FDI अंतर्वाहों में निम्नलिखित में से कौन-सी प्रवृत्तियाँ सही हैं ? 1. 2003 – 04 में, FDI ईक्विटी (साम्या) अंतर्वाह प्रतिशतता वृद्धि ऋणात्मक थी । 2. 2004 – 05 से 2007 – 08 तक FDI अंतर्वाह बहुत उच्च और धनात्मक थे । 3. 2008 – 09 में, FDI अंतर्वाह धनात्मक थे, किन्तु पिछले वर्ष की अपेक्षा घटे थे । नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए :
- (a)केवल 1 और 3
- (b)1, 2 और 3
- (c)केवल 2 और 3
- (d)केवल 1 और 2
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) 1, 2 और 3 — कुछ भी तय करने से पहले यह देखिए कि मापा क्या जा रहा है।
कथन 1 स्वयं शब्द देता है : ‘FDI ईक्विटी अंतर्वाह प्रतिशतता वृद्धि’। यानी जिस शृंखला पर यह प्रश्न चल रहा है वह अंतर्वाह की मात्रा नहीं, उसकी वर्ष-दर-वर्ष वृद्धि-दर है। एक बार यह तय हो जाए तो तीनों कथन उसी शृंखला पर परखे जाने चाहिए।
कथन 1 — 2003 – 04 में वृद्धि ऋणात्मक थी। सही। वह वर्ष गिरावट का था; उससे पिछला वर्ष भी गिरावट का रहा था, इसलिए यह लगातार दूसरा ऋणात्मक वर्ष था।
कथन 2 — 2004 – 05 से 2007 – 08 तक अंतर्वाह बहुत उच्च और धनात्मक थे। सही। यही वह चार-वर्षीय उछाल है जिसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तेज़ी से बढ़ा; इन वर्षों की वृद्धि-दरें बड़ी और धनात्मक रहीं, और अंतिम दो वर्षों में तो वृद्धि दोगुने के आसपास पहुँची।
कथन 3 — 2008 – 09 में अंतर्वाह धनात्मक थे, किन्तु पिछले वर्ष की अपेक्षा घटे थे। इसी शृंखला पर सही। उस वर्ष वृद्धि धनात्मक रही — यानी निवेश बढ़ता रहा — पर वृद्धि की दर पिछले वर्ष की तुलना में तेज़ी से गिरी। यह वैश्विक वित्तीय संकट का वर्ष था और पूँजी-प्रवाह की गति दुनिया भर में मंद पड़ी।
तीनों कथन टिकते हैं, इसलिए उत्तर (b) है।
एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए। चूँकि 2008 – 09 में वृद्धि धनात्मक थी, उस वर्ष का निरपेक्ष अंतर्वाह पिछले वर्ष से अधिक था, कम नहीं; जो घटी वह बढ़ने की रफ़्तार थी। कथन 1 में आया ‘प्रतिशतता वृद्धि’ शब्द ही बताता है कि प्रश्न किस शृंखला की बात कर रहा है — और जो पाठक कथन 3 को मात्रा की बात मानकर पढ़ेगा, वह उसे नकार देगा; कथन 3 को छोड़ने वाला विकल्प ठीक उसी पाठक के लिए रखा गया है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)केवल 1 और 3 — यह समुच्चय कथन 2 को नकार देता है, जो इन तीनों में सबसे पक्का है। 2004 – 05 से 2007 – 08 का दौर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के तेज़ विस्तार का दौर था और उन चारों वर्षों में वृद्धि बड़ी तथा धनात्मक रही। यह वही अवधि है जिसे भारतीय अर्थव्यवस्था के उच्च वृद्धि-चक्र के रूप में पढ़ाया जाता है, जिसमें निवेश, निर्यात और पूँजी-प्रवाह — तीनों बढ़े। इसलिए इस कथन को बाहर करने वाला कोई समुच्चय टिकता नहीं।
- (c)केवल 2 और 3 — यह विकल्प कथन 1 को छोड़ देता है, जबकि वही इस प्रश्न की कुंजी है — दोनों अर्थों में। पहला, तथ्य के स्तर पर : 2003 – 04 में वृद्धि सचमुच ऋणात्मक थी। दूसरा, पढ़ने के स्तर पर : उसी कथन का शब्द ‘प्रतिशतता वृद्धि’ यह तय करता है कि शेष दोनों कथनों को किस शृंखला पर परखना है। कथन 1 को हटा देने पर प्रश्न की भाषा-कुंजी भी हाथ से निकल जाती है और कथन 3 भ्रामक लगने लगता है।
- (d)केवल 1 और 2 — यह वह विकल्प है जो कथन 3 को नकारता है, और उसके पीछे एक समझने योग्य तर्क भी है : यदि कोई ‘अंतर्वाह घटे थे’ को निरपेक्ष राशि के अर्थ में पढ़े, तो कथन ग़लत लगेगा, क्योंकि उस वर्ष वृद्धि धनात्मक थी और राशि बढ़ी थी। पर पूरा प्रश्न वृद्धि-दर की शृंखला पर चल रहा है, जैसा कथन 1 के शब्दों से स्पष्ट है, और उस शृंखला पर 2008 – 09 पिछले वर्ष की तुलना में स्पष्ट गिरावट का वर्ष है। कथनों की सूची को एक ही मापदंड पर पढ़ना — यही इस प्रश्न की असली सीख है।
अवधारणा
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश वह निवेश है जिसमें विदेशी निवेशक किसी उद्यम में स्थायी हित और प्रबंध में भूमिका चाहता है; इसके विपरीत विदेशी संविभाग निवेश शेयर और बॉण्ड में लगाया गया वह धन है जो प्रतिफल की तलाश में तेज़ी से आता-जाता है। इसी कारण पहले को अपेक्षाकृत स्थिर और दूसरे को चंचल माना जाता है।
भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश दो मार्गों से आता है — स्वचालित मार्ग, जिसमें पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होती, और सरकारी अनुमोदन का मार्ग, जो कुछ संवेदनशील क्षेत्रों के लिए है। क्षेत्रवार सीमाएँ नीति में तय की जाती हैं और समय-समय पर उदार की जाती रही हैं।
आँकड़ों को पढ़ते समय तीन भेद ध्यान में रखने चाहिए। पहला, ‘ईक्विटी अंतर्वाह’ और ‘कुल अंतर्वाह’ अलग-अलग राशियाँ हैं; कुल में पुनर्निवेशित आय और अन्य पूँजी भी जुड़ती है। दूसरा, ‘मात्रा’ और ‘वृद्धि-दर’ अलग हैं — किसी वर्ष मात्रा बढ़ सकती है और वृद्धि-दर फिर भी गिर सकती है। तीसरा, आँकड़े वित्तीय वर्ष के अनुसार दिए जाते हैं, इसलिए ‘2008 – 09’ जैसा युग्म एक ही वर्ष का नाम है, दो का नहीं।
यही तीसरा भेद इस प्रश्न में निर्णायक है, और यही सबसे कम अभ्यास में आता है।
इस प्रश्न की अवधि भारतीय अर्थव्यवस्था के दो अलग-अलग दौरों को छूती है। 2002 – 03 और 2003 – 04 का दौर वैश्विक मंदी के बाद का था, जिसमें पूँजी-प्रवाह सुस्त रहा। इसके बाद 2004 – 05 से 2007 – 08 तक तेज़ वृद्धि का दौर आया, जिसमें विदेशी निवेश कई गुना बढ़ा। फिर 2008 – 09 में वैश्विक वित्तीय संकट ने पूँजी-प्रवाह की रफ़्तार पर ब्रेक लगाया, यद्यपि भारत में निवेश उस वर्ष भी बढ़ता रहा।
आँकड़ों की प्रस्तुति भी इस बहस का हिस्सा रही है। नीति-दस्तावेज़ प्रायः वृद्धि-दर की तालिका छापते हैं, जिसमें हर वर्ष के सामने पिछले वर्ष की तुलना में प्रतिशत परिवर्तन लिखा होता है। ऐसी तालिका पढ़ने वाले को यह याद रखना पड़ता है कि ऋणात्मक प्रविष्टि का अर्थ निवेश का ऋणात्मक होना नहीं, बल्कि उसका पिछले वर्ष से कम रह जाना है।
हिन्दी स्तंभ में वित्तीय वर्ष रिक्ति-सहित डैश से छपे हैं — ‘2003 – 04’ — और ‘ईक्विटी’ के बाद कोष्ठक में हिन्दी पर्याय (साम्या) जोड़ा गया है, जो अंग्रेज़ी स्तंभ में नहीं है।
मुख्य तथ्य
- प्रश्न की शृंखला प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के ईक्विटी अंतर्वाह की वर्ष-दर-वर्ष वृद्धि-दर है, निरपेक्ष राशि नहीं — यह कथन 1 के शब्दों से तय होता है।
- 2002 – 03 और 2003 – 04 लगातार दो वर्ष ऋणात्मक वृद्धि के रहे।
- 2004 – 05 से 2007 – 08 तक चारों वर्ष बड़ी और धनात्मक वृद्धि के रहे — यही निवेश-उछाल का दौर है।
- 2008 – 09 में वृद्धि धनात्मक रही पर पिछले वर्ष की तुलना में तेज़ी से गिरी; यह वैश्विक वित्तीय संकट का वर्ष था।
- धनात्मक वृद्धि का अर्थ है कि उस वर्ष की निरपेक्ष राशि पिछले वर्ष से अधिक थी — घटी वह रफ़्तार थी, राशि नहीं।
- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में स्थायी हित और प्रबंध की भूमिका होती है, जबकि संविभाग निवेश अपेक्षाकृत चंचल पूँजी है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- वृद्धि-दर और निरपेक्ष राशि को एक मान लेना — यही इस प्रश्न का मुख्य जाल है।
- ऋणात्मक वृद्धि को ऋणात्मक निवेश समझ लेना, जबकि उसका अर्थ केवल पिछले वर्ष से कम रह जाना है।
- ईक्विटी अंतर्वाह और कुल अंतर्वाह के आँकड़े आपस में बदल देना; कुल में पुनर्निवेशित आय और अन्य पूँजी भी जुड़ती है।
आँकड़ों पर आधारित कथन-सूची में सबसे पहला काम यह तय करना है कि शृंखला कौन-सी है — मात्रा, वृद्धि-दर, अनुपात या हिस्सेदारी। प्रायः किसी एक कथन के शब्द ही यह तय कर देते हैं, जैसे यहाँ कथन 1 का ‘प्रतिशतता वृद्धि’। उसके बाद शेष कथनों को उसी मापदंड पर पढ़िए, न कि अपनी स्मृति के मापदंड पर। दूसरा सुझाव यह है कि ऐसे प्रश्नों में वर्षों की एक मोटी रूपरेखा याद रखिए — कौन-सा दौर मंदी का था, कौन-सा उछाल का, और कौन-सा संकट का; ठीक-ठीक अंक याद रखने की आवश्यकता प्रायः नहीं पड़ती।
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- (a) 1, 2 and 3 only
- (b) 1, 2 and 4 only
- (c) 1, 2, 3 and 4
- (d) 3 and 4 only
उत्तर(c) 1, 2, 3 and 4
इसी प्रश्नपत्र का विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड के कार्यों वाला प्रश्न — विदेशी निवेश की उसी नीतिगत कड़ी से।
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- (a)वह पिछले वर्ष से कम रही
- (b)वह पिछले वर्ष से अधिक रही
- (c)वह शून्य रही
- (d)वह ऋणात्मक रही
उत्तर(b) वह पिछले वर्ष से अधिक रही
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प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विदेशी संविभाग निवेश में मुख्य अंतर क्या है ?
- (a)पहला केवल सरकारी उपक्रमों में आता है
- (b)पहले में स्थायी हित और प्रबंध की भूमिका होती है
- (c)दूसरा केवल ऋण के रूप में आता है
- (d)दोनों में कोई अंतर नहीं
उत्तर(b) पहले में स्थायी हित और प्रबंध की भूमिका होती है