एक ज्यावक्रीय अनुप्रस्थ तरंग किसी रज्जु पर गमन कर रही है । इस रज्जु पर कोई बिन्दु किस गति में है ?
- (a)तरंग की कोणीय आवृत्ति के समान कोणीय आवृत्ति वाली SHM (सरल आवर्त गति)
- (b)तरंग की आवृत्ति से भिन्न आवृत्ति वाली SHM (सरल आवर्त गति)
- (c)तरंग की कोणीय चाल के समान कोणीय चाल वाली एकसमान वृत्तीय गति
- (d)तरंग की कोणीय चाल से भिन्न कोणीय चाल वाली एकसमान वृत्तीय गति
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) तरंग की कोणीय आवृत्ति के समान कोणीय आवृत्ति वाली SHM (सरल आवर्त गति) — अनुप्रस्थ तरंग में माध्यम का कण आगे नहीं बढ़ता; वह अपनी साम्य-स्थिति के इर्द-गिर्द, तरंग की दिशा के लंबवत, आगे-पीछे दोलन करता है।
ज्यावक्रीय तरंग को इस रूप में लिखा जाता है : y = A sin(kx − ωt)। किसी एक बिंदु को स्थिर मान लीजिए, यानी x को नियत कर दीजिए; तब y केवल समय का ज्या-फलन रह जाता है। यही सरल आवर्त गति की परिभाषा है — विस्थापन समय के साथ ज्या-रूप में बदलता है और प्रत्यानयन बल विस्थापन के समानुपाती तथा उसके विपरीत दिशा में होता है।
अब आवृत्ति का प्रश्न। उसी व्यंजक में समय के साथ बदलने वाला गुणांक ω है, और वही तरंग की कोणीय आवृत्ति भी है। इसलिए कण की दोलन-आवृत्ति और तरंग की आवृत्ति एक ही होती है। यह बात सहज भी है : स्रोत जिस दर से माध्यम को हिलाता है, माध्यम का हर कण उसी दर से दोलन करता है; तरंग केवल उस दोलन की कला को आगे ले जाती है, ऊर्जा के साथ।
दो राशियों का भेद यहीं स्पष्ट कर लेना चाहिए। तरंग की चाल v = ω/k होती है और वह माध्यम के गुणों पर निर्भर करती है — रज्जु के लिए तनाव और प्रति इकाई लंबाई द्रव्यमान पर। कण की चाल इससे अलग राशि है, समय के साथ बदलती रहती है, और उसका अधिकतम मान Aω होता है। इन दोनों को एक मान लेना इस अध्याय की सबसे आम भूल है।
गति का रूप भी ध्यान देने योग्य है। रज्जु का कण एक सरल रेखा पर आगे-पीछे चलता है, वृत्त पर नहीं। वृत्ताकार पथ जल-पृष्ठ की तरंगों में दिखता है, जो अलग परिघटना है।
छपाई की एक बात : विकल्प (a) में ‘कोणीय आवृत्ति’ है और विकल्प (b) में केवल ‘आवृत्ति’ — यह असमानता दोनों स्तंभों में समान रूप से छपी है, और चूँकि कोणीय आवृत्ति तथा आवृत्ति एक स्थिर गुणक से जुड़ी हैं, तर्क पर इसका कोई असर नहीं पड़ता।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)तरंग की आवृत्ति से भिन्न आवृत्ति वाली SHM (सरल आवर्त गति) — यह विकल्प गति का रूप तो ठीक बताता है — सरल आवर्त गति — पर आवृत्ति के बारे में उलटा दावा करता है। माध्यम के कण की दोलन-आवृत्ति तरंग की आवृत्ति से भिन्न नहीं हो सकती, क्योंकि तरंग स्वयं उन्हीं दोलनों के आगे बढ़ने का नाम है। यदि कण किसी और दर से दोलन करने लगें तो वह उसी तरंग का हिस्सा नहीं रह जाएगा। माध्यम बदलने पर जो बदलता है वह तरंग की चाल और तरंगदैर्घ्य हैं; आवृत्ति स्रोत से तय होती है और माध्यम बदलने पर भी वही रहती है।
- (c)तरंग की कोणीय चाल के समान कोणीय चाल वाली एकसमान वृत्तीय गति — एकसमान वृत्तीय गति यहाँ नहीं हो रही, यद्यपि उसका उल्लेख आकस्मिक नहीं है : सरल आवर्त गति को एकसमान वृत्तीय गति के किसी व्यास पर प्रक्षेप के रूप में भी दिखाया जाता है, और यही समानता इस विकल्प को विश्वसनीय बनाती है। पर प्रक्षेप और वास्तविक पथ अलग बातें हैं — तनी हुई रज्जु का कण एक सरल रेखा पर आगे-पीछे चलता है, उसके पास वृत्त पर घूमने की कोई स्वतंत्रता नहीं होती। वृत्ताकार या दीर्घवृत्ताकार पथ जल-पृष्ठ की तरंगों में कणों के लिए देखा जाता है, जो भिन्न प्रकार की तरंग है।
- (d)तरंग की कोणीय चाल से भिन्न कोणीय चाल वाली एकसमान वृत्तीय गति — यह विकल्प भी वृत्तीय गति की बात करता है और उस पर एक और ग़लत दावा जोड़ देता है — कि कोणीय चाल तरंग से भिन्न होगी। दोनों अंश टिकते नहीं। रज्जु के कण का पथ रेखीय है, और उसकी दोलन-दर तरंग की दर के बराबर है। ध्यान दीजिए कि विकल्प (c) और (d) मिलकर वृत्तीय गति के दोनों संभव रूप घेर लेते हैं, ठीक वैसे ही जैसे (a) और (b) सरल आवर्त गति के दोनों रूप घेरते हैं। इसलिए निर्णय दो चरणों में होता है : पहले गति का रूप तय कीजिए, फिर आवृत्ति का सम्बन्ध।
अवधारणा
तरंग माध्यम में विक्षोभ के आगे बढ़ने की परिघटना है, जिसमें ऊर्जा और संवेग तो स्थानांतरित होते हैं, पर माध्यम का पदार्थ स्थानांतरित नहीं होता। अनुप्रस्थ तरंग में कणों का दोलन तरंग की गति-दिशा के लंबवत होता है; अनुदैर्घ्य तरंग में वह उसी दिशा के अनुदिश होता है।
ज्यावक्रीय तरंग का समीकरण y = A sin(kx − ωt) चार राशियाँ एक साथ रखता है : आयाम A, कोण संख्या k, कोणीय आवृत्ति ω, और उनके सम्बन्ध से निकलने वाली तरंग-चाल v = ω/k। आवृत्ति f = ω/2π और तरंगदैर्घ्य λ = 2π/k से v = fλ भी निकल आता है।
तीन राशियों का भेद इस अध्याय की रीढ़ है। पहली, तरंग की चाल — यह माध्यम पर निर्भर है और किसी एक तरंग के लिए स्थिर रहती है। दूसरी, कण की चाल — यह समय के साथ बदलती है, साम्य-स्थिति पर अधिकतम (Aω) और छोर पर शून्य। तीसरी, आवृत्ति — यह स्रोत से तय होती है और माध्यम बदलने पर भी नहीं बदलती, जबकि तरंगदैर्घ्य बदल जाता है।
रज्जु पर तरंग की चाल तनाव और प्रति इकाई लंबाई द्रव्यमान से तय होती है : तनाव बढ़ाने पर चाल बढ़ती है और मोटी, भारी रज्जु पर घटती है। यही सिद्धांत तार वाले वाद्ययंत्रों के स्वर-नियमन का आधार है।
तरंगों से जुड़े प्रश्न सामान्य विज्ञान में प्रायः अवधारणा के स्तर पर पूछे जाते हैं, गणना के स्तर पर नहीं — और उनका सबसे आम विषय यही है कि माध्यम का कण क्या करता है। इसका कारण भी है : यही वह बिंदु है जहाँ रोज़मर्रा का अनुभव भ्रम पैदा करता है। पानी में लहर आगे बढ़ती दिखती है, इसलिए लगता है कि पानी भी आगे बढ़ रहा है; पर तैरता हुआ पत्ता ऊपर-नीचे होता रहता है, आगे नहीं जाता — यही तरंग का असली स्वरूप दिखाता है।
इस प्रश्न में विकल्प जोड़ों में रखे गए हैं : दो सरल आवर्त गति के और दो एकसमान वृत्तीय गति के, और हर जोड़े में एक ‘समान’ और एक ‘भिन्न’ आवृत्ति वाला। ऐसी सममित रचना संकेत देती है कि निर्णय दो अलग-अलग प्रश्नों का है — गति का रूप क्या है, और आवृत्ति का सम्बन्ध क्या है।
हिन्दी स्तंभ में संक्षेप SHM रोमन में रखा गया है और उसके बाद कोष्ठक में उसका हिन्दी विस्तार दिया गया है, जो अंग्रेज़ी स्तंभ में नहीं है।
मुख्य तथ्य
- अनुप्रस्थ तरंग में माध्यम का कण तरंग की दिशा के लंबवत, सरल आवर्त गति करता है और आगे नहीं बढ़ता।
- कण की दोलन-आवृत्ति तरंग की आवृत्ति के बराबर होती है, क्योंकि तरंग उन्हीं दोलनों के आगे बढ़ने का नाम है।
- तरंग-चाल v = ω/k = fλ माध्यम के गुणों से तय होती है, जबकि कण की चाल समय के साथ बदलती है और उसका अधिकतम मान Aω होता है।
- माध्यम बदलने पर आवृत्ति नहीं बदलती; चाल और तरंगदैर्घ्य बदल जाते हैं।
- रज्जु पर तरंग की चाल तनाव और प्रति इकाई लंबाई द्रव्यमान पर निर्भर करती है।
- सरल आवर्त गति को एकसमान वृत्तीय गति के व्यास पर प्रक्षेप के रूप में देखा जा सकता है, पर रज्जु के कण का वास्तविक पथ रेखीय होता है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- कण की चाल और तरंग की चाल को एक मान लेना — पहली समय के साथ बदलती है, दूसरी माध्यम से तय होती है।
- जल-पृष्ठ की तरंगों वाले वृत्ताकार पथ को हर प्रकार की तरंग पर लागू कर देना।
- यह मान लेना कि माध्यम बदलने पर आवृत्ति बदल जाती है, जबकि बदलते तरंगदैर्घ्य और चाल हैं।
तरंगों के प्रश्नों में विकल्प प्रायः दो कसौटियों को आपस में मिलाकर बनाए जाते हैं, जैसे यहाँ — गति का रूप और आवृत्ति का सम्बन्ध। ऐसे प्रश्न में सुरक्षित तरीक़ा यह है कि दोनों कसौटियों पर अलग-अलग निर्णय लिया जाए और तब विकल्प चुना जाए। पहले पूछिए : कण किस पथ पर चलता है ? इससे आधे विकल्प कट जाते हैं। फिर पूछिए : उसकी दर क्या तरंग की दर के बराबर है ? इससे शेष दो में से एक निकल आता है। यही दो-चरणीय आदत भौतिकी के अधिकांश अवधारणा-प्रश्नों में काम आती है।
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EPFO_APFC_2016_Q74खोलें व हल करें →In raising an object to a given height by means of an inclined plane, as compared with raising the object vertically, there is a reduction in
- (a) Force to be applied
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उत्तर(a) Force to be applied
इसी प्रश्नपत्र का आनत तल वाला प्रश्न — भौतिकी के उसी खंड से, जहाँ उत्तर अवधारणा से निकलता है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
किसी रज्जु पर चलती ज्यावक्रीय तरंग में कण की अधिकतम चाल किसके बराबर होती है ?
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- (c)आयाम और तरंगदैर्घ्य के गुणनफल
- (d)तरंगदैर्घ्य और आवृत्ति के गुणनफल
उत्तर(b) आयाम और कोणीय आवृत्ति के गुणनफल
- practice — not a real PYQ
जब कोई तरंग एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाती है, तो निम्नलिखित में से कौन-सी राशि अपरिवर्तित रहती है ?
- (a)चाल
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- (c)आवृत्ति
- (d)आयाम
उत्तर(c) आवृत्ति