1 से 300 तक सारे पूर्णांक लिखने में अंक 1 का प्रयोग कितनी बार किया जाता है ?
- (a)160
- (b)140
- (c)120
- (d)110
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) 160 — इस प्रश्न को खोलने वाला कदम यह है कि संख्याएँ न गिनी जाएँ, अंक गिने जाएँ, और वह भी स्थान-मान के अनुसार अलग-अलग। इकाई के स्थान पर 1 उन्हीं संख्याओं में आता है जो 1 पर समाप्त होती हैं — 1, 11, 21 … 291 — हर दस में एक, इसलिए 300 संख्याओं में 30 बार। दहाई के स्थान पर 1 तब आता है जब संख्या 10 से 19, 110 से 119, या 210 से 219 के बीच हो — तीन खंड, दस-दस संख्याओं के, इसलिए 30 बार। सैकड़े के स्थान पर 1 केवल 100 से 199 तक आता है, अर्थात् लगातार 100 बार। तीनों जोड़ने पर 30 + 30 + 100 = 160। ध्यान रखिए कि 111 जैसी संख्या तीनों गिनतियों में एक-एक बार आती है, और यह सही भी है — उसमें अंक 1 वास्तव में तीन बार लिखा जाता है। इसी गिनती का सामान्य नियम भी बना लीजिए, क्योंकि परास बदलकर यही प्रश्न बार-बार आता है। 1 से 100 तक किसी भी अंक (शून्य को छोड़कर) की आवृत्ति 20 होती है — इकाई पर दस बार और दहाई पर दस बार। इसलिए 1 से 300 तक हर अंक के लिए 60 बार बनता है, और अंक 1 को इसके ऊपर सैकड़े वाले खंड से 100 बार और मिल जाते हैं, क्योंकि 100 से 199 तक हर संख्या का पहला अंक 1 ही है। यही कारण है कि इस परास में 1 की आवृत्ति शेष अंकों से कहीं अधिक है: 2 के लिए 60 और 1 के लिए 160। सीमा बदलते ही यह असंतुलन भी बदल जाता है, इसलिए हर बार खंड नए सिरे से बनाइए।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)140 — 140 प्रायः तब बनता है जब दहाई के स्थान की गिनती अधूरी रह जाए — 10 से 19 का खंड तो सबको दिखता है, पर 110 से 119 और 210 से 219 वाले खंड छूट जाते हैं। दहाई के स्थान पर 1 पूरे परास में तीन बार, दस-दस के खंडों में लौटता है, इसलिए वहाँ की सही गिनती 30 है, 10 नहीं।
- (c)120 — 120 उस दशा में बनता है जब सैकड़े वाले सौ अंक तो गिन लिए जाएँ पर शेष दो स्थानों की गिनती में से केवल एक ही, और वह भी आंशिक रूप से, जुड़े। यहाँ तीन गिनतियाँ अलग-अलग पूरी करनी पड़ती हैं — इकाई 30, दहाई 30, सैकड़ा 100 — और इनमें से कोई भी छूटे तो उत्तर सीधे इसी तरह नीचे खिसक जाता है।
- (d)110 — 110 सबसे कम गिनती वाला विकल्प है और वह लगभग केवल सैकड़े के खंड (100 से 199) पर टिका है, जिसमें एक-आध खंड और जोड़ दिया गया हो। यह विकल्प इसलिए आकर्षक लगता है कि 100 से 199 तक का हिस्सा तुरंत दिख जाता है और लगता है कि बाक़ी परास में 1 कभी-कभार ही आएगा — जबकि इकाई और दहाई मिलाकर वहीं से 60 अंक और आ जाते हैं।
अवधारणा
अंक-गिनती के प्रश्नों का सामान्य नियम यह है कि हर स्थान-मान की गिनती स्वतंत्र रूप से की जाए और फिर जोड़ी जाए। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि प्रश्न संख्याओं की नहीं, अंकों के लिखे जाने की गिनती पूछता है — इसलिए 11 में अंक 1 दो बार और 111 में तीन बार गिना जाता है। हर स्थान पर कोई अंक एक निश्चित लय से लौटता है: इकाई पर हर दसवीं संख्या में, दहाई पर दस-दस संख्याओं के खंड में, और सैकड़े पर सौ-सौ संख्याओं के खंड में। इसी लय से गिनती बिना एक-एक संख्या लिखे निकल आती है। शून्य वाला रूप इस नियम का अपवाद है, क्योंकि अग्रगामी शून्य लिखे ही नहीं जाते और इसलिए उसकी गिनती हर खंड में कम पड़ती है — यही उसे इस परिवार का सबसे कठिन प्रश्न बनाता है।
इस पेपर के संख्यात्मक भाग में संख्या-पद्धति पर आधारित कई प्रश्न हैं, और वे सूत्र से नहीं, संरचना से हल होते हैं। यहाँ चारों विकल्प केवल अंक हैं और अवरोही क्रम में छपे हैं, इसलिए स्थान से कोई संकेत नहीं मिलता। विकल्पों की बनावट भी सोची-समझी है: 160 के नीचे तीन ऐसे मान रखे गए हैं जो किसी न किसी अधूरी गिनती से बनते हैं, इसलिए जो अभ्यर्थी दो स्थानों की गिनती करके तीसरी छोड़ देता है वह सीधे किसी ग़लत विकल्प पर जा बैठता है। ऐसे प्रश्नों में सबसे बड़ी सुरक्षा यही है कि तीनों स्थान-मान अलग-अलग लिखकर जोड़े जाएँ, ताकि कोई खंड छूटे तो तुरंत दिख जाए।
मुख्य तथ्य
- 1 से 300 तक इकाई के स्थान पर अंक 1 — 1, 11, 21 से लेकर 291 तक, हर दस में एक, कुल 30 बार।
- दहाई के स्थान पर अंक 1 — 10 से 19, 110 से 119 और 210 से 219 तक के तीन खंड, कुल 30 बार।
- सैकड़े के स्थान पर अंक 1 — 100 से 199 तक लगातार, कुल 100 बार; यही इस परास में सबसे बड़ा हिस्सा है।
- 111 में अंक 1 तीन बार गिना जाता है, क्योंकि प्रश्न अंकों के लिखे जाने की संख्या पूछता है, संख्याओं की नहीं।
- 1 से 100 तक शून्य को छोड़कर हर अंक की आवृत्ति 20 होती है — इकाई पर दस और दहाई पर दस।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- संख्याएँ गिनना, अंक नहीं — जिससे 11, 100 और 111 जैसी संख्याएँ कम गिनी जाती हैं।
- दहाई के स्थान पर अंक 1 के लौटने वाले खंड, यानी 110 से 119 और 210 से 219, छोड़ देना।
- 1 से 300 तक की गिनती को 1 से 100 तक की गिनती का सीधा तिगुना मान लेना, जबकि सैकड़े वाला खंड इस अंक के लिए असममित है।
यही ढाँचा दूसरे अंकों और दूसरी सीमाओं के साथ दोहराया जाता है — '1 से 100 तक अंक 9 कितनी बार', '1 से 1000 तक अंक 0 कितनी बार', या 'किसी पुस्तक के पृष्ठ क्रमांक लिखने में कुल कितने अंक लगे'। अन्तिम रूप में गिनती अंक-लंबाई के खंडों में की जाती है — एक अंक वाले नौ पृष्ठ, दो अंक वाले नब्बे, और इसी क्रम में आगे। शून्य वाला रूप सबसे कठिन है, क्योंकि अग्रगामी शून्य लिखे नहीं जाते; उसमें हर खंड की गिनती अलग से करनी पड़ती है।
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अभ्यास
- practice — not a real PYQ
1 से 100 तक सारे पूर्णांक लिखने में अंक 9 का प्रयोग कितनी बार किया जाता है ?
- (a)10
- (b)11
- (c)19
- (d)20
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