बलात् श्रम अथवा बेगार, भारत के संविधान के निम्नलिखित में से कौन-से अनुच्छेद का अतिक्रमण है?
- (a)अनुच्छेद 16
- (b)अनुच्छेद 17
- (c)अनुच्छेद 19
- (d)अनुच्छेद 23
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) अनुच्छेद 23। संविधान के भाग तीन में 'शोषण के विरुद्ध अधिकार' शीर्षक के नीचे दो अनुच्छेद आते हैं — 23 और 24 — और उनमें से अनुच्छेद 23 ठीक इसी विषय पर है। अनुच्छेद 23(1) मानव के दुर्व्यापार, बेगार तथा इसी प्रकार के अन्य बलात् श्रम को प्रतिषिद्ध करता है और कहता है कि इस प्रावधान का उल्लंघन विधि के अनुसार दंडनीय अपराध होगा। ध्यान दीजिए कि 'बेगार' शब्द संविधान का अपना शब्द है — वह किसी अनुवाद से नहीं आया, बल्कि अनुच्छेद के पाठ में ही मौजूद है। बेगार का अर्थ है बिना पारिश्रमिक के, बलपूर्वक कराया गया श्रम — वह पुरानी सामंती प्रथा जिसमें भू-स्वामी या स्थानीय प्रभुत्वशाली व्यक्ति किसी काश्तकार या मज़दूर से मुफ़्त काम कराता था और मना करने पर दंड देता था। संविधान ने इसे मौलिक अधिकार के स्तर पर वर्जित किया, और यह वर्जन राज्य तथा निजी व्यक्ति — दोनों के विरुद्ध लागू होता है, जो अनुच्छेद 23 की एक विशेषता है, क्योंकि अधिकांश मौलिक अधिकार मुख्यतः राज्य के विरुद्ध होते हैं। अनुच्छेद 23(2) एक अपवाद भी रखता है: राज्य सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए अनिवार्य सेवा लागू कर सकता है, पर ऐसा करते समय वह केवल धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा। इसी शृंखला का अगला अनुच्छेद 24 है, जो चौदह वर्ष से कम आयु के बालक को कारख़ाने, खान या अन्य संकटमय नियोजन में लगाने पर रोक लगाता है। यह भी जान लीजिए कि इस अनुच्छेद का दायरा न्यायालय ने पारंपरिक बेगार से कहीं आगे बढ़ाया है — 1982 के एशियाड मज़दूर मामले में यह कहा गया कि न्यूनतम मज़दूरी से कम पर काम कराना भी बलात् श्रम है, क्योंकि आर्थिक विवशता भी एक प्रकार का बल है। शेष तीनों विकल्प संविधान के वास्तविक और महत्त्वपूर्ण अनुच्छेद हैं, पर उनका विषय बलात् श्रम नहीं है। अतः विकल्प (d) ही सही है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)अनुच्छेद 16 — अनुच्छेद 16 का विषय लोक नियोजन के मामलों में अवसर की समानता है, बलात् श्रम नहीं। यह अनुच्छेद कहता है कि राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति के विषय में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी, और केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान या निवास के आधार पर किसी नागरिक को अपात्र नहीं ठहराया जाएगा; इसके साथ पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण तथा अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए पदोन्नति में आरक्षण के उपबंध भी इसी अनुच्छेद में हैं। अर्थात् इसका क्षेत्र नियुक्ति और आरक्षण है। यह विकल्प उन अभ्यर्थियों को उलझाता है जो 'श्रम' शब्द सुनते ही रोज़गार से जुड़े किसी अनुच्छेद की ओर बढ़ते हैं; भेद यह है कि अनुच्छेद 16 नौकरी पाने के अवसर की बात करता है, और अनुच्छेद 23 काम कराने के तरीक़े की।
- (b)अनुच्छेद 17 — अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत करता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध करता है; अस्पृश्यता से उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना विधि के अनुसार दंडनीय अपराध है। इसी अनुच्छेद के आधार पर नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 बने। यह विकल्प इसलिए फुसलाता है कि बेगार की प्रथा ऐतिहासिक रूप से जाति-आधारित अधीनता से जुड़ी रही है, इसलिए दोनों विषय एक-दूसरे के निकट लगते हैं। पर संविधान ने दोनों को अलग-अलग अनुच्छेदों में रखा है — अनुच्छेद 17 सामाजिक बहिष्कार तथा अस्पृश्यता पर है, और अनुच्छेद 23 बलपूर्वक श्रम पर। प्रश्न विशेष रूप से बलात् श्रम की बात कर रहा है, इसलिए उत्तर 23 ही है।
- (c)अनुच्छेद 19 — अनुच्छेद 19 नागरिकों को छह स्वतंत्रताएँ देता है — वाक् तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्वक तथा निरायुध सम्मेलन की, संगम या संघ बनाने की, भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण की, निवास तथा बसने की, और कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने की। इनमें से अंतिम स्वतंत्रता — वृत्ति या कारोबार की — व्यवसाय चुनने के अधिकार की बात करती है, और यही समानता इस विकल्प को आकर्षक बनाती है। पर व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता और बलपूर्वक श्रम से मुक्ति दो अलग प्रश्न हैं: पहला यह तय करता है कि व्यक्ति कौन-सा काम चुने, दूसरा यह कि किसी से जबरन और बिना पारिश्रमिक काम न कराया जाए। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताएँ युक्तियुक्त निर्बंधनों के अधीन हैं, जबकि अनुच्छेद 23 का प्रतिषेध निजी व्यक्तियों पर भी लागू होता है।
अवधारणा
'शोषण के विरुद्ध अधिकार' संविधान के भाग तीन का वह खंड है जो व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के शोषण से बचाता है, केवल राज्य की मनमानी से नहीं — और यही उसे शेष मौलिक अधिकारों से अलग करता है। अनुच्छेद 23 तीन चीज़ों को प्रतिषिद्ध करता है: मानव का दुर्व्यापार, बेगार, तथा इसी प्रकार का अन्य बलात् श्रम। मानव के दुर्व्यापार में स्त्रियों तथा बालकों की ख़रीद-फ़रोख़्त, वेश्यावृत्ति के लिए विवश करना और दास-प्रथा जैसे व्यवहार आते हैं। बेगार सामंती अर्थव्यवस्था की वह प्रथा है जिसमें बिना मज़दूरी के काम कराया जाता है। 'इसी प्रकार के अन्य बलात् श्रम' वाक्यांश ने इस अनुच्छेद को विस्तृत बना दिया, क्योंकि उसमें बंधुआ मज़दूरी और आर्थिक विवशता से उपजा श्रम भी आ जाता है। अनुच्छेद 23(2) राज्य को सार्वजनिक प्रयोजन के लिए अनिवार्य सेवा लागू करने की छूट देता है, पर उसमें भेदभाव पर रोक है। अनुच्छेद 24 इसी खंड का दूसरा अनुच्छेद है, जो चौदह वर्ष से कम आयु के बालकों के संकटमय नियोजन पर रोक लगाता है।
इस अनुच्छेद का व्यावहारिक विस्तार न्यायालय के निर्णयों और विधायी उपायों से हुआ है, और परीक्षा की दृष्टि से दोनों महत्त्वपूर्ण हैं। विधायी पक्ष में बंधित श्रम पद्धति (उत्सादन) अधिनियम, 1976 प्रमुख है, जिसने बंधुआ मज़दूरी को समाप्त घोषित किया और बंधुआ मज़दूरों के ऋण रद्द किए; इसके साथ अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम तथा बाल श्रम से जुड़े क़ानून भी इसी अनुच्छेद की भावना से जुड़ते हैं। न्यायिक पक्ष में दो निर्णय सबसे अधिक उद्धृत होते हैं। पीपुल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ (1982), जिसे 'एशियाड मज़दूर मामला' कहा जाता है, में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि न्यूनतम मज़दूरी से कम पर काम कराना भी अनुच्छेद 23 के अर्थ में बलात् श्रम है, क्योंकि आर्थिक विवशता भी एक प्रकार का बल है। बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ (1984) में न्यायालय ने बंधुआ मज़दूरी की पहचान तथा पुनर्वास के लिए विस्तृत निर्देश दिए। इन दोनों निर्णयों से अनुच्छेद 23 का दायरा पारंपरिक बेगार से आगे बढ़कर आधुनिक श्रम-शोषण तक पहुँचा।
मुख्य तथ्य
- अनुच्छेद 23(1) मानव के दुर्व्यापार, बेगार तथा इसी प्रकार के अन्य बलात् श्रम को प्रतिषिद्ध करता है और उल्लंघन को विधि के अनुसार दंडनीय अपराध बनाता है।
- 'बेगार' संविधान का अपना शब्द है — इसका अर्थ है बिना पारिश्रमिक के बलपूर्वक कराया गया श्रम, जो सामंती व्यवस्था की एक प्रथा थी।
- अनुच्छेद 23 का प्रतिषेध राज्य तथा निजी व्यक्ति — दोनों के विरुद्ध लागू होता है, जो इसे अधिकांश अन्य मौलिक अधिकारों से अलग करता है।
- अनुच्छेद 23(2) राज्य को सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए अनिवार्य सेवा लागू करने देता है, पर केवल धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग के आधार पर भेदभाव वर्जित है।
- अनुच्छेद 24 इसी खंड का दूसरा अनुच्छेद है — चौदह वर्ष से कम आयु के बालक को कारख़ाने, खान या अन्य संकटमय नियोजन में लगाने पर रोक।
- बंधित श्रम पद्धति (उत्सादन) अधिनियम, 1976 ने बंधुआ मज़दूरी को समाप्त घोषित किया और बंधुआ मज़दूरों के ऋण रद्द किए।
- एशियाड मज़दूर मामले (1982) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि न्यूनतम मज़दूरी से कम पर काम कराना भी अनुच्छेद 23 के अर्थ में बलात् श्रम है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- 'श्रम' शब्द देखकर अनुच्छेद 16 चुन लेना; उसका विषय लोक नियोजन में अवसर की समानता है, बलपूर्वक कराया गया श्रम नहीं।
- बेगार को जाति-आधारित अधीनता से जोड़कर अनुच्छेद 17 चुन लेना; अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत करता है, बलात् श्रम का नहीं।
- अनुच्छेद 19(1)(g) की वृत्ति-स्वतंत्रता को इस प्रश्न से जोड़ देना; व्यवसाय चुनने का अधिकार और बलात् श्रम से मुक्ति दो अलग प्रश्न हैं।
- अनुच्छेद 23 और 24 को गड्डमड्ड कर देना; 23 बलात् श्रम तथा मानव-दुर्व्यापार पर है और 24 बाल-नियोजन पर।
अनुच्छेद-संख्या पूछने वाले प्रश्न इस परीक्षा में लगभग निश्चित रूप से आते हैं, और उनका ढाँचा सरल दिखता है पर वह भ्रम-जनक विकल्पों पर टिका होता है — प्रायः चारों विकल्प एक ही भाग के, आस-पास की संख्या वाले अनुच्छेद होते हैं। इसलिए संविधान के भाग तीन को शीर्षक-वार याद रखना सबसे उपयोगी है: समता का अधिकार 14 से 18, स्वतंत्रता का अधिकार 19 से 22, शोषण के विरुद्ध अधिकार 23 तथा 24, धर्म की स्वतंत्रता 25 से 28, संस्कृति तथा शिक्षा संबंधी अधिकार 29 और 30, और संवैधानिक उपचारों का अधिकार 32। यदि शीर्षक याद हो तो विषय से अनुच्छेद तक पहुँचना यांत्रिक हो जाता है। दूसरा उपयोगी अभ्यास यह है कि हर अनुच्छेद के साथ एक प्रसिद्ध न्यायिक निर्णय और एक संबंधित अधिनियम जोड़ लिया जाए, क्योंकि परीक्षा उन्हें भी अलग प्रश्नों में लौटाती है — जैसे अनुच्छेद 23 के साथ एशियाड मज़दूर मामला और 1976 का बंधित श्रम अधिनियम।
संबंधित PYQ
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
भारत के संविधान का कौन-सा अनुच्छेद चौदह वर्ष से कम आयु के बालक को कारख़ाने, खान या अन्य संकटमय नियोजन में लगाने पर रोक लगाता है?
- (a)अनुच्छेद 21A
- (b)अनुच्छेद 23
- (c)अनुच्छेद 24
- (d)अनुच्छेद 45
उत्तर(c) अनुच्छेद 24
- practice — not a real PYQ
किस अधिनियम ने भारत में बंधुआ मज़दूरी की पद्धति को समाप्त घोषित किया और बंधुआ मज़दूरों के ऋण रद्द किए?
- (a)न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948
- (b)बंधित श्रम पद्धति (उत्सादन) अधिनियम, 1976
- (c)ठेका श्रम (विनियमन तथा उत्सादन) अधिनियम, 1970
- (d)अंतरराज्यिक प्रवासी कर्मकार अधिनियम, 1979
उत्तर(b) बंधित श्रम पद्धति (उत्सादन) अधिनियम, 1976