस्तु का उत्पादन आदेश मिलने के बाद ही आरंभ होता हो
उत्तर(b) जब वस्तु का बाज़ार मौजूद हो, मूल्य निर्धारित हो और बिक्री न हो पाने का जोखिम नगण्य हो