1930 के दशक में केरल में स्थापित कृषक संघों को क्या कहा जाता था?
- (a)किसान सभा
- (b)कीर्ति किसान
- (c)कर्षक संगम
- (d)किसान मोर्चा
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) कर्षक संगम। मलयालम में 'कर्षकन्' का अर्थ है किसान और 'संगम' का अर्थ संघ; इसलिए 'कर्षक संगम' का शाब्दिक अर्थ ही किसान-संघ है, और 1930 के दशक में केरल — विशेषतः मालाबार — में बने कृषक संगठनों का यही नाम था। इनका उदय कांग्रेस समाजवादी दल के कार्यकर्ताओं के गाँव-गाँव जाकर काम करने से हुआ, जो 1934 के आसपास आरंभ हुआ; पहला संगम 1935 में चिराक्कल ताल्लुक में बना, और आगे चलकर इन सबका महासंघ 'अखिल मालाबार कर्षक संगम' के रूप में खड़ा हुआ, जिसके अध्यक्ष पी॰ नारायणन नायर और सचिव के॰ ए॰ केरलीयन बने। इनकी माँगें ठोस और स्थानीय थीं, अमूर्त नहीं — जन्मी (भू-स्वामी) द्वारा वसूले जाने वाले अवैध उगाहों (अक्रमपिरिवुकळ) की समाप्ति, पट्टे के नवीनीकरण पर लिए जाने वाले शुल्क (पोलिचेषुत्तु) का अंत, अग्रिम लगान की वसूली रोकना, और 'स्वयं खेती करूँगा' का बहाना बनाकर काश्तकार को बेदख़ल करने की प्रथा पर रोक। यही वे रोज़मर्रा के अन्याय थे जिन पर मालाबार का काश्तकार सीधे लामबंद हो सकता था, और इसी कारण कर्षक संगम गाँव-स्तर पर तेज़ी से फैले। यह लामबंदी अकेली नहीं थी। उन्हीं वर्षों में देश के अलग-अलग भागों में इसी प्रकार के संगठन बने, पर उनके नाम स्थानीय भाषा से आए — बिहार और फिर अखिल भारतीय स्तर पर किसान सभा, पंजाब में कीर्ति किसान, और मालाबार में कर्षक संगम। इसलिए प्रश्न वस्तुतः यह जाँच रहा है कि अभ्यर्थी नाम को उसके प्रदेश से जोड़ पाता है या नहीं। प्रश्न में तीन बातें एक साथ दी गई हैं — स्थान (केरल), काल (1930 का दशक) और संगठन का प्रकार (कृषक संघ) — और तीनों एक ही उत्तर पर मिलती हैं। शेष तीनों नाम वास्तविक हैं, पर वे भारत के दूसरे भू-भागों के या दूसरे कालखंड के हैं। एक बात और ध्यान देने योग्य है: हिन्दी स्तंभ ने इस मलयालम नाम का अनुवाद नहीं किया, केवल देवनागरी में लिप्यंतरण किया है, इसलिए हिन्दी-माध्यम अभ्यर्थी के लिए सहारा शब्द के अर्थ में ही है — 'कर्षक' का अर्थ किसान है, और यही अर्थ इसे शेष विकल्पों से अलग पहचानने में सहायक होता है। अतः विकल्प (c) ही सही है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)किसान सभा — 'किसान सभा' नाम वास्तविक है, पर वह केरल का नहीं। यह उत्तर भारत की, विशेषतः बिहार की, किसान-लामबंदी का नाम है — स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में बिहार प्रांतीय किसान सभा 1929 में बनी, और 1936 में लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई, जिसके प्रथम अध्यक्ष सहजानंद सरस्वती और महासचिव एन॰ जी॰ रंगा थे। कर्षक संगम आगे चलकर इसी अखिल भारतीय धारा से जुड़ जाते हैं, पर प्रश्न नाम पूछ रहा है, धारा नहीं। यह विकल्प इसलिए ख़तरनाक है कि 'किसान सभा' वह नाम है जो किसान-आंदोलन का ज़िक्र आते ही सबसे पहले स्मृति में आता है; बचाव यह है कि प्रश्न में दिया गया प्रदेश — केरल — पहले पढ़ा जाए और तब नाम चुना जाए।
- (b)कीर्ति किसान — 'कीर्ति किसान' पंजाब का नाम है, केरल का नहीं। 'कीर्ति' नामक पत्रिका ग़दर आंदोलन से लौटे क्रांतिकारियों ने 1926 में आरंभ की थी, और उसी नाम पर 1928 में कीर्ति किसान पार्टी बनी, जिसमें सोहन सिंह जोश जैसे नेता सक्रिय थे। इसका कार्यक्षेत्र पंजाब की किसान और मज़दूर राजनीति थी, और इसका वैचारिक स्रोत ग़दर तथा वामपंथी धारा थी। भौगोलिक दृष्टि से यह विकल्प केरल से हज़ारों किलोमीटर दूर है, इसलिए 'कहाँ' की जाँच से ही यह बाहर हो जाता है। ऐसे प्रश्नों में हर विकल्प के साथ एक प्रदेश और एक दशक जोड़कर याद रखना सबसे कारगर तरीक़ा है, क्योंकि परीक्षा प्रायः चारों नाम असली रखती है और केवल स्थान बदल देती है।
- (d)किसान मोर्चा — 'किसान मोर्चा' 1930 के दशक के केरल के कृषक संगठनों का नाम नहीं है। 'मोर्चा' शब्द भारतीय राजनीति में मुख्यतः स्वतंत्रता के बाद के दलीय अनुषंगी संगठनों और आंदोलनकारी मोर्चेबंदी के लिए प्रयुक्त होता है, न कि औपनिवेशिक काल के मालाबार के गाँव-स्तरीय काश्तकार संघों के लिए। इस विकल्प का काम केवल इतना है कि वह सुनने में जाना-पहचाना लगे — 'किसान' शब्द साझा है, इसलिए तेज़ी से पढ़ने वाला उसे सही मान सकता है। यहाँ भी वही जाँच काम करती है: नाम को स्थान और दशक से मिलाइए। केरल + 1930 का दशक = कर्षक संगम; बिहार/अखिल भारतीय + 1929–1936 = किसान सभा; पंजाब + 1928 = कीर्ति किसान।
अवधारणा
1930 के दशक में किसान-लामबंदी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का एक नया और स्वतंत्र आयाम बनकर उभरी। सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद कांग्रेस के भीतर बना कांग्रेस समाजवादी दल (1934) और उससे जुड़े कार्यकर्ता गाँवों में उतरे, और उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्रता की माँग को काश्तकार की ठोस शिकायतों — लगान, बेदख़ली, बेगार और अवैध उगाही — से जोड़ दिया। इसी दौर में क्षेत्रीय नामों वाले किसान संगठन बने: बिहार और फिर अखिल भारतीय स्तर पर किसान सभा, पंजाब में कीर्ति किसान, आंध्र में रैयत संघ की धारा, और मालाबार में कर्षक संगम। इन सबकी संरचना एक जैसी थी — गाँव-स्तरीय इकाई, ताल्लुक या ज़िला स्तर पर महासंघ, और ठोस स्थानीय माँगों का एक चार्टर — पर नाम स्थानीय भाषा से आए, और परीक्षा ठीक इसी अंतर पर प्रश्न बनाती है। यह भी ध्यान रखने योग्य है कि मालाबार में यह लामबंदी आगे चलकर 1940 के दशक के कयूर और करिवेल्लूर जैसे संघर्षों तथा केरल के भूमि-सुधार आंदोलन की पृष्ठभूमि बनी।
मालाबार की काश्तकारी व्यवस्था इस लामबंदी की जड़ में है। वहाँ भूमि पर 'जन्मी' नामक भू-स्वामियों का अधिकार था और वास्तविक खेती 'कानम' तथा 'वेरुम्पाट्टम' जैसी काश्तकारी शर्तों पर होती थी, जिनमें काश्तकार की स्थिति अत्यंत असुरक्षित रहती थी — पट्टा थोड़े वर्षों का, नवीनीकरण पर अलग शुल्क, और भू-स्वामी को यह कहकर बेदख़ल कर देने का अधिकार कि वह स्वयं खेती करेगा। कर्षक संगम की माँगें इन्हीं व्यवहारों के विरुद्ध थीं, और यही कारण है कि आंदोलन का स्वर आर्थिक तथा क़ानूनी था, केवल राजनीतिक नहीं। परीक्षा की दृष्टि से इस प्रश्न का महत्त्व यह है कि यह क्षेत्रीय शब्दावली की परख करता है: 'कर्षक संगम' उन नामों में है जिन्हें हिन्दी-माध्यम अभ्यर्थी प्रायः पहली बार यहीं पढ़ता है। हिन्दी स्तंभ ने नाम का अनुवाद नहीं किया, लिप्यंतरण किया है, इसलिए मलयालम शब्द का अर्थ जान लेना ही उसे स्मृति में टिकाने का सबसे अच्छा उपाय है।
मुख्य तथ्य
- 1930 के दशक में केरल — विशेषतः मालाबार — में बने कृषक संघों का नाम 'कर्षक संगम' था; मलयालम में कर्षकन् = किसान, संगम = संघ।
- इनका विस्तार कांग्रेस समाजवादी दल के कार्यकर्ताओं के गाँव-स्तरीय काम से हुआ, जो 1934 के आसपास आरंभ हुआ; पहला संगम 1935 में चिराक्कल ताल्लुक में बना।
- इनका महासंघ 'अखिल मालाबार कर्षक संगम' बना, जिसके अध्यक्ष पी॰ नारायणन नायर और सचिव के॰ ए॰ केरलीयन थे।
- मुख्य माँगें — अवैध उगाही (अक्रमपिरिवुकळ) की समाप्ति, पट्टा-नवीनीकरण शुल्क (पोलिचेषुत्तु) का अंत, अग्रिम लगान पर रोक, और 'स्वयं खेती' के बहाने बेदख़ली पर रोक।
- बिहार प्रांतीय किसान सभा 1929 में स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में बनी; अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना 1936 में लखनऊ में हुई।
- कीर्ति किसान पार्टी 1928 में पंजाब में बनी, और 'कीर्ति' पत्रिका 1926 में ग़दर आंदोलन से जुड़े क्रांतिकारियों ने आरंभ की थी।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- प्रदेश पढ़े बिना 'किसान सभा' चुन लेना — यह किसान-आंदोलन का सबसे परिचित नाम है, पर केरल का नहीं, मुख्यतः बिहार और अखिल भारतीय स्तर का है।
- 'कीर्ति किसान' को किसी भी दक्षिणी संगठन से जोड़ देना; वह पंजाब का नाम है और उसकी जड़ ग़दर आंदोलन तथा 1926 की 'कीर्ति' पत्रिका में है।
- 'किसान मोर्चा' को औपनिवेशिक काल का संगठन मान लेना; 'मोर्चा' शब्द मुख्यतः स्वतंत्रता के बाद के दलीय अनुषंगी संगठनों के लिए प्रयुक्त होता है।
- कर्षक संगम के गठन का दशक 1920 का मान लेना; प्रश्न स्पष्ट रूप से 1930 के दशक कहता है और पहला संगम 1935 का है।
क्षेत्रीय आंदोलनों और संगठनों के नाम इस परीक्षा का नियमित विषय हैं, और प्रश्न प्रायः दोनों दिशाओं में बनता है — कभी नाम देकर प्रदेश पूछा जाता है, कभी प्रदेश और दशक देकर नाम। चारों विकल्प असली नाम रखे जाते हैं, इसलिए 'सुना हुआ नाम' चुनने की रणनीति सीधे विफल होती है। तैयारी का उपयोगी तरीक़ा यह है कि किसान-आंदोलन के प्रत्येक नाम के साथ तीन चीज़ें एक पंक्ति में लिख ली जाएँ — प्रदेश, दशक और एक प्रमुख नेता। उदाहरण के लिए: किसान सभा — बिहार तथा अखिल भारतीय, 1929 और 1936, सहजानंद सरस्वती; कीर्ति किसान — पंजाब, 1928, सोहन सिंह जोश; कर्षक संगम — मालाबार, 1935, पी॰ नारायणन नायर। इस तालिका के बन जाने पर इस प्रकार का प्रश्न कुछ सेकंड का रह जाता है, और परीक्षा में बचा समय दूसरे खंडों में काम आता है।
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उत्तर(a) Yadunandan Sharma
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अभ्यास
- practice — not a real PYQ
1936 में लखनऊ में स्थापित अखिल भारतीय किसान सभा के प्रथम अध्यक्ष निम्नलिखित में से कौन थे, जो बिहार प्रांतीय किसान सभा के भी नेता रहे थे?
- (a)एन॰ जी॰ रंगा
- (b)स्वामी सहजानंद सरस्वती
- (c)बाबा रामचंद्र
- (d)पी॰ नारायणन नायर
उत्तर(b) स्वामी सहजानंद सरस्वती
- practice — not a real PYQ
मालाबार के कर्षक संगमों का महासंघ 'अखिल मालाबार कर्षक संगम' किस प्रकार की माँगों को लेकर संगठित हुआ था?
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- (b)अवैध उगाही, पट्टा-नवीनीकरण शुल्क और मनमानी बेदख़ली के विरुद्ध काश्तकारों की माँगें
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उत्तर(b) अवैध उगाही, पट्टा-नवीनीकरण शुल्क और मनमानी बेदख़ली के विरुद्ध काश्तकारों की माँगें