निम्नलिखित में से कौन-सी एक विशेषता असहयोग आंदोलन की नहीं है?
- (a)आर्थिक बहिष्कार तीव्र व सफल था।
- (b)इस आंदोलन में बहुत बड़ी संख्या में मध्यम वर्ग ने भाग लिया।
- (c)अनियमित भौगोलिक विस्तार और क्षेत्रीय विविधता, इसकी मुख्य विशेषता थी।
- (d)असहयोग आंदोलन के साथ-साथ अन्य गांधीवादी सामाजिक सुधार आंदोलनों, जैसे मद्य-विरोधी अभियान, को भी कुछ सफलता मिली।
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) इस आंदोलन में बहुत बड़ी संख्या में मध्यम वर्ग ने भाग लिया। सबसे पहले प्रश्न का ढाँचा पढ़िए: यहाँ पूछा गया है कि कौन-सी विशेषता असहयोग आंदोलन की 'नहीं' है, और हिन्दी स्तंभ में यह 'नहीं' मोटे टाइप में छपा है — इस पुस्तिका में हर निषेधात्मक प्रश्न में यह बलाघात दिया गया है, जो अभ्यर्थी के लिए सुविधा है। अर्थात् चार में से तीन कथन आंदोलन की सच्ची विशेषताएँ हैं और एक नहीं; ढूँढ़ना उसी एक को है। असहयोग आंदोलन (1920–22) की जो बात उसे पहले के दौर से अलग करती है, वह मध्यम वर्ग की भागीदारी नहीं, बल्कि जनसाधारण का आंदोलन में उतरना है — किसान, बागान-मज़दूर, कारख़ाना-मज़दूर और जनजातीय समुदाय पहली बार इतने बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बने, और यही उसे 'जन-आंदोलन' बनाता है। मध्यम वर्ग ने आरंभ में उत्साह अवश्य दिखाया, पर वह उत्साह टिका नहीं। बिपन चंद्र का विवरण साफ़ है कि 1921 के उत्तरार्ध तक विद्यार्थी विद्यालयों और महाविद्यालयों की ओर लौटने लगे थे तथा वकील और वादकारी अदालतों की ओर; और उसी अध्याय में यह भी दर्ज है कि वकीलों द्वारा अदालतों का बहिष्कार शैक्षिक बहिष्कार जितना सफल नहीं रहा। इसलिए 'बहुत बड़ी संख्या में मध्यम वर्ग ने भाग लिया' वाला कथन आंदोलन की पहचान बनाने वाली विशेषता के रूप में नहीं टिकता, और कुंजी उसी को अपवाद के रूप में चुनती है। शेष तीनों कथन — तीव्र आर्थिक बहिष्कार, असमान भौगोलिक विस्तार, तथा मद्य-विरोधी जैसे गांधीवादी सामाजिक अभियानों की आंशिक सफलता — पाठ्यपुस्तकों में आंदोलन की मान्य विशेषताओं के रूप में ही आते हैं। अतः विकल्प (b) ही उत्तर है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)आर्थिक बहिष्कार तीव्र व सफल था। — यह आंदोलन की सच्ची विशेषता है, इसलिए यह उत्तर नहीं हो सकता। आर्थिक बहिष्कार असहयोग का सबसे ठोस और सबसे मापने योग्य परिणाम था: विदेशी कपड़े का आयात 1920–21 में 102 करोड़ रुपये से घटकर 1921–22 में 57 करोड़ रुपये रह गया, अर्थात् लगभग आधा। यह गिरावट केवल भावना का आँकड़ा नहीं थी — विदेशी वस्त्र की होलियाँ, दुकानों की धरना-घेराबंदी और खादी के प्रसार ने मिलकर आयात-व्यापार पर सीधा असर डाला। इसी कारण पाठ्यपुस्तकें आर्थिक बहिष्कार को आंदोलन का सबसे सफल अंग मानती हैं। निषेधात्मक प्रश्न में ऐसे विकल्प को छोड़ना ही सही है, क्योंकि प्रश्न 'सही विशेषता' नहीं, 'ग़लत विशेषता' माँग रहा है।
- (c)अनियमित भौगोलिक विस्तार और क्षेत्रीय विविधता, इसकी मुख्य विशेषता थी। — यह भी आंदोलन की मान्य विशेषता है, इसलिए यह अपवाद नहीं है। असहयोग का विस्तार पूरे देश में एक-सा नहीं था और उसका स्वरूप क्षेत्र-दर-क्षेत्र बदलता रहा। शैक्षिक बहिष्कार में बंगाल सबसे आगे रहा और पंजाब दूसरे स्थान पर, जबकि मद्रास का प्रतिसाद ठंडा रहा। इसी तरह कहीं किसानों की माँगें आंदोलन के साथ जुड़ गईं, कहीं वन-अधिकारों का प्रश्न प्रमुख हो गया, और कहीं आंदोलन ने स्थानीय सामाजिक संघर्षों का रूप ले लिया। यह असमानता आंदोलन का दोष नहीं, उसकी संरचनात्मक विशेषता थी — एक अखिल भारतीय आह्वान जब स्थानीय समाजों तक पहुँचता है तो वहाँ की परिस्थितियों के अनुसार ढल जाता है। परीक्षा में यह वाक्य लगभग इसी शब्दावली में लौटता है।
- (d)असहयोग आंदोलन के साथ-साथ अन्य गांधीवादी सामाजिक सुधार आंदोलनों, जैसे मद्य-विरोधी अभियान, को भी कुछ सफलता मिली। — यह कथन भी सही है, इसलिए यह उत्तर नहीं है। गांधीजी का कार्यक्रम केवल राजनीतिक असहयोग तक सीमित नहीं था; उसके साथ रचनात्मक और सामाजिक सुधार के अभियान भी चल रहे थे — खादी और चरखा, अस्पृश्यता-निवारण, हिन्दू-मुस्लिम एकता और मद्य-निषेध। इनमें मद्य-विरोधी अभियान को विशेष लोकप्रियता मिली: ताड़ी की दुकानों पर धरना इतना फैल गया कि वह आंदोलन के मूल कार्यक्रम का अंग न होते हुए भी उसकी सबसे दृश्य गतिविधियों में गिना जाने लगा। कई प्रांतों में आबकारी राजस्व में गिरावट भी दर्ज हुई। इसलिए इस कथन को अपवाद मानना तथ्य के विरुद्ध होगा; यह ठीक वैसा ही वाक्य है जैसा पाठ्यपुस्तकें आंदोलन के सामाजिक आयाम के लिए प्रयोग करती हैं।
अवधारणा
असहयोग आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का पहला अखिल भारतीय जन-आंदोलन माना जाता है, और उसकी विशेषताएँ पाँच शीर्षकों में समझी जा सकती हैं। पहली, इसका कार्यक्रम त्याग और बहिष्कार का था — उपाधियों का त्याग, सरकारी विद्यालयों तथा अदालतों का बहिष्कार, विधानमंडलों के चुनाव का बहिष्कार, विदेशी वस्त्र का बहिष्कार। दूसरी, इसका आर्थिक पक्ष सबसे प्रभावी सिद्ध हुआ, जिसका प्रमाण विदेशी कपड़े के आयात में तीव्र गिरावट है। तीसरी, इसका सामाजिक आधार पहले से कहीं व्यापक था — किसान, मज़दूर और जनजातीय समुदाय बड़ी संख्या में शामिल हुए, और यही 'जन-आंदोलन' का अर्थ है। चौथी, इसका भौगोलिक विस्तार असमान था और क्षेत्रीय स्वरूप अलग-अलग रहा। पाँचवीं, इसके साथ रचनात्मक कार्यक्रम — खादी, अस्पृश्यता-निवारण, मद्य-निषेध — जुड़े रहे, जिससे यह केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक अभियान भी बना। जो कथन इन पाँच में नहीं बैठता, निषेधात्मक प्रश्न में वही उत्तर होता है। इसीलिए तैयारी में हर आंदोलन के लिए यह पाँच-शीर्षक वाली सूची अलग से लिख लेना उपयोगी होता है।
एक बात ईमानदारी से जोड़ लेनी चाहिए, क्योंकि वह इस प्रश्न को अधिक साफ़ ढंग से समझाती है। मध्यम वर्ग असहयोग से पूरी तरह अनुपस्थित नहीं था — उसी पाठ्यपुस्तकीय विवरण में दर्ज है कि लगभग नब्बे हज़ार विद्यार्थियों ने सरकारी शिक्षा-संस्थाएँ छोड़ीं और कई प्रतिष्ठित वकीलों ने वकालत त्याग दी, जिनमें उस दौर के बड़े नाम शामिल थे। कुंजी का आधार अनुपस्थिति नहीं, पैमाना और टिकाऊपन है: यह भागीदारी उस विशाल पैमाने की नहीं थी जिससे वह आंदोलन की पहचान बन जाती, और 1921 के उत्तरार्ध तक वह घटने लगी थी। यही कारण है कि इतिहास-लेखन असहयोग की नवीनता को मध्यम वर्ग में नहीं, जनसाधारण के प्रवेश में देखता है। परीक्षा की दृष्टि से यह अंतर उपयोगी है: 'भाग लिया' और 'बहुत बड़ी संख्या में भाग लिया' दो अलग दावे हैं, और निषेधात्मक प्रश्न प्रायः इसी मात्रा-सूचक शब्द पर टिकाया जाता है।
मुख्य तथ्य
- असहयोग आंदोलन 1920 में आरंभ हुआ और फ़रवरी 1922 की चौरी-चौरा की घटना के बाद स्थगित कर दिया गया; यह पहला अखिल भारतीय जन-आंदोलन माना जाता है।
- आर्थिक बहिष्कार सबसे सफल अंग रहा — विदेशी कपड़े का आयात 1920–21 के 102 करोड़ रुपये से घटकर 1921–22 में 57 करोड़ रुपये रह गया।
- शैक्षिक बहिष्कार में बंगाल सबसे आगे रहा और पंजाब दूसरे स्थान पर, जबकि मद्रास का प्रतिसाद ठंडा रहा — यही असमान भौगोलिक विस्तार है।
- वकीलों द्वारा अदालतों का बहिष्कार शैक्षिक बहिष्कार जितना सफल नहीं रहा; 1921 के उत्तरार्ध तक विद्यार्थी विद्यालयों और वकील अदालतों की ओर लौटने लगे थे।
- ताड़ी की दुकानों पर धरना, जो मूल कार्यक्रम का अंग नहीं था, अत्यंत लोकप्रिय हुआ — गांधीवादी सामाजिक अभियानों की आंशिक सफलता का उदाहरण।
- लगभग नब्बे हज़ार विद्यार्थियों ने सरकारी शिक्षा-संस्थाएँ छोड़ीं और कई प्रतिष्ठित वकीलों ने वकालत त्यागी — अर्थात् मध्यम वर्ग अनुपस्थित नहीं था, पर यह भागीदारी टिकी नहीं।
- आंदोलन की नवीनता किसानों, मज़दूरों और जनजातीय समुदायों के बड़े पैमाने पर प्रवेश में थी, जिसने उसे जन-आंदोलन बनाया।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- निषेधात्मक 'नहीं' को पढ़े बिना पहला सही दिखने वाला कथन चुन लेना; इस पुस्तिका में वह मोटे टाइप में छपा है, इसलिए उसे देख लेना कठिन नहीं है।
- मध्यम वर्ग की भागीदारी को पूरी तरह नकार देना; प्रश्न 'बहुत बड़ी संख्या में' वाले मात्रा-सूचक दावे को अस्वीकार करता है, भागीदारी को नहीं।
- आर्थिक बहिष्कार की सफलता पर संदेह करना; विदेशी कपड़े के आयात का 102 करोड़ से 57 करोड़ रुपये तक गिरना उसका मापने योग्य प्रमाण है।
- असमान भौगोलिक विस्तार को दोष मानकर उसे 'विशेषता नहीं' समझ लेना; इतिहास-लेखन में वह आंदोलन की मान्य संरचनात्मक विशेषता है।
आधुनिक भारत के आंदोलनों पर निषेधात्मक प्रश्न इस परीक्षा में बार-बार आते हैं, और उनका ढाँचा लगभग स्थिर रहता है: तीन कथन किसी मानक पाठ्यपुस्तक के वाक्यों से लगभग ज्यों-के-त्यों उठाए जाते हैं, और चौथा उसी शब्दावली में लिखा जाता है पर उसमें कोई मात्रा-सूचक या दिशा-सूचक शब्द बदल दिया जाता है — 'बहुत बड़ी संख्या में', 'पूर्णतः', 'सर्वप्रथम', 'केवल'। इसलिए ऐसे प्रश्न में पहला काम निषेध को चिह्नित करना है और दूसरा काम मात्रा-सूचक शब्दों को रेखांकित करना। तीसरा उपयोगी अभ्यास यह है कि हर बड़े आंदोलन की चार-पाँच मान्य विशेषताएँ एक सूची में याद रखी जाएँ; तब प्रश्न पढ़ते ही यह दिखने लगता है कि कौन-सा कथन उस सूची में नहीं है। जहाँ दो कथन सही लगें, वहाँ उस कथन को चुनिए जिसका दावा सबसे बड़ा और सबसे कम प्रमाण-सिद्ध हो।
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उत्तर(a) बंगाल