यदि दो संख्याओं का अन्तर उन संख्याओं के योगफल से अधिक है, तो
- (a)दोनों संख्याएँ ऋणात्मक हैं
- (b)यथार्थतः दोनों में से एक संख्या ऋणात्मक है
- (c)दोनों में से कम-से-कम एक संख्या ऋणात्मक है
- (d)उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) दोनों में से कम-से-कम एक संख्या ऋणात्मक है — दोनों संख्याएँ a और b मान लीजिए और शर्त को वैसे ही लिखिए जैसे वह छपी है: a − b > a + b। दोनों ओर से a हटा दीजिए, बचता है −b > b, अर्थात् 2b < 0, अर्थात् b < 0। इसका अर्थ यह हुआ कि जो संख्या घटाई जा रही है वह अवश्य ऋणात्मक है — और इतना सिद्ध होते ही यह भी सिद्ध हो गया कि दोनों में से कम-से-कम एक ऋणात्मक है। यह निष्कर्ष 'अन्तर' के दूसरे पाठ पर भी टिका रहता है: यदि अन्तर से निरपेक्ष मान लिया जाए, तो भी दो अऋणात्मक संख्याओं के लिए सदैव |a − b| ≤ a + b होता है, इसलिए अन्तर का योगफल से बड़ा होना बिना किसी ऋणात्मक संख्या के संभव ही नहीं। दोनों पाठों में एक ही उत्तर बचता है, और यही इस विकल्प की मज़बूती है। ऐसे प्रश्नों में परिमाणकों की शक्ति का क्रम याद रखना निर्णायक होता है। 'दोनों ऋणात्मक हैं' सबसे प्रबल दावा है, 'यथार्थतः एक ऋणात्मक है' उससे कुछ कम, और 'कम-से-कम एक ऋणात्मक है' सबसे कमज़ोर — पर यही कमज़ोरी उसे सबसे सुरक्षित बनाती है, क्योंकि वह उन सभी स्थितियों में सत्य रहता है जिनमें प्रबल दावे टूट जाते हैं। इसलिए 'सदैव सत्य' पूछने वाले प्रश्न में सबसे कमज़ोर सही दावा ही उत्तर होता है, और उसे परखने का तरीक़ा यह है कि उससे प्रबल दावों के लिए एक-एक प्रतिउदाहरण खोजा जाए।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)दोनों संख्याएँ ऋणात्मक हैं — 'दोनों ऋणात्मक' कहना आवश्यक शर्त से कहीं आगे चला जाना है। एक ही प्रतिउदाहरण इसे गिरा देता है: a = 5 और b = −2 लीजिए, तो अन्तर 5 − (−2) = 7 और योगफल 5 + (−2) = 3 — शर्त पूरी है, फिर भी एक संख्या धनात्मक है। सिद्ध केवल इतना होता है कि घटाई जाने वाली संख्या ऋणात्मक है।
- (b)यथार्थतः दोनों में से एक संख्या ऋणात्मक है — 'यथार्थतः एक' भी बहुत अधिक कह देता है, केवल दूसरी दिशा में। a = −1 और b = −2 लीजिए: अन्तर −1 − (−2) = 1 और योगफल −3, इसलिए 1 > −3 सत्य है — और यहाँ दोनों संख्याएँ ऋणात्मक हैं। इसलिए शर्त पूरी करने वाली जोड़ियों में कुछ ऐसी भी हैं जिनमें दोनों ऋणात्मक हों, और 'ठीक एक' का दावा टिकता नहीं।
- (d)उपर्युक्त में से कोई नहीं — यह इस पूरे प्रश्नपत्र का एकमात्र पलायन-विकल्प है, और ऐसे विकल्प को यंत्रवत् ग़लत मान लेना उतना ही ख़तरनाक है जितना यंत्रवत् सही मान लेना। यहाँ यह इसलिए नहीं टिकता कि उससे पहले वाला कथन सिद्ध हो चुका है — b < 0 निकलते ही 'कम-से-कम एक ऋणात्मक' अवश्यंभावी हो जाता है। जब कोई एक विकल्प प्रमाणित हो, तब 'इनमें से कोई नहीं' अपने आप गिर जाता है।
अवधारणा
यह असमिका और तर्क का प्रश्न है, गणना का नहीं, और इसमें दो औज़ार काम आते हैं। पहला, शर्त को सरलतम रूप में लाना — दोनों ओर से समान पद हटा देने पर a − b > a + b सिमटकर −b > b रह जाता है, और यहीं पूरा उत्तर छिपा है। दूसरा, अति-कथन वाले विकल्पों को एक प्रतिउदाहरण से गिराना; तर्क में किसी सार्वभौमिक दावे को झूठा सिद्ध करने के लिए एक ही उदाहरण पर्याप्त होता है, जबकि उसे सच्चा सिद्ध करने के लिए प्रमाण चाहिए। इसके साथ परिमाणकों का भेद भी समझ लेना चाहिए: 'कम-से-कम एक' का अर्थ है एक या दोनों, 'यथार्थतः एक' का अर्थ है एक और केवल एक, और 'दोनों' का अर्थ है दो-दो। तीनों की शक्ति अलग है, और परीक्षा प्रायः इन्हीं तीनों को एक ही विकल्प-सूची में रखकर यही भेद जाँचती है।
इस पेपर के संख्यात्मक भाग में ऐसे कुछ प्रश्न हैं जिनमें कोई संख्या दी ही नहीं जाती और निर्णय गुणधर्म से करना पड़ता है। इस प्रश्न की एक अलग विशेषता यह है कि इसका विकल्प (d) 'उपर्युक्त में से कोई नहीं' है — इस पूरी पुस्तिका में पलायन-विकल्प यही एक बार आया है। ऐसे विकल्प को न तो यंत्रवत् ग़लत मानना चाहिए और न सुरक्षित शरण, क्योंकि उसकी सच्चाई पूरी तरह इस पर निर्भर है कि उससे पहले वाले तीनों कथन सचमुच ग़लत हैं या नहीं। यहाँ चूँकि विकल्प (c) सिद्ध हो जाता है, इसलिए पलायन-विकल्प अपने आप गिर जाता है; यदि तीनों प्रतिउदाहरणों से कटते, तो वही उत्तर होता।
मुख्य तथ्य
- a − b > a + b से दोनों ओर से a हटाने पर −b > b रह जाता है, अर्थात् 2b < 0 और b < 0; a पर कोई प्रतिबंध नहीं लगता।
- दो अऋणात्मक संख्याओं के लिए सदैव |a − b| ≤ a + b होता है, इसलिए 'अन्तर' का निरपेक्ष पाठ लेने पर भी कम-से-कम एक संख्या ऋणात्मक होनी ही चाहिए।
- 'कम-से-कम एक' का दावा 'यथार्थतः एक' और 'दोनों' दोनों से कमज़ोर है, इसलिए वह अधिक स्थितियों में सत्य रहता है।
- किसी सार्वभौमिक दावे को झूठा सिद्ध करने के लिए एक प्रतिउदाहरण पर्याप्त है — a = 5, b = −2 से 'दोनों ऋणात्मक' कटता है और a = −1, b = −2 से 'यथार्थतः एक' कटता है।
- 'उपर्युक्त में से कोई नहीं' तभी सही होता है जब शेष तीनों कथन सिद्ध रूप से ग़लत हों।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- पलायन-विकल्प को देखते ही या तो सदैव ग़लत या सदैव सही मान लेना, जबकि उसकी सच्चाई शेष तीन विकल्पों पर निर्भर होती है।
- प्रतिउदाहरण खोजे बिना सबसे प्रबल दावे को चुन लेना, क्योंकि वह अधिक निश्चित सुनाई देता है।
- 'अन्तर' को केवल एक ही क्रम में पढ़ना और यह न जाँचना कि निरपेक्ष मान वाले पाठ में भी वही निष्कर्ष टिकता है या नहीं।
इस प्रकार के प्रश्न प्रायः इसी रूप में आते हैं — एक शर्त दी जाती है और चार निष्कर्षों में से वह चुनना होता है जो सदैव सत्य हो। कभी उलटा रूप भी आता है, जिसमें 'कौन-सा सदैव सत्य नहीं है' पूछा जाता है, और तब उत्तर वही होता है जिसके लिए एक प्रतिउदाहरण मिल जाए। सबसे तेज़ रास्ता दो चरणों का है: पहले शर्त को बीजगणित से सरल कीजिए, फिर बचे हुए दावों को छोटी-छोटी संख्याओं से परखिए, जिनमें ऋणात्मक और शून्य दोनों आज़माना न भूलिए।
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अभ्यास
- practice — not a real PYQ
यदि दो संख्याओं a और b के लिए a − b > a + b है, तो निम्नलिखित में से क्या सदैव सत्य है ?
- (a)a ऋणात्मक है
- (b)b ऋणात्मक है
- (c)दोनों ऋणात्मक हैं
- (d)दोनों धनात्मक हैं
उत्तर(b) b ऋणात्मक है — दोनों ओर से a हटाने पर −b > b रह जाता है, इसलिए b < 0; a पर कोई प्रतिबंध नहीं आता।