कोयले पर ₹ 100 प्रति टन का उपकर निम्नलिखित में से किसके अन्तर्गत आता है?
- (a)कार्बन-कर
- (b)कार्बन सब्सिडि
- (c)प्रौद्योगिकी के लिए कार्बन प्रोत्साहन
- (d)कार्बन परमिट की बिक्री के लिए कार्बन प्रोत्साहन
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) कार्बन-कर। कोयले पर लगाया गया प्रति टन उपकर अर्थशास्त्र की दृष्टि से कार्बन-कर की श्रेणी में आता है, और इसका तर्क सीधा है। कोयला जलने पर कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है, जिसकी लागत उत्पादक की बहियों में नहीं आती पर समाज उठाता है — यह ऋणात्मक बाह्यता है। कार्बन-कर उसी बाह्य लागत को क़ीमत में जोड़ने का उपकरण है: कर लगने से कोयले की क़ीमत बढ़ती है, उसका उपयोग महँगा पड़ता है, और स्वच्छ विकल्प तुलनात्मक रूप से सस्ते हो जाते हैं। यही 'बाह्यता का अंतःस्थापन' है, जिसे 'प्रदूषक भुगतान करे' के सिद्धांत के रूप में भी कहा जाता है। भारत में इस उपकर का इतिहास इस प्रकार है: यह 2010 में 50 रुपये प्रति टन की दर से 'स्वच्छ ऊर्जा उपकर' के रूप में आरंभ हुआ; 2014-15 के बजट में, 11 जुलाई 2014 से, इसकी दर बढ़ाकर 100 रुपये प्रति टन कर दी गई — प्रश्न इसी दर की बात कर रहा है; 1 मार्च 2015 से यह 200 रुपये प्रति टन हुई; और 2016-17 के बजट में इसे 400 रुपये प्रति टन कर दिया गया, तब इसका नाम 'स्वच्छ पर्यावरण उपकर' रखा गया। इससे प्राप्त राशि राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा निधि में जाती थी, जिससे स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी परियोजनाओं और अनुसंधान के लिए धन दिया जाता था। ध्यान दीजिए कि निधि का उपयोग स्वच्छ ऊर्जा के लिए होना उपकर की प्रकृति नहीं बदलता — वसूली का उपकरण कर ही रहता है, प्रोत्साहन नहीं। यह भी ध्यान रखिए कि इस प्रश्न का हिन्दी रूप पूरा प्रश्न-वाक्य है और प्रश्नचिह्न पर समाप्त होता है, जबकि अंग्रेज़ी स्तंभ वहाँ वाक्य-पूर्ति है। स्टेम का यह रूपांतर उत्तर पर कोई असर नहीं डालता, पर हिन्दी पढ़ने वाले को यह जान लेना चाहिए कि उसका स्तंभ पूरा प्रश्न पूछ रहा है, अधूरा वाक्य नहीं। अतः विकल्प (a) ही सही है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)कार्बन सब्सिडि — यह विकल्प दिशा ही उलट देता है। अनुदान (सब्सिडी) का अर्थ है किसी गतिविधि को सस्ता करके उसे प्रोत्साहित करना, जबकि उपकर उसे महँगा करके हतोत्साहित करता है। 'कार्बन अनुदान' जैसी कोई व्यवस्था होती तो वह कोयले के उपयोग को बढ़ावा देती, जो नीति के घोषित उद्देश्य के ठीक विपरीत है। ध्यान रहे कि जीवाश्म ईंधनों पर दिए जाने वाले अनुदान की बहस अलग है — अनेक देशों में ऐसे अनुदान मौजूद रहे हैं और उन्हें हटाने की सिफ़ारिश की जाती रही है, क्योंकि वे कार्बन-कर के प्रभाव को काट देते हैं। इस विकल्प को पहचानने की सरल कसौटी यह है कि पूछा जाए — इससे सरकार को पैसा मिलता है या सरकार पैसा देती है? उपकर में सरकार वसूलती है, इसलिए वह कर है, अनुदान नहीं।
- (c)प्रौद्योगिकी के लिए कार्बन प्रोत्साहन — प्रोत्साहन (incentive) और कर दो अलग प्रकार के नीति-उपकरण हैं, और इस विकल्प में दोनों को मिला दिया गया है। प्रौद्योगिकी के लिए प्रोत्साहन का अर्थ होता है स्वच्छ प्रौद्योगिकी अपनाने पर कर-छूट, अनुदान, त्वरित मूल्यह्रास या पूँजीगत सहायता देना — अर्थात् धन बाहर जाता है। कोयले पर लगने वाला उपकर इसके विपरीत धन एकत्र करता है। यह सच है कि उपकर से जमा राशि राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा निधि में जाकर स्वच्छ ऊर्जा की परियोजनाओं को दी जाती थी, और इसी कारण यह विकल्प आकर्षक लगता है; पर वह राशि के उपयोग की बात है, वसूली के स्वरूप की नहीं। किसी उपाय का वर्गीकरण इस बात से होता है कि वह किस पर और किस रूप में लगाया गया है, न कि इस बात से कि उससे मिली राशि आगे किस मद में ख़र्च हुई।
- (d)कार्बन परमिट की बिक्री के लिए कार्बन प्रोत्साहन — यह विकल्प कार्बन-मूल्यन के दूसरे उपकरण की ओर संकेत करता है और उसे भी ग़लत रूप में रखता है। कार्बन अनुज्ञप्ति (carbon permit) की व्यवस्था 'सीमा तथा व्यापार' (cap-and-trade) कहलाती है: सरकार कुल उत्सर्जन की एक सीमा तय करती है, उस सीमा तक की अनुज्ञप्तियाँ जारी करती है, और जिन इकाइयों के पास अतिरिक्त अनुज्ञप्तियाँ बचती हैं वे उन्हें बेच सकती हैं। यह मात्रा-आधारित उपकरण है, जिसमें क़ीमत बाज़ार तय करता है; जबकि कार्बन-कर मूल्य-आधारित उपकरण है, जिसमें सरकार दर तय करती है और मात्रा बाज़ार पर छूटती है। कोयले पर प्रति टन एक निश्चित दर से लगने वाला उपकर स्पष्ट रूप से दूसरी श्रेणी का है। इसके अतिरिक्त 'अनुज्ञप्ति बेचने के लिए प्रोत्साहन' कहना उस व्यवस्था का भी सही वर्णन नहीं है, क्योंकि वहाँ प्रोत्साहन उत्सर्जन घटाने का होता है, बेचने का नहीं।
अवधारणा
कार्बन-मूल्यन (carbon pricing) का उद्देश्य यह है कि कार्बन उत्सर्जन की वह लागत, जो अब तक किसी के बहीखाते में नहीं आती थी, आर्थिक निर्णयों में दिखाई देने लगे। इसके दो प्रमुख उपकरण हैं। पहला, कार्बन-कर — सरकार उत्सर्जन या कार्बन-प्रधान ईंधन पर प्रति इकाई एक निश्चित दर तय करती है; इसमें क़ीमत निश्चित रहती है और उत्सर्जन में कितनी कमी आएगी यह पहले से तय नहीं होता। दूसरा, उत्सर्जन-व्यापार अर्थात् सीमा तथा व्यापार — सरकार कुल उत्सर्जन की मात्रा तय करती है और अनुज्ञप्तियों का बाज़ार बनने देती है; इसमें मात्रा निश्चित रहती है और क़ीमत बाज़ार तय करता है। दोनों का सैद्धांतिक आधार एक ही है — बाह्यता का अंतःस्थापन — पर उनका जोखिम अलग है: कर में क़ीमत की निश्चितता है, व्यापार में परिणाम की। इनके साथ तीसरा उपकरण नियमन का है, जिसमें मानक तय करके सीधे बाध्य किया जाता है, जैसे वाहनों के उत्सर्जन-मानक। भारत में कोयले पर लगा उपकर पहले प्रकार का उदाहरण है, और उसे अंतर्राष्ट्रीय चर्चा में प्रायः 'भारत का कार्बन-कर' कहकर उद्धृत किया गया है।
इस उपकर का व्यावहारिक इतिहास परीक्षा-दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। 2010 में यह 'स्वच्छ ऊर्जा उपकर' के नाम से 50 रुपये प्रति टन की दर पर आरंभ हुआ और घरेलू तथा आयातित दोनों प्रकार के कोयले पर लागू था; इसकी दर 2014, 2015 और 2016 में क्रमशः बढ़ती गई और अंतिम रूप से 400 रुपये प्रति टन तक पहुँची, जब उसका नाम बदलकर 'स्वच्छ पर्यावरण उपकर' कर दिया गया। इससे मिली राशि राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा निधि में जाती थी। वस्तु एवं सेवा कर लागू होने के बाद यह उपकर उस नई व्यवस्था में समाहित हो गया और कोयले पर क्षतिपूर्ति उपकर लगने लगा। एक बात इस पेपर के हिन्दी स्तंभ के बारे में भी ध्यान देने योग्य है: विकल्प (b) में 'सब्सिडी' के स्थान पर 'सब्सिडि' छपा है, अर्थात् अंत में ह्रस्व इ की मात्रा है। यह पुस्तिका की अपनी वर्तनी है और उसे जैसा छपा है वैसा ही रखा गया है; अर्थ पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता, पर पढ़ते समय यह अटपटा लग सकता है, इसलिए उसे मुद्रण की विशेषता समझकर आगे बढ़ जाइए।
मुख्य तथ्य
- कोयले पर प्रति टन लगने वाला उपकर कार्बन-कर की श्रेणी में आता है — यह कार्बन उत्सर्जन की बाह्य लागत को क़ीमत में जोड़ने का उपकरण है।
- यह उपकर 2010 में 'स्वच्छ ऊर्जा उपकर' के रूप में 50 रुपये प्रति टन की दर से आरंभ हुआ।
- 2014-15 के बजट में, 11 जुलाई 2014 से, इसकी दर बढ़ाकर 100 रुपये प्रति टन कर दी गई — प्रश्न इसी दर का उल्लेख करता है।
- 1 मार्च 2015 से दर 200 रुपये प्रति टन हुई और 2016-17 के बजट में 400 रुपये प्रति टन, जब इसका नाम 'स्वच्छ पर्यावरण उपकर' रखा गया।
- इससे प्राप्त राशि राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा निधि में जाती थी, जिससे स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी परियोजनाओं तथा अनुसंधान को धन दिया जाता था।
- कार्बन-कर मूल्य-आधारित उपकरण है — सरकार दर तय करती है; उत्सर्जन-व्यापार मात्रा-आधारित उपकरण है — सरकार सीमा तय करती है और क़ीमत बाज़ार तय करता है।
- वस्तु एवं सेवा कर लागू होने के बाद यह उपकर उस व्यवस्था में समाहित हो गया और कोयले पर क्षतिपूर्ति उपकर लगने लगा।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- कर और अनुदान की दिशा उलट देना; उपकर से सरकार वसूली करती है, जबकि अनुदान में सरकार भुगतान करती है — यही सबसे सरल कसौटी है।
- उपकर से जमा राशि के उपयोग को उसकी प्रकृति मान लेना; राशि स्वच्छ ऊर्जा पर ख़र्च होने से भी वसूली का स्वरूप कर ही रहता है।
- कार्बन-कर और कार्बन अनुज्ञप्ति के व्यापार को एक मान लेना; पहला दर तय करता है और दूसरा मात्रा।
- उपकर की दरों का क्रम भूल जाना; 2010 में 50, जुलाई 2014 से 100, मार्च 2015 से 200 और 2016-17 में 400 रुपये प्रति टन।
पर्यावरण-अर्थशास्त्र से जुड़े प्रश्न इस परीक्षा में दो शैलियों में आते हैं — किसी उपाय को वर्ग में रखने को कहकर, जैसे यहाँ, और किसी योजना या निधि का नाम पूछकर। पहली शैली में सफलता की कुंजी उपकरणों का वर्गीकरण है: कर, अनुदान, अनुज्ञप्ति-व्यापार और नियमन — इन चारों की परिभाषा और दिशा स्पष्ट रखिए, अर्थात् किसमें धन आता है, किसमें जाता है, किसमें मात्रा तय होती है और किसमें क़ीमत। दूसरी शैली के लिए योजनाओं तथा निधियों के नाम उनके वर्ष के साथ याद रखिए। एक तीसरी सावधानी संख्या की है: जब प्रश्न में कोई दर दी गई हो, तो वह दर किसी विशेष वर्ष की होती है, और उसी वर्ष का सूचक भी बन जाती है — यहाँ 100 रुपये प्रति टन 2014 की दर है। इसलिए दरों की शृंखला याद रखना दुहरा लाभ देता है: वह वर्गीकरण भी बताती है और काल भी।
संबंधित PYQ
EPFO_APFC_2016_Q27The term 'Carbon footprint' means
- (a) A region which is rich in coal mines
- (b) The amount of reduction in the emission of CO2 by a country
- (c) The use of Carbon in manufacturing industries
- (d) The amount of greenhouse gases produced by our day-to-day activities
उत्तर(d) The amount of greenhouse gases produced by our day-to-day activities
EPFO APFC 2016 में 'कार्बन फ़ुटप्रिंट' का अर्थ पूछा गया है — कार्बन से जुड़ी शब्दावली का दूसरा प्रश्न, जिसे इसी के साथ पढ़ा जा सकता है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
भारत में कोयले पर लगने वाला 'स्वच्छ ऊर्जा उपकर' 2010 में किस दर से आरंभ किया गया था?
- (a)50 रुपये प्रति टन
- (b)100 रुपये प्रति टन
- (c)200 रुपये प्रति टन
- (d)400 रुपये प्रति टन
उत्तर(a) 50 रुपये प्रति टन
- practice — not a real PYQ
उत्सर्जन नियंत्रण के जिस उपकरण में सरकार कुल उत्सर्जन की मात्रा तय करती है और अनुज्ञप्तियों की क़ीमत बाज़ार तय करता है, उसे क्या कहते हैं?
- (a)कार्बन-कर
- (b)सीमा तथा व्यापार (कैप ऐंड ट्रेड)
- (c)जीवाश्म ईंधन अनुदान
- (d)त्वरित मूल्यह्रास
उत्तर(b) सीमा तथा व्यापार (कैप ऐंड ट्रेड)