निम्नलिखित में से कौन-सी एक विशेषता एकाधिकार स्पर्धा की नहीं है?
- (a)बाजार में खरीददारों और बेचनेवालों की बड़ी संख्या
- (b)विभेदित उत्पादों से बाजार बनता है
- (c)बाजार में उत्पाद समजातीय होता है
- (d)विक्रय संवर्धन के लिए बिक्री लागतों का प्रयोग किया जाता है
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) बाजार में उत्पाद समजातीय होता है। यह निषेधात्मक प्रश्न है और हिन्दी स्तंभ में 'नहीं' मोटे टाइप में छपा है। एकाधिकार स्पर्धा (monopolistic competition) वह बाज़ार-रचना है जिसका विवेचन एडवर्ड चैंबरलिन ने किया, और उसकी पहचान ही उत्पाद-विभेद पर टिकी है। इस बाज़ार में विक्रेता बहुत हैं, पर हर विक्रेता का उत्पाद दूसरे के उत्पाद से किसी न किसी रूप में भिन्न होता है — ब्रांड, आकार, पैकिंग, गुणवत्ता, दुकान का स्थान, बिक्री के बाद की सेवा, या केवल विज्ञापन से बनी छवि। इसी भिन्नता के कारण प्रत्येक विक्रेता को अपने उत्पाद पर थोड़ा-सा एकाधिकार मिल जाता है और वह अपनी क़ीमत स्वयं तय कर पाता है, यद्यपि निकट स्थानापन्न उपलब्ध होने से उसकी माँग-वक्र बहुत लचीली रहती है। यही 'एकाधिकार' और 'स्पर्धा' का मेल इस बाज़ार के नाम में झलकता है। अब कथन (c) को देखिए: 'समजातीय उत्पाद' का अर्थ है कि सभी विक्रेताओं का माल बिलकुल एक जैसा हो और क्रेता के लिए उनमें कोई अंतर न रह जाए। यह पूर्ण प्रतिस्पर्धा (perfect competition) की विशेषता है, एकाधिकार स्पर्धा की नहीं — और वस्तुतः यह उत्पाद-विभेद के ठीक विपरीत है, जो एकाधिकार स्पर्धा की जान है। इसीलिए यही कथन अपवाद है। शेष तीनों कथन इस बाज़ार-रचना की मान्य विशेषताएँ हैं — क्रेता-विक्रेताओं की बड़ी संख्या, विभेदित उत्पादों से बना बाज़ार, और विक्रय-संवर्धन के लिए बिक्री लागतों का प्रयोग। ध्यान रहे कि 'बिक्री लागत' अर्थात् विज्ञापन तथा प्रचार का व्यय केवल इसी प्रकार के बाज़ार में अर्थपूर्ण होता है, क्योंकि जहाँ उत्पाद बिलकुल एक जैसे हों वहाँ विज्ञापन से अपने माल को अलग दिखाने की कोई गुंजाइश ही नहीं रहती। अतः विकल्प (c) ही उत्तर है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)बाजार में खरीददारों और बेचनेवालों की बड़ी संख्या — यह एकाधिकार स्पर्धा की सही विशेषता है, इसलिए यह अपवाद नहीं हो सकता। इस बाज़ार में क्रेता और विक्रेता दोनों बड़ी संख्या में होते हैं — यही उसे एकाधिकार तथा अल्पाधिकार से अलग करता है, जहाँ विक्रेता एक या कुछ ही होते हैं। संख्या बड़ी होने का एक महत्त्वपूर्ण परिणाम यह है कि कोई भी एक फ़र्म इतनी बड़ी नहीं होती कि उसके निर्णय से पूरे बाज़ार की क़ीमत हिल जाए, और न ही फ़र्में एक-दूसरे की प्रतिक्रिया का हिसाब लगाकर निर्णय लेती हैं — यह अंतर अल्पाधिकार से बहुत बड़ा है, जहाँ पारस्परिक निर्भरता ही विश्लेषण का केंद्र होती है। इसी के साथ प्रवेश तथा निकास की स्वतंत्रता भी इस बाज़ार की विशेषता है, जिसके कारण दीर्घकाल में फ़र्म केवल सामान्य लाभ अर्जित कर पाती है।
- (b)विभेदित उत्पादों से बाजार बनता है — यह भी इस बाज़ार-रचना की परिभाषात्मक विशेषता है, इसलिए यह उत्तर नहीं है। उत्पाद-विभेद ही वह तत्त्व है जो एकाधिकार स्पर्धा को पूर्ण प्रतिस्पर्धा से अलग करता है। विभेद वास्तविक भी हो सकता है — गुणवत्ता, संघटन, आकार, सामग्री में अंतर — और काल्पनिक भी, जो केवल ब्रांड-नाम, पैकिंग या विज्ञापन से बनता है। दोनों का आर्थिक परिणाम एक ही है: क्रेता के मन में उत्पादों के बीच अंतर बन जाता है और वह किसी एक विक्रेता के लिए कुछ अधिक क़ीमत देने को तैयार हो जाता है। इसी से प्रत्येक फ़र्म की माँग-वक्र नीचे की ओर ढालू होती है, यद्यपि निकट स्थानापन्न होने के कारण वह बहुत लचीली रहती है। रोज़मर्रा के उदाहरण — साबुन, टूथपेस्ट, रेस्तराँ, वस्त्र — इसी बाज़ार के हैं।
- (d)विक्रय संवर्धन के लिए बिक्री लागतों का प्रयोग किया जाता है — यह भी सही है और अपवाद नहीं। 'बिक्री लागत' (selling cost) चैंबरलिन की अपनी शब्दावली है और उसका अर्थ है वह व्यय जो उत्पाद की माँग बढ़ाने या उसे अपनी ओर खींचने के लिए किया जाता है — विज्ञापन, प्रचार, विक्रय-कर्मियों का व्यय, प्रदर्शनी तथा छूट-योजनाएँ। उत्पादन-लागत और बिक्री लागत का भेद महत्त्वपूर्ण है: उत्पादन-लागत वस्तु बनाने पर होती है, जबकि बिक्री लागत उसी बनी हुई वस्तु की माँग-वक्र को दाहिनी ओर खिसकाने के लिए। यह व्यय पूर्ण प्रतिस्पर्धा में अर्थहीन होता है, क्योंकि वहाँ उत्पाद एक जैसे हैं और क़ीमत बाज़ार तय करता है; और शुद्ध एकाधिकार में उसका महत्त्व सीमित रहता है, क्योंकि प्रतिद्वंद्वी ही नहीं। इसलिए बिक्री लागत एकाधिकार स्पर्धा की विशिष्ट पहचान मानी जाती है।
अवधारणा
बाज़ार-रचनाओं को चार कोटियों में पढ़ा जाता है और उनका भेद तीन कसौटियों पर टिका है — विक्रेताओं की संख्या, उत्पाद की प्रकृति, और प्रवेश की स्वतंत्रता। पूर्ण प्रतिस्पर्धा में विक्रेता बहुत, उत्पाद समजातीय, प्रवेश मुक्त, और फ़र्म क़ीमत-ग्राही होती है; उसकी माँग-वक्र पूर्णतः लचीली, अर्थात् क्षैतिज, होती है। एकाधिकार स्पर्धा में विक्रेता बहुत, पर उत्पाद विभेदित, प्रवेश मुक्त, और फ़र्म की माँग-वक्र नीचे की ओर ढालू पर बहुत लचीली; बिक्री लागत यहीं महत्त्वपूर्ण होती है। अल्पाधिकार में विक्रेता कुछ ही, उत्पाद समजातीय या विभेदित, प्रवेश पर बाधाएँ, और फ़र्मों में पारस्परिक निर्भरता — इसीलिए वहाँ मूल्य-कठोरता तथा गुटबंदी की चर्चा होती है। शुद्ध एकाधिकार में विक्रेता एक, निकट स्थानापन्न कोई नहीं, प्रवेश अवरुद्ध, और फ़र्म ही उद्योग। इन चारों को एक तालिका में तीनों कसौटियों के साथ लिख लेने पर इस विषय का कोई भी प्रश्न — चाहे वह सकारात्मक हो या निषेधात्मक — यंत्रवत् हल हो जाता है।
एकाधिकार स्पर्धा की अवधारणा 1930 के दशक में एडवर्ड चैंबरलिन तथा जोन रॉबिन्सन के काम से अर्थशास्त्र में आई, और उसका महत्त्व यह है कि उसने वास्तविक बाज़ारों को समझने का रास्ता खोला — क्योंकि व्यवहार में न तो पूर्ण प्रतिस्पर्धा मिलती है और न शुद्ध एकाधिकार। इस बाज़ार-रचना का एक और परिणाम है 'अतिरिक्त क्षमता' (excess capacity): चूँकि प्रत्येक फ़र्म की माँग-वक्र ढालू होती है, दीर्घकाल में वह अपनी न्यूनतम औसत लागत के बिंदु से कम उत्पादन पर संतुलन में आती है, अर्थात् उसकी उत्पादन-क्षमता का पूरा उपयोग नहीं होता। दीर्घकाल में मुक्त प्रवेश के कारण उसका असामान्य लाभ समाप्त हो जाता है और वह केवल सामान्य लाभ अर्जित करती है। परीक्षा में इन दोनों निष्कर्षों पर भी प्रश्न बनते हैं। हिन्दी स्तंभ ने यहाँ 'monopolistic competition' का अनुवाद 'एकाधिकार स्पर्धा' किया है, लिप्यंतरण नहीं — इसलिए अंग्रेज़ी पद को साथ याद रखना उपयोगी है, क्योंकि पाठ्यपुस्तकों में दोनों रूप मिलते हैं।
मुख्य तथ्य
- एकाधिकार स्पर्धा की परिभाषात्मक विशेषता उत्पाद-विभेद है; समजातीय उत्पाद पूर्ण प्रतिस्पर्धा की विशेषता है, इसलिए वही इस प्रश्न का अपवाद-कथन है।
- इस बाज़ार में क्रेता तथा विक्रेता बड़ी संख्या में होते हैं और प्रवेश तथा निकास स्वतंत्र रहता है, इसलिए कोई एक फ़र्म बाज़ार-क़ीमत को अकेले नहीं हिला सकती।
- उत्पाद-विभेद वास्तविक भी हो सकता है (गुणवत्ता, आकार, संघटन) और काल्पनिक भी (ब्रांड, पैकिंग, विज्ञापन से बनी छवि)।
- विभेद के कारण प्रत्येक फ़र्म की माँग-वक्र नीचे की ओर ढालू होती है, यद्यपि निकट स्थानापन्न उपलब्ध होने से वह बहुत लचीली रहती है।
- 'बिक्री लागत' का अर्थ है विज्ञापन तथा विक्रय-संवर्धन पर किया गया व्यय; यह उत्पादन-लागत से भिन्न है और माँग-वक्र को दाहिनी ओर खिसकाने के लिए किया जाता है।
- दीर्घकाल में मुक्त प्रवेश के कारण फ़र्म केवल सामान्य लाभ अर्जित करती है और उसमें 'अतिरिक्त क्षमता' की स्थिति बनी रहती है।
- इस अवधारणा का विकास 1930 के दशक में एडवर्ड चैंबरलिन तथा जोन रॉबिन्सन के काम से हुआ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- निषेधात्मक 'नहीं' पढ़े बिना कोई भी सही दिखने वाली विशेषता चुन लेना; तीन कथन सच्ची विशेषताएँ हैं और केवल एक अपवाद।
- 'समजातीय' और 'विभेदित' उत्पाद के अर्थ को उलट देना; समजातीय पूर्ण प्रतिस्पर्धा की पहचान है और विभेदित एकाधिकार स्पर्धा की।
- बिक्री लागत को उत्पादन-लागत का ही अंग मान लेना; दोनों अलग हैं और बिक्री लागत माँग-वक्र को खिसकाने के लिए की जाती है।
- विक्रेताओं की बड़ी संख्या देखकर इसे पूर्ण प्रतिस्पर्धा मान लेना; संख्या दोनों में बड़ी होती है, भेद उत्पाद की प्रकृति से होता है।
बाज़ार-रचनाओं पर प्रश्न इस परीक्षा के अर्थशास्त्र खंड में नियमित हैं और उनकी दो शैलियाँ हैं — 'निम्नलिखित में से कौन-सी विशेषता अमुक बाज़ार की है' और 'कौन-सी नहीं है'। दोनों का सामना एक ही तैयारी से हो जाता है: चारों रचनाओं की तुलनात्मक तालिका, जिसमें विक्रेताओं की संख्या, उत्पाद की प्रकृति, प्रवेश की स्वतंत्रता, माँग-वक्र का आकार, बिक्री लागत की भूमिका और दीर्घकालीन लाभ — छह पंक्तियाँ हों। परीक्षा-कक्ष में विकल्प पढ़ते समय यह पूछिए कि यह विशेषता किस रचना की है; जो विशेषता किसी दूसरी रचना की निकले, निषेधात्मक प्रश्न में वही उत्तर है। यहाँ 'समजातीय उत्पाद' सीधे पूर्ण प्रतिस्पर्धा की ओर संकेत करता है, इसलिए निर्णय तत्काल हो जाता है। यही पद्धति अल्पाधिकार तथा एकाधिकार पर बने प्रश्नों में भी उतनी ही कारगर है।
संबंधित PYQ
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
निम्नलिखित में से कौन-सी बाज़ार-रचना में उत्पाद समजातीय होता है और प्रत्येक फ़र्म क़ीमत-ग्राही होती है?
- (a)एकाधिकार स्पर्धा
- (b)पूर्ण प्रतिस्पर्धा
- (c)अल्पाधिकार
- (d)शुद्ध एकाधिकार
उत्तर(b) पूर्ण प्रतिस्पर्धा
- practice — not a real PYQ
अर्थशास्त्र में 'बिक्री लागत' (selling cost) से क्या अभिप्राय है, जिसका महत्त्व एकाधिकार स्पर्धा में सबसे अधिक होता है?
- (a)वस्तु के उत्पादन में लगने वाली कच्चे माल की लागत
- (b)वस्तु की माँग बढ़ाने के लिए विज्ञापन तथा विक्रय-संवर्धन पर किया गया व्यय
- (c)वस्तु के परिवहन तथा भंडारण की लागत
- (d)श्रमिकों को दी जाने वाली मज़दूरी
उत्तर(b) वस्तु की माँग बढ़ाने के लिए विज्ञापन तथा विक्रय-संवर्धन पर किया गया व्यय