भूमण्डलीय स्थान-निर्धारण प्रणाली (ग्लोबल पोज़िशनिंग सिस्टम) (GPS) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : 1. GPS से ATM संव्यवहारों में यथार्थ समय अंकित हो पाता है । 2. GPS संकेतों के विश्वव्यापी अन्तरण के लिए उपग्रहों के एक समूह पर निर्भर करता है । उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं ?
- (a)केवल 1
- (b)केवल 2
- (c)1 और 2 दोनों
- (d)न तो 1, न ही 2
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) 1 और 2 दोनों — दोनों कथन इस प्रणाली के दो अलग-अलग, पर समान रूप से सही, पक्षों को छूते हैं।
कथन 2 पहले लीजिए, क्योंकि वही अधिक परिचित है। भूमंडलीय स्थान-निर्धारण प्रणाली उपग्रहों के एक पूरे समूह पर टिकी है, जो पृथ्वी की मध्यम कक्षाओं में इस तरह बिखरे हैं कि पृथ्वी पर लगभग हर जगह से एक साथ कई उपग्रह दिखाई देते रहें। हर उपग्रह लगातार संकेत प्रसारित करता है, और ग्राही उन संकेतों को पकड़कर अपनी स्थिति निकालता है। इसलिए ‘उपग्रहों के एक समूह पर निर्भर करता है’ कहना ठीक है।
कथन 1 उस पक्ष को छूता है जिसकी चर्चा कम होती है, पर जो व्यवहार में उतना ही महत्त्वपूर्ण है — समय। हर उपग्रह में अत्यंत परिशुद्ध परमाणु घड़ी लगी होती है और प्रसारित संकेत के साथ समय की सूचना भी जाती है। स्थिति निकालने का पूरा गणित इसी समय पर टिका है : ग्राही यह मापता है कि संकेत को उस तक पहुँचने में कितना समय लगा और उससे दूरी निकालता है।
इसी परिशुद्ध समय का दूसरा उपयोग वित्तीय और संचार-जालक्रमों में होता है। बैंकिंग तथा संचार के तंत्रों को अपने अलग-अलग स्थानों पर लगे उपकरणों की घड़ियाँ आपस में मिलाकर रखनी पड़ती हैं, ताकि संव्यवहारों पर अंकित समय भरोसेमंद हो और उनका क्रम विवाद में न पड़े। इसके लिए इसी प्रणाली से मिले समय-संकेत का व्यापक उपयोग होता है। इसलिए कथन 1 भी सही है।
दोनों कथन सही होने से उत्तर (c) है। यहाँ सूची के बाद सीधे प्रश्न-वाक्य आता है और कोई कूट-पंक्ति नहीं है; विकल्प ‘1 और 2 दोनों / न तो 1, न ही 2’ वाली जोड़ी के हैं, जो इस प्रश्नपत्र पर सामान्य बनावट है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)केवल 1 — यह विकल्प समय वाले कथन को तो स्वीकार करता है पर उपग्रह-समूह वाले कथन को नकार देता है, जो इस प्रणाली की सबसे बुनियादी बात है। स्थिति निकालने के लिए ग्राही को एक साथ कई उपग्रहों के संकेत चाहिए — तीन से स्थिति और एक अतिरिक्त से ग्राही की अपनी घड़ी की त्रुटि का सुधार। इसीलिए उपग्रह इस तरह बिखेरे जाते हैं कि आकाश के अलग-अलग कोनों से पर्याप्त संकेत मिलते रहें। एक उपग्रह से यह काम हो ही नहीं सकता, इसलिए कथन 2 को नकारना प्रणाली की परिभाषा को ही नकारना है।
- (b)केवल 2 — यह विकल्प उपग्रह-समूह वाली बात मान लेता है पर समय वाली बात छोड़ देता है, और यही इस प्रश्न की असली परीक्षा है। इस प्रणाली को केवल ‘रास्ता बताने वाली’ तकनीक मान लेना अधूरी समझ है : उसका उतना ही बड़ा उपयोग परिशुद्ध समय बाँटने का है, जिस पर संचार-जालक्रम, विद्युत ग्रिड और वित्तीय तंत्र निर्भर करते हैं। दूरी की गणना स्वयं समय की गणना है, इसलिए समय इस प्रणाली का उप-उत्पाद नहीं, उसका मूल है।
- (d)न तो 1, न ही 2 — दोनों कथनों को नकारने का कोई आधार नहीं बनता, क्योंकि दोनों इस प्रणाली के प्रलेखित लक्षण हैं — एक उसकी बनावट का और दूसरा उसके उपयोग का। कथन-सूची वाले प्रश्नों में ‘न तो 1, न ही 2’ वाला विकल्प तभी चुना जाना चाहिए जब दोनों कथनों में कोई स्पष्ट दोष मिले। यहाँ न कोई अतिशयोक्ति है, न कोई ग़लत आँकड़ा; दोनों कथन संयत भाषा में वही कहते हैं जो प्रणाली करती है।
अवधारणा
भूमंडलीय स्थान-निर्धारण प्रणाली तीन खंडों से बनी है : अंतरिक्ष खंड, यानी उपग्रहों का समूह; नियंत्रण खंड, यानी वे भू-केंद्र जो उपग्रहों की कक्षा और घड़ियों पर नज़र रखते हैं और सुधार भेजते हैं; और उपयोगकर्ता खंड, यानी ग्राही उपकरण।
काम करने का ढंग त्रिपार्श्वन कहलाता है। हर उपग्रह अपने संकेत के साथ यह सूचना भेजता है कि संकेत कब भेजा गया और उस समय उपग्रह कहाँ था। ग्राही अपनी घड़ी से आगमन का समय जानता है, अंतर से दूरी निकालता है, और कई उपग्रहों से मिली दूरियों को मिलाकर अपनी स्थिति तय करता है। तीन उपग्रहों से स्थिति निकल आती है, पर ग्राही की घड़ी उतनी परिशुद्ध नहीं होती, इसलिए चौथे उपग्रह का संकेत उस घड़ी-त्रुटि को सुधारने के काम आता है — और यही कारण है कि हर ग्राही वास्तव में एक बहुत सटीक घड़ी भी है।
एक बात और ध्यान देने योग्य है : यह एकतरफ़ा प्रसारण-प्रणाली है। उपग्रह संकेत भेजते हैं, ग्राही केवल सुनता है; उसे कुछ भेजना नहीं पड़ता। इसीलिए एक ही समय में असंख्य ग्राही इसका उपयोग कर सकते हैं।
इस प्रकार की और भी प्रणालियाँ हैं — रूस, यूरोप और चीन की अपनी-अपनी वैश्विक प्रणालियाँ, तथा भारत की क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली। भारत में विमानन के लिए संवर्धन-प्रणाली भी विकसित की गई है, जो संकेतों की शुद्धता बढ़ाती है।
स्थान-निर्धारण प्रणाली आज केवल मानचित्र और दिशा-निर्देश की तकनीक नहीं रह गई। परिशुद्ध समय की उसकी सेवा पर संचार-जालक्रमों का समकालन, विद्युत ग्रिड का संचालन और वित्तीय संव्यवहारों का समय-अंकन निर्भर करते हैं। यही कारण है कि इसे आधारभूत संरचना की तरह देखा जाता है और देश अपनी स्वतंत्र प्रणालियाँ विकसित करते हैं।
भारत के संदर्भ में क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली इसी सामरिक सोच का परिणाम है : वैश्विक प्रणाली किसी अन्य देश के नियंत्रण में है, इसलिए महत्त्वपूर्ण अनुप्रयोगों के लिए अपनी क्षमता आवश्यक मानी गई।
परीक्षा की दृष्टि से इस विषय पर प्रश्न चार खिड़कियों से आते हैं : प्रणाली की बनावट, काम करने का सिद्धांत, उपयोग के क्षेत्र, और विभिन्न देशों की प्रणालियों के नाम। यह प्रश्न पहले तीन में से दो को छूता है।
हिन्दी स्तंभ में स्टेम में लगातार दो कोष्ठक छपे हैं — पहले अंग्रेज़ी नाम का देवनागरी लिप्यन्तरण और उसके तुरन्त बाद रोमन संक्षेप — जबकि अंग्रेज़ी स्तंभ में केवल संक्षेप है।
मुख्य तथ्य
- यह प्रणाली मध्यम कक्षाओं में स्थित उपग्रहों के समूह पर आधारित है, ताकि पृथ्वी पर लगभग हर स्थान से एक साथ कई उपग्रह दिखते रहें।
- हर उपग्रह में परमाणु घड़ी होती है और वह समय की सूचना सहित संकेत लगातार प्रसारित करता है।
- स्थिति निकालने की विधि त्रिपार्श्वन है : संकेत के आने में लगे समय से दूरी और कई दूरियों को मिलाकर स्थिति।
- तीन उपग्रहों से स्थिति निकलती है और चौथे से ग्राही की घड़ी की त्रुटि सुधारी जाती है — इसीलिए हर ग्राही एक बहुत सटीक घड़ी भी है।
- इसी परिशुद्ध समय का उपयोग वित्तीय तथा संचार-जालक्रमों में संव्यवहारों के समय-अंकन और उपकरणों की घड़ियों के समकालन के लिए होता है।
- यह एकतरफ़ा प्रसारण-प्रणाली है : ग्राही केवल संकेत सुनता है, भेजता नहीं, इसलिए असंख्य ग्राही एक साथ इसका उपयोग कर सकते हैं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- इस प्रणाली को केवल दिशा-निर्देश की तकनीक मान लेना और उसकी समय-सेवा को भूल जाना।
- यह मान लेना कि ग्राही उपग्रह को कोई संकेत भेजता है, जबकि यह एकतरफ़ा प्रसारण-प्रणाली है।
- स्थिति निकालने के लिए आवश्यक उपग्रहों की संख्या भूल जाना — तीन स्थिति के लिए और एक घड़ी-सुधार के लिए।
दो-कथन वाले प्रश्नों में दोनों कथनों को अलग-अलग तौलने के बाद यह भी देखिए कि वे एक ही पक्ष की बात कर रहे हैं या अलग-अलग पक्षों की। यहाँ एक कथन बनावट का है और दूसरा उपयोग का, इसलिए दोनों के एक साथ सही होने में कोई विरोध नहीं। जहाँ कथन संयत भाषा में हों और उनमें कोई अतिशयोक्ति या असामान्य आँकड़ा न हो, वहाँ ‘दोनों सही’ का विकल्प प्रायः सुरक्षित रहता है — पर यह सुविधा तभी है जब हर कथन अलग से जाँच लिया गया हो। इस प्रश्नपत्र में प्रौद्योगिकी से जुड़े प्रश्न इसी शैली में बार-बार आते हैं।
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उत्तर(c) Local, Wide and Metropolitan
इसी प्रश्नपत्र का LAN, WAN और MAN वाला प्रश्न — संचार-जालक्रमों की उसी शब्दावली से।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
किसी ग्राही को अपनी त्रिविम स्थिति और घड़ी-त्रुटि दोनों निकालने के लिए कम से कम कितने उपग्रहों के संकेत चाहिए ?
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उत्तर(c) चार
- practice — not a real PYQ
भारत की अपनी क्षेत्रीय उपग्रह नौवहन प्रणाली किस नाम से जानी जाती है ?
- (a)नाविक
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उत्तर(a) नाविक