खान अब्दुल गफ्फार खान द्वारा सन् 1928 में निम्नलिखित में से कौन-सा एक प्रकाशन आरंभ किया गया था?
- (a)पख्तून
- (b)खुदाई खिदमतगार
- (c)यंग इंडिया
- (d)इंडिया अवेकन्स
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) पख्तून। ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान ने 1928 में 'पख़्तून' नामक मासिक पत्रिका आरंभ की थी। यह पश्तो भाषा में निकलती थी और मई 1928 में, मक्का से लौटने के बाद, उन्होंने इसका प्रकाशन शुरू किया। पत्रिका का उद्देश्य केवल राजनीतिक प्रचार नहीं था — वह पश्तो भाषा और साहित्य को प्रतिष्ठा दिलाने, पख़्तून समाज में शिक्षा का प्रसार करने, और ख़ून के बदले ख़ून की परंपरा तथा आपसी झगड़ों के विरुद्ध सामाजिक सुधार का वातावरण बनाने का माध्यम भी थी। इसे समझने के लिए ग़फ़्फ़ार ख़ान के काम का क्रम देखिए: उन्होंने पहले सीमांत क्षेत्र में 'आज़ाद' विद्यालय खोले और 1921 में अंजुमन-ए-इस्लाह-उल-अफ़ाग़िना नामक सुधार-संगठन बनाया; फिर 1928 में यह पत्रिका आरंभ की; और उसके बाद, नवम्बर 1929 में, ख़ुदाई ख़िदमतगार नामक स्वयंसेवी संगठन खड़ा किया, जिसके सदस्य लाल कुर्ते पहनने के कारण 'सुर्ख़ पोश' या 'रेड शर्ट्स' कहलाए। अर्थात् पत्रिका पहले आई और संगठन बाद में; यही क्रम प्रश्न के लिए निर्णायक है, क्योंकि प्रश्न विशेष रूप से 1928 का वर्ष देता है और यह भी कहता है कि पूछा जा रहा है एक 'प्रकाशन'। 'पख़्तून' का महत्त्व केवल राजनीतिक नहीं था। उस समय पश्तो में आधुनिक गद्य और पत्रकारिता का ढाँचा लगभग नहीं था, इसलिए यह पत्रिका भाषा के मानकीकरण और साहित्यिक अभिव्यक्ति के लिए भी एक मंच बनी; उसमें कविता, निबंध और सुधार-संबंधी लेख छपते थे, और वह सीमांत के गाँवों तक पहुँचती थी। उपनिवेशी प्रशासन के लिए यह चिंता का विषय था, क्योंकि वह एक ऐसे समाज को संगठित कर रही थी जिसे प्रशासन अब तक केवल सैन्य दृष्टि से देखता आया था। अब विकल्पों को कसौटी पर रखिए। विकल्प (b) संगठन है, प्रकाशन नहीं, और उसका वर्ष भी 1929 है; विकल्प (c) दूसरे व्यक्ति की, दूसरी भाषा की और दूसरे नगर से निकलने वाली पत्रिका है; विकल्प (d) ग़फ़्फ़ार ख़ान की किसी पत्रिका का नाम नहीं है। अतः विकल्प (a) ही सही है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)खुदाई खिदमतगार — यह इस प्रश्न का सबसे सुनियोजित जाल है, क्योंकि नाम ग़फ़्फ़ार ख़ान से जुड़ा हुआ बिलकुल सही है — पर वह पत्रिका नहीं, संगठन है। ख़ुदाई ख़िदमतगार, अर्थात् 'ईश्वर के सेवक', नवम्बर 1929 में स्थापित एक अहिंसक स्वयंसेवी संगठन था, जिसके सदस्य लाल रंग के कुर्ते पहनते थे और इसीलिए 'सुर्ख़ पोश' कहलाते थे। यह संगठन अनुशासन, प्रशिक्षण और सामाजिक सेवा पर टिका था और आगे चलकर सीमांत प्रांत में कांग्रेस के साथ मिलकर सविनय अवज्ञा आंदोलन में उतरा। प्रश्न में दो बातें स्पष्ट हैं — वर्ष 1928 और शब्द 'प्रकाशन' — और यह विकल्प दोनों कसौटियों पर चूकता है। यही भेद याद रखने योग्य है: 1928 में पत्रिका 'पख़्तून', 1929 में संगठन 'ख़ुदाई ख़िदमतगार'।
- (c)यंग इंडिया — 'यंग इंडिया' महात्मा गांधी की अंग्रेज़ी साप्ताहिक पत्रिका थी, ग़फ़्फ़ार ख़ान की नहीं। गांधीजी ने 1919 में इसका संपादन-भार सँभाला और लगभग 1932 तक इसमें लिखते रहे; यह अहमदाबाद से निकलती थी और उनके विचारों — सत्याग्रह, स्वदेशी, अस्पृश्यता-निवारण — का मुख्य मंच थी। गांधीजी की दूसरी पत्रिका 'नवजीवन' गुजराती में थी, और दक्षिण अफ़्रीका के दिनों में उन्होंने 'इंडियन ओपिनियन' निकाली थी। यह विकल्प इसलिए फुसलाता है कि 'यंग इंडिया' उस युग का सर्वाधिक परिचित पत्रिका-नाम है, और ग़फ़्फ़ार ख़ान को 'सीमांत गांधी' कहा जाता है — दोनों बातें मिलकर एक झूठा जोड़ बना देती हैं। भाषा की जाँच से ही भेद स्पष्ट हो जाता है: पख़्तून पश्तो में थी, यंग इंडिया अंग्रेज़ी में।
- (d)इंडिया अवेकन्स — 'इंडिया अवेकन्स' ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान की किसी पत्रिका का नाम नहीं है, और उनके काम से इसका कोई संबंध नहीं मिलता। इस प्रकार का विकल्प चार में से एक ऐसा नाम रखने के लिए बनाया जाता है जो अंग्रेज़ी में उस युग के किसी राष्ट्रवादी प्रकाशन जैसा सुनाई दे, ताकि अनिश्चित अभ्यर्थी उसे भी संभावित मान ले। बचाव सीधा है: ग़फ़्फ़ार ख़ान का कार्यक्षेत्र उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत था, उनकी भाषा पश्तो थी, और उनका पूरा सुधार-कार्यक्रम पख़्तून समाज को संबोधित था; इसलिए उनकी पत्रिका का नाम भी उसी भाषा और उसी पहचान से निकला — 'पख़्तून'। जहाँ किसी व्यक्ति की भाषा और कार्यक्षेत्र स्पष्ट हो, वहाँ विकल्पों को उसी कसौटी पर परखना सबसे तेज़ तरीक़ा है।
अवधारणा
राष्ट्रीय आंदोलन के अध्ययन में समाचार-पत्र और पत्रिकाएँ एक स्वतंत्र विषय हैं, क्योंकि वे तीन काम एक साथ करती थीं — विचार का प्रसार, संगठन का निर्माण, और भाषा तथा साहित्य का पोषण। इसीलिए प्रत्येक बड़े नेता के साथ एक-दो प्रकाशन जुड़े मिलते हैं: गांधी के साथ 'यंग इंडिया', 'नवजीवन' और 'हरिजन'; तिलक के साथ 'केसरी' तथा 'मराठा'; लाला लाजपत राय के साथ 'पीपल'; ग़फ़्फ़ार ख़ान के साथ 'पख़्तून'। इन्हें याद रखने का सबसे भरोसेमंद तरीक़ा तीन खानों की तालिका है — प्रकाशन का नाम, भाषा और संस्थापक — क्योंकि परीक्षा प्रायः भाषा या संस्थापक बदलकर विकल्प बनाती है। दूसरा उपयोगी भेद संगठन और प्रकाशन का है: कई नेताओं के नाम के साथ दोनों जुड़े होते हैं, और प्रश्न में यदि 'प्रकाशन' शब्द आया हो तो संगठन का नाम स्वतः बाहर हो जाता है। ग़फ़्फ़ार ख़ान के प्रसंग में यही भेद पूरे प्रश्न का आधार है। तीसरा भेद वर्ष का है: एक ही नेता के जीवन में प्रकाशन और संगठन प्रायः अलग-अलग वर्षों में आते हैं, और परीक्षा ठीक उसी अंतराल पर प्रश्न टिका देती है, जैसा यहाँ 1928 और 1929 के बीच किया गया है।
ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान (1890–1988) को 'बाचा ख़ान' और 'सीमांत गांधी' कहा जाता है। उनका आरंभिक काम शिक्षा और सामाजिक सुधार का था — उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में 'आज़ाद' विद्यालयों की स्थापना और 1921 में अंजुमन-ए-इस्लाह-उल-अफ़ाग़िना नामक सुधार-संगठन का गठन। 1928 की पत्रिका 'पख़्तून' और 1929 का ख़ुदाई ख़िदमतगार संगठन इसी क्रम की अगली कड़ियाँ हैं। ख़ुदाई ख़िदमतगार का महत्त्व इसलिए भी है कि उसने अहिंसा को उस समाज में स्थापित किया जिसे उपनिवेशी प्रशासन युद्धप्रिय मानकर चलता था; अप्रैल 1930 में पेशावर के क़िस्सा ख़्वानी बाज़ार की घटना इसी संगठन के आंदोलन के दौरान हुई। स्वतंत्रता और विभाजन के बाद वे पाकिस्तान में रहे और वहाँ लंबे समय तक कारावास में रहे। भारत ने उन्हें 1987 में भारत रत्न से सम्मानित किया। इस पेपर के इतिहास-खंड में सीमांत प्रांत का यह प्रसंग एक बार ही आता है, पर वह इसी एक तथ्य पर टिका है।
मुख्य तथ्य
- ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान ने 1928 में पश्तो भाषा की मासिक पत्रिका 'पख़्तून' आरंभ की; प्रकाशन मई 1928 में, मक्का से लौटने के बाद शुरू हुआ।
- ख़ुदाई ख़िदमतगार ('ईश्वर के सेवक') एक संगठन है, प्रकाशन नहीं; इसकी स्थापना नवम्बर 1929 में हुई और इसके सदस्य लाल कुर्तों के कारण 'सुर्ख़ पोश' कहलाए।
- उनका आरंभिक काम शिक्षा और सुधार का था — सीमांत प्रांत में 'आज़ाद' विद्यालय और 1921 में अंजुमन-ए-इस्लाह-उल-अफ़ाग़िना नामक संगठन।
- 'यंग इंडिया' महात्मा गांधी की अंग्रेज़ी साप्ताहिक पत्रिका थी, जिसका संपादन उन्होंने 1919 में सँभाला; उनकी गुजराती पत्रिका 'नवजीवन' थी।
- ग़फ़्फ़ार ख़ान को 'बाचा ख़ान' और 'सीमांत गांधी' कहा जाता है; उनका जीवनकाल 1890 से 1988 तक रहा और भारत ने उन्हें 1987 में भारत रत्न दिया।
- अप्रैल 1930 में पेशावर के क़िस्सा ख़्वानी बाज़ार की घटना ख़ुदाई ख़िदमतगार के आंदोलन के दौरान हुई।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- संगठन और प्रकाशन को एक मान लेना — ख़ुदाई ख़िदमतगार संगठन है और 1929 का है, जबकि प्रश्न 1928 के प्रकाशन के बारे में पूछता है।
- 'सीमांत गांधी' उपाधि के कारण गांधीजी की पत्रिका 'यंग इंडिया' को ग़फ़्फ़ार ख़ान से जोड़ देना; वह अंग्रेज़ी साप्ताहिक थी और अहमदाबाद से निकलती थी।
- पत्रिका की भाषा भूल जाना; 'पख़्तून' पश्तो में निकलती थी, और भाषा की जाँच से ही अधिकांश विकल्प तुरंत बाहर हो जाते हैं।
- 'इंडिया अवेकन्स' जैसे अंग्रेज़ी-नुमा नाम को उस युग का कोई प्रसिद्ध राष्ट्रवादी प्रकाशन मान लेना; ग़फ़्फ़ार ख़ान की किसी पत्रिका का यह नाम नहीं है।
प्रकाशन-और-संस्थापक इस परीक्षा का सर्वाधिक दुहराया जाने वाला प्रकार है, और इसकी तीन शैलियाँ हैं — नाम देकर संस्थापक पूछना, संस्थापक देकर नाम पूछना, और वर्ष देकर दोनों में से एक पूछना। इस प्रश्न में तीसरी शैली है, इसलिए वर्ष स्वयं छँटनी का औज़ार बन जाता है। तैयारी में तीन-खाने की तालिका सबसे उपयोगी सिद्ध होती है: प्रकाशन, भाषा, संस्थापक — और जहाँ संभव हो, वर्ष भी। साथ ही एक अलग सूची उन नामों की बनाइए जो संगठन हैं, प्रकाशन नहीं, क्योंकि परीक्षा इन दोनों को जानबूझकर एक ही विकल्प-समूह में रखती है: ख़ुदाई ख़िदमतगार, अभिनव भारत, अनुशीलन समिति संगठन हैं; पख़्तून, केसरी, यंग इंडिया, हरिजन प्रकाशन हैं। यह भेद स्पष्ट रहने पर ऐसे प्रश्न कुछ ही क्षणों में हल हो जाते हैं।
संबंधित PYQ
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान द्वारा स्थापित ख़ुदाई ख़िदमतगार संगठन, जिसके सदस्य 'सुर्ख़ पोश' कहलाते थे, किस वर्ष खड़ा किया गया था?
- (a)1921
- (b)1928
- (c)1929
- (d)1930
उत्तर(c) 1929
- practice — not a real PYQ
महात्मा गांधी ने 1919 में जिस अंग्रेज़ी साप्ताहिक पत्रिका का संपादन-भार सँभाला और जो उनके विचारों का प्रमुख मंच बनी, उसका नाम क्या था?
- (a)पख़्तून
- (b)यंग इंडिया
- (c)केसरी
- (d)इंडियन ओपिनियन
उत्तर(b) यंग इंडिया