1880 के दशक के आरंभ में आर्य महिला समाज की स्थापना इनमें से किसके द्वारा की गयी थी?
- (a)स्वामी दयानंद सरस्वती
- (b)स्वामी विवेकानंद
- (c)पंडिता रमाबाई
- (d)रमाबाई रानाडे
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) पंडिता रमाबाई। आर्य महिला समाज की स्थापना पंडिता रमाबाई ने 1882 में पुणे में की थी, अर्थात् ठीक उसी कालखंड में जिसे प्रश्न '1880 के दशक के आरंभ' कहता है। यह संस्था उनके पति की मृत्यु के तुरंत बाद खड़ी हुई और इसका उद्देश्य स्त्रियों को शिक्षित करना, बाल-विवाह के विरुद्ध जनमत बनाना तथा विधवाओं की दशा सुधारना था। रमाबाई की विशिष्टता यह है कि वे स्वयं संस्कृत की विदुषी थीं — कलकत्ता के विद्वानों ने उन्हें 'पंडिता' और 'सरस्वती' की उपाधियाँ दी थीं — और इसीलिए वे शास्त्र के भीतर से स्त्री-प्रश्न उठा सकती थीं, जो उस युग में असाधारण बात थी। आर्य महिला समाज की स्थापना के उसी वर्ष उन्होंने शिक्षा पर बनी हंटर आयोग के सामने साक्ष्य दिया और यह माँग रखी कि स्त्रियों के लिए शिक्षिकाओं का प्रशिक्षण हो तथा भारतीय स्त्रियों को चिकित्सा-शिक्षा में प्रवेश मिले, ताकि उनका इलाज करने वाली महिला चिकित्सक उपलब्ध हों। आगे का क्रम भी याद रखने योग्य है: 1887 में उनकी पुस्तक 'द हाई कास्ट हिंदू वुमन' प्रकाशित हुई; 1889 में उन्होंने विधवाओं और परित्यक्ता स्त्रियों के लिए 'शारदा सदन' खोला; और 1890 के दशक के उत्तरार्ध में केड़गाँव में 'मुक्ति मिशन' की स्थापना की, जो अकाल-पीड़ित स्त्रियों और बालिकाओं के लिए आश्रय बना। इस प्रश्न का असली जाल विकल्प (d) है, क्योंकि 'पंडिता रमाबाई' और 'रमाबाई रानाडे' दो अलग व्यक्ति हैं और हिन्दी में उनके नाम देखने में लगभग एक जैसे लगते हैं — हिन्दी स्तंभ में ये दोनों नाम एक के नीचे एक छपे हैं, इसलिए जल्दी पढ़ने पर घुल-मिल सकते हैं। संस्थापक पंडिता रमाबाई हैं, अतः विकल्प (c) ही सही है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)स्वामी दयानंद सरस्वती — यह विकल्प नाम की समानता पर टिका है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में बंबई में आर्य समाज की स्थापना की थी, और 'आर्य महिला समाज' नाम में वही 'आर्य' शब्द आने से ऐसा लगता है मानो दोनों एक ही धारा की संस्थाएँ हों। वस्तुतः दोनों का संबंध नहीं है: आर्य समाज वेदों की ओर लौटने का धार्मिक सुधार-आंदोलन था, जबकि आर्य महिला समाज स्त्री-शिक्षा और स्त्री-अधिकारों के लिए बनी महाराष्ट्र की संस्था थी। कालक्रम की जाँच से भी यह विकल्प कमज़ोर पड़ता है — दयानंद का देहावसान 1883 में हुआ और उनके सुधार-कार्य का केंद्र स्त्री-संगठन नहीं था। ऐसे प्रश्नों में साझा शब्द को प्रमाण मानना सबसे आम भूल है; नाम मिलाने के बजाय संस्था का उद्देश्य और क्षेत्र मिलाइए।
- (b)स्वामी विवेकानंद — स्वामी विवेकानंद का काल और कार्यक्षेत्र दोनों यहाँ मेल नहीं खाते। 1880 के दशक के आरंभ में वे अपनी युवावस्था में थे; उनका सार्वजनिक जीवन 1893 के शिकागो धर्म-संसद के बाद प्रमुखता में आया और रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1897 में हुई। स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में उनकी प्रेरणा से जो काम हुआ, वह मुख्यतः भगिनी निवेदिता के माध्यम से 1898 में कलकत्ता में बालिका विद्यालय के रूप में सामने आया — अर्थात् प्रश्न में दिए गए दशक से डेढ़ दशक बाद। इसलिए यह विकल्प केवल एक बड़े नाम की उपस्थिति है, तथ्य नहीं। ऐसे प्रश्न में सबसे तेज़ जाँच यही है कि प्रत्येक नाम के सार्वजनिक जीवन का आरंभ-वर्ष याद कर लिया जाए और उसे प्रश्न के दशक से मिलाकर देखा जाए।
- (d)रमाबाई रानाडे — यही इस प्रश्न का असली जाल है, क्योंकि रमाबाई रानाडे वास्तव में आर्य महिला समाज से जुड़ी थीं — पर संस्थापक के रूप में नहीं। वे न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानाडे की पत्नी थीं और उन्होंने बंबई में आर्य महिला समाज की एक शाखा स्थापित की, अर्थात् वे संस्था को आगे बढ़ाने वाली थीं, उसे जन्म देने वाली नहीं। उनका अपना बड़ा योगदान अलग है: बंबई में 'हिंदू लेडीज़ सोशल ऐंड लिटररी क्लब' की स्थापना और सेवा सदन का नेतृत्व, जो बंबई में 1908 में और पुणे में 1909 में आरंभ हुआ। नाम की समानता के कारण दोनों रमाबाइयाँ प्रायः एक मान ली जाती हैं; भेद इस तरह याद रखिए — पंडिता रमाबाई संस्कृत की विदुषी थीं और उन्होंने 1882 में पुणे में आर्य महिला समाज खड़ा किया, जबकि रमाबाई रानाडे रानाडे की पत्नी थीं और उनका काम सेवा सदन से जुड़ा है।
अवधारणा
उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में महाराष्ट्र स्त्री-प्रश्न पर सबसे सक्रिय क्षेत्रों में था, और वहाँ तीन अलग धाराएँ साथ-साथ चल रही थीं। पहली, ज्योतिराव तथा सावित्रीबाई फुले की धारा, जिसने 1848 से बालिका विद्यालय आरंभ किए और जाति तथा स्त्री दोनों प्रश्नों को एक साथ उठाया। दूसरी, प्रार्थना समाज तथा रानाडे-भंडारकर की सुधारवादी धारा, जो विधवा-पुनर्विवाह और स्त्री-शिक्षा के लिए संस्थाएँ बना रही थी। तीसरी, पंडिता रमाबाई की धारा, जो शास्त्र-ज्ञान से लैस होकर स्त्री की अधीनता पर सीधा प्रश्न उठाती थी और जिसका काम आश्रय-गृहों तथा प्रशिक्षण-संस्थाओं के रूप में मूर्त हुआ। इन तीनों को अलग-अलग पहचानना इसलिए ज़रूरी है कि परीक्षा प्रायः एक धारा की संस्था को दूसरी धारा के व्यक्ति से जोड़कर विकल्प बनाती है। साथ ही यह भी ध्यान रखिए कि इस काल की अधिकांश स्त्री-संस्थाओं के नाम मिलते-जुलते हैं — आर्य महिला समाज, भारत स्त्री महामंडल, सेवा सदन, महिला परिषद् — इसलिए नाम के साथ नगर और वर्ष जोड़कर याद रखना ही सुरक्षित है।
पंडिता रमाबाई (1858–1922) का जीवन असाधारण मोड़ों से भरा है और उन्हीं मोड़ों से परीक्षा के तथ्य निकलते हैं। संस्कृत की शिक्षा उन्हें अपने पिता से मिली; कलकत्ता के विद्वानों ने उनकी विद्वत्ता के लिए उन्हें 'पंडिता' और 'सरस्वती' की उपाधियाँ दीं। 1882 में पति की मृत्यु के बाद उन्होंने पुणे में आर्य महिला समाज की स्थापना की और उसी वर्ष हंटर आयोग के समक्ष स्त्री-शिक्षा और स्त्रियों की चिकित्सा-शिक्षा की माँग रखी। इसके बाद वे इंग्लैंड गईं, जहाँ 1883 में उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार किया, फिर अमेरिका गईं और वहाँ 'द हाई कास्ट हिंदू वुमन' (1887) लिखी, जिससे मिली आय ने भारत लौटकर शारदा सदन (1889) खोलने में सहायता की। 1890 के दशक के अकालों के दौरान उन्होंने केड़गाँव में मुक्ति मिशन के माध्यम से बड़ी संख्या में स्त्रियों और बालिकाओं को आश्रय दिया। 1919 में उन्हें कैसर-ए-हिंद पदक मिला। यह पूरा जीवन-वृत्त एक ही प्रश्न में नहीं आता, पर उसके किसी भी टुकड़े पर प्रश्न बन सकता है।
मुख्य तथ्य
- आर्य महिला समाज की स्थापना पंडिता रमाबाई ने 1882 में पुणे में की, उनके पति की मृत्यु के तुरंत बाद।
- कलकत्ता के विद्वानों ने उनकी संस्कृत-विद्वत्ता के लिए उन्हें 'पंडिता' और 'सरस्वती' की उपाधियाँ दी थीं।
- 1882 में ही उन्होंने हंटर आयोग के समक्ष साक्ष्य देकर स्त्रियों के लिए शिक्षिकाओं के प्रशिक्षण और भारतीय स्त्रियों की चिकित्सा-शिक्षा की माँग रखी।
- उनकी पुस्तक 'द हाई कास्ट हिंदू वुमन' 1887 में प्रकाशित हुई; विधवाओं के लिए 'शारदा सदन' उन्होंने 1889 में आरंभ किया।
- 1890 के दशक के उत्तरार्ध में उन्होंने केड़गाँव में 'मुक्ति मिशन' की स्थापना की, जो अकाल-पीड़ित स्त्रियों और बालिकाओं का आश्रय बना।
- रमाबाई रानाडे एक भिन्न व्यक्ति थीं — न्यायमूर्ति एम॰ जी॰ रानाडे की पत्नी, जिन्होंने बंबई में आर्य महिला समाज की शाखा स्थापित की और सेवा सदन का नेतृत्व किया (बंबई 1908, पुणे 1909)।
- स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में बंबई में आर्य समाज की स्थापना की थी — नाम में 'आर्य' साझा होने के बावजूद दोनों संस्थाएँ अलग हैं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- पंडिता रमाबाई और रमाबाई रानाडे को एक व्यक्ति मान लेना; संस्थापक पहली हैं, जबकि दूसरी ने बंबई में शाखा खोली और सेवा सदन का नेतृत्व किया।
- 'आर्य' शब्द की समानता देखकर आर्य महिला समाज को स्वामी दयानंद सरस्वती की संस्था मान लेना; आर्य समाज 1875 का है और उसका उद्देश्य भिन्न था।
- स्वामी विवेकानंद को 1880 के दशक की स्त्री-संस्था से जोड़ देना; रामकृष्ण मिशन 1897 का है और निवेदिता का बालिका विद्यालय 1898 का।
- संस्था का नगर भूल जाना; आर्य महिला समाज पुणे में 1882 में बना, और उसकी बंबई शाखा बाद में खुली — दोनों को एक मान लेना भ्रम पैदा करता है।
समाज-सुधार खंड में परीक्षा की सबसे प्रिय तकनीक मिलते-जुलते नामों को एक ही विकल्प-समूह में रख देना है, और यह प्रश्न उसका आदर्श उदाहरण है — दो 'रमाबाई' आमने-सामने रखी गई हैं और एक ही अक्षर-भर का अंतर पूरे अंक का निर्णय करता है। इससे बचने के दो उपाय हैं। पहला, प्रत्येक सुधारक के साथ एक विशिष्ट पहचान-चिह्न जोड़कर याद रखिए, जो दूसरे से न मिले — पंडिता रमाबाई के साथ 'संस्कृत की विदुषी, शारदा सदन, मुक्ति मिशन'; रमाबाई रानाडे के साथ 'रानाडे की पत्नी, सेवा सदन'। दूसरा, प्रश्न में दिए गए काल-संकेत को गंभीरता से लीजिए — यहाँ '1880 के दशक के आरंभ' अकेले ही दो विकल्प बाहर कर देता है। यही पद्धति इस पेपर के अन्य समाज-सुधार प्रश्नों में भी काम आती है, जहाँ संस्था, नगर और वर्ष तीनों में से कोई एक प्रश्न में दे दिया जाता है।
संबंधित PYQ
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
विधवाओं और परित्यक्ता स्त्रियों के लिए 'शारदा सदन' नामक संस्था 1889 में किसने आरंभ की थी, जिन्होंने 1887 में 'द हाई कास्ट हिंदू वुमन' भी लिखी?
- (a)रमाबाई रानाडे
- (b)पंडिता रमाबाई
- (c)सावित्रीबाई फुले
- (d)आनंदीबाई जोशी
उत्तर(b) पंडिता रमाबाई
- practice — not a real PYQ
बंबई में 1908 में और पुणे में 1909 में आरंभ हुए सेवा सदन का नेतृत्व करने वाली, न्यायमूर्ति एम॰ जी॰ रानाडे की पत्नी कौन थीं?
- (a)पंडिता रमाबाई
- (b)रमाबाई रानाडे
- (c)ताराबाई शिंदे
- (d)सरला देवी चौधुरानी
उत्तर(b) रमाबाई रानाडे