आर्थिक लागत की तुलना में सामाजिक लागत अधिक होती है। इसका कारण यह है कि
- (a)समाज, अर्थव्यवस्था से बड़ा है
- (b)समाज में राज्य-व्यवस्था सम्मिलित है, जबकि अर्थव्यवस्था में यह सम्मिलित नहीं है
- (c)दर्शकों (बाइस्टैंडर्स) द्वारा वहन की गयी लागत धनात्मक होती है
- (d)समाज में उपभोक्ता और उत्पादक, दोनों सम्मिलित होते हैं
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) दर्शकों (बाइस्टैंडर्स) द्वारा वहन की गयी लागत धनात्मक होती है। इस प्रश्न का पूरा उत्तर एक समीकरण में है: सामाजिक लागत = निजी (आर्थिक) लागत + बाह्य लागत। निजी अथवा आर्थिक लागत वह है जो उत्पादक स्वयं उठाता है और जो उसकी बहीखाते में दिखाई देती है — कच्चा माल, मज़दूरी, ईंधन, ब्याज, मूल्यह्रास। बाह्य लागत वह है जो उस गतिविधि के कारण किसी तीसरे पक्ष पर पड़ती है, जो न उस सौदे का क्रेता है और न विक्रेता — अर्थशास्त्र में उसे ही 'दर्शक' (bystander) कहते हैं। एक कारख़ाना नदी में अपशिष्ट बहाता है तो नीचे की ओर रहने वाले किसान और मछुआरे उसका बोझ उठाते हैं; वाहन का धुआँ पड़ोसी बस्ती के फेफड़ों पर असर डालता है; ऊँची आवाज़ का जनरेटर आस-पास के घरों की नींद ख़राब करता है। इनमें से कोई भी लागत उत्पादक की बहियों में दर्ज नहीं होती, पर वह समाज पर पड़ती अवश्य है। जब यह बाह्य लागत शून्य से अधिक, अर्थात् धनात्मक, होती है, तभी सामाजिक लागत आर्थिक लागत से अधिक हो जाती है — और विकल्प (c) ठीक यही शर्त बताता है। एक और बात ध्यान देने योग्य है: प्रश्न वाक्य-पूर्ति के रूप में है और 'इसका कारण यह है कि' पर टूटता है, इसलिए प्रत्येक विकल्प को उस अधूरे वाक्य से जोड़कर पूरा वाक्य बनाकर पढ़िए — तभी यह दिखता है कि कौन-सा विकल्प सचमुच कारण बता रहा है और कौन-सा केवल एक सही-सी बात कह रहा है। यही कारण है कि यह उत्तर है और शेष तीन नहीं: शेष तीनों विकल्प यह बताते हैं कि समाज और अर्थव्यवस्था के दायरे में क्या-क्या आता है, जो एक वर्गीकरण-संबंधी बात है, जबकि प्रश्न लागत के अंतर का कारण पूछ रहा है, दायरे का नहीं। जिस विकल्प में लागत का उल्लेख ही न हो, वह लागत के अंतर का कारण नहीं बता सकता। अतः विकल्प (c) ही सही है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)समाज, अर्थव्यवस्था से बड़ा है — यह कथन दायरे की बात करता है, कारण की नहीं। यह कह देना कि समाज अर्थव्यवस्था से बड़ा है, अपने आप में कोई आर्थिक तर्क नहीं है — बड़े दायरे से यह नहीं निकलता कि लागत अधिक होगी। सामाजिक लागत का अधिक होना किसी दायरे की तुलना से नहीं, बल्कि इस तथ्य से निकलता है कि कुछ लागतें बाज़ार के मूल्य-तंत्र से बाहर रह जाती हैं और तीसरे पक्ष पर पड़ती हैं। यदि किसी गतिविधि में कोई बाह्य लागत हो ही नहीं, तो समाज के 'बड़े' होने के बावजूद सामाजिक लागत और निजी लागत बराबर रहेंगी। इसलिए यह विकल्प एक सही-सी लगने वाली सामान्य बात है, जो प्रश्न के तर्क को छूती तक नहीं। ऐसे विकल्पों को पहचानने का तरीक़ा यह है कि पूछा जाए — क्या इसमें कोई ऐसी क्रिया-विधि बताई गई है जिससे अंतर पैदा होता हो?
- (b)समाज में राज्य-व्यवस्था सम्मिलित है, जबकि अर्थव्यवस्था में यह सम्मिलित नहीं है — यह विकल्प भी वर्गीकरण की बात कर रहा है और साथ ही अर्थशास्त्र की दृष्टि से भ्रामक है। समाज और अर्थव्यवस्था अलग-अलग 'डिब्बे' नहीं हैं जिनमें राज्य-व्यवस्था कहीं रखी हो और कहीं नहीं; ये विश्लेषण की दृष्टियाँ हैं, और राज्य तो स्वयं अर्थव्यवस्था का एक बड़ा कर्ता है — वह कर लगाता है, व्यय करता है, नियमन करता है और उत्पादन भी करता है। पर मूल आपत्ति वही है जो विकल्प (a) पर है: इसमें कोई लागत-संबंधी क्रिया-विधि नहीं बताई गई। सामाजिक लागत के अधिक होने का कारण बाह्यता है, किसी संस्था के दायरे में होने या न होने से नहीं। ध्यान दीजिए कि हिन्दी स्तंभ में इस विकल्प में भी 'नहीं' शब्द आता है, पर वह सामान्य टाइप में है — वह प्रश्न का निषेध नहीं, विकल्प का अपना वाक्य है।
- (d)समाज में उपभोक्ता और उत्पादक, दोनों सम्मिलित होते हैं — यह कथन तथ्य के रूप में सही है — समाज में उपभोक्ता और उत्पादक दोनों आते हैं — पर वह प्रश्न का उत्तर नहीं है, क्योंकि उपभोक्ता तथा उत्पादक दोनों अर्थव्यवस्था में भी आते हैं। अर्थात् यह विशेषता समाज और अर्थव्यवस्था को अलग नहीं करती, इसलिए इससे लागत का अंतर निकल ही नहीं सकता। यह विकल्प इस प्रश्न का सबसे सुनियोजित जाल है, क्योंकि वाक्य पढ़ने में निर्दोष लगता है और अभ्यर्थी को कोई त्रुटि नहीं दिखती; त्रुटि यह है कि सही बात कारण की जगह रख दी गई है। ऐसे प्रश्नों में एक ही कसौटी काम आती है: विकल्प को प्रश्न के 'क्योंकि' के बाद जोड़कर पूरा वाक्य बनाइए और पूछिए कि क्या यह वाक्य सचमुच अंतर की व्याख्या करता है। यहाँ केवल विकल्प (c) ही उस परीक्षा में उत्तीर्ण होता है।
अवधारणा
बाह्यता (externality) वह स्थिति है जिसमें किसी व्यक्ति या फ़र्म की गतिविधि से किसी तीसरे पक्ष का हित प्रभावित होता है, और उसके लिए न कोई भुगतान किया जाता है, न कोई क्षतिपूर्ति मिलती है। बाह्यताएँ दो प्रकार की होती हैं। ऋणात्मक बाह्यता में तीसरे पक्ष पर लागत पड़ती है — प्रदूषण, शोर, यातायात-भीड़ — और तब सामाजिक लागत निजी लागत से अधिक हो जाती है; बाज़ार अपने आप ऐसी वस्तु का उत्पादन समाज के लिए वांछित मात्रा से अधिक कर देता है। धनात्मक बाह्यता में तीसरे पक्ष को लाभ मिलता है — टीकाकरण, शिक्षा, अनुसंधान — और तब सामाजिक लाभ निजी लाभ से अधिक होता है, तथा बाज़ार वांछित मात्रा से कम उत्पादन करता है। दोनों ही स्थितियों में बाज़ार का परिणाम कुशल नहीं रहता, जिसे 'बाज़ार की विफलता' कहा जाता है। उपचार के प्रचलित उपाय हैं — प्रदूषक पर कर (पीगू-कर), उत्सर्जन की अनुज्ञप्तियों का व्यापार, प्रत्यक्ष नियमन, और लाभकारी गतिविधियों पर अनुदान। इसी शृंखला में कोऐज़ का यह तर्क भी आता है कि यदि संपत्ति-अधिकार स्पष्ट हों और सौदेबाज़ी की लागत कम हो, तो पक्षकार आपसी समझौते से भी समाधान निकाल सकते हैं।
इस अवधारणा का व्यावहारिक महत्त्व नीति-निर्माण में सबसे अधिक है, और इसीलिए परीक्षा इसे बार-बार पूछती है। जब किसी बड़ी परियोजना की लागत-लाभ समीक्षा की जाती है, तो केवल निर्माण-व्यय नहीं गिना जाता; विस्थापन, वन-हानि, प्रदूषण और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव भी लागत में जोड़े जाते हैं — यही सामाजिक लागत-लाभ विश्लेषण है। पर्यावरण-नीति में 'प्रदूषक भुगतान करे' का सिद्धांत इसी तर्क से निकलता है: उद्देश्य यह है कि बाह्य लागत को उत्पादक की अपनी लागत में सम्मिलित कर दिया जाए, जिसे बाह्यता का 'अंतःस्थापन' कहते हैं। कोयले पर लगने वाला उपकर, वाहनों के लिए उत्सर्जन-मानक, और औद्योगिक इकाइयों पर लगने वाली शर्तें — सब इसी विचार के व्यावहारिक रूप हैं; इसी पेपर का प्रश्न 43 कोयले पर लगने वाले उपकर के बारे में है और वह इसी अवधारणा का अगला चरण है। हिन्दी स्तंभ में यहाँ अंग्रेज़ी पद 'bystanders' का लिप्यंतरण कोष्ठक में दिया गया है, जो पाठक को मूल शब्द तक पहुँचने में सहायता करता है।
मुख्य तथ्य
- सामाजिक लागत = निजी (आर्थिक) लागत + बाह्य लागत; जब बाह्य लागत धनात्मक होती है, तभी सामाजिक लागत आर्थिक लागत से अधिक होती है।
- निजी लागत वह है जो उत्पादक स्वयं उठाता है और जो उसकी बहियों में दर्ज होती है — कच्चा माल, मज़दूरी, ईंधन, ब्याज तथा मूल्यह्रास।
- बाह्य लागत वह है जो किसी तीसरे पक्ष पर पड़ती है, जो न उस सौदे का क्रेता है और न विक्रेता; अर्थशास्त्र में उसे 'दर्शक' (bystander) कहते हैं।
- ऋणात्मक बाह्यता में सामाजिक लागत निजी लागत से अधिक होती है और बाज़ार वांछित मात्रा से अधिक उत्पादन कर देता है — प्रदूषण तथा शोर इसके उदाहरण हैं।
- धनात्मक बाह्यता में सामाजिक लाभ निजी लाभ से अधिक होता है और बाज़ार वांछित मात्रा से कम उत्पादन करता है — टीकाकरण, शिक्षा तथा अनुसंधान इसके उदाहरण हैं।
- बाह्यता के कारण बाज़ार का परिणाम कुशल नहीं रहता, जिसे 'बाज़ार की विफलता' कहा जाता है।
- उपचार के प्रचलित उपाय — प्रदूषक पर कर, उत्सर्जन-अनुज्ञप्तियों का व्यापार, प्रत्यक्ष नियमन, तथा लाभकारी गतिविधियों पर अनुदान।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- 'समाज बड़ा है' जैसे दायरे-संबंधी कथन को कारण मान लेना; दायरे की तुलना से लागत का अंतर सिद्ध नहीं होता, बाह्यता से होता है।
- विकल्प (d) की सही-सी बात को उत्तर मान लेना; उपभोक्ता तथा उत्पादक दोनों अर्थव्यवस्था में भी आते हैं, इसलिए वह अंतर नहीं बताता।
- विकल्प (b) में आए 'नहीं' को प्रश्न का निषेध समझ लेना; यह प्रश्न निषेधात्मक नहीं है और वह 'नहीं' विकल्प के अपने वाक्य का अंग है।
- बाह्य लागत और अवसर लागत को एक मान लेना; अवसर लागत छोड़े गए विकल्प का मूल्य है, जबकि बाह्य लागत तीसरे पक्ष पर पड़ने वाला बोझ।
बाह्यता और सामाजिक लागत पर प्रश्न इस परीक्षा में दो रूपों में आते हैं — परिभाषा पूछकर, और कारण पूछकर। कारण वाला रूप कठिन होता है, क्योंकि उसमें विकल्प प्रायः ऐसे सही कथन होते हैं जो प्रश्न का उत्तर नहीं देते। ऐसे प्रश्नों की एक भरोसेमंद तकनीक यह है कि विकल्प चुनने से पहले अपने मन में उत्तर का ढाँचा बना लिया जाए — यहाँ वह ढाँचा है 'सामाजिक लागत = निजी लागत + बाह्य लागत' — और फिर देखा जाए कि कौन-सा विकल्प उस ढाँचे के किसी पद का नाम लेता है। दूसरी तकनीक यह है कि विकल्प को प्रश्न के अधूरे वाक्य से जोड़कर पूरा वाक्य पढ़ा जाए, क्योंकि इस पेपर के कई प्रश्न वाक्य-पूर्ति के रूप में हैं और अलग से पढ़ने पर विकल्प का तर्क छिप जाता है। तीसरी बात, अर्थशास्त्र के प्रश्नों में सामान्य ज्ञान जैसा लगने वाला विकल्प प्रायः उत्तर नहीं होता; उत्तर वही होता है जो किसी तकनीकी पद का नाम लेता हो।
संबंधित PYQ
EPFO_APFC_2016_Q27The term 'Carbon footprint' means
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उत्तर(d) The amount of greenhouse gases produced by our day-to-day activities
EPFO APFC 2016 में 'कार्बन फ़ुटप्रिंट' का अर्थ पूछा गया है — वही पर्यावरणीय बाह्यता का विषय, दूसरी शब्दावली में।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
अर्थशास्त्र में किसी गतिविधि की सामाजिक लागत और निजी लागत के बीच के अंतर को, जो तीसरे पक्ष पर पड़ता है, क्या कहा जाता है?
- (a)अवसर लागत
- (b)बाह्य लागत
- (c)डूबी हुई लागत
- (d)सीमांत लागत
उत्तर(b) बाह्य लागत
- practice — not a real PYQ
निम्नलिखित में से कौन-सा उदाहरण धनात्मक बाह्यता का है, जिसमें सामाजिक लाभ निजी लाभ से अधिक होता है?
- (a)कारख़ाने द्वारा नदी में अपशिष्ट बहाना
- (b)वाहनों से निकलने वाला धुआँ
- (c)व्यापक टीकाकरण कार्यक्रम
- (d)रात में तेज़ आवाज़ का जनरेटर चलाना
उत्तर(c) व्यापक टीकाकरण कार्यक्रम