कोई व्यक्ति एक निश्चित प्रति दर्जन कीमत पर सेब खरीदता है और उन्हें उक्त कीमत की 8 गुनी राशि प्रति सैकड़ा कीमत लेकर बेच देता है । उसे कितने प्रतिशत लाभ या हानि होगी ?
- (a)4% लाभ
- (b)6% लाभ
- (c)4% हानि
- (d)6% हानि
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) 4% हानि — इस प्रश्न को खोलने वाला एक कदम यह है कि क्रय और विक्रय दोनों को एक ही इकाई पर लाया जाए, क्योंकि खरीद दर्जन के हिसाब से है और बिक्री सैकड़े के हिसाब से। मान लीजिए एक दर्जन का क्रय-मूल्य P है, तो एक सेब का क्रय-मूल्य P/12 हुआ; और सौ सेब 8P में बिकते हैं, तो एक सेब का विक्रय-मूल्य 8P/100 हुआ। अब तुलना सरल है: 1/12 = 0·0833 और 8/100 = 0·08, अर्थात् विक्रय-मूल्य क्रय-मूल्य से कम है — इसलिए हानि। मात्रा निकालने के लिए 300 सेब लेना सबसे साफ़ रास्ता है, क्योंकि 300 में 12 और 100 दोनों पूरे-पूरे बँट जाते हैं: 300 सेबों का क्रय-मूल्य 25P और विक्रय-मूल्य 24P, यानी हानि P और हानि प्रतिशत = (P/25P) × 100 = 4%। ध्यान दीजिए कि P कहीं भी छोड़ना नहीं पड़ा — अनुपात ही उत्तर तय कर देता है, इसलिए वास्तविक कीमत का न दिया होना कोई कमी नहीं है। एक और रास्ता, जो और भी छोटा है: दोनों दरों को प्रति सौ पर लाकर देखिए। सौ सेब का क्रय-मूल्य (100/12) × P = 8·33P पड़ता है और विक्रय-मूल्य 8P है, अर्थात् विक्रय-मूल्य क्रय-मूल्य का 8 ÷ 8·33 = 0·96 गुना — यानी ठीक 4% की कमी। ध्यान दीजिए कि 24/25 का अनुपात यहाँ किसी भी रास्ते से निकले, वही रहता है, क्योंकि 8/100 ÷ 1/12 = 96/100 है। इस प्रकार यह प्रश्न वास्तव में एक ही भिन्न — 96/100 — पहचानने का है, और शेष सब उसी से निकल आता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)4% लाभ — प्रतिशत ठीक है पर दिशा उलटी। लाभ तभी होता जब 8/100 > 1/12 होता, अर्थात् सैकड़े की दर दर्जन की दर से ऊँची पड़ती। यहाँ 8/100 = 0·08 और 1/12 = 0·0833 है, इसलिए बिक्री लागत से नीची है। इस प्रश्न में असली विभाजन-रेखा यही दिशा है, और वह केवल दोनों दरों को एक इकाई पर लाकर तय होती है।
- (b)6% लाभ — 6% किसी भी संगत गणना से नहीं निकलता। दिए गए अंकों — दर्जन, सैकड़ा और गुणक 8 — से बनने वाला अनुपात 24 : 25 है, जो ठीक 4% की कमी देता है। विकल्पों में 4 और 6 दोनों को दो-दो दिशाओं के साथ रखने का उद्देश्य यही देखना है कि अभ्यर्थी ने वास्तव में हिसाब लगाया या अनुमान से चुना।
- (d)6% हानि — दिशा तो सही है, पर मात्रा नहीं। हानि प्रतिशत सदैव क्रय-मूल्य पर निकाला जाता है; यहाँ 300 सेबों पर हानि P और क्रय-मूल्य 25P है, जो ठीक 4% देता है। यदि कोई भूल से विक्रय-मूल्य पर निकाले तो भी उत्तर लगभग 4·17% आता है, 6% नहीं।
अवधारणा
क्रय-विक्रय के प्रश्नों में जब खरीद और बिक्री की इकाइयाँ अलग हों, तब पूरा काम इकाई मिलाने का होता है, गणना का नहीं। तीन सुविधाजनक रास्ते हैं — प्रति नग मूल्य निकाल लीजिए; दोनों इकाइयों के लघुतम समापवर्त्य जितनी वस्तुएँ मान लीजिए; या दोनों दरों को एक ही आधार पर लाकर उनका अनुपात देख लीजिए। तीनों एक ही उत्तर देते हैं, क्योंकि लाभ-हानि प्रतिशत अनुपात पर टिका है, वास्तविक कीमत पर नहीं — इसीलिए ऐसे प्रश्नों में कीमत का न दिया होना कोई कमी नहीं। दो नियम स्थिर रहते हैं: प्रतिशत का आधार सदैव क्रय-मूल्य होता है, और दिशा इस बात से तय होती है कि विक्रय-मूल्य क्रय-मूल्य से ऊपर है या नीचे। पहले दिशा तय कीजिए, फिर मात्रा — इसी क्रम से चूक की संभावना सबसे कम रहती है।
इस पेपर का लगभग एक-तिहाई भाग संख्यात्मक है और उसमें प्रतिशत, लाभ-हानि तथा मिश्रण के प्रश्न बार-बार आते हैं; इसी पेपर में आगे चावल के मिश्रण वाला प्रश्न भी इसी परिवार का है। इनमें कठिनाई गणित की नहीं, प्रश्न के ढाँचे को पहचानने की होती है, और यही कारण है कि विकल्प जोड़ियों में बनाए जाते हैं — यहाँ 4% और 6% दोनों को लाभ तथा हानि, दोनों दिशाओं के साथ रखा गया है। ऐसी बनावट का उद्देश्य यही है कि केवल दिशा या केवल मात्रा जानने वाला अभ्यर्थी आधे रास्ते फँस जाए। हिन्दी स्तंभ में प्रतिशत चिह्न से पहले कोई जगह नहीं छपी है और 'प्रति दर्जन' तथा 'प्रति सैकड़ा' शब्दों में लिखे गए हैं।
मुख्य तथ्य
- लाभ या हानि प्रतिशत = (लाभ या हानि ÷ क्रय-मूल्य) × 100 — आधार सदैव क्रय-मूल्य रहता है, विक्रय-मूल्य नहीं।
- इकाइयाँ भिन्न हों तो उनका लघुतम समापवर्त्य लेना सुविधाजनक — यहाँ 12 और 100 का लघुतम समापवर्त्य 300 है।
- प्रति सेब क्रय-मूल्य P/12 और विक्रय-मूल्य 8P/100; दोनों का अनुपात 24 : 25, अर्थात् विक्रय-मूल्य क्रय-मूल्य का 96%।
- अनुपात पर आधारित प्रश्नों में वास्तविक मूल्य का न दिया होना बाधा नहीं है, क्योंकि वह गणना में कट जाता है।
- यदि हानि प्रतिशत भूल से विक्रय-मूल्य पर निकाला जाए तो यहाँ लगभग 4·17% आता है — इससे दिखता है कि आधार बदलने से उत्तर कितना खिसकता है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- दिशा तय किए बिना प्रतिशत निकाल लेना — प्रश्न 'लाभ या हानि' पूछता है, इसलिए पहला निर्णय दिशा का है।
- प्रतिशत विक्रय-मूल्य पर निकाल देना, जबकि लाभ-हानि का आधार सदैव क्रय-मूल्य होता है।
- दर्जन और सैकड़ा को मिलाए बिना ही 8 के गुणक को सीधे लाभ मान लेना, जबकि 8 गुना कीमत सौ नगों की है, बारह की नहीं।
यही ढाँचा दर्जन-सैकड़ा, किलो-क्विंटल या मीटर-गज जैसी जोड़ियों के साथ दोहराया जाता है, और कभी-कभी 'इतने रुपये में इतने ख़रीदे और इतने रुपये में इतने बेचे' के रूप में आता है। पहला काम सदैव यह है कि दोनों दरों को एक ही इकाई पर लाया जाए; उसके बाद प्रश्न दो पंक्तियों में हल हो जाता है। उलटा रूप भी आता है, जिसमें लाभ प्रतिशत देकर विक्रय दर पूछी जाती है — वहाँ भी पहले प्रति नग क्रय-मूल्य निकालिए, फिर उस पर प्रतिशत लगाइए।
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अभ्यास
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