‘क्लाउड कम्प्यूटिंग’ प्रौद्योगिकी क्या निर्दिष्ट करती है ?
- (a)कलनविधि (ऐल्गोरिथ्म) का एक समुच्चय जो अस्पष्ट तर्क (फ़ज़ी लॉजिक) का प्रयोग कर समस्याओं का समाधान करता है
- (b)अनेक कम्प्यूटर जो बेतार जालक्रमों और उपग्रहों के माध्यम से आपस में जुड़े होते हैं
- (c)एक वितरित कम्प्यूटर स्थापत्य, जो अनुप्रयोगों/उपयोगकर्ताओं को जैसी आवश्यकता हो वैसा ही सॉफ्टवेयर, आधारिक-संरचना एवं प्लेटफॉर्म प्रदान करता है
- (d)एक भविष्यानुकूल प्रौद्योगिकी जो कम्प्यूटिंग निष्पादन हेतु क्लाउड्स का प्रयोग करेगी
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) एक वितरित कम्प्यूटर स्थापत्य, जो अनुप्रयोगों/उपयोगकर्ताओं को जैसी आवश्यकता हो वैसा ही सॉफ्टवेयर, आधारिक-संरचना एवं प्लेटफॉर्म प्रदान करता है — यह विकल्प क्लाउड कंप्यूटिंग की मानक परिभाषा के तीनों अंग एक साथ रखता है : वितरित संसाधन, माँग के अनुसार आपूर्ति, और तीन स्तरों पर सेवा।
क्लाउड कंप्यूटिंग का मूल विचार यह है कि कंप्यूटिंग को स्वामित्व से अलग करके सेवा बना दिया जाए। पहले हर संस्था अपने सर्वर ख़रीदती थी, उन्हें अपने परिसर में रखती थी और उनकी क्षमता सबसे व्यस्त दिन के हिसाब से तय करती थी — यानी अधिकांश समय क्षमता ख़ाली पड़ी रहती थी। क्लाउड में वही संसाधन बड़े आँकड़ा-केंद्रों में एकत्र रहते हैं और उपयोगकर्ता जितना चाहे उतना, जब चाहे तब लेता है और उतने का ही शुल्क देता है।
सेवा तीन स्तरों पर मिलती है, और विकल्प (c) तीनों का नाम लेता है। आधारिक संरचना के स्तर पर उपयोगकर्ता को आभासी मशीन, भंडारण और जालक्रम मिलते हैं। प्लेटफ़ॉर्म के स्तर पर उसे वह वातावरण मिलता है जिसमें वह अपने अनुप्रयोग चला सके, बिना यह चिंता किए कि नीचे कौन-सा प्रचालन तंत्र चल रहा है। सॉफ़्टवेयर के स्तर पर उसे तैयार अनुप्रयोग मिलता है, जिसे वह ब्राउज़र से चलाता है — ई-मेल और प्रलेख-संपादन की जालस्थल-आधारित सेवाएँ इसी स्तर की हैं।
इसके साथ जुड़ी विशेषताएँ भी याद रखने योग्य हैं : स्वयं-सेवा के रूप में तुरन्त उपलब्धता, जालक्रम के माध्यम से व्यापक पहुँच, संसाधनों का साझा भंडार, माँग के अनुसार तेज़ी से घटना-बढ़ना, और उपयोग का मापन, जिस पर शुल्क तय होता है।
शेष तीन विकल्प — एक कलनविधि का वर्ग, एक जालक्रम का वर्णन, और एक शब्द का अक्षरशः अर्थ — इनमें से कोई इस व्यवस्था को नहीं बताता, इसलिए उत्तर (c) है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)कलनविधि (ऐल्गोरिथ्म) का एक समुच्चय जो अस्पष्ट तर्क (फ़ज़ी लॉजिक) का प्रयोग कर समस्याओं का समाधान करता है — अस्पष्ट तर्क अपने आप में एक वास्तविक और उपयोगी क्षेत्र है : उसमें सत्य और असत्य के बीच की मात्राओं को भी मान दिया जाता है, जिससे ‘थोड़ा गर्म’ या ‘लगभग भरा’ जैसी अवधारणाएँ गणित में उतर आती हैं, और उसका प्रयोग नियंत्रण-प्रणालियों तथा घरेलू उपकरणों में होता है। पर उसका क्लाउड कंप्यूटिंग से कोई सम्बन्ध नहीं। यह विकल्प इसलिए रखा गया है कि दोनों पद कंप्यूटर-विज्ञान के आधुनिक शब्दकोश से आते हैं और सुनने में समान रूप से तकनीकी लगते हैं।
- (b)अनेक कम्प्यूटर जो बेतार जालक्रमों और उपग्रहों के माध्यम से आपस में जुड़े होते हैं — यह विकल्प किसी जालक्रम का वर्णन करता है, क्लाउड का नहीं। अनेक कंप्यूटरों का आपस में जुड़ा होना क्लाउड की पूर्व-शर्त तो है, पर वही उसकी परिभाषा नहीं — अन्यथा हर बड़ा जालक्रम क्लाउड कहलाने लगता। जो बात इसे क्लाउड बनाती है वह है संसाधनों का साझा भंडार, माँग के अनुसार तुरन्त उपलब्धता, और उपयोग के अनुसार शुल्क। इसके अलावा संयोजन का माध्यम — बेतार हो या तंतु — परिभाषा का अंग नहीं है, इसलिए ‘बेतार जालक्रम और उपग्रह’ जोड़ देना उसे और संकुचित कर देता है।
- (d)एक भविष्यानुकूल प्रौद्योगिकी जो कम्प्यूटिंग निष्पादन हेतु क्लाउड्स का प्रयोग करेगी — यह विकल्प ‘क्लाउड’ शब्द का अक्षरशः अर्थ ले लेता है, मानो गणना आकाश के बादलों में की जाएगी। नाम वस्तुतः एक चित्र-परंपरा से आया है : जालक्रम के आरेखों में इंटरनेट को एक बादल के आकार से दिखाया जाता रहा है, क्योंकि उसके भीतर का विस्तार उपयोगकर्ता के लिए महत्त्वहीन होता है। यही भाव क्लाउड कंप्यूटिंग में भी है — उपयोगकर्ता को सेवा मिलती है, यह जाने बिना कि वह किस मशीन पर, किस नगर में चल रही है। और यह भविष्य की तकनीक नहीं है; ई-मेल से लेकर प्रलेख-संपादन तक की सेवाएँ इसी रूप में वर्षों से चल रही हैं।
अवधारणा
क्लाउड कंप्यूटिंग को समझने का सबसे सरल रास्ता उसकी तुलना बिजली से करना है। कोई कारख़ाना अपना जनरेटर लगाने के बजाय ग्रिड से बिजली लेता है, जितनी चाहिए उतनी, और मीटर के अनुसार भुगतान करता है। क्लाउड कंप्यूटिंग में गणना-शक्ति, भंडारण और सॉफ़्टवेयर उसी तरह सेवा के रूप में मिलते हैं।
सेवा-मॉडल तीन हैं — आधारिक संरचना, प्लेटफ़ॉर्म और सॉफ़्टवेयर — और इन तीनों में यह बदलता जाता है कि प्रबंधन का कितना भार सेवा-प्रदाता उठाता है और कितना उपयोगकर्ता। परिनियोजन के मॉडल भी कई हैं : सार्वजनिक क्लाउड, जिसमें संसाधन कई ग्राहकों के बीच साझा होते हैं; निजी क्लाउड, जो एक ही संस्था के लिए होता है; और दोनों को मिलाकर बना मिश्रित रूप।
लाभ स्पष्ट हैं : पूँजीगत व्यय घटकर परिचालन व्यय बन जाता है, क्षमता माँग के अनुसार तुरन्त बढ़ाई-घटाई जा सकती है, और छोटी संस्थाओं को भी वही आधारिक संरचना उपलब्ध हो जाती है जो बड़ी संस्थाओं के पास है।
चिंताएँ भी उतनी ही वास्तविक हैं : आँकड़े कहाँ रखे जा रहे हैं, उन पर किस देश का विधि-क्षेत्र लागू होगा, सेवा-प्रदाता पर निर्भरता कितनी बढ़ जाएगी, और जालक्रम बाधित होने पर काम कैसे चलेगा। यही कारण है कि सरकारी और वित्तीय संस्थाएँ आँकड़ों के स्थानीय भंडारण और सुरक्षा-मानकों पर विशेष बल देती हैं।
प्रशासनिक दृष्टि से क्लाउड कंप्यूटिंग अब एक नीतिगत विषय भी है। सरकारी विभागों की सेवाएँ साझा आँकड़ा-केंद्रों पर चलाने से लागत घटती है और नई सेवाएँ तेज़ी से शुरू की जा सकती हैं, पर इसके साथ आँकड़ों की सुरक्षा, गोपनीयता और सेवा-स्तर के अनुबंध जैसे प्रश्न जुड़ जाते हैं।
परीक्षा में इस विषय पर प्रश्न प्रायः तीन रूपों में आते हैं : परिभाषा, सेवा-मॉडल के नाम, और लाभ-हानि का आकलन। यह प्रश्न पहले रूप का है, और उसका सही विकल्प जान-बूझकर लंबा रखा गया है, क्योंकि उसमें परिभाषा के तीनों अंग समाए हैं।
एक व्यावहारिक संकेत : ऐसे प्रश्नों में सबसे विस्तृत विकल्प प्रायः सही होता है, क्योंकि परिभाषा को पूरा कहने में शब्द लगते हैं — पर यह केवल संकेत है, निर्णय अर्थ से ही होना चाहिए।
हिन्दी स्तंभ में विकल्प (c) में ‘अनुप्रयोगों/उपयोगकर्ताओं’ तिर्यक रेखा से, बिना जगह के छपा है, ठीक अंग्रेज़ी के ‘applications/users’ की तरह; और विकल्प (a) में दो लिप्यन्तरण-कोष्ठक जोड़े गए हैं, जो अंग्रेज़ी स्तंभ में नहीं हैं।
मुख्य तथ्य
- क्लाउड कंप्यूटिंग वितरित संसाधनों से माँग के अनुसार सॉफ़्टवेयर, प्लेटफ़ॉर्म और आधारिक संरचना उपलब्ध कराने की व्यवस्था है।
- तीन सेवा-मॉडल हैं — आधारिक संरचना, प्लेटफ़ॉर्म और सॉफ़्टवेयर — और तीनों में प्रबंधन का भार अलग-अलग बँटता है।
- मुख्य विशेषताएँ : स्वयं-सेवा के रूप में तुरन्त उपलब्धता, जालक्रम से व्यापक पहुँच, साझा संसाधन-भंडार, माँग के अनुसार घटना-बढ़ना और उपयोग का मापन।
- परिनियोजन के रूप हैं सार्वजनिक, निजी और मिश्रित क्लाउड।
- ‘क्लाउड’ नाम जालक्रम-आरेखों की उस परंपरा से आया है जिसमें इंटरनेट को बादल के आकार से दिखाया जाता था।
- मुख्य चिंताएँ हैं आँकड़ों का स्थान और उन पर लागू विधि-क्षेत्र, सेवा-प्रदाता पर निर्भरता, तथा जालक्रम बाधित होने पर सेवा की उपलब्धता।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- क्लाउड को किसी भी बड़े जालक्रम का पर्याय मान लेना, जबकि उसकी पहचान साझा भंडार और माँग पर उपलब्धता से है।
- ‘क्लाउड’ शब्द का अक्षरशः अर्थ ले लेना और उसे भविष्य की कोई कल्पना समझ लेना।
- सेवा-मॉडल के तीनों स्तर — आधारिक संरचना, प्लेटफ़ॉर्म और सॉफ़्टवेयर — आपस में बदल देना।
परिभाषा वाले प्रश्नों में एक अच्छी आदत यह है कि पहले मन में अपनी परिभाषा बना ली जाए और फिर विकल्पों में उससे मेल खाता विकल्प खोजा जाए, न कि विकल्प पढ़-पढ़कर परिभाषा गढ़ी जाए। क्लाउड कंप्यूटिंग के लिए वह परिभाषा तीन शब्दों में सिमट सकती है : साझा संसाधन, माँग पर उपलब्ध, सेवा के रूप में। इसके बाद हर विकल्प से पूछिए कि क्या उसमें ये तीनों बातें हैं। इसी पत्र में स्पैम, प्लग-एन-प्ले और जालक्रमों के प्रकार जैसे प्रश्न भी इसी शैली के हैं, इसलिए यह आदत कई प्रश्नों पर एक साथ काम करती है।
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उत्तर(c) Local, Wide and Metropolitan
इसी प्रश्नपत्र का LAN, WAN और MAN वाला प्रश्न — जालक्रमों की उसी कड़ी से, जिस पर क्लाउड की सेवाएँ टिकी हैं।
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अभ्यास
- practice — not a real PYQ
क्लाउड कंप्यूटिंग में किसी उपयोगकर्ता को आभासी मशीन, भंडारण और जालक्रम उपलब्ध कराने वाला सेवा-मॉडल क्या कहलाता है ?
- (a)सॉफ़्टवेयर सेवा के रूप में
- (b)प्लेटफ़ॉर्म सेवा के रूप में
- (c)आधारिक संरचना सेवा के रूप में
- (d)आँकड़ा संचय सेवा के रूप में
उत्तर(c) आधारिक संरचना सेवा के रूप में
- practice — not a real PYQ
निम्नलिखित में से कौन-सी क्लाउड कंप्यूटिंग की विशेषता नहीं है ?
- (a)माँग के अनुसार संसाधनों का घटना-बढ़ना
- (b)उपयोग का मापन और उसी के अनुसार शुल्क
- (c)संसाधनों का साझा भंडार
- (d)प्रत्येक उपयोगकर्ता के लिए अलग भौतिक सर्वर अनिवार्य होना
उत्तर(d) प्रत्येक उपयोगकर्ता के लिए अलग भौतिक सर्वर अनिवार्य होना