19वीं सदी में, भारत में आर्थिक विकास की कमी के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा/से कारण जिम्मेवार था/थे? 1. आधिकारिक तौर पर ब्रिटिश सरकार अहस्तक्षेप की नीति से वचनबद्ध थी, किन्तु वास्तव में यह एक विभेदात्मक हस्तक्षेप की नीति थी। 2. यूरोपीय उद्यमियों के संबंधन बैंकों और एजेंसी घरों के साथ थे, जबकि भारतीयों को स्वजन, परिवार व जाति के लोगों पर निर्भर रहना पड़ता था। 3. जब बागानों का अंतरण व्यक्तिगत पूँजीपति के स्वामित्व में किया गया, तब देशीय निवेशकों की जानबूझकर उपेक्षा की गयी। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- (a)केवल 1
- (b)केवल 2 और 3
- (c)केवल 1 और 3
- (d)1, 2 और 3
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) 1, 2 और 3। यह कथन-आधारित प्रश्न है, इसलिए सही रास्ता यही है कि तीनों कथनों का अलग-अलग निर्णय किया जाए और उसके बाद कूट मिलाया जाए। कथन 1 सही है। ब्रिटिश सरकार घोषित रूप से 'अहस्तक्षेप' अर्थात् laissez-faire की नीति पर चलती थी — अर्थव्यवस्था में सरकार हस्तक्षेप न करे, यही उसका सैद्धांतिक वचन था। पर व्यवहार में हस्तक्षेप लगातार हुआ, और वह एकतरफ़ा था। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण सूती वस्त्र पर लगाया गया प्रति-संतुलनकारी उत्पाद-शुल्क है: 1890 के दशक में जब राजस्व के लिए आयातित सूती माल पर आयात-शुल्क लगाया गया, तो साथ ही भारतीय मिलों के उत्पादन पर भी उतना ही उत्पाद-शुल्क लगा दिया गया, ताकि भारतीय उद्योग को कोई संरक्षण न मिल जाए। यह अहस्तक्षेप नहीं, विभेदात्मक हस्तक्षेप था। कथन 2 सही है। यूरोपीय उद्यमी विनिमय बैंकों, प्रबंध अभिकरणों (managing agencies) और एजेंसी घरों के जाल से जुड़े थे, जिनसे उन्हें पूँजी, साख, बीमा, जहाज़रानी और विपणन — सब एक साथ मिल जाता था। भारतीय उद्यमी के पास ऐसा संस्थागत ढाँचा नहीं था; उसे पूँजी और साख के लिए अपने कुटुंब, जाति और समुदाय के जाल पर निर्भर रहना पड़ता था, जैसे मारवाड़ी, पारसी, गुजराती और चेट्टियार व्यापारिक समुदायों में देखा जाता है। कथन 3 सही है। बागानों — विशेषतः असम के चाय-बागानों — के लिए बंजर भूमि (waste land) के जो नियम बनाए गए, वे उदार शर्तों पर यूरोपीय पूँजीपतियों को लंबी लीज़ देने के लिए गढ़े गए थे। उनकी शर्तें ऐसी थीं जिन्हें स्थानीय उद्यमी पूरा नहीं कर सकते थे, और जब तक भारतीय निवेशक इस उद्योग में प्रवेश कर पाते, सबसे उपजाऊ चाय-भूमि ब्रिटिश कंपनियों को बंदोबस्त की जा चुकी थी। परिणामतः चाय के संयुक्त-पूँजी उद्यमों की अधिकांश पूँजी इंग्लैंड में पंजीकृत कंपनियों की रही, भारत में पंजीकृत कंपनियों की नहीं। तीनों कथन सही हैं, इसलिए कूट में 1, 2 और 3 — अर्थात् विकल्प (d) — ही उत्तर है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)केवल 1 — यह विकल्प केवल कथन 1 को सही मानता है, अर्थात् कथनों 2 और 3 को अस्वीकार करता है — और दोनों अस्वीकार ग़लत हैं। कथन 2 उन्नीसवीं सदी के भारतीय उद्यम का सबसे बुनियादी संरचनात्मक तथ्य कहता है: यूरोपीय उद्यमी संस्थागत वित्त — विनिमय बैंक, एजेंसी घर, प्रबंध अभिकरण — से जुड़े थे, जबकि भारतीय को कुटुंब और जाति के जाल से पूँजी जुटानी पड़ती थी। कथन 3 बागान-उद्योग की विशिष्ट कहानी है, जिसमें भूमि-नियम ही यूरोपीय पूँजी के अनुकूल गढ़े गए थे। जो अभ्यर्थी 'केवल 1' चुनता है, वह प्रायः नीति-स्तर के भेदभाव को तो पहचान लेता है पर पूँजी-बाज़ार और भूमि-नीति के भेदभाव को नहीं देखता। कथन-आधारित प्रश्न में यही सबसे आम भूल है — एक कथन के प्रमाण से संतुष्ट होकर शेष को बिना जाँचे छोड़ देना।
- (b)केवल 2 और 3 — यह विकल्प कथन 1 को अस्वीकार करता है, जो सबसे कम टिकने वाला अस्वीकार है। अहस्तक्षेप की घोषित नीति और विभेदात्मक हस्तक्षेप के व्यवहार का अंतर औपनिवेशिक आर्थिक इतिहास का केंद्रीय तर्क ही है, और उसका प्रमाण नीति-दस्तावेज़ों में मिलता है — सूती वस्त्र पर प्रति-संतुलनकारी उत्पाद-शुल्क, रेलवे में निवेशकों को दी गई प्रतिफल-गारंटी, सरकारी ख़रीद में ब्रिटिश आपूर्तिकर्ताओं की प्राथमिकता, और यूरोपीय उद्यम के पक्ष में भूमि तथा वन-नीति। यदि सरकार सचमुच अहस्तक्षेपी होती तो न भारतीय मिलों पर उत्पाद-शुल्क लगता और न रेलवे-पूँजी को गारंटी मिलती। इसलिए कथन 1 को छोड़ देना उस पूरे तर्क को छोड़ देना है जिस पर उन्नीसवीं सदी की भारतीय आर्थिक बहस टिकी है।
- (c)केवल 1 और 3 — यह विकल्प कथन 2 को अस्वीकार करता है, और यही अस्वीकार सबसे कम बचाव-योग्य है, क्योंकि कथन 2 का प्रमाण संस्थाओं के नामों में ही दिखाई देता है। कलकत्ता, बंबई और मद्रास के एजेंसी घर तथा प्रबंध अभिकरण यूरोपीय पूँजी को उद्योग तक पहुँचाने का ढाँचा थे — वे एक साथ पूँजी जुटाते, प्रबंध करते, कच्चा माल ख़रीदते और उत्पाद बेचते थे, और विनिमय बैंकों से उनका सीधा संबंध था। भारतीय उद्यमी के पास ऐसा कोई तंत्र नहीं था; उसकी साख उसके समुदाय की साख थी, और पूँजी परिवार तथा जाति के भीतर से आती थी। यही कारण है कि भारतीय उद्यम कुछ विशिष्ट व्यापारिक समुदायों तक सीमित रहा। इसलिए 'केवल 1 और 3' अधूरा है और पूरा उत्तर 1, 2 तथा 3 ही बनता है।
अवधारणा
उन्नीसवीं सदी में भारत के औद्योगीकरण की गति धीमी क्यों रही — इस प्रश्न के उत्तर तीन स्तरों पर दिए जाते हैं, और प्रश्न के तीन कथन ठीक इन्हीं तीन स्तरों से आते हैं। पहला स्तर नीति का है: घोषित अहस्तक्षेप के बावजूद कर, शुल्क, सरकारी ख़रीद और रेलवे-निवेश की गारंटी जैसे उपकरण लगातार एक पक्ष के लाभ में चले। दूसरा स्तर संस्थागत वित्त का है: आधुनिक उद्योग के लिए दीर्घकालिक पूँजी चाहिए, और वह पूँजी बैंकों, एजेंसी घरों तथा प्रबंध अभिकरणों के जाल से आती है — यह जाल यूरोपीय उद्यमियों के पास था, भारतीयों के पास नहीं, इसलिए भारतीय उद्यम समुदाय-आधारित साख पर टिका रहा। तीसरा स्तर संसाधनों तक पहुँच का है: भूमि, वन और खनिज के नियम इस प्रकार बनाए गए कि नए क्षेत्रों में प्रवेश यूरोपीय पूँजी के लिए सरल और भारतीय के लिए कठिन हो — बागान इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं। इन तीनों को अलग-अलग पहचान लेने पर इस विषय का कोई भी कथन-प्रश्न सुलझाया जा सकता है। चौथा स्तर, जिसे प्रश्न ने नहीं छुआ पर जो उसी बहस का अंग है, माँग और क्रय-शक्ति का है — कृषि की दुर्दशा से घरेलू बाज़ार छोटा बना रहा।
असम के चाय-बागानों की कहानी कथन 3 को मूर्त रूप देती है। उन्नीसवीं सदी के मध्य में सरकार ने 'बंजर भूमि' के नाम पर विशाल भू-भाग लंबी लीज़ पर अत्यंत उदार शर्तों पर देने के नियम बनाए, जिनका उद्देश्य यूरोपीय पूँजी को इस नए उद्योग की ओर खींचना था। शर्तें — न्यूनतम क्षेत्रफल, अग्रिम पूँजी और एक निश्चित अवधि में भूमि साफ़ करके रोपण करने की बाध्यता — ऐसी थीं जिन्हें स्थानीय उद्यमी प्रायः पूरा नहीं कर सकते थे। जब तक भारतीय पूँजी इस उद्योग में उतरी, सबसे अच्छी भूमि बंदोबस्त हो चुकी थी और नियम भी क्रमशः कम आकर्षक बना दिए गए थे। इसका परिणाम यह हुआ कि चाय-उद्योग की अधिकांश संयुक्त-पूँजी इंग्लैंड में पंजीकृत कंपनियों की रही। इसी क्षेत्र से आगे बागान-श्रम की गिरमिटिया व्यवस्था और उस पर बने विशेष क़ानूनों का प्रसंग निकलता है, जो श्रम-विधि के अध्ययन में लौटकर आता है।
मुख्य तथ्य
- कथन 1 सही — ब्रिटिश सरकार घोषित रूप से अहस्तक्षेप (laissez-faire) की नीति पर थी, पर व्यवहार में उसका हस्तक्षेप एकतरफ़ा और विभेदात्मक था।
- इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण सूती वस्त्र पर लगाया गया प्रति-संतुलनकारी उत्पाद-शुल्क है, जिससे भारतीय मिलों को आयात-शुल्क का कोई संरक्षण न मिल सके।
- कथन 2 सही — यूरोपीय उद्यमी विनिमय बैंकों, एजेंसी घरों और प्रबंध अभिकरणों के जाल से जुड़े थे, जो पूँजी, साख, विपणन तथा जहाज़रानी एक साथ उपलब्ध कराते थे।
- भारतीय उद्यमी को पूँजी और साख के लिए कुटुंब, जाति और समुदाय पर निर्भर रहना पड़ता था — मारवाड़ी, पारसी, गुजराती तथा चेट्टियार व्यापारिक जालों का महत्त्व इसी से है।
- कथन 3 सही — असम में चाय-बागानों के लिए बनाए गए बंजर भूमि नियम यूरोपीय पूँजी को उदार शर्तों पर लंबी लीज़ देने के लिए गढ़े गए थे।
- इन नियमों की शर्तें स्थानीय उद्यमियों के लिए पूरी करना कठिन थीं, और भारतीय निवेशकों के प्रवेश तक सबसे उपजाऊ चाय-भूमि ब्रिटिश कंपनियों को बंदोबस्त हो चुकी थी।
- परिणामस्वरूप चाय के संयुक्त-पूँजी उद्यमों की अधिकांश पूँजी इंग्लैंड में पंजीकृत कंपनियों की रही, भारत में पंजीकृत कंपनियों की नहीं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- कथन-प्रश्न में एक कथन का प्रमाण मिलते ही शेष को बिना जाँचे छोड़ देना; यहाँ तीनों कथन अलग-अलग स्तरों से आते हैं और तीनों की जाँच अलग-अलग करनी पड़ती है।
- 'अहस्तक्षेप की नीति' को उसके घोषित अर्थ में सही मान लेना और कथन 1 को इसीलिए ग़लत ठहरा देना; कथन स्वयं घोषित नीति और व्यवहार का अंतर बता रहा है।
- कथन 2 को केवल राय मान लेना; एजेंसी घर, प्रबंध अभिकरण और विनिमय बैंक वास्तविक संस्थाएँ थीं और उनके नाम आज भी दस्तावेज़ों में मिलते हैं।
- बागानों वाले कथन 3 को अत्युक्ति मान लेना; बंजर भूमि नियमों की शर्तें ही ऐसी थीं कि स्थानीय उद्यमी उन पर खरे नहीं उतर सकते थे।
इस पेपर के भाग B में कथन-आधारित प्रश्न गिने-चुने ही हैं, इसलिए जब वे आते हैं तब उन पर अलग से ध्यान देना चाहिए। इनका ढाँचा एक-सा होता है — दो, तीन या चार क्रमांकित कथन, उसके बाद अलग अनुच्छेद में 'नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए' वाली निर्देश-पंक्ति, और फिर कूट। सुरक्षित पद्धति यह है कि कूट को विकल्प पढ़ने से पहले ढक दिया जाए, प्रत्येक कथन के आगे मन में 'सही' या 'ग़लत' लिख लिया जाए, और तभी विकल्प देखे जाएँ; अन्यथा विकल्पों की बनावट ही निर्णय को खींचने लगती है। एक और उपयोगी तकनीक यह है कि जिस कथन पर सबसे अधिक विश्वास हो, उसी से आरंभ कीजिए और उसके आधार पर विकल्प काटते चलिए — यहाँ यदि कथन 1 सही है तो विकल्प (b) तुरंत बाहर हो जाता है, और यदि कथन 2 भी सही है तो (a) तथा (c) भी।
संबंधित PYQ
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
उन्नीसवीं सदी के अंत में भारतीय सूती मिलों के उत्पादन पर प्रति-संतुलनकारी उत्पाद-शुल्क लगाने का मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित में से क्या था?
- (a)भारतीय मिलों को आयातित माल के मुक़ाबले संरक्षण देना
- (b)भारतीय मिलों को आयात-शुल्क से मिलने वाला संरक्षण समाप्त करना
- (c)भारतीय मिलों में श्रम-दशाओं में सुधार कराना
- (d)कच्चे कपास के निर्यात को प्रोत्साहित करना
उत्तर(b) भारतीय मिलों को आयात-शुल्क से मिलने वाला संरक्षण समाप्त करना
- practice — not a real PYQ
औपनिवेशिक भारत में यूरोपीय उद्यम को पूँजी, प्रबंध और विपणन एक साथ उपलब्ध कराने वाली जिस व्यवस्था का अंत कंपनी अधिनियम में संशोधन से हुआ, वह कौन-सी थी?
- (a)प्रबंध अभिकरण प्रणाली
- (b)स्थायी बंदोबस्त
- (c)रैयतवाड़ी व्यवस्था
- (d)गिरमिटिया श्रम व्यवस्था
उत्तर(a) प्रबंध अभिकरण प्रणाली